हिन्दी उपन्यास में मनोविश्लेषणात्मक परंपरा के प्रवर्तक जैनेंद्र कुमार का स्थान प्रेमचंदोत्तर उपन्यासकारों में बहुत ही महत्वपूर्ण है।जैनेन्द्रजी का कथा-साहित्य भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का संवाहक रहा है । उन्होंने अपनी संस्कृति और परंपरा के परिप्रेक्ष्य में ही भारतीय मानस की पहचान की है । उन्होंने अपने उपन्यासों एवं कहानियों में अनेक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं जैसे- ईश्वर, आस्तिकता-नास्तिकता, बुद्धि-भावना, अंतःप्रेरणा -तर्क, हिंसा-अहिंसा, प्रेम और वासना, पति और पत्नी, सतीत्व, शरीर की पवित्रता, पाप-पुण्य, समर्पण आदि ।
जैनेंद्र स्वातंत्रयोत्तर भारत में भौतिकता की चमक दमक, परिवार के बिखराव, धन लोलुपता, विवाहेतर संबंधों को देखते हुए ऐसे मुद्दों को उठा रहे थे। जैनेंद्र ने अपने जीते जी देश की राजनीतिक, सामाजिक संरचना में कई रंग और बदलाव महसूस किए। अपने समय व समाज को समझने की उनकी जो दृष्टि थी, उसके अनुकूल उन्होंने पात्र रचे। समाज पर टिप्पणी की, विश्लेषण किया। जैनेंद्र के रचना संसार में नायिकाएँ लेखक से कई बार विद्रोह कर देती हैं, वे जैनेंद्र के स्वप्नों और मंतव्यों से अलग डगर पकड़ने लगती हैं। उनकी स्त्रियों की सीमाएँ हो सकती हैं, यह भी कि वे वैसी स्वतंत्र नहीं जो स्वयं निर्णय लें और उसके सुख दुख झेलें। दरअसल वे घटनाओं की शिकार हैं और 'प्रतिक्रिया' व्यक्त करती हैं। महत्वपूर्ण यह है कि इस प्रक्रिया में वे निश्चित रूप से अपने समय को पीछे छोड़ती हैं। जिस स्त्री ने परंपरा से विद्रोह किया उसी ने ठोकर खाने के बावजूद नई राह बनाई। परंपरा को जैनेंद्र की स्त्रियों ने तोड़ा, नई राह आधुनिक स्त्री विमर्श बना रहा है।
जैनेन्द्र ने प्रेमचन्द के सामाजिक यथार्थ को नहीं अपनाया, लेकिन वे प्रेमचन्द के विलोम नहीं बल्कि पूरक थे। प्रेमचन्द और जैनेन्द्र को साथ-साथ रखकर ही जीवन और इतिहास को उसकी समग्रता के साथ समझा जा सकता है। जैनेन्द्र ने भाषा के स्तर पर काफी मेहनत की। जैनेंद्र के उपन्यासों में दार्शनिक और आध्यात्मिक तत्वों के समावेशन से दूरूहता आई है परंतु ये सारे तत्व जहाँ-जहाँ भी उपन्यासों में समाविष्ट हुए हैं, वहाँ वे पात्रों के अंतर का सृजन प्रतीत होते हैं। जैनेंद्र के पात्र बाह्य वातावरण और परिस्थितियों से कम प्रभावित लगते हैं जबकि अंतर्मुखी गतियों से ज्यादा संचालित। पात्रों की अल्पता के कारण भी जैनेंद्र के उपन्यासों में वैयक्तिक तत्वों की प्रधानता रही है।
इनके सभी उपन्यासों में प्रमुख पुरुष पात्र सशक्त क्रांति के समर्थक हैं। बाह्य स्वभाव, रुचि और व्यवहार में एक प्रकार की कोमलता और भीरुता की भावना होकर भी ये अपने अंतर में महान विध्वंसक होते हैं। उनका यह विध्वंसकारी व्यक्तित्व नारी की प्रेमविषयक अस्वीकृतियों की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप निर्मित होता है। इसी कारण जब वे किसी नारी का थोड़ा भी आश्रय, सहानुभूति या प्रेम पाते हैं, तब टूटकर गिर पड़ते हैं और तभी उनका बाह्य स्वभाव कोमल हो जाता है। जैनेंद्र के नारी पात्र प्रायः उपन्यास में प्रधानता लिए हुए होते हैं। उपन्यासकार ने अपने नारी पात्रों के चरित्र-चित्रण में सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक दृष्टि का परिचय दिया है। स्त्री के विविध रूपों, उसकी क्षमताओं और प्रतिक्रियाओं का विश्वसनीय अंकन किया है। 'सुनीता', 'त्यागपत्र' तथा 'सुखदा' आदि उपन्यासों में ऐसे अनेक अवसर आए हैं, जब उनके नारी चरित्र भीषण मानसिक संघर्ष की स्थिति से गुज़रे हैं। नारी और पुरुष की अपूर्णता तथा अंतर्निर्भरता की भावना इस संघर्ष का मूल आधार है। वह अपने प्रति पुरुष के आकर्षण को समझती है, समर्पण के लिए प्रस्तुत रहती है और पूरक भावना की इस क्षमता से आल्हादित होती है, परंतु कभी-कभी जब वह पुरुष में इस आकर्षण मोह का अभाव देखती है, तब क्षुब्ध होती है, व्यथित होती है। इसी प्रकार से जब पुरुष से कठोरता की अपेक्षा के समय विनम्रता पाती है, तब यह भी उसे असह्य हो जाता है।
गांधीवादी चिंतक, मनोवैज्ञानिक कथा साहित्य के सूत्रधार, साहित्यकार जैनेन्द्र को उनके विशिष्ट दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक साहित्य के लिये भी जाना जाता है। हिन्दू रहस्यवाद, जैन दर्शन से प्रभावित जैनेन्द्र का सम्पूर्ण साहित्य सृजन प्रक्रिया की विलक्षणता और सुनियोजित संश्लिष्टता का अनन्यतम उदाहरण है। जैनेन्द्र के बारे में अज्ञेय ने कहा था आज के हिन्दी के आख्यानकारों और विशेषतय: कहानीकारों में सबसे अधिक टेक्निकल जैनेन्द्र हैं। तकनीक उनकी प्रत्येक कहानी की और सभी उपन्यासों की आधारशिला है। स्त्री विमर्श के प्रबल हिमायती जैनेन्द्र ने कहानी के अंदर प्रेम को संभव किया।
कहानी खेल से उनके लेखन का सिलसिला जो प्रारंभ हुआ तो 24 साल की उम्र तक उपन्यास परख आ गया। उपन्यास 'परख' से सन् 1929 में पहचान बनी। 'सुनीता' का प्रकाशन 1935 में हुआ। 'त्यागपत्र' 1937 में और 'कल्याणी' 1939 में प्रकाशित हुए। 1929 में पहला कहानी-संग्रह 'फांसी' छपा। इसके बाद 1930 में 'वातायन', 1933 में 'नीलम देश की राजकन्या', 1934 में 'एक रात', 1935 में 'दो चिड़ियां' और 1942 में 'पाजेब' का प्रकाशन हुआ। सन् 1929 में ‘परख’ से आरंभ कर सन् 1985 में ‘दशार्क’ के लेखन तक उनका रचनाकाल विस्तृत है। इस समयावधि में जैनेन्द्र ने कुल तेरह उपन्यास लिखे जिनमें से अधिकतर उपन्यासों का कथ्य स्त्री संबंधी है। लेखक ने अपने कुछ उपन्यासों के शीर्षक भी कथा की मुख्य चरित्र रही स्त्रियों के नाम पर ही दिए हैं। जैसे - ‘सुनीता’, ‘कल्याणी’, ‘सुखदा’।
समय और हम, साहित्य का श्रेय और प्रेय, प्रश्न और प्रश्न, सोच-विचार, राष्ट्र और राज्य, काम पे्रम और परिवार, अकाल पुरुष गांधी आदि निबंध जैनेन्द्र की दार्शनिकता और नितांत मौलिक पदस्थापनाओं के कारण जाने पहचाने गए। अपने अधिकांश साहित्य का लेखन डिक्टेशन से कराने वाले जैनेन्द्र के लेखन पर महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर का अत्यधिक प्रभाव था। जिसके प्रत्यक्ष उदाहरण उनके उपन्यास सुनीता और सुखदा हैं जो टैगोर के उपन्यास- घरे बाहरे से प्रेरित हैं। परख और सुनीता को पढ उपन्यासकार मुंशी प्रेमचन्द ने एक बार कहा था जैनेन्द्र में गोर्की और शरतचन्द्र चटर्जी दोनों एक साथ देखने को मिलते हैं। बहरहाल बांग्ला साहित्यकार शरतचन्द्र के उपन्यासों की ही तरह उनके तकरीबन सभी उपन्यासों में स्त्री चरित्र पूरी दृढता के साथ नजर आते हैं। त्याग-पत्र की मृणाल और सुनीता का केन्द्रीय चरित्र सुनीता उपन्यास में अपनी मौजूदगी का अहसास प्रखरता से कराता है। हालांकि उनके स्त्री चरित्र आत्मा की ट्रेजेडी और आत्म प्रपीढन से ग्रसित नजर आते हैं।
जैनेंद्र की आरंभिक तीनों रचनाओं परख (1929), त्यागपत्र (1937) व सुनीता (1935) के केंद्र में स्त्री है। प्रायः प्रेम करती स्त्रियाँ। प्रेम करती ये स्त्रियाँ विचारशील और कर्मठ हैं। अपने पारिवारिक, सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करती ये वे स्त्रियाँ हैं, जिन्होंने पारिवारिक मर्यादा, परंपरा, नियमों की पाखंडी तस्वीर को तोड़ा और जीतने हारने, संघर्ष करने के लिए परंपरागत औरत के चोले से बाहर निकल आईं। जैनेंद्र की साहित्यिक चेतना 'त्यागपत्र' में चरमोत्कर्ष पर है। मृणाल के चरित्र, संघर्ष और त्रासदी ने उसके व्यक्तित्व को अद्भुत ऊँचाई प्रदान की है। 'त्यागपत्र' में आधुनिक हिंदी गद्य साहित्य का सशक्त स्त्री विमर्श सिर्फ स्त्रियाँ ही कर सकती हैं, यदि ऐसी कोई बाध्यता न हो तो प्रेमचंद और जैनेंद्र की कुछ रचनाएँ आधुनिक स्त्री विमर्श के समकक्ष ठहरती है।
इन स्त्रियों ने कर्तव्य निर्वाह करते हुए जिस प्रकार नैतिकता, मर्यादा का विश्लेषण किया, जिस तरह सामाजिक संरचना में रचे बसे पाखंड को तार तार किया वह भविष्य की अधिकारसंपन्न स्त्री के लिए रास्ता बनाता है। जैनेंद्र की इन स्त्रियों ने कहीं स्वेच्छा से अपना जीवन नहीं चुना है। अक्सर यही हुआ कि उनके मन की जो बात थी, मन में ही उसका दम घुट गया। लेकिन परिस्थितियों का सामना करने में इनके वजूद की जद्दोजहद प्रकट होती है। नियति की शिकार होने के बाद भी इन स्त्रियों ने अपने लिए रास्ते जरूर बनाए या कम से कम रूढ़ रास्तों से ऐतराज दिखाया।
मृणाल हिंदी साहित्य की पहली आधुनिक स्त्री है जो नैतिकता की परंपरागत मान्यता को सिरे से खारिज करती है। वह न सिर्फ अपने स्त्रीत्व व अस्मिता के प्रति सजग है बल्कि खुद को तिल तिल जला कर भी वह नया रास्ता अख्तियार करती है। सच है कि जलना उसके जैसी स्त्रियों के नसीब में होता है, पर वह घर में इज्जत बचाते दम नहीं तोड़ती। मृणाल ने घर छोड़ा, बाहर निकली और हाशिए के लोगों के बीच पहुँच गई। यहीं उसका व्यक्तित्व नए आयाम पाता है। उसके पास समाज व लोगों को समझने के लिए तार्किक बुद्धि है जो कथित सभ्य समाज के ढोंगों का पर्दाफाश करती है। जिंदगी के आखिरी मुकाम पर वह शराबी, जुआरी, भिखारियों, वेश्याओं जैसे कथित दुर्जनों के बीच है। मृणाल इनके बीच भी इनकी ऊपरी परत खरोंच कर इनसानियत पा जाती है। मृणाल समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों की सच्ची सहृदयता का सम्मान करती है। तभी वह कहती है 'वहाँ छल असंभव है जो छल कि शिष्ट समाज में जरूरी ही है।' मनुष्य हो तो भीतर एक मनुष्य होना होगा। कलई वाला सदाचार यहाँ खुल कर उघड़ रहता है। यहाँ खरा कंचन ही टिक सकता है। क्योंकि उसे जरूरत नहीं कि वह कहे 'मैं पीतल नहीं हूँ'। दरअसल मृणाल सभ्य समाज के सदाचार की ही शिकार थी। किसी से प्रेम कर बैठना ही मृणाल का कदाचार था। उसका पालन पोषण तो इसलिए हो रहा था कि वह एक अच्छी आर्य स्त्री बने। जबरदस्ती दूसरे से विवाह के बाद जब वह दांपत्य की नींव सच्चाई पर रखना चाहती है तो पति की नजर में दुराचारी हो जाती है। सच्चाई का बोझ पति की मर्दानगी के लिए कहर है। पछाँह का घी खाया मर्द उसकी बेंत से धुनाई करता है। साथ ही यह धौंस भी देता है कि 'बहू बेटियों की चलन की रीति नीति हुआ करती है।' '...अपना कुल शील चला जाता है, वह न निभा तो फिर क्या रह गया'। इस कुल शील का मतलब यही था कि पति की हर जायज नाजायज इच्छा को शिरोधार्य किया जाए। कुल शील की ओखल में स्त्री के सिर पर दनादन मूसल बरसते रहें और वह सहती रहे। पति ने दुश्चरित्रता का आरोप लगा कर मृणाल को छोड़ दिया तो उसका कोई सहारा नहीं। मायके में उसकी जगह तभी तक थी जब तक पति का घर था। घर आने की शर्त ही थी कि 'वहाँ अपनी गृहस्थी अच्छी तरह सँभालना और पति को सुखी रखना' पर मृणाल से तो गृहस्थी ही बिखर गई थी अब नैहर में ठौर कहाँ? स्त्री को मिलने वाले आशीर्वादों का बोझ कैसा होता है, इसको जैनेंद्र ने समझा है।
'पतिव्रता रहने पूतों फलने, बड़भागिन होने आदि के आशीर्वाद उन्होंने ऐसे प्रणत भाव से दिए कि मानो उसके नीचे वह गड़ कर भी मर जाए तो धन्य हो जाए' पर मृणाल विद्रोहिणी निकली उसने 'अन्य' होना स्वीकार न किया। वह कहती है 'क्यों पतिव्रता को यह चाहिए कि पति उसे नहीं चाहता तब भी अपना बोझ डाल दे? मुझे देखना भी नहीं चाहते, यह जान कर मैंने उनकी आँखों के आगे से हट जाना स्वीकार कर लिया।' मृणाल ने अलग रहना स्वीकार किया और पति ने उसे शहर के बाहरी हिस्से की एक कोठरी में पटक दिया। आत्महत्या का विकल्प मृणाल के सामने कभी नहीं था। वह मरने को अधर्म मानती है। उसे जीना था, भले मर कर ही सही। रोटी चलाने में मृणाल की मदद एक निहायत ही मामूली आदमी करता है। यह आदमी मृणाल के रूप यौवन पर आसक्त है। मृणाल इसे समझती है फिर भी वह सहारा देने के लिए उसकी कृतज्ञ है। शीघ्र ही मृणाल परिश्रम से अपनी जीविका अर्जित करने लगती है। उसके गर्भ धारण करते ही दूसरा आदमी उसे छोड़ कर भाग जाता है। मृणाल स्वयं यही चाहती थी कि वह अपने परिवार में लौट जाए। क्योंकि वह समझती थी कि उसके साथ सोने के कारण वह उसे बदजात और बाजारू औरत ही समझेगा। दुख और अपमान की पीड़ा मृणाल को इस मनःस्थिति में पहुँचा देती है कि वह अपने दर्द से ही दवा हासिल करती है : 'मेरा मन पक्का होता रहे कि कोई मुझे कुचले, तो भी मैं कुचली न जाऊँ और इतनी जीवित रहूँ कि उसके पाप के बोझ भी ले लूँ और सबके लिए क्षमा की प्रार्थना करूँ।'
इतनी उदारता निर्वेयक्तिक सोच से ही आ सकती है। मृणाल ने अपने कष्टों को भी साक्षी भाव से देखा तभी अहं का विर्सजन कर पाई। दूसरे मर्द के छोड़ कर जाने के बाद, प्रसूति के लिए मृणाल जब मिशनरी अस्पताल पहुँचती है तो वहाँ उसे धर्म परिवर्तन का प्रलोभन मिलता है किंतु वह धर्म परिवर्तन को राजी नहीं होती है। गौरतलब है कि धर्म परिवर्तन से इनकार वह इसलिए नहीं करती कि हिंदू धर्म में उसकी गहरी आस्था है। ऐसा वह इसलिए करती है कि वह स्त्री है और उसकी स्थिति के लिए किसी भी धर्म में कोई रियायत नहीं है।
जैनेंद्र के स्त्री पात्रों में एक और समानता है वे सभी, रिश्तों की बुनियाद सच्चाई पर रखना चाहती हैं। अपने तथा दूसरे के प्रति ईमानदार रहने की आकांक्षी हैं। परख की कट्टो, त्यागपत्र की मृणाल, सुनीता की सुनीता, मुक्तिबोध की नीना और दर्शार्क की वेश्यावृति करने वाली रंजना, ये सभी अपने कार्य के प्रति जिम्मेदार हैं और सीधा जवाब देती हैं। जैनेंद्र के यहाँ स्त्री प्रेम को स्वीकारती है, पर वह यथासंभव विवाह संस्था के संरक्षण का प्रयास करती है। जैनेंद्र की कहानी 'जाह्नवी' में स्त्री प्रेमी की प्रतीक्षा में हर दिन कौओं को रोटी खिलाती है। जाह्नवी रोटी खाते कौओं से मनुहार करती है कि वे उसके सारे अंग चाहे नोच खा लें पर दो आँखों को छोड़ दें। ये आँखें पियु का इंतजार कर रही हैं। इसी लड़की 'जाह्नवी' का जब विवाह तय हो जाता है तो वह भावी पति को पत्र लिख अपने प्रेमी के बारे में बताती है। वह साफ साफ कहती है कि जीवनसंगिनी बनने में वह असमर्थ है। हाँ अनुगता बन कर वह कर्तव्य निर्वहन भली भाँति कर सकती है। संयोग से जाह्नवी की इस सच्चाई का सम्मान होता है। पर त्यागपत्र में मृणाल की सच्चाई ही उसकी मुसीबतों का कारण बन जाती है। मुसीबतों को न्यौता तो मृणाल खुद देती है प्रेम करके। इस प्रेम को यह सिला मिलता है कि उसे 'कुलबोरन' कहा जाता है।
मृणाल भाई के संरक्षण व भाभी के अनुशासन में बड़ी होती है। भाभी के लिए वह दायित्व है। मृणाल को सुगृहणी बना कर ससुराल भेजना भाभी की जिम्मेदारी है। यहाँ दो स्त्रियों के मध्य निकटता न होकर अनुशासन की औपचारिक दूरी है। घर में मृणाल मात्रा अपने भतीजे प्रमोद के साथ नैसर्गिक रूप से रहती है।
युवा होती लड़कियों की तरह वह खुद से, आकाश से, बादल से, तारों से, हवा से प्रेम करती है। इन्हीं प्रेमों के बीच प्रेम मूर्त हो गया तो बगिया की तरह लहलह हो जाती है। यही प्रेम मृणाल को हुआ है जिसकी वजह से वह चिड़िया बन जाना चाहती है। चिड़िया नन्हीं है पर स्वतंत्र है, उड़ सकती है। मृणाल उड़ने से पहले ही पकड़ ली गई और सजा मुकर्रर हो गई।
ससुराल से लौट कर मृणाल बुझी बुझी है। प्रमोद उससे कुछ सुनना चाहता है जो वह सुनता है, उसके बाल मन को भेदने के लिए पर्याप्त है 'तुम सब लोगों के लिए मैं पराई हूँ। तेरी माँ ने मुझे धक्का देकर पराया बना दिया है। पर मुझे जहाँ भेज दिया है प्रमोद मेरा मन वहाँ का नहीं है।'
मृणाल यहाँ स्पष्टतया कहती है कि उसे धक्का देकर खदेड़ा गया है। वह अवांछित वस्तु है। इसका उसे एहसास है। मायके में उसे सुनना पड़ा 'आइंदा इस तरह बिना फूफा की मर्जी से चली आएगी तो वह उन्हें अपने घर में आश्रय न देंगे।' मृणाल आश्रिता और सामान बन कर रह गई है। वह प्रमोद से खुद को 'फूफा की चीज' कहती है।
'त्यागपत्र' की रचना 1937 में हुई थी। उस समय के भारत में महिला सशक्तिकरण व महिला साक्षरता दर का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। मृणाल इतनी बहादुर नहीं थी कि घर छोड़ कर, प्रेमी के साथ निकल जाती। उसने बेमेल विवाह में भरसक सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया था, पर पति के व्यवहार ने उसे तोड़ दिया। ऐसा नहीं था कि मृणाल प्रतिरोध नहीं करती। पति के ठहरे गर्भ को गिराने की कोशिश, विरोध था। मृणाल के गर्भ पर सिर्फ मृणाल का अधिकार था। इसके विपरीत मृणाल दूसरे आदमी (कोयले वाले) से ठहरे गर्भ को जन्म देती है। क्योंकि 'इस पाप को ढो रही हूँ' कहने के बावजूद वह कोयले वाले की कृतज्ञ है। आसनाई के लिए ही सही पर उसने मृणाल को घर परिवार छोड़ कर सहारा दिया था। मृणाल युवा है और अपनी दैहिक जरूरतों को छिपाती नहीं। वह कहती है 'तन दे सकूँगी शायद वह अनिवार्य हो।' तन की जरूरत के बारे में इतने कुंठामुक्त तरीके से तब कितनी औरतें बोल रही थीं? मृणाल देह को पारस्परिक आवश्यकता मान रही है पर वह देह का सौदा करने के सख्त खिलाफ है। यह उसका ऊँचा वसूल है। अन्यथा दर दर की ठोकर से उसे कुछ राहत अवश्य मिली होती। मृणाल की यौवन की उमंगें बेरहमी से कुचली गई थीं। फिर भी मृणाल अपनी आंतरिक गरिमा व स्वाभिमान से समझौता नहीं करती। जैनेंद्र स्त्री की क्षमता का विस्तार घर से बाहर भी चाहते हैं।
इन नारी पात्रों ने समाज और संस्कृति की बलिवेदी पर अपना आत्मबलिदान किया है । जैनेन्द्रजी ने न तो इनका आदर्शवादी समाधान दिया और न ही मार्क्सवादियों की तरह क्रांति का आह्वान किया, बल्कि बुद्धिजीवी वर्ग पर ही यह प्रश्न अनुत्तरित छोड़ दिया । उनके ये नारी पात्र आत्म-बलिदान करते हुए पाठकीय संवेदना को जाग्रत करने में सफल हो गए हैं । यहाँ जैनेन्द्रजी ने सटीक चित्रण कर सांस्कृतिक परिष्करण को हमारे समक्ष एक आवश्यकता के रूप में प्रस्तुत कर दिया । इन स्त्रियों की पीड़ा सामाजिक विषमता जनित होते हुए भी उन्होंने समाज की महत्ता को स्वीकार किया । मृणाल कहती है- “ मैं समाज को तोड़ना फोड़ना नहीं चाहती । समाज टूटा कि फिर हम किसके भीतर बनेंगे या किसके भीतर बिगड़ेंगे?” अपनी ओर से नितांत निरपराध होते हुए भी वेदना और कवकलता में इन नारियों का घुलना पाठकीय संवेदना को जाग्रत करने और सहानुभूति प्राप्त करने में सफल रहा है । इससे समाज और संस्कृति की विसंगतियों को जैनेन्द्रजी ने उजागर करके भी इनके महत्त्व को नकारा नहीं ।
जैनेन्द्र कुमार स्त्री को ‘सर्वस्व’ रूप में स्वीकार करते हैं। यह रूप अपनाते ही 'स्त्री’ पूरे विश्व का मूलाधार बन जाती है। उनका मानना है –‘स्त्री ही व्यक्ति को बनाती है, घर को, कुटुम्ब को बनाती है। फिर उन्हें बिगाड़ती भी वही है। हर्ष भी वही और विमर्श भी। ठहराव भी और उजाड़ भी। दूध भी और खून भी। रोटी भी और स्कीमें भी। और फिर आपकी मरम्मत और श्रेष्ठता भी सब कुछ स्त्री ही बनाती है। धर्म स्त्री पर टिका है, सभ्यता स्त्री पर निर्भर है और फ़ैशन की जड़ भी वही है। एक शब्द में कहो ,...दुनिया स्त्री पर टिकी है।
त्यागपत्र में मृणाल एक प्रबल चरित्र के रूप में उभरती है। वह अत्यंत उदार व आदर्शवादी चरित्र के रूप में उभरती है जो स्वयं के जीवन में अपार कष्ट पाकर भी सदा दूसरों के लिए केवल सुख की ही आकांक्षा रखती है। उसके मन में अपनी परिस्थितियों के लिए ज़िम्मेदार लोगों के लिए कोई कटुता नहीं और न ही वह किसी को दोषी मानती है। मृणाल अपने जीवन में जिससे भी जुड़ना चाहती है या जुड़ी वह केवल सत्य और पूरी निष्ठा के साथ, फिर उस पर अपना सर्वस्व न्योछावर करना चाहा। समाज की नजरों में वह एक बाज़ारू औरत है किन्तु तन देकर धन की उम्मीद करना वह बेमानी समझती है। जीवन में मिली ठोकरों की प्रतिक्रिया वह केवल मौन आत्मसंघर्ष के रूप में व्यक्त करती है। अपने संघर्षमय जीवन में सामाजिक नियमों का वह सदा तिरस्कार करती है। मृणाल जैसा स्त्री चरित्र तथाकथित सभ्य समाज की ‘सभ्यता’ पर सवालिया निशान लगाता है, समाज के भीतर दोहरा स्वरूप लेकर विचरण करते लोगों को बेनक़ाब करता है और विवश करता है बुद्धिजीवी वर्ग को सामाजिक नियम-कानून, नैतिकता, आदर्श की परिभाषाओं पर पुनर्विचार करने के लिए।
वर्तमान संदर्भों में यह स्त्री चरित्र अधिक पारंपरिक और कम आधुनिक नज़र आती हैं। जिस युग में जैनेन्द्र उपन्यासों की रचना प्रारम्भ करते हैं अर्थात् 20वीं शताब्दी का दूसरा-तीसरा दशक, यह काल भी परम्परा और आधुनिकता के संघर्ष का समय है। कट्टो, सुनीता और मृणाल पारम्परिक इन अर्थों में हैं कि वे जानती हैं कि तत्कालीन सामाजिक संरचना के तहत वे कर्तव्यों से बंधी हैं। उनके यह कर्तव्य उनके परिवार के प्रति हैं। जैनेन्द्र के यहाँ परिवार और विवाह संस्कार परम्पराओं से जुड़ा है। अतः इनका निर्वाह करने वाली स्त्री पारम्परिक ही होगी। इन स्त्रियों में परिवार या विवाह संस्था को तोड़ने की इच्छा नहीं है क्योंकि इनसे कटकर या बाहर निकलकर ‘जीवन’ गर्त की ओर बढ़ता चला जाएगा। मृणाल के दुखद अंत के माध्यम से जैनेन्द्र यही संकेत देना चाहते हैं क्योंकि जैनेन्द्र स्त्री की स्वतंत्र सत्ता के पक्षधर नहीं हैं। ‘त्यागपत्र’ में प्रमोद के माध्यम से वे कहलवाते हैं- ‘विवाह की ग्रंथि दो के बीच की ग्रंथि नहीं है वह समाज के बीच की भी है। चाहने से वह क्या टूटती है। विवाह भावुकता का प्रश्न नहीं है, व्यवस्था का प्रश्न है।.. वह गांठ है जो बंधी कि खुल नहीं सकती। टूटे तो टूट भले ही जाए लेकिन टूटना कब किसका श्रेयस्कर है?’ पारम्परिक यह स्त्रियाँ इन अर्थों में भी हैं कि इन्हें अधिकारसंपन्नता प्राप्त नहीं है जो कि तत्कालीन समय का भी प्रभाव है। अधिकार पाने हेतु यहाँ स्त्री लड़ती नहीं किन्तु स्त्री हेतु समाज के द्वारा बनाये गए नियमों व वर्जनाओं का पालन भी नहीं करती। स्वायत्तता की दरकार इन्हें नहीं है, पति के साथ होते हुए आर्थिक आत्मनिर्भरता की आवश्यकता भी इन्हें नहीं है क्योंकि जैनेन्द्र स्त्री को पुरुष की सहभागी के रूप में देखते हैं, प्रतिद्वंद्वी के रूप में नहीं। जैनेन्द्र कुमार का मत है- ‘स्त्री पुरुष के पौरुष स्पर्धा में न पड़े बल्कि उसे उसी रूप में धारण करके कृतार्थता का अनुभव करे। आज का कैरियिस्ट शब्द सतीत्व के अर्थ स्पष्ट करता है। कैरिज़्म में पुरुष से होड़ है। सतीत्व में पुरुष से योग और सहयोग से है|’ आज के आधुनिक संदर्भों में ऐसी मान्यताओं को इन स्त्री चरित्रों की सीमाओं के रूप में भी देखा जा सकता है। किन्तु जैसा कि कहा जा चुका है कि जैनेन्द्र कुमार का समय परम्परा व आधुनिकता के संघर्ष का समय रहा है और ऐसे समय में जैनेन्द्र परस्पर विरोध एवं प्रतियोगिता की अपेक्षा सामंजस्य का मार्ग चुनते हैं। उनके भीतर न जड़ परम्पराओं को ढोते रहने का आग्रह है और न ही आधुनिकता के नाम पर अपना सब कुछ ताक पर रख देने का चलन है। जैनेन्द्र के साहित्य का मूल तत्व ‘प्रेम’ है। ‘प्रेम’ का उत्कृष्ट रूप जैनेन्द्र ‘स्त्री’ के भीतर पाते हैं। यही कारण है कि परिवार तथा विवाह संस्थान बचाए रखने का दायित्व उन्होंने स्त्रियों के हाथ में दिया। ‘प्रेम’ के अभाव में जैनेन्द्र विवाह और परिवार की नीँव को कमज़ोर व अधूरा मानते हैं। दरअसल जैनेन्द्र ने मानवीय दुनिया की अपेक्षा आत्मिक दुनिया पर ज्यादा लिखा वे यथार्थ की जगह विचारों की बात ज्यादा करते हैं जो उन्हें रूसी साहित्यकार दास्तोएव्सकी के नजदीक रखता है। एक दौर वह था जब उपन्यास, कहानियों में यशपाल और जैनेन्द्र द्वारा नारी के बोल्ड चित्रण से उनकी साडी-जम्पर उतारवाद का प्रवर्तक भी कहा गया तथा उन पर साहित्य में नैतिकता की गिरावट और अश्लीलता के आरोप मढे गए, अपने ऊपर लगे इन आरोपों का जवाब जैनेन्द्र ने अपने निबंधों के जरिए ही दिया। अश्लीलता यदि है तो वस्तु में नहीं व्यक्ति में है, असल में नैतिकता की दुहाई देने वाले लोग वे ही हैं जो सुविधा प्राप्त हैं, वे अपने भोग और आराम को बचाये रखने के लिए नीतिवादिता से अपनी रक्षा में चारों ओर घेरा डालते हैं अंग्रेजी में एक शब्द है कंजरवेटिव नैतिकता की दुहाई ऐसे ही लोग देते हैं।
अपनी जिंदगी में उच्च आदर्शो को ओढने वाले सादगी-करूणा की प्रतिमूर्ति जैनेन्द्र सही मायने में सत्यान्वेषी थे जिनके लिए अपनी आत्मा की आवाज सर्वोपरि थी और जिसका पालन उन्होंने मरते दम तक किया।
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बेहद सठीक एवं सार्थक समीक्षा , बेहतर और प्रभावी व्याख्या।
जवाब देंहटाएंत्यागपत्र शीर्षक की सार्थकता मिल सकती हैं क्या?
जवाब देंहटाएंKarmbhumi upanyas ki samiksha mil Sakta hai kya
जवाब देंहटाएंजैनेन्द्र के त्यागपत्र उपन्यास की कथावस्तु मिल सकती है क्या?
जवाब देंहटाएंमृणाल का चरित्र चित्रण करें ।
जवाब देंहटाएंत्याग पत्र उपन्यास का विश्लेषण करते हुए मूल संवेदना मिल सकती है ???
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