बुधवार, 22 जून 2016

सुशील कुमार की "दियारा में रेत होती जिंदगी"

तपती धरती और चिलचिलाती गर्मी में आई बारिश की बूंदों से धरा का आंगन ही नहीं खिलखिला रही है बल्कि आत्मा को भी अजीब खुशी मिल रही है. मनुष्य के साथ-साथ सृष्टि का हर जीव खुशी का गीत गुनगुनाए जा रहा है. सूखती नदियाँ अपनी जवानी को फिर से पाकर इठला रही है. लेकिन इन सबों के बीच भी याद आती है एक जिंदगी – दियारा के लोगों की जिंदगी. जी हां, नदियों के बालू में पलने वाली जिंदगी, उसके सुख और दुःख के पल, जिनकी जिंदगी बारिस की बूंदों से ही प्रभावित होती है. और याद आती है कवि सुशील कुमार की दियारा में रेत होती जिंदगी. खुद ही करीब से महसूसें सुशील कुमार की कविताओं में दियारा की जिंदगी को. 
दियारा में रेत होती ज़िन्दगी

दियारा - (एक) :

न शहर न गाँव है
न ठाँव है कहीं न छाँव है
रेत से पटा दयार है
दूर तलक पसरा सन्नाटा है
निस्पंद गंगा के कछार का
हाँ, यह दियारा इलाका है

ठौर-ठौर जल-जमाव है
छिछली नदी में एक – दो नाव हैं
नाव में चढ़ते-उतरते दियारा के लोग
और लोगों को टेरते मल्लाह
खेते जाते हैं अपनी पतवार,
मगन होकर गुनगुनाते जाते हैं
दु:ख से भींजे कोई गीत 

मौन दियारावासी खुले आसमान के नीचे
बीच कभी ठुठ्डियों पर
अपनी उंगलियाँ टिकाये,
कभी घुटनों के बल टिके
तो कोई निर्निमेष निहारता जाता
क्षितिज पर अनंत शून्य
तो कोई नाप रहा होता
जल राशि के अपार विस्तार के साथ
मन ही मन अपनी घनीभूत पीड़ा

समय मानों ठहर गया हो यहाँ !
न जाने किस दुश्चिंता में ऊब-डूब
कांतिम्लान इन चेहरों पर उछरी
कितनी-कितनी लकीरें
कहती हैं दियारा के दर्द की अनगिन गाथाएँ !

समय के प्रवाह में बहता जीवन की
नाव, फिर हिचकोलें खाती है
केवट का स्वर-लय टूटता है
नदी का मौन भंग हो जाता है
आ जाता है घाट
और पथ

उतारता है नाविक यात्रियों को
उस पार हौले-हौले
जहाँ मयस्सर है सिर्फ़
गंगोटी का बलुआही सफ़र --
रेत की सर्पिल पगडंडियाँ --
जहाँ देखता हूँ कुली-पिट्ठूओं का दल
जो घाट पर कब से उनकी बाट जोह रहे हैं !

मौसम के सिवा यहाँ कुछ भी खुशग़वार नहीं
रेत होती दियारावासियों की ज़िन्दगी में
खुशियाँ कम हैं ग़म ज़्यादा
विकास की आखिरी किरण से महरुम
जनपद-मुख्यालय से कटा
दियारा में सुविधाओं का नामोंनिशान नहीं ;
झोपड़पट्टियों में बेहाल लोग
न सड़कें  न बिजली  न पेयजल
न पक्के मकान  न दुकान
हाथ हज़ार पर रोजगार नहीं
अर्द्धनग्न या लंगोट पहने
थिगड़ों में लिपटे पुरुष
दीखते हैं दियारा में कहीं तो
स्त्रियाँ फटे बसन अपनी देह चुरातीं
बच्चे भी नंग-धड़ंग
जो स्कूल जाने के बजाय गृहस्थी में हाथ बटाते –
मछलियाँ-केकड़े-घोंघे की खोज में 
चहबच्चों में कमर तक कीचड़ गहडोरते,
कितना  हृदयविदारक है –
उन बाल-गोपालों के हाथ
कभी कलम नहीं गहे

ले-देकर बस एक खेती है गुजर-बसर को
और खेत भी ज्यादातर रेत-सने हैं !

फसल के साथ इलाके में
अपराध भी खूब फलते हैं
बोता कोई है, काटता कोई है
फसल-कटाई के दिनों कई बार
पसीने की जगह खू़न टपकते हैं खेतों में
हत्याएँ और लूट तो सरेआम है

दियारा - (दो) :

साँझ गहराते ही
बच्चों की आँख की तरह
बंद हो जाते हैं दियारा के रास्ते
दूर-दराज गाँवों में कहीं
जुगनुओं की तरह टिमटिमाती हैं लालटेनें
बाकी सारा दियारा निमग्न होता है
घुप्प अँधेरे में,
झिंगुरों की आवाज़ में
टोडों की टर्राहट में
तेज हवाओं की सरसराहट में

लाचार हो या बीमार कोई
राशन - पानी का इंतजाम करना हो
या दवा - दारु का,
कोसों पैदल चलकर ही
तय होती है दियारा में
बाज़ार-अस्पताल की दूरियाँ

दियारा :(तीन)

आषाढ़ के आते - आते नदी फूलने लगती है
तब राई सी मुसीबत भी पहाड़ बन जाती है
दियारावासी लहरों पर अपनी आँख बिछाये
नदी-माँ से कोप बरजने की प्रार्थनाएँ करते
कोशी-बलान-कमला-गंडक भी उफनती
गंगा से गले मिलती हैं सावन में
पर सँभाल नहीं पाती गंगा अपनी बहनों की बाढ़
नेपाल का बैराज खुलते ही
बेतरह खौलने लगती है वह
और तटबंध भहराने लगते हैं

लोग घर-बार छोड़ भागने लगते हैं
लील जाती है कई बार हहराती गंगा
पूरा का पूरा दियारा
बह जाते हैं कई जानें-माल–मवेशी
किसानों के सालों सँजोये सपने भी

जो बच पाते हैं इस विभीषिका से
उनकी आँखों में होता है
दु:खों के अंतहीन जंगल
और सिर पर उनके खुला आसमान

दियारा-(चार) :

जब मेघ उतर आते है खाड़ी में
नई जलोढ़ मिट्ट्याँ पट जाती है समूचे दियारा पर
और मृण्मय श्मशानी चुप्पियां फैल जाती है दूर तक

फिर होती है कई सरकारी घोषणाएँ
और राहत के नाम पर एक बार फिर
लूट का बाज़ार गर्म होता है
कुछ सेर मोटे अनाज और कुछ रुपये
मुआवज़े के बतौर बाँटकर
दियारावासियों को फुसला लिया जाता है
हर बरसात में

घर-दुआर माल-मवेशी खेत-खलिहान
ओसारों में चहकते छोरे
खेतों में लहलहाते धानों की बालियाँ
चौपालों में गूँजते गीत
पागुर करती गायों के स्वर
यानि कि विस्थापन का पूरा स्मृतिचित्र ही
दिन-रात तैरता है बेबस आँखों में
और हरदम एक हूक-सी
उठती है दियारावासियों के दिल में।

कवि का परिचय-वृत
     सुशील कुमार
  • जन्म-13/09/1964. पटना सिटी (बिहार) में।
  • सम्प्रति मानव संसाधन विकास विभाग,रांची (झारखंड) में कार्यरत
  • संपर्क -  सहायक निदेशक/प्राथमिक शिक्षा निदेशालय/ स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग/एम डी आई भवन(प्रथम तल)/ पोस्ट-धुर्वा /रांची (झारखंड) – 834004
      ईमेल –   sk.dumka@gmail.com
      मोबाईल न. 0 9431310216 / 0 9006740311
§  प्रकाशित कृतियां – कविता-संग्रह  कितनी रात उन घावों को सहा है (2004), तुम्हारे शब्दों से अलग (2011), जनपद झूठ नहीं बोलता (2012)
  • कविताएं और आलेख साहित्य की मानक पत्रिकाओं व अंतर्जाल-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित।  


मंगलवार, 21 जून 2016

माँ पर केंद्रित सुभाष रूपेला की कुछ कविताएं।

सुभाष रूपेला
माँ शब्द जितना पवित्र एवं व्यापक है उतना ही अनमोल भी। एक माँ अपने बच्चों की खुशी के लिए क्या-क्या नहीं करती? हां, ये अलग बात है कि समय के साथ माँ के रहन-सहन में बदलाव आया है लेकिन इससे माँ के महत्व में कहीं कोई कमी नहीं आ जाती। आज पढते हैं माँ पर केंद्रित सुभाष रूपेला की कुछ कविताएं।

माँ
है होती नसीब माँ से दुनिया,
बिन माँ कोई जग में आया कहां?
पला कहां, जिया कहां?
इंसान तो क्या, भगवान भी,
क्या माँ की गोद में नहीं पला?
कौशल्या देवकी और यशोदा को
राम और कृष्ऩ क्यों भूलें भला?
त्याग नींद अपनी, लाल को वो सुलाती,
दुख की धूप को वो, ममता-छाया से हरती,
हरि तो जग में हैं दिखते किसको?
माँ तो मिलती है हर किसी को.
ऑक्सीजन है जीवन में माँ,
सूरज है अंधेरे में माँ,
जल है प्यास में माँ,
सहारा है संकट में माँ,
बहार है खिजां में मां,
है हँसती हुई हस्ती माँ.
लाल की दौलत-ए-जन्नत है माँ.
सबकी कामना यही है माँ,
कुछ भी बदले इस जहां में,
बदले न कभी प्यारी न्यारी माँ,
मदर डे क्या, हर दिन ही,
बेटा न भूले कभी माँ.

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क्यों रहे माँ बेचैन
करुऩा बन उमड़ पड़ी ममता उस माँ की,
सोते-जागते दिखने लगी, सूरत अपने लाल की.
पूछती फिरती नुस्खे प्रगति के, है कौन-सी गली वो है न भटकी?
रटती थी लाल का नाम यों, जपती हो मानो राम राम,
मन्नत दुआ सब करती, चाहे हो सुबह या हो फिर शाम.
तीर्थ-तीर्थ वो जाती, पीर बाबा सब वो मानती,
झाड़-फूँक सब वो करवाती, बाँवरी-सी सब कहीं फिरती.
फिरकी-सी थी वो फिरती, थकती नहीं, वस रहती सदा चलती.
नंबर वन बना बेटे को रहेगी, उसकी साँस है जब तक चलती.
चिंता के पानी में चीनी-सी थी वो घुलती,
धुन देख उसकी लोग समझते उसे सनकी.
आते-आते रैंक रह गया,
आई. आई. टी. का चांस रह गया,
जाते जाते प्राऩ बच गया,
दिमाग लेकिन गुम हो गया.
जीने का चैन उड़ गया,
मुर्दे-सा जिस्म हो गया.
आज भी दिखती वो माता,
कलेजा मुँह को आ जाता.
खुद की लगन से आता है रैंक, खोलो क्वालिटी टाइम बैंक
झाड़े से है सुधरा कभी, किसी के दिमाग का टैंक?
ऐसी सनक न किसी को चढ़ाए भगवान!
पास हो जाए लाल, बस इतना रहे अरमान.

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माँ का दर्द
माँ तो लुटा देती है सब,
पर बेटा लौटाता है कब?
“इससे तो बेहतर है बैंक, हे नाथ,
लौटाता है मूलधन ब्याज के साथ।“
श्रीमती की आपत्ति
लाखों कमाती हूँ,
गरीब श्रीमान के हाथ थमाती हूं,
उनके रिश्तेदार फिर भी मुझे भार ही समझते हैं –
तभी तो मुझे श्रीमती गरीब चंद नहीं, उनकी भार्या ही कहते हैं।
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मस्त लापरवाह माँ
गोलगप्पे खाती रही, गप्पें लगाती रही;
सखियों संग मस्त सदा, सुध घर की जाती रही।
किट्टी में जाती रही, क्लबों में छाती रही;
मॉल में डोलती रही, बच्चों ने ये सब सही।
बड़ा बेटा फ़ेल हुआ, रात घर से भाग गया;
चिंता क्या उसकी करे, धब्बा था जो धुल गया।
एक दर्पऩ टूट गया, रोशनी वो लूट गया;
आँखों में था वो लगा, मँझला नाबीना हुआ।
गली में ठग आ गया, छोटे को उठा ले गया;
माँ को थी फुरसत कहां? आज़ादी वो दे गया।
रग रग में ड्रग घुस गई, पुड़िया से गुड़िया गई;
मस्ती का नशा माँ पे, अपने में वो खोती गई।
ध्यान से जो न पालती, औलाद क्यों वो जनती?
लापरवाह माँ होती, बच्चे रुल जाते तभी।
बच्चे तो फूल-से हैं, माली-सी माँ सीँचती;
घर की फुलवारी सदा, रखवाली से खिलती।
बच्चों की कीमन पे, ऐश करना न तुम कभी;
गोदी के तारे हैं ये, हीरे जवाहर सभी।
मोमबत्ती-सी माँ हो, करुऩा को पिघलती हो;
रोशनी को जलती हो, लाल को दुलारती हो!
भगवान मेहर करना, हर घर पे नज़र रखना;
बच्चों में खोई रहे, ममता-सी माँ भेजना!!!
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सोमवार, 20 जून 2016

मानिक बच्छावत की 'सड़क पर ज़िंदगी' की समीक्षा शहंशाह आलम के शब्दों में

 मनुष्य-जीवन के संघर्ष-काल को कमाल का शब्द देती कविताएँ

मानिक बच्छावत ऐसे श्रमिकों को एक नई आवाज़, एक नई मशाल, एक नई सच्चाई, एक नई जद्दोजहद, एक नई डगर देना चाहते हैं, जो उनके नए सफ़र में काम आएँ। इसलिए कि मानिक बच्छावत की कविताएँ पराजित और हारे हुए आदमी की कविताएँ होने के साथ-साथ उन आदमियों की भी कविताएँ हैं, जो अपनी पराजय और हार को जीत में बदलते दिखाई देते हैं। पढते हैं संग्रह की समीक्षा शहंशाह आलम के शब्दों में।

यह सच है कि आदमी के जीवन का संघर्ष रहस्यों से भरा रहता है। ये संघर्ष-रहस्य आदमी के जीवन में चुपचाप चले नहीं आए हैं। मेरे ख़्याल से पूरी चालाकी से दुनिया भर के पूँजीवादियों ने और दुनिया भर की अमीर, क्रूर, दंभी सरकारों ने आदमी के जीवन में अभाव, बेरोज़गारी, बेक़रारी, दुर्भाग्य आदि सबकुछ चालाकी से भर दिए हैं ताकि यह जो आम आदमी है, वह अपनी निजी ज़िंदगी में आम ही बना रहे, ख़ास बने भी तो उनका अपना जोखिम से भरा जीवन बने, जिससे हर पूँजीवादी और अमीर सरकारें उनका मुँह चिढ़ा सकें। हम आम आदमी के जीवन की यही विडंबना है, यही उधेड़बुन है, यही आवाजाही है कि हम अपने हिस्से का जितना बढ़िया-बढ़िया इकट्ठा करें, सहेजें, संभाल कर रखें, फिर अंतत: उन्हीं अमीर लोगों, उन्हीं क्रूर सरकारों को वापस लौटा दें, जो अमीर लोग और अमीर सरकारें एक-दूसरे के सहोदर हैं सदियों-सदियों से। यही सच है कि आम आदमी का जीवन ऊहापोह, दुविधा, उलझन, असमंजस, चिंता की स्तिथि में पीसता आया है और आगे भी पीसता रहेगा। ऐसे ही आम आदमी के इस आजीवन संघर्ष की गाथा रही हैं समकालीन कविता के वरिष्ठ कवि मानिक बच्छावत की कविताएँ। इनके सद्य प्रकाशित कविता-संग्रह 'सड़क पर ज़िंदगी' की कविताएँ भी उन्हीं पीसते-घिसते आदमी की कविताएँ हैं :

          प्यारे मियाँ के पास
          दो घोड़ा गाड़ियाँ थीं
          जिन्हें वे हावड़ा स्टेशन पर रखते
          मुसाफ़िर इनमें बैठ जाते
          घोड़ा गाड़ियाँ बंद खिड़कियों वाली होती थीं
          कलकत्ता के रईसों की गाड़ी
          जिन्हें दो टट्टूनुमा घोड़े खींचते
          स्टेशन से हरिसन रोड, ताराचंद दत्त स्ट्रीट
          कॉलेज स्ट्रीट, गिरीश पार्क, श्याम बाज़ार तक
          लोग इनमें चले जाते
          पर जब से टैक्सियाँ और ऑटो चलने लगे
          लोगों ने घोड़ा गाड़ियों पर बैठना बंद कर दिया
          प्यारे मियाँ को भूखों मरने की नौबत आ गई('प्यारे मियाँ की बग्घियाँ'/पृ.13)।

   अब कोई साधारण जन रोज़ बदल रहे समय, रोज़ बदल रही तकनीक, रोज़ बदल रही जीवन-शैली में ख़ुद को कहाँ पर एडजस्ट करे, ख़ुद को कहाँ पर रखे, ख़ुद को कहाँ पर बैठाए, यही विवादास्पद है। अब इसे साज़िश कहें या अराजक परिस्थिति कि जो पूँजीहीन हैं, जो मूल्यांकनहीन हैं, जो अनुभवहीन हैं, वे इस रोज़ बदल रही दुनिया को कैसे अपना बनाएँ, कैसे अपनी प्रार्थना में शामिल करें, कैसे अपनी मुक्ति का रास्ता ढूँढ़ें, उनके जीवन का सबसे बड़ा सवाल यही है। इन साधारण जन के जीवन में असाधारण इतना भरा-पूरा मुझे जब-तब दिखाई देता है कि उनका समय तराज़ू पर मेंढकों को तौलने के समान है। तराज़ू पर एक मेंढक को चढ़ाओ तो दूसरा तब तक क़ूदकर भाग निकलना चाहता है। ऐसे जीवन की सँख्या देश में अधिक है, जो अपने निजी जीवन में अकसर विफल है, पराजित है और सिर्फ़ प्रार्थनाओं के भरोसे जीवित है। आप ढोल पीटते रहिए कि आपका देश आगे बढ़ रहा है। मेरा देश तो वैसा का वैसा ही है, अभाव से भरा, ज़ुल्मो-सितम से हरा :

          राधिया के पास नहीं हैं
          ज़्यादा कपड़े
          सिर्फ़ एक जोड़ी बस
          एक वह पहनती है
          और दूसरे को धोती-निचोड़ती सूखाती है
          कार्नवालिस स्ट्रीट की सड़क की रेलिंग पर
          जो दो भागों में बाँटती है सड़क को('राधिया के कपड़े'/पृ.15)
   अथवा,
          ठेका मज़दूरिन है
          किसी को ज़रूरत होती है
          बुला लेता है
          बदले में खाना मिल जाता है
          चौधरीबाड़ी के बरामदे के नीचे
          पसरकर पड़ी रहती है
          वह अकेली नहीं है
          उसके साथ उससे भी कमउम्र की
          बहुत सारी औरतें हैं
          घर के काम से जातीं
          बहुरानियों की मालिश-चंपी से लेकर
          कई छोटे-मोटे काम करतीं
          इधर से उधर संदेशे ले जातीं(वही/पृ.15-16)।

   ग़ौरतलब यही है कि बहुत सारे संदेशवाहक की ज़िंदगी में बहुत-बहुत दिनों तक कोई अच्छी ख़बर कहाँ आती है। ग़ौरतलब यह भी है कि मानिक बच्छावत की वाजित चिंता यही है कि ऐसा कौन-सा जुगत भिड़ाया-किया जाए, जो प्यारे मियाँ और राधिया के घर भी अच्छे दिन सचमुच पहुँचें। इसलिए कि सरकारें तो हमेशा से भिखारी ही होती हैं या यूँ कहिए कि लुटेरी ही होती हैं। इसलिए कि सरकारें दस बहाने करके और हज़ार रास्ते निकाल करके हमारी जेबी से पैसे मार लेती हैं। सरकारों का लूटने का यह सिलसिला अंतहीन है :

          दो बीघा ज़मीन है
          हराधन चासी के पास
          बांग्ला नस्ल के दो छोटे-छोटे बैल भी हैं
          चास हल चलाता है
          धान उपजाता है
          उसका संसार ऐसे ही चलता है
          दो जून पेट भरने लायक़
          धान हो जाता है
          खेत महाजन के यहाँ गिरवी है
          उसको चार सयानी लड़कियाँ हैं
          हराधन को उनकी चिंता है
          क्या करे
          किस कुएँ में डाल दे
          बाक़ी सबकी हालत भी ऐसी ही है('हराधन चासी का दुःख'/पृ.27)।

   दरअसल मानिक बच्छावत की ये कविताएँ मनुष्य के दुःख की उस अंतहीन कविता-यात्रा की गूँज है, जिसमें मनुष्यता छटपटाती, कराहती, बिलखती दिखाई देती है। कवि का यह विराट अनुभव है। इसीलिए मानिक बच्छावत की ये कविताएँ मनुष्य की विवशता, विफलता, वीभत्सता की भी कविताएँ हैं। लेकिन इसे मानिक बच्छावत का कमाल कहिए कि इन्हीं विवशता, विफलता, वीभत्सता से मनुष्य की मुक्ति का रास्ता भी निकाल लाते दिखाई देते हैं। ये कविताएँ व्यवस्था के विरोध में पूरी मज़बूती से खड़ी भी दिखाई देती हैं। और सिर्फ़ दुःख नहीं गढ़तीं। यह जो पूँजीवादी संस्कृति का राक्षस रोज़ आम आदमी का लहू माँगता है, इस राक्षस के गहरे भीतर जाकर मानिक बच्छावत वार भी करते दिखाई देते हैं जोकि हर कवि का दायित्व है। संग्रह की 'फेलू दा और कॉफ़ी हाउस', 'सपना राय', 'शुभ्रा दास सड़क पर', 'लक्खी की रेज़गारी', 'बाउल गायक निमाई', 'बहूबाज़ार की रसूलन', 'ननीगोपाल कालीघाट का', 'पेशेवालियाँ', 'मोची', 'कविता लिखने का मौक़ा', 'पारोमिता की कथा', 'रोटी बेचती औरत', 'बंदर नाच', 'सैयदशाली लेन पर स्कूल', 'मरे हुए आदमी की माँ', 'भीड़ में रहना', 'रामधनी का ठेला', 'फुटबॉल', 'सड़क पर ज़िंदगी' आदि कविताएँ मानिक बच्छावत के जीवन को देखने-परखने के अनूठे अनुभव को प्रकट करती हैं। मानिक बच्छावत की जो बड़ी ख़ासियत है, यह है कि वे घर से जब बाहर निकलते हैं तो आपसे बातचीत करते हुए भी उनकी नज़रें उन आदमियों पर रहती हैं, जो लगातार जीवन-संघर्ष करते हुए सरकार के अच्छे दिनों का नक़ाब उतारने में लगे होते हैं। ये वे जनता-जनार्दन हैं, जो अपने श्रम से, अपने श्रमिक जीवन से सबको लाभांवित तो करते हैं, लेकिन ख़ुद अभाव की खाई तरफ़ हर पल बढ़ रहे होते हैं। मानिक बच्छावत ऐसे श्रमिकों को एक नई आवाज़, एक नई मशाल, एक नई सच्चाई, एक नई जद्दोजहद, एक नई डगर देना चाहते हैं, जो उनके नए सफ़र में काम आएँ। इसलिए कि मानिक बच्छावत की कविताएँ पराजित और हारे हुए आदमी की कविताएँ होने के साथ-साथ उन आदमियों की भी कविताएँ हैं, जो अपनी पराजय और हार को जीत में बदलते दिखाई देते हैं। इसलिए कि मानिक बच्छावत का मानना यही है कि जो सपनों को मरते देखते हैं, वे ही अपने मरे हुए सपनों को जीवित करने का हुनर भी रखते हैं :

          भोर होते ही खड़ा होता है निमाई
          नहा-धोकर अपनी मिरजई पहन
          चंदन के टीकों से लेपता है कपाल
          गले पर नाक पर बाँहों पर लगाता है टीके
          निकल पड़ता है अपना एकतारा ले('बाउल गायक निमाई'/पृ.38)।
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सड़क पर ज़िंदगी(कविता-संग्रह)/ कवि : मानिक बच्छावत/ प्रकाशक : समकालीन सृजन, 20, बालमुकुंद मक्कर रोड, कोलकाता-700 007/ मोबाइल संपर्क : 09830411118/ मूल्य : ₹150
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गुरुवार, 16 जून 2016

सुशील सिद्धार्थ का व्यंग्य एक था राजा

आत्महत्या कहकर हमारे गांव कुनबे को बदनाम न करो।देखो,मरना एक दिन सबको है।वीर मनुष्य वही है जो भाग्य के भरोसे न बैठा रहे कि जब वह दिन आएगा तब मर लेंगे।ऐसा मान लेंगे तो हमारी संस्कृति का विकास रुक जाएगा।इसलिए हम अपना दिन खुद चुनते हैं।कहा गया है कि कर्म करो फल की इच्छा न करो।इसलिए किसान पेड़ पर विकास के फल की तरह लटक जाते हैं। इन पंक्तियों को लिखने वाले सुशील सिद्धार्थ समकालीन व्यंग्यकारों में एक प्रतिष्ठित नाम हैं. जिनके व्यंग्य की एक अलग शैली है. इन्होंने चार व्यंग्य संग्रह और दो कविता संग्रह के अलावे नौ पुस्तकों का संपादन किया है. जिन्हें आलोचना के लिए स्पंदन सम्मान से सम्मानित किया गया है. पढ़ते हैं सुशील सिद्धार्थ जी के व्यंग्य एक था राजा को.



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एक था राजा
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सुशील सिद्धार्थ
यह एक सरल,निष्कपट ,पारदर्शी और दयालु समय की कहानी है।एक दिन किसी देश का राजा चिंता में पड़ गया।उसे देखकर रानी भी पड़ गई।पड़कर रानी ने गुरुदेव को बुला भेजा।हरकारा रवाना हुआ।गुरुदेव बहुत दिनों से ताव खाए पड़े थे।गुरुदेव दरबार से बुलाए जाने के लंबे इंतज़ार में हर आने जाने वाले को शाप दे रहे थे।वे चिंतित थे कि कहीं राजा ने पत्नी, न्याय, नियम आदि की तरह गुरु भी तो नहीं बदल लिया!हरकारे को देखकर हवन कुंड की तरह गुरु का इच्छा कुंड भभक उठा।वे सोचने लगे कि अहा,वह चिंतक ही क्या जिसे सत्ता का सत्तू न मिल सके।हर दार्शनिक का लक्ष्य दरबार की दुंदुभि बनना ही तो है।ऐसे आदि आदि विचार उछालते हुए गुरुदेव ख़याली घोड़े पर सवार थे।हरकारे ने हांफते हुए उनको नीचे उतारा।जल्द पहुंचना था इसलिए हरकारे ने उन्हें जीवित घोड़े पर बिठाया।घोड़ा गधे की भांति चल पड़ा।वह एक सरकारी घोड़ा था।
महल में पहुंचते ही गुरुदेव ने रानी को आनंद के अंतिम छोर पर खड़े होकर आशीर्वाद दिया।वे और देते कि राजा आ गया।आते ही उसने कहा कि ,'गुरुदेव,आज हम चिंतित हैं और कुछ सोच रहे हैं।' गुरुदेव यह सुनते ही दुखी हो गए।अपने दुख को माहौल में स्थापित किया।फिर बोले,'राजन यह तो अनर्थ है।सोचना और चिंतित होना तो प्रजा का धर्म माना गया है।बल्कि उत्तम राजा वह माना जाता है जो प्रजा के लिए सोचने और चिंतित होने के नित नए सुनहरे अवसर मुहैया कराता रहे।यही राजपरंपरा है।ऐसे अवसरों से ही राज्य में चिंतक पैदा होते रहे हैं।फिर भी,आप राजा हैं।कुछ भी कर सकते हैं।बताएँ मुझे किसलिए बुलाया है।'राजा बोला',गुरुदेव प्रजा मुझको क्या समझती है।उसके मन में मेरी कैसी छवि है!क्या आप बता सकते हैं।'
गुरुदेव ज्ञानी तो बहुत थे।मगर यह जानते थे कि जिस ज्ञान से अपनी जान का संकट पैदा हो जाए वह अज्ञान है।बोले,'क्या क्या नहीं समझती है।आपका कहां तक बखान करूँ।' राजा मूर्ख तो बहुत था।मगर यह जानता था कि गुरुदेव हैं तो हमारे ही गुरुदेव।बोला, 'यह भी तो परंपरा रही है कि राजा लोग वेष बदलकर रात में किसी गांव वांव में जाकर सबके मन का हाल मालूम करते थे।क्या मेरा ऐसा करना सिंहासन को शोभा देगा?'गुरुदेव ने मन में अपशब्द निबद्ध अनेक शास्त्रीय बातें सोची।कहीं ऐसा तो नहीं कि यह सनकी आदमी मुझे भी साथ चलने को कह दे।कुछ देर बाद मन के बाहर गद्गद होकर बोले,'अहा के बाद अहहा भी कि आपने यह कहा।वैसे आपको वेष बदलने की ज़रूरत नहीं है।आपको अनेक वर्षों से जनसमुदाय ने देखा ही नहीं है।फिर भी सावधानी बरत कर जाना ही उचित होगा।अब पक्के तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता कि प्रजा का रवैया कैसा रहेगा।अजातशत्रु शब्द में भी शत्रु तो लगा ही है।प्रजा के रवैये के बारे में ग्लोबलम् उपनिषद में कहा गया है,' मीडिया न जानाति कुतो मनुष्य:।'
रानी ने तिलक लगाया।राजा निकल पड़ा।रानी ने बहुत दिन बाद ऐसी सांस ली जिसे चैन की सांस कहा जाता है।जिन पत्नियों के पति अधिकतर घर में ही रहते हैं वे इस सौभाग्य का अनुभव कर सकती हैं।दांम्पत्य दुर्दशा पुराण में ऐसी बातें विस्तार से लिखी गई हैं।बहरहाल,यह ताकीद कर दी गई कि किसी को कानोकान भी ख़बर न हो।आंखोआंख का तो सवाल ही नहीं उठता।
राजा ने अपने अत्यंत प्रिय वेषभूषाकार से अपना चेहरा मोहरा बदलवाया।चुपके से निकल पड़ा।राजा को ज़मीन पर पांव रखने में कष्ट तो हो रहा था,मगर उसे प्रजा की गर्दन पर पांव रखने का परंपरागत अभ्यास था।उसे ख़ास अटपटा भी नहीं लग रहा था।जब रात जैसी रात हो गई तब राजा एक गांव जैसे गांव में जा पहुंचा।वहाँ कुत्ते भौंक रहे थे।राजा यह जानकर ख़ुश हुआ कि हमने सबको अभिव्यक्ति की आजादी दे रखी है।महल में राजा को शिक्षा के दौरान प्रजा के जो पर्यायवाची रटाए गए थे उनमें कुत्ता और सुअर सबसे ऊपर थे।
राजा अब उस जगह की तलाश में था जहां भीड़ जैसे लोग मिलें।राजा उदार था।भीड़ और भेड़ जैसे शब्दों से उसे प्यार था।भेड़िया शब्द का तो वह आदर करता था।कुछ दूर पर सामने लोग दिखे।वह विनम्रता की मूर्ति बनकर आगे बढ़ा।राज्य में सर्वाधिक विनम्रता राजा की मूर्तियों पर ही दिखती थी।राज्य मूर्तियों के सहारे ही आगे बढ़ रहा था।राजा ने देखा।सामने एक चौपाल ।चौपाल में भीड़ जमा थी।वह निकट जाकर बोला,'भाइयो ,मैं राह भटक गया हूं।क्या आप सबसे बात करते हुए यहाँ रात बिता सकता हूं।'चौपाल के लोगों ने एक दूसरे को एक दूसरे की तरह देखा।राजा के लिए जगह बना दी गई।पानी वानी आया।उसने पिया।कुछ ताज़ा पानी अपनी आंखों में डाल लिया।ताज़ा पानी आंखों में मरने की प्रक्रिया में लग गया।कुछ हल्की फुल्की बातें शुरू हुईं।राजा आवाज़ बदलने में भी निपुण था।आवाज़ बदलकर पूछने लगा,'भाइयो,सुना है आप के गांव में कुछ किसानों ने आत्महत्या की है।ऐसा क्यों हुआ।क्या राज्य की व्यवस्था ठीक नहीं है?' एक बुजुर्ग कहने लगा,'ओ मेहमान भाई।आत्महत्या कहकर हमारे गांव कुनबे को बदनाम न करो।देखो,मरना एक दिन सबको है।वीर मनुष्य वही है जो भाग्य के भरोसे न बैठा रहे कि जब वह दिन आएगा तब मर लेंगे।ऐसा मान लेंगे तो हमारी संस्कृति का विकास रुक जाएगा।इसलिए हम अपना दिन खुद चुनते हैं।कहा गया है कि कर्म करो फल की इच्छा न करो।इसलिए किसान पेड़ पर विकास के फल की तरह लटक जाते हैं।वे इस लटकने के फल की इच्छा नहीं करते।वे जानते हैं कि इस अमर फल का बटवारा करनेवाले आते ही होंगे।और यह भी समझ लो ,जब मौत माता का बुलावा आ जाता है तब कौन रुक सका है।हम तो आभारी हैं राजा जी के कि दिन रात ऐसे बुलावों का शिलान्यास करने में व्यस्त रहते हैं।संतजन कह गए हैं कि चलो बुलावा आया है।'इतना सुनते ही सारी चौपाल ने हाथ जोड़ लिए और जयकारा भी लगाया।
राजा भक्ति भाव में डूब गया।खुश होकर बोला,'वाह।आप लोग कितने होशियार हैं।दार्शनिक हैं।फिर भी कुछ तबकों द्वारा यह सवाल उठाया जाता है कि देश का राजा सेठों महाजनों के पीछे पीछे चल रहा है।'राजा का वाक्य पूरा होते होते चौपाल में सबने अपने कानों पर हाथ रख लिए।कि उफ, हम ये बातें सुन भी नहीं सकते।एक युवक आवेश में कहने लगा,'ओ परदेसी भाई।ऐसे सवाल उठाने वालों को इस राज्य का कानून उठा क्यों नहीं लेता।इसीलिए राजधानी में बार बार भूकंप आता है।गैया के सींग पर टिकी धरती मैया भी ऐसा झूठ बर्दाश्त नहीं कर पाती।तुम पहले बात को समझो।हर वक्त जो चालू है वही चलता है।कहा गया है--महाजनो येन गता स पंथा:।महाजन सेठ पूंजीधर व्यापारी जिस पथ पर चलें वही पथ है।बाकी सब लथपथ है।इसलिए हमारे राजाजी इनके पीछे चल रहे हैं।मैं तो कहता हूँ  यह लिख देना चाहिए जगह जगह कि विकास के वास्ते महाजन के रास्ते। समाज के हर रास्ते को किसी न किसी पूंजीधर के नाम कर देना चाहिए।दुख की बात है कि अभी भी राज्य के बहुत कम मार्गों पर ऐसा हो सका है।मैं यह नहीं कह रहा कि हमारे राजाजी ने इस मामले में कोई कोताही की है।ना ना।ऐसा सोचना भी पाप है।वे तो चौबीस घंटे इस काम में लगे हैं।हमारे भीतर ही कोई खोट है जो इसकी गति धीमी है।'राजा ने मन ही मन तय किया कि वापस लौटते ही इस काम को गतिमान करना है।चुपके से इस युवक को बुलाकर दरबार में कोई ज़िम्मेदार पद देना है।ये प्रजा के मन की बातें हैं।प्रजा की भावनाओं को समझना ही राजा का पहला धर्म है।
राजा इतना प्रसन्न हुआ कि उसका मन किया असली भेस में आ जाए।मगर इच्छा को दबा लिया।कहने लगा ,'इसी कारण यह राज्य उन्नति कर रहा है प्रजा और राजा मिलकर एक जैसा ही  सोच रहे हैं।अब चलना चाहिए।बातों बातों में रात खत्म होने को आई।' एक अधेड़ ने हाथ जोड़ लिए 'साहेब क्या उम्दा बात कही।जब अंधेरा होता है तब हम अंधेरा दूर करने की बातें करने लगते हैं।'तभी एक अन्य ने अधेड़ को रोक कर कहा,' वो तो ठीक कहा ।मगर कुछ करना भी चाहिए।हमें मनुष्य जीवन मिला है। ओ मेहमान जी,अभी कुछ रौशनी कम है।रुकिए,हम निकट के गांव में आग लगवाने का इंतजाम करते हैं।ताकि कुछ तो उजाला हो सके।'
राजा ख़ुश हुआ।जाड़े में हाथ तापने और सरकारी गश्त के समय रौशनी करने का यह पुराना तरीका था।थोड़ी ही देर में रास्ते पर रौशनी दिखने लगी।राजा जलते गांव की रौशनी में अपना लिखा राज्यगीत गाता हुआ आगे बढ़ चला।
अब चौपाल पर सारे लोग अपना अपना मेकअप उतार रहे थे।एक बुजुर्ग दिखते आदमी ने कहा,' आप सब दरबारियों ने अच्छा अभिनय किया।ख़ैर हमको अभ्यास भी है।हम बरसों से यही करते चले आए हैं।ऐसा करो,अब असली गांव वालों को रिहा कर दो जो सुबह से बंधक पड़े हैं।' एक युवक बोला',चाचा आप जान कैसे गए थे कि राजासाहब यहीं आएंगे।'बुजुर्ग हंसा,' ऐसा है ,राजा की चाल से ही अंदाजा लग जाता है कि वह कहां जा रहा है।'


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बुधवार, 15 जून 2016

ध्रुव गुप्त की "मुझमें कुछ है जो आईना-सा है" की समीक्षा शहंशाह आलम के शब्दों में

ध्रुव गुप्त की ग़ज़लें हों अथवा कविताएँ, दोनों ही में हम पाते हैं कि वे परदे में छिपी हुई आवाज़ को मुखर करते हैं, अपनी आवाज़ की ताक़त भर देते हैं, जिससे मांसहीन आदमी भी अपनी आवाज़ में एक नई तरह की ऊर्जा महसूस करता है माननीयों के विरुद्ध खड़ा होते हुए, अपने कठिन दिनों के विरुद्ध खड़ा होते हुए। ध्रुव गुप्त ग़ज़ल सिंफ़ (विधा) को एक अलग तरह की ऊँचाई प्रदान करते हैं। इनकी ग़ज़ल-प्रतिभा की संपन्नता हमें चकित करती है। इनकी ग़ज़लों में अभिव्यक्त यथार्थ भी थोड़ा अलग है। पढते हैं ध्रुव गुप्त की "मुझमें कुछ है जो आईना-सा है" की समीक्षा शहंशाह आलम के शब्दों में।


भारतीय हिंदी ग़ज़लकारों में ध्रुव गुप्त बहुत ही इज़्ज़त और मुहब्बत से लिया जानेवाला नाम है। इसका मुख्य कारण ध्रुव गुप्त की ग़ज़लें हैं, जो पाठ के समय कुछ ऐसा अद्भुत समा बाँधती हैं, जैसे किसी बहती हुई नदी को आप बारिश के वक़्त देखते हैं। बारिश के वक़्त नदी की जो असली ख़ूबसूरती उभरकर सामने आती है, उसके तसव्वुर मात्र से मन में जो रागात्मकता जन्म लेती है, ध्रुव गुप्त की ग़ज़लें कुछ वैसा ही आभास दिलाती हैं। मेरी मान्यता है कि ध्रुव गुप्त की ग़ज़लें ग़ज़ल के बारे में एक नई समझ विकसित करती हैं। नई गहराई और नई समझदारी भी। हिंदी के बहुत सारे शायरों की तरह ध्रुव गुप्त की ग़ज़लें अधोलोक से आई हुई ग़ज़लें नहीं होतीं बल्कि इनकी ग़ज़लें बिना किसी लाग-लपेट के सीधे इनके दिल से निकली हुई होती हैं :
     सबने दो-चार हर्फ़ लिख डाले,
     मेरे चेहरे में अब मेरा क्या है।
या,
     घर मेरे दिल में भी रहा न कभी,
     घर में मैं भी ज़रा- सा रहता हूँ।
या,
     सारी नज़रों से दरकिनार हुआ,
     मैं गए वक़्त का अख़बार हुआ।

ध्रुव गुप्त की ग़ज़लें हमें एक नए घर में प्रवेश कराती हैं, एक ऐसे नए घर में, जहाँ से आपको वापस लौटने की इच्छा नहीं होती। इसलिए कि ध्रुव गुप्त का जो ग़ज़ल-संसार है, उसकी आभा जीवन के पक्ष में खड़ी दिखाई देती है। जबकि जीवन को हमारे वक़्त के माननीय जटिलताओं से भर दे रहे हैं। आदमी को मांसहीन बना रहे हैं। इस पर बार-बार विचार किया जाना चाहिए कि मनुष्य को जो कुछ अच्छा और बढ़िया चाहिए, वह किस समय-काल में मिलेगा :
     पाँव में अपने छाले हैं, या,
     टुकड़ा-टुकड़ा आसमान है।

ध्रुव गुप्त की ग़ज़लें हों अथवा कविताएँ, दोनों ही में हम पाते हैं कि वे परदे में छिपी हुई आवाज़ को मुखर करते हैं, अपनी आवाज़ की ताक़त भर देते हैं, जिससे मांसहीन आदमी भी अपनी आवाज़ में एक नई तरह की ऊर्जा महसूस करता है माननीयों के विरुद्ध खड़ा होते हुए, अपने कठिन दिनों के विरुद्ध खड़ा होते हुए। इस तरह ध्रुव गुप्त ग़ज़ल सिंफ़ (विधा) को एक अलग तरह की ऊँचाई प्रदान करते हैं। इनकी ग़ज़ल-प्रतिभा की संपन्नता हमें चकित करती है। इनकी ग़ज़लों में अभिव्यक्त यथार्थ भी थोड़ा अलग है। थोड़ा भिन्न है :
     अख़बार देखकर अभी अफ़सोस है जिन्हें,
     वो अपने घर में बंद थे जब हादसा हुआ।

ध्रुव गुप्त मानवीय मूल्यों के प्रति सिर्फ़ अपनी रचनाओं में ही नहीं, अपने निजी जीवन में भी सचेत रहे हैं। यहाँ मैं ज़्यादा इस बात पर ज़ोर देकर कहना चाहूँगा कि ध्रुव गुप्त अपने रचना-कर्म से अधिक जीवन-कर्म में मानवीय मूल्यों को स्थापित करते रहे हैं। यही कारण है कि जिस तरह इनके निजी जीवन में किसी तरह का झोल-झाल नहीं रहा, उसी तरह इनकी रचनाओं में किसी तरह का झोल-झाल दिखाई नहीं देता। और न किसी तरह का जाल दिखाई देता है। मेरा यह कथन इनकी सद्य: प्रकाशित ग़ज़लों और नज़्मों की किताब 'मुझमें कुछ है जो आईना-सा है' में छापी गईं सारी ही ग़ज़लों और नज़्मों में हम किसी आईने की तरह साफ़-साफ़ देख सकते हैं। जबकि आज दिलों के आईने गर्द-गुबार से भरे पड़े हैं :
     काश, ऐसा हो कि हम
     लौट चलें दश्त में फिर
     न कोई फ़िक्र हो कल की
     न उलझनें, न सितम
     भूख भर रोटी हो
     और आँख भरके हरियाली।
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मुझमें कुछ है जो आईना-सा है(ग़ज़लें और नज़्में)
शायर : ध्रुव गुप्त
प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन,7/31, अंसारी मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली-110 002
मूल्य : 250₹
आवरण : के रविन्द्र।
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सोमवार, 13 जून 2016

'जनपद झूठ नहीं बोलता' : नए शब्द, नए स्वर, नए मुहावरे, नए अचरज की कविताएँ

सुशील कुमार समकालीन हिंदी कविता के उन कवियों में हैं, जिनकी कविताओं का स्वर, जिनकी कविताओं का आवेग और स्वाद अपनी एक अलहदा पहचान रखते हैं। यह सच है, सुशील कुमार के कविता-संग्रह 'जनपद झूठ नहीं बोलता' की कविताओं में उनके अनुभव, उनके विचार, उनके अवसाद, उनके जनसंघर्ष एकदम अंतरंग हो-होकर कविता के विशाल द्वार में प्रवेश पाते हैं। आज पढते हैं सुशील कुमार की कविता संग्रह "जनपद झूठ नहीं बोलता" की पुस्तक-समीक्षा, समीक्षक शहंशाह आलम के शब्दों में, जो कि लहक पत्रिका के ताजा अंक में भी प्रकाशित हुई है।साभार।


'जनपद झूठ नहीं बोलता' : नए शब्द, नए स्वर, नए मुहावरे, नए अचरज की कविताएँ
● शहंशाह आलम

मैं अकसर सोचता हूँ कि जिस तरह मनुष्य के पास एक जीवन होता है, क्या वैसा ही जीवन कविता के पास भी है? अगर ऐसा नहीं है तो कोई कविता मनुष्य की भावनाओं को कैसे व्यक्त कर लेती है। इसका उत्तर पाने के लिए मुझे कोई कठिनाई नहीं उठानी पड़ी। एक कवि होने के नाते मैं इतना तो समझ ही सकता हूँ कि किसी कवि में जब जीवन है, तो उसकी कविताओं में जीवन की झलक दिखाई देगी ही देगी। सुशील कुमार वैसे ही कवियों में हैं, जिनकी कविताओं में मनुष्य का जीवन पूरी तरह मुखर होता दिखाई देता है, बिलकुल जनोन्मुख। सुशील कुमार के कविता-संग्रह 'जनपद झूठ नहीं बोलता' की कविताएँ मनुष्य-जीवन के लोक और मनुष्य-जीवन के जनपद का ही वृत्तांत हैं। इसलिए कि सुशील कुमार का लोक और जनपद जनाकीर्ण है, मनुष्यों से भरा हुआ है, प्रकृति को इस जनाश्रय में समेटता हुआ :
     दिन समेटकर उतरता है थकामाँदा बूढ़ा सूरज
     पहाड़ के पीछे
     अपने वन-प्रांतर की निःशेष होती गाथाएँ लिए
     उसकी तमतमाई आँखों की ललाई पसर आती है
     जंगलों से गुम हो रही हरियाली तक
     दम तोड़ रही नदियों में फैल रहे रेतीले दयार तक
     विलुप्त हो रहे पंछियों के इक्के-दुक्के नीड़ों तक('पहाड़िया'/पृ.15)।

सुशील कुमार समकालीन हिंदी कविता के उन कवियों में हैं, जिनकी कविताओं का स्वर, जिनकी कविताओं का आवेग और स्वाद अपनी एक अलहदा पहचान रखते हैं। यह सच है, सुशील कुमार के कविता-संग्रह 'जनपद झूठ नहीं बोलता' की कविताओं में उनके अनुभव, उनके विचार, उनके अवसाद, उनके जनसंघर्ष एकदम अंतरंग हो-होकर कविता के विशाल द्वार में प्रवेश पाते हैं। इस तरह उनकी कविताओं का पाठक भी उनके एकदम क़रीब महसूस करता है। इसलिए भी कि सुशील कुमार की कविताओं में फैशन की तरह कोई चीज़ न आकर किसी आंदोलन की तरह आती है। यह सुखद है। वरना आज अधिकतर कवि के एजेंडे में मनुष्य-जीवन न होकर उनका अपना निजी जीवन होता है, जिसमें किसी परिवर्तन की कामना नहीं होती, बल्कि वे बार-बार अपने जीवन के काले-घने अँधेरे में संशयग्रस्त लौटते दिखाई देते हैं। इसलिए कि ऐसे कवियों का न तो विचार स्पष्ट होता है, न प्रतिबद्धता, न जनपक्षधरता। और न यहाँ जन-आदेश का सम्मान ही दिखाई देता है। सुशील कुमार उन कवियों में हैं, जिनका विचार, जिनकी प्रतिबद्धता और जन-आदेश का सम्मान किसी आईने की तरह साफ़ और सूक्ष्म दिखाई पड़ता है :
     कितनी भोली
     और अनजान हो तुम फूलमनी
     इस धरती पर कि
     वायुयान को
     एक चील समझती हो
     और रेलगाड़ी पर
     कभी बैठने के सपने देखती हो('फूलमनी'/पृ. 26)।

इन दिनों अच्छे दिनों का हो-हल्ला और चिल्ल-पों इस तरह फैलाया गया है कि जो अभावग्रस्त जीवन जी रहे हैं, उन्हें हाशिए पर डाल दिया गया है। ऐसे लोगों के अच्छे जीवन के बारे में न सोचकर आज बुलेट ट्रेन चलाने का सपना दिखाया जा रहा है। जबकि सच्चाई यही है कि फूलमनी जैसी कितनी ही ज़िंदगियाँ अपने भीतर कोई एक अच्छा दिन तक नहीं पा सकी हैं, उस अच्छे दिन के लिए आज भी तरस रही हैं। यह भी कठोर सत्य है कि न इनकी आधारभूत संरचना में कोई परिवर्तन दिखाई देता है, न संवेदनागत कोई वैशिष्ट्य ही दिखाई देता है :
     जब पूरा गाँव निढाल होता है नींद में
     बहुत भोर में
     मुर्ग़ा-बाँग से पहले ही
     उठ-पुठ कर
     जंगल चल देती हो
     महुआ बिनती हो
     लकड़ी चुनती हो
     घास का बोझा बनाती हो
     मन ही मन मगन हो
     कोई प्रेमगीत गुनगुनाती हो
     और वंदना-माधे परब के आने की
     प्रतीक्षा करती हो(वही/पृ. 27-28)।
शहंशाह आलम

सुशील कुमार जिस लोक, जिस जनपद की बातें अपनी कविताओं में पूरी तरह मुखर कहते-रचते रहे हैं, उनका वह लोक, वह जनपद पूरी तरह देखा-भाला हुआ है। उनकी सारी कविताएँ इस बात की गवाही देती हैं। चर्चित कवि दिनेश कुशवाह उनकी कविताओं के बहाने सही ही कहते हैं, 'सुशील कुमार ने अपने जनपद के पहाड़, नदी, पेड़, जंगल, पशु, फूल, फल, विरह, संयोग, संघर्ष, आदिवासी, उनकी अंत:क्रियाएँ, परंपराएँ और अपरिमित दुःख को इस तरह आत्मसात् किया और रचा है, जैसे उनकी कविताएँ भीतर ही भीतर सुलगती अँगीठी का निर्धूम ताप हों।' सुशील कुमार की 'बाँसलोय में बहत्तर ऋतु', 'पहाड़ी नदी के बारे में', 'कब लौटोगे सुकल परदेस से', 'बंदगाँव की घाटियाँ', 'महुआ फूलने के मौसम में', 'असम से लौटकर हरिया सोरेन', 'ढीली पड़ती मुट्ठियाँ', 'दियारा में रेत होती ज़िन्दगी', 'यहाँ कभी बसंत नहीं आता', 'तुम्हारे स्त्री होने का मतलब', 'कोसी- शोक में डूबी एक नदी का नाम है', 'पेड़ प्रथम नागरिक हैं पृथ्वी पर', 'वे शहनाई के कबीर थे', 'माँ' आदि कविताएँ आपको कविता-काल के बहुत सारे रंग दिखाती हैं, परन्तु इन रंगों में आदिवासी जीवन का जो रंग दृश्यपटल पर उभर कर सामने आता है, वह रंग एकदम टटका है। वही एक रंग है जिसमें मानव-मुक्ति की सच्ची कामना छिपी हुई है। वही एक रंग है जिसमें हमारे समय का नवीन उन्मेष दिखाई देता है। यही वह रंग भी है, जो कवि को सार्थक संगति तक पहुँचाता है।
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जनपद झूठ नहीं बोलता(कविता-संग्रह)/कवि : सुशील कुमार/प्रकाशक : हिन्द-युग्म, 1, जिया सराय, हौज़ ख़ास, नई दिल्ली-110016/मूल्य : 250₹/कवि-संपर्क : 09006740311/आवरण : गौतम साव, वाज़दा ख़ान।
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संपर्क:-

~शहंशाह आलम, प्रकाशन विभाग, बिहार विधान परिषद्, पटना-800015/मोबाइल : 09835417537


   











रविवार, 12 जून 2016

एक बदलाव (पुरानी डायरी के पन्ने): सुशील कुमार भारद्वाज

एक बदलाव (पुरानी डायरी के पन्ने)
सुशील कुमार भारद्वाज

मैं 1990 में पहली बार पटना आया था और तब से अब तक में काफी परिवर्तन महसूस कर रहा हूं। उस समय मेरे गांव से हार्डिंग पार्क पटना बस पङाव का किराया महज बीस रूपया था जबकि आज वह 125 रूपया हो गया है। पटना में सुबह 5:45 बजे की बस में बैठता था तो 9:30 बजे तक हर हाल में अपने गांव के लिए निर्धारित पङाव पर उतर जाता था लेकिन अब उसी बस से 2:00-2:30 बजे दोपहर से पहले पहुंचना नामुमकिन है। उसी दिन वापसी की बात तो शायद दु:स्वप्न बन चुका है। खैर, विकास के दौर में कुछ चीजों का आगे-पीछे हो जाना बङी बात नहीं है। लेकिन सबसे ज्यादे दु:ख और आश्चर्य होता है बाईपास या एन एच 30 को देख कर। जीरोमाइल से अनिसाबाद तक में कुछ जगहों को छोङ दिया जाय तो सङक के दोनों ओर पानी ही पानी नजर आता था खासकर सङक के दक्षिणी हिस्से में।हालात ऐसे थे कि जिन थोङे लोगों ने उधर घर बनाया था उन्हें बङे-बडे ट्यूबों का ही सहारा था जिससे वे सडक तक पहुंच पाते थे। सडक के दोनों किनारे पर इतने घने जंगल लगे थे कि दिन में भी डर लगने लगता था। डर सिर्फ़ तेज चलती गाङियों का ही नहीं था बल्कि लूटपाट का भी था। मरे जानवरों के दूर्गंध बीच किसी अपराध का शिकार हो इंसान का पङा होना भी बङी बात नहीं थी। लेकिन आज आप वहां एक पेङ के लिए भी तरस जाएंगे। जबकि एक समय था जब गर्दनीबाग का इलाका पेङों से इस कदर पटा पङा हुआ था कि कुछ हिस्सा आमबगीचा और अमरूदी बगीचा के रूप में जाना जाता था। वैसे तो गर्दनीबाग में सरकारी आवास होने की वजह से भी पेङों को फलने फूलने का मौका मिलता रहा लेकिन इन आवासों में जिस तरीके का अवैध कब्जा है या खुलेआम कहीं गाय बंधी तो कहीं भूसे के ढेर से इन आवासों की दयनीय स्थिति बनी हुई है वहां पेङ - पौधों की क्या बात की जाए? हाल में एक मॉल बनने की बात चली, फिर चुप्पी लद गई। एक बार फिर जजेज कोठी बनने की बात आई है, लेकिन वो भी भविष्य की ही बात लगती है। हां, इस इलाके के प्रसिद्ध दुमहला को नस्तेनाबूत कर दिया गया है जो गर्दनीबाग अस्पताल के पास से शुरू होता था लेकिन यहां अब कचरा डम्पिंग यार्ड बन गया है। विकास के इस दौर में काफी कुछ बदला।यह इलाका पूर्णतः कंक्रीट का जंगल बन चुका है। जबकि इंडियन अॉयल का डिप्पो तैयार होने से पहले बाईपास के दक्षिणी तरफ जिस जमीन को कोई दस हजार रूपये कठ्ठा लेने को तैयार नहीं था आज वहां की जमीन 45 लाख रूपये कट्ठा मिलना मुश्किल है। इन वर्षों में सबसे ज्यादे बाईपास किनारे गाङियों के शो रूम और अस्पताल खुले हैं, शेष चीजों की तो बात ही कुछ और है। विकास और घनी आबादी के बीच बेऊर का इलाका काफी विकसित हुआ है। मुझे अच्छी तरह से याद है कि 1997 के आस-पास आदर्श कारा बेऊर और मैला -सफाई संयंत्र के आस-पास दूर दूर में एक दो घर नजर आता था बाजार और दुकान की तो बात ही बेमानी है लेकिन आज इस इलाके के विकसित रूप को देखकर विश्वास भी नहीं कर पाएंगे कि किस तरह इन इलाकों में नहर के पानी से चारों ओर बाढ का नजारा दिखता था। हां, अब तो इस इलाके में दैनिक भास्कर जैसे अखबार का दफ्तर भी खुल गया है।

शनिवार, 11 जून 2016

शहंशाह आलम की कविताएं

शहंशाह आलम साहित्य में एक परिचित नाम है जिनकी रचनाएं जीवन की दुश्वारियों से होकर गुजरती हैं जो आपके मर्मस्थान को छूती ही नहीं है बल्कि आपको सोचने पर भी विवश करती है कि हम कैसे समय में जी रहे हैं? हम कहां से कहां पहुंच गए हैं? आप स्वयं शहंशाह आलम की इन कविताओं को देखें और महसूस करें।

     एक बेघर की कविता
 
   
जिनके अपने घर नहीं होते वे नींद में चलते हुए अकसर
पहुँच जाते हैं किसी के भी घर का दरवाज़ा खटखटाने

उन्हें लगता है उनके सपनों से चुराकर बनाया गया है वह घर
जिसकी कुंडी पीट रहे होते हैं वे अपने हाथ से पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से
जैसे कि यह घर उसी का था और चुरा लिया गया था
उस घर के मालिक के द्वारा उसके समय के किसी हिस्से से

यह भी सच है हमारी कठिनाइयों हमारी परेशानियों के बीच
हमारी पसलियों से एक औरत तो बनाई गई ज़रूर
परन्तु हमारे माँस-मज्जे से एक घर नहीं बनाया गया
जोकि हमारे जीवन का पूरा यथार्थ था स्वार्थ से परे
इस पृथ्वी पर रहने-सहने के लिए बिंदास

यह भी सच है कि एक औरत भाग भी जाए
किसी प्रेमी के साथ
किसी दूसरे की घरवाले के साथ
या किसी औरत भगानेवाले के साथ
उनके बहकावे में आकर तो उस औरत को
वापस लाया जा सकता है समझा-बुझाकर

लेकिन कोई घर आपके जीवन से छूट जाए अचानक
अथवा लूट जाए तो उसे वापस लाना बेहद मुश्किल होता है

फिर किसी के पास सुंदर से सुंदर औरत हो
और आपके पास कम सुंदर औरत हो
तो उस अधिक सुंदर औरत का मरद आपको डाँटेगा नहीं
इस बात के लिए कि आपके पास कम सुंदर औरत क्यों है

लेकिन आपके पास आपका अपना घर नहीं है
तो वही औरत आपको डाँट पिलाएगी
या वही मरद आपको धिक्कारेगा इसके लिए
कि आपने उनके घर की तरफ़ देख भी कैसे लिया
जब आपके पास अपना घर नहीं है दिखाने के लिए

इसलिए कि आप दुर्बल हैं अगर आपके पास अपना घर नहीं है
और उनके लिए आप किसी भिखारी जैसे ही हैं
जो उनके घर को मैला करते रहते हैं बराबर आ-आकर।
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     कुश्तीबाज़
   

अपने रहने के ठिकाने से दूर कुश्तीबाज़ कुश्ती लड़ता है

अकसर अखाड़े में पूरे मुहल्ले के सामने कुश्ती लड़ी जाती रही है
अखाड़ा जो कुश्ती लड़ने कसरत करने के लिए बनाया जाता रहा है

लेकिन क्या बड़े-बड़े अखाड़ों में अपना कौशल दिखाने वाला
कोई अखाड़िया दिखाई देता है इन दिनों आपके शहर में कहीं

आप कहेंगे नहीं, लेकिन आपका कहा झूठ साबित होगा मेरे विचार से
इसलिए कि कुश्ती लड़ने का अखाड़ा न भी दिखाई दे तब भी
मैं रोज़ कुश्ती लड़ रहा हूँ अपने इस कुश्तीबाज़ समय से हतप्रभ

यही कुश्ती ऐतिहासिक कुश्ती बनकर रह गई है मेरे जीवन में
आपके जीवन में शायद जीत लेते हों अपने समय की सारी कुश्तियाँ
परन्तु मैं तो हारता रहा हूँ बार-बार अपने जीवन की कुश्ती सच में

इसलिए कि मैं नया मनुष्य हूँ जिसे बहुत कमज़ोर सिद्ध किया जा चुका है
जिसे बहुत बूढ़ा प्रसिद्ध किया जा चुका है, जो सत्ताधीश हैं, उनके द्वारा
इसलिए कि सारी कुश्तियाँ अब सत्ताधीश ही लड़ते दिखाई देते हैं
अगर आप राज्य हैं तो केन्द्र से आप केन्द्र हैं तो राज्य से
जिसे नूराकुश्ती मैं कहता हूँ जिसमें यह तय किया जा चुका होता है
कि एक दूसरे को चित नहीं करना है किसी भी क़ीमत पर
चित किसी को करना भी है तो जनता को करना है हमेशा की तरह

सच यही है कि जनता के जीवन की सारी माननीय-सम्माननीय स्थितियाँ
सारे सत्ताधीश ही क़ब्ज़ा किए चले आ रहे हैं सदियों से पूरी तरह अखाड़िया।
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     छलाँग
   

एक घर मिला था टूटा-फूटा रास्ते में
सफ़र से लौटा तो वहाँ पर घर नहीं था
मकान था भव्य आलीशान अद्भुत
और यह छलाँग थी उस उस घर के मालिक की

उसी तरह एक युग का दूसरे युग में प्रवेश
कुछ इस तरह हुआ इस महाद्वीप पर इस चेतन में
जो चमत्कृत कर रहा था विस्मित कर रहा था सबको
कि अभी तो आज में थे हम सब जी रहे
और वही आज कल में बदल चुका इतनी जल्दी

अभी वह मनुष्य बच्चा पैदा हुआ था
अब था गबरू जवान बिलकुल

वह लड़की अभी थी पहाड़ के नीचे
अब थी पहाड़ की चोटी पर खड़ी मुस्करा रही
अपने छोटे गठीले स्तनों के साथ

वैसे ही वह लड़का था बैठा हँस रहा इस नदी के किनारे
उसने मार दी थी छलाँग अचानक नदी की छाती पर
अब था वह उस हरी भूमि पर उस हरी पृथ्वी पर
जो बची रह गई थी नदी के बीच में अनंत मैदान की तरह।
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     अज्ञातवास
   

इस टूटी हुई नाव में रहता हूँ मैं इन दिनों
अकेला जहाँ कोई नहीं है पानियों के सिवा
न कोई मनुष्य न कोई खंडहर न कोई कायरता

सुना था सच्चरित्र और त्यागी तपस्वी ऐसे ही किसी एकांत में
ऐसे ही स्थानों पर तपस्या किया करते थे सबकी दृष्टि से छिपकर
देवता तक किसी पेड़ की ओट से देख भर लिया करते थे
कि तपस्या का फल पाकर वे उनके समकक्ष खड़े नहीं हो जाएँ

लेकिन मेरे इस एकांतवास में न कोई तपस्वी मिला न कोई देवता
न वे स्त्रियाँ मिलीं जो भादों महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी को
व्रत रखती थीं और देवताओं से डरते हुए उन्हीं का शरणगृह चाहती थीं

मैंने अपनी इच्छा से लिया था यह एकांतवास नदी के बीचोबीच
एकांत को स्मरणीय-वरणीय मानकर अपने एकांत को सज्जित करने
जहाँ न आदिम भय हो न आदिम कोई धर्म जो डँसता रहता था

एकांत बस एकांत का जाप करने के बावजूद कोई था ज़रूर कोई था
जो मेरे इस नावघर को मेरे इस एकांतवास को मेरे इस कमलासन को
ढहाना चाहता था मटियामेट करना चाहता था मेरे भीतर जन्म ले रहे
नए शब्द से नए छंद से नए वृक्ष से नए पुरुष से नए विरोध से भयातुर।
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     बाघ
   

बचपन में बाघ झाँकता था
पेड़ों की ओट से झुरमुटों की ओट से
हमारे सपने में हमारी नींद में
कपास वाले दिनों में वापस ले जाने के लिए
जीवन वाले दिनों में घूमा-फिरा ले आने के लिए

लोहा पानी आग आम्रवृक्ष पहाड़ जंगल
सबकुछ लौटाने के लिए तत्पर
सबकुछ हस्तांतरित करने के लिए उत्सुक
हमें ही जैसे रहता था बाघ

मगर बाघ से भयभीत हम छिपते फिरते थे कमरे में
नींद का कमरा सुरक्षित-रक्षित होता था हमारे लिए
बाघ से बचपन वाले दिनों में

जबकि हत्यारे सदियों से झाँकते आ रहे थे हमारी नींद में
हमारे सपने में शातिर बिलकुल बेकल-बेचैन होकर

हमारे पास कोई कमरा नहीं होता था बचने के लिए
हत्यारे से हत्यारे के हथियार से
न बचपन के दिनों में न अब के दिवसों में

बाघ तो बस गुर्राता था शोर मचाता था नींद में हमारी
जंगली हवाओं के साथ अपनी उपस्तिथि दर्ज कराता
ज़्यादा से ज़्यादा चेतावनी देकर चला जाता था नींद से

नींद से उठने पर सारा कुछ यथावत् मिलता था
जो कुछ जैसा नींद में जाते वक़्त छोड़ते थे हम

हम अपने डर के कारण डर जाते थे बाघ से
नींद में और नींद से बाहर बुरी तरह
बाघ के विरुद्ध कई अर्थ-अनर्थ निकालकर

जब ठठ्ठा मार हँसता था हत्यारा अँधेरे में
रोटियों के टुकड़े उछाल हमारी तरफ़
बाघ उस समय अपनी बाघिन से
प्रेम-क्रीड़ा कर रहा होता था
या अपने शावकों को दौड़ना-भागना सिखा रहा होता था

अब आप पूछेंगे प्रश्न करेंगे कि
बाघ से भी बड़ा बर्बर शिकारी हुआ है भला
आप पूछेंगे पूछते ही जाएँगे एकदम कुशल प्रश्नकर्ता बन

मेरा उत्तर होगा मेरा आग्रह होगा कि
बाघ ने कितनी दफ़ा शिकार किया आपका
आप ज़रूर कहेंगे : एक बार भी नहीं

मैं फिर कहूँगा आपको याद दिलाऊँगा
आप तो रोज़ शिकार किए जा रहे होते हैं
किसी अमात्य के द्वारा किसी महामात्य के द्वारा
किसी पुलिसवाले किसी दुकानदार के द्वारा
किसी बैंक मैनेजर किसी सूदख़ोर के द्वारा
किसी स्त्री किसी पुरुष के द्वारा
किसी आतंकी झंडे किसी पार्टी के प्रवक्ता द्वारा
एकदम अभ्यस्त एकदम शिकार कर लिए जाने को तैयार

सच यही था अब भी अंतर्राष्ट्रीय
बाघ का संरक्षण-संवर्द्धन हम करें न करें
उनका संरक्षण-संवर्द्धन ज़रूर करते आ रहे हैं
जो हमारे असल हत्यारे थे जो हमारे असल शिकारी थे
जोकि असल में बर्बर थे दमघोंटू थे

उन्हीं हत्यारे की शैली उन्हीं के विचार
उन्हीं की भोगवृत्ति उन्हीं के भाव उन्हीं के उच्चारण
उन्हीं के अन्तर्विरोध को अपनाते हुए
हम पार करना चाहते थे ध्वनि और प्रकाश और अन्तरिक्ष
अपने-अपने जीवन का सारा कुछ भूल-भुलाकर
इसलिए कि हर हत्यारा भुखमरा होता है आदिकालीन

आप भी तो भुखमरी के शिकार हुए जा रहे हैं इन दिनों

जबकि आपके जीवन में किसी हत्यारे की नहीं
एक बाघ की ज़रूरत थी जो आपकी रक्षा कर सके

आपके जीवन में पत्थर की लकड़ी की लोहे की तांबे-पीतल की ज़रूरत थी
जिनसे आप अपने हत्यारे को अपने बलात्कारी को
अपने शोषक को मार भगा सकें
उनके विरुद्ध पूरी व्याघ्रता से

आपके अन्तःकरण के भय का निवारण वहाँ कहाँ है बंधु
जहाँ आप ढूँढ़ते रहे हैं शताब्दियों से सच में
और मारते रहे हैं बेचारे बाघ को सपने तक में

आप इतने समझदार इतने नेक होने के बाद भी
अपने अन्दर भरे भय का अन्वेषण कहाँ कर पा रहे हैं
उन पुलिसवालों उन सूदख़ोरों उन हत्यारों उन चोरों
उन अमात्य-महामात्य उन जटिल परिस्थितियों
उन दरिद्रताओं उन क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं को
मार भगाने के लिए आज भी अब भी।
                         ( मुंगेर / 21 जुलाई 2015 )




कवि का परिचय


      शहंशाह आलम

जन्म : 15 जुलाई, 1966, मुंगेर, बिहार

शिक्षा : एम. ए. (हिन्दी)

प्रकाशन : 'गर दादी की कोई ख़बर आए', 'अभी शेष है पृथ्वी-राग', 'अच्छे दिनों में ऊंटनियों का कोरस', 'वितान', 'इस समय की पटकथा' पांच कविता-संग्रह प्रकाशित। सभी संग्रह चर्चित। 'गर दादी की कोई ख़बर आए' कविता-संग्रह बिहार सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा पुरस्कृत। 'मैंने साधा बाघ को' कविता-संग्रह शीघ्र प्रकाश्य। 'बारिश मेरी खिड़की है' बारिश विषयक कविताओं का चयन-संपादन। 'स्वर-एकादश' कविता-संकलन में कविताएं संकलित। 'वितान' (कविता-संग्रह) पर पंजाबी विश्वविद्यालय की छात्रा जसलीन कौर द्वारा शोध-कार्य।
हिन्दी की सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित। बातचीत, आलेख, अनुवाद, लघुकथा, चित्रांकन, समीक्षा भी प्रकाशित।

पुरस्कार/सम्मान : बिहार सरकार का राजभाषा विभाग, राष्ट्रभाषा परिषद पुरस्कार तथा बिहार प्रगतिशील लेखक संघ का प्रतिष्ठित पुरस्कार 'कवि कन्हैया स्मृति सम्मान' के अलावे दर्जन भर से अधिक महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान मिले हैं।

संप्रति, बिहार विधान परिषद् के प्रकाशन विभाग में सहायक हिन्दी प्रकाशन।

संपर्क : हुसैन कॉलोनी, नोहसा बाग़ीचा, नोहसा रोड, पेट्रोल पाइप लेन के नज़दीक, फुलवारीशरीफ़, पटना-801505, बिहार।

मोबाइल :  09835417537

ई-मेल : shahanshahalam01@gmail.com