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गुरुवार, 30 जून 2016

सुशील सिद्धार्थ का व्यंग्य "बीमारी, तीमारदारी,दुनियादारी का दर्शन"

आदमी तीमारदारी से तब तौबा करता है जब तीमारदारी खुद एक बीमारी बन जाती है।आदमी दुनियादार है तो बीमारी का आनंद और ज़्यादा।तीन चीज़ें आपके सुकून को जुनून में बदल  सकती हैं, बीमारी तीमारदारी दुनियादारी।दुनिया वालों का प्यार सबसे ज़्यादा तब उमड़ता है जब आप बिस्तर की चौहद्दी में सीमित हों।तब देखिए लोगों का सामान्य ज्ञान, मेडिकल साइंस पर उनकी पकड़,हरिओम से लेकर अनुलोम विलोम तक उनकी पहुँच, भांति भांति की पैथियों पर उनके शोध प्रबंध, संयम और परहेज पर उनका आध्यात्मिक अनुसंधान।जो साधारण सा जुकाम हो जाने पर रूमाल से नाक तक नहीं पोछ पाते वे आपकी रिपोर्टों को ऐसी गंभीरता से पढ़ते हैं कि एम्स वाले चरण चूमने लगें।ऐसी लंबी सांस भरेंगे निकालेंगे कि बच्चे वसीयत के लिए वकील को फोन करने लगें। पढते हैं प्रतिष्ठित व्यंग्यकार सुशील सिद्धार्थ के व्यंग्य "बीमारी, तीमारदारी,दुनियादारी का दर्शन" को।
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सुशील सिद्धार्थ

सुशील सिद्धार्थ

बीमारियां जीवन दर्शन के वृक्ष की शाखाएं हैं।किसी भी शाखा में लटक जाइए किसी न किसी ज्ञान में अटक जाएंगे।बीमार शब्द ही अद्भुत है।अस्वस्थ कहने से हाय हाय के कैनवास पर मुर्दनी,बदहाली,तबाही का वैसा चित्र नहीं खिंचता जैसा बीमार कहते ही लपक उठता है।इसलिए बीमार आदमी कुछ ख़ास होता है।कई बार ख़ास दिखने के लिए कुछ समझदार लोग ख़ुशी ख़ुशी बीमार से बने रहते हैं।उर्दू कविता का तो आधा काम बीमारी से ही चलता है।बीमारेमुहब्बत की हाय हाय न हो शायरी में सन्नाटा खिंच जाए।दर्द मरीज आह दवा मसीहा इलाज बिस्तर कमजोरी  मौत क़फ़न क़ब्र जैसे लफ़्ज़ न हों तो शायरी लगभग गूंगी हो जाए।एक ज़माने में लखनऊ की नफ़ासत का साज़ बीमारी के दम से ही बजता था।जब कोई पूछता था कि हुज़ूर के दुश्मनों की तबीयत नासाज़ तो नहीं है।ख़ैर।ऐसे ही किसी बीमारियाना मूड में मिर्ज़ा ग़ालिब ने कहा था कि पड़िए गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार।ग़ालिब का क्या है।वे तो कुछ भी कह देते थे।वे कह सकते थे कि मेरे मरने के बाद मेरे घर से  जाने कैसी तस्वीरें और चंद हसीनों के ख़त निकले।हम और आप यह ख़तरा उठा सकते हैं क्या।मोबाइल से एक शाकाहारी मैसेज निकल आए तो घर से निकलने की आदर्श स्थिति आ जाएगी।लेकिन इतने बड़े शायर ने कहा है तो कुछ वज़न होगा ज़रूर। बीमार और तीमारदार का चोली दामन का साथ वे भी मानते हैं जो चोली की चेतना और दामन की दयालुता से अब तक नावाकिफ हैं। यह ग़ौरतलब है कि ग़ालिब ने तीमारदार से तौबा क्यों की थी।उनका तो वे जाने मगर कुछ तजुर्बेकार लोगों से बातचीत कर मैंने जो ज्ञान हासिल किया वह प्रस्तुत है।
आदमी तीमारदारी से तब तौबा करता है जब तीमारदारी खुद एक बीमारी बन जाती है।आदमी दुनियादार है तो बीमारी का आनंद और ज़्यादा।तीन चीज़ें आपके सुकून को जुनून में बदल  सकती हैं, बीमारी तीमारदारी दुनियादारी।दुनिया वालों का प्यार सबसे ज़्यादा तब उमड़ता है जब आप बिस्तर की चौहद्दी में सीमित हों।तब देखिए लोगों का सामान्य ज्ञान, मेडिकल साइंस पर उनकी पकड़,हरिओम से लेकर अनुलोम विलोम तक उनकी पहुँच, भांति भांति की पैथियों पर उनके शोध प्रबंध, संयम और परहेज पर उनका आध्यात्मिक अनुसंधान।जो साधारण सा जुकाम हो जाने पर रूमाल से नाक तक नहीं पोछ पाते वे आपकी रिपोर्टों को ऐसी गंभीरता से पढ़ते हैं कि एम्स वाले चरण चूमने लगें।ऐसी लंबी सांस भरेंगे निकालेंगे कि बच्चे वसीयत के लिए वकील को फोन करने लगें।फिर तमाम मनन के बाद एक बहुत महत्वपूर्ण बात कहेंगे कि भाई साहब हम क्या कहें।जो डॉक्टर कहे वही करिएगा।जैसे बीमार तय किए बैठा है कि जब तक ये नहीं कहेंगे तब तक डॉक्टर की बात नहीं माननी।जो आठ बजे सुबह उठकर किसी तरह दांत मांजकर दफ्तर भाग लेते हैं वे अनुशासन की मूर्ति बन जाएंगे।ऐसा है सुबह पांच बजे बिस्तर छोड़ दिया करिए।एक गिलास पानी पिया और निकल गए टहलने।भाभी जी रोज यह कहती होंगी मगर आप सुनते नहीं।भाभी जी की बात माना करिए।मैंने आपसे कई बार कहा है।इसके बाद आनेवाली चाय के साथ समोसा या पकौड़ी न आए तो भाभीजी की महानता कैसे प्रमाणित हो।वे समोसा खा रहे,आप लार घूंट रहे हैं और उनकी भाभी यानी आपकी पत्नी के प्रवचन उमड़ रहे।क्या कहूँ भाई साब,मान ही लेते तो आज यह हालत क्यों होती।मैं इतनी केयर करती हूँ कि...।उसके बाद जाने कैसे कैसे संस्मरण।भावुकता की चाय में डुबो कर उपदेश के बिस्कुट खाते रहिए।
कोई बहुत गंभीर मामला न हो तो बुखार आदि मामलों में गिरफ्तार पति को देखकर पत्नी उत्साह से भर उठती है।ऐसा है ,अपना यह मोबाईल मुझे दो।कुछ दिन अपना माइंड फ्री रखो।तुमने बहुत नरक काट रखा है।दिन्न भर।ये न्यूज, वो मैसेज, ये फोन वो चैट।ये बधाई वो वाहवा।कित्ती फुरसत है लोगों को।अभी बीमार हो इसलिए कुछ नहीं कह रही।मुझे सब मालूम है वहाँ क्या होता है।कहीं उल्टा सीधा चैट हो गया तो।अभी बीमार हो इसलिए...।मुझसे बात करने की फुरसत नहीं।और?नहीं आज मटर पनीर नहीं बनेगा।डॉक्टर ने मना किया है।किसी बात पर तुम्हारा कंट्रोल नहीं।अभी बीमार हो इसलिए...।तीमारदारी में लगी पत्नी से अगर कह दिया कि उन्ने शांति रखने के लिए भी कहा है तो फिर भुगतिए।देखभाल अच्छी लगती है मगर इतनी हो कि देखने भालने पर पाबंदी लग जाए तो रूह फ़ना होने लगती है।
तीमारदारी में आशंकाओं की ख़ासी भूमिका है।वैसे समकालीन चिकित्सा जगत का बहुत सारा चमत्कार आशंका नामक गुफा में छिपा है।वैधानिक चेतावनी यह है कि अलीबाबा और चालीस चोर की कहानी से इस गुफा का कोई संबंध नहीं है।यह जांचों की गुफा है।खुल जा जांच जांच।आप, तीमारदार और डॉक्टर।कुछ क्षणों में डॉक्टर आपको कब्जे में ले लेगा।आपके तीमारदार से कुछ कहेगा।कहने के समय आपको चेम्बर से बाहर बिठाया जा सकता है।फिर तीमारदारी और दुनियादारी की सलाहें शुरू।ऐसा है,डॉक्टर कोई उल्लू तो है नहीं।जितनी जांचें कही है उतनी करा लो।ठीक है हल्की खांसी है मगर फेफड़ों की लीवर की पूरी जांच करा लीजिए।दिल भी जंचा डालिए।अरे अरे।चच्च चच्च।ऐसा न कहिए।डॉक्टर कोई उल्लू तो है नहीं।खांसी का दिल से क्या घुटने से भी ताल्लुक है।हमारे पड़ोस के तिरवेदी जी खांसते थे तो घुटने कांपने लगते थे।घुटने बदलवाए तब खांसी में आराम आया।डॉक्टर कोई....।चंचल भाई के दांतों में दर्द उठता था तो छींकें आने लगती थीं।दांतों का नया सेट लगवा लिया बस नाक सही हो गई।शरीर का हर पुर्जा एक दूसरे से कनेक्ट है कि नहीं।डॉक्टर कोई...।
जब इस तरह कोई घिर जाता है तब उसका सोया दार्शनिक अंगड़ाई ले उठता है।तब वह बीमारी की डाल पर झूला झूलने लगता है।डॉक्टर पींगे बढ़ाने लगते हैं।कई बार कुछ लोग  बीमारी को लोकगीत उपन्यास महाकाव्य की तरह लिखने लगते हैं।हर मिलने जुलने वाले को व्याधिदान (बतर्ज गोदान) नामक महाकाव्य या उपन्यास के अंश सुनाने लगते हैं।कोई भूल से कह भर दे कि अब नाखून का दर्द कैसा है।प्रेरणा मिल गई।रचना पाठ शुरू।किसी भी किस्सागो से बड़े किस्सागो।बीच में टोका कि नाराज, यार या तो कोई बात पूछो मती या फिर पूरी बात सुनो।मैं तो मर मर के किसी तरह बता रहा हूं और तुम कानून छांट रहे हो।मतलब ,वियोगी होगा पहला कवि अंतिम सत्य नहीं है।हो सकता है कोई बीमार आदमी ही पहला कवि हो गया हो।आजकल की बहुतेरी कविताओं को देखकर बीमारी और कविता के रिश्ते पर बड़ी बहस निकाली जा सकती है।ख़ैर,धीरे धीरे यह रचना हर परिचित को कंठस्थ हो जाती है।इस तरह बीमारी के कई संस्करण और पाठ तैयार हो जाते हैं।
दर्शन का दूसरा चरण है पीड़ा से प्यार।कुछ लोग बीमारी को महबूबा बना लेते हैं।आप सब कुछ कहिए उनकी प्यारी बीमारी को कुछ न कहिए।कह के तो देखिए, कि साब यह कौन सी बीमारी है।एहतियात रखें तो जल्द दूर हो जाएगी।वे नाराज़ हो जाएंगे।जानते भी हैं कुछ कि जो मुंह में आया कह गए।इस बीमारी की महिमा शास्त्र में गाई गई है।क्या बात करते हैं आप भी।उनका बस चले तो प्रसिद्ध श्लोक का रूपांतरण इस तरह कर डालें।यदा यदा हि बुखारस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानम  जुकामस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।यानी यह बीमारी महान।इससे बीमार मैं महान।
दर्शन का तीसरा चरण दुनियादारी से जुड़ा है।लोग गणित लगाकर डायरी मेंटेन करते हैं।अरे जाइए साब।इनको क्या।जब मैं भर्ती था तब देखने आनेवालों की लाइन लगी रहे।डॉक्टर ससुर एक दूसरे से फुसफुसाएं कि बेट्टा, यह है बीमारी।इसे कहते हैं बीमार होना।कुछ आनेवाले तो तैयार कि साहब हमारा भी एक बेड बाबूजी के पास लगा दो।डॉक्टर जाने कैसे हाथ पांव जोड़ कर सबको मना करें।बात करते हो।हमारे सामने उड़ा न करो।
इसलिए साहिब,बीमारी तीमारदारी और दुनियादारी का महान दर्शन आसान नहीं।इसे कोई बीमार मनीषी ही समझ सकता है।
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गुरुवार, 23 जून 2016

सुशील सिद्धार्थ और सहायक पर निबंध

एक इंसान अकेले ही सारा काम नहीं कर सकता। काम को पूर्णता के साथ करने के लिए उसे एक सहायक" की जरूरत होती है। जबकि कार्य-निष्पादन की गति और स्थिति का सहायक की गति और स्थिति से क्या तालमेल है वह प्रतिष्ठित व्यंग्यकार सुशील सिद्धार्थ की रचना "सहायक पर निबंध" में साफ-साफ परिलक्षित है। आप भी इसका आनंद लें।

सहायक पर निबंध
सुशील सिद्धार्थ

वह एक कामयाब सहायक है।कामयाब सहायक वही है जो अपने साहब के हर काम में सहायक हो।सुख में सब साथ रहते हैं।जो दुख में रहे वही साथी।इसी तरह जो अक्लमंदी में साथ रहे उसको क्या गिनना।न तीन में न तेरह में।जो बेवकूफी में वफादारी करे वही अच्छा सहायक माना जाता है।प्रायः अच्छा सहायक अपने साहब को बेवकूफ मानकर चलता है।अच्छा सहायक अपनी अच्छाई से साहब को बेवकूफ बनाकर छोड़ता है।सहायक अचानक इतना महान नहीं बना।वह झिड़की उपेक्षा लानत बेइज्जती प्रपंच की पंचाग्नि में तपा।व्यवस्था की ऐतिहासिक गुफा में घुसा।हमारी परंपरा है कि हम पुरानी बातों से सीखकर आगे या पीछे चलते हैं।इस सहायक ने एक पुराने दिलजले का कथन पढ़ा कि मनुष्य एक बार काल के गाल से तो बाहर निकल सकता है लेकिन अगर ईमानदारी मनुष्य को निगलने लगे तो उसकी रक्षा कोई मंत्र तंत्र यंत्र नहीं कर सकता।उसकी रक्षा केवल षड़यंत्र ही कर सकता है।रक्षा न हो पाए तो नाश निश्चित है। सहायक ने विचार किया कि अगर सब नाश ही हो गया तो हम क्या चटनी पीसेंगे।साहब लोग हैं तभी हम हैं।यह न रहा तो हमारा क्या होगा।सहायक का यह सोचना ठीक था।कुछ लोग सोचते बहुत हैं करते कुछ नहीं।वे धरती पर बोझ से अधिक हैं।उत्तम नर वे हैं जो सोचने के साथ करते भी हैं।सोचा घोटाला करना है कर दिया।हत्या तो सोचने से पहले कर दी।बलात्कार तो सोचातीत है और हर बालिग नाबालिग पुल्लिंग का समाजसिद्ध अधिकार है।सहायक भी सोचने के साथ करने वाला ऐसा ही महान भारतीय था।उसने सोचा कि बॉस हमेशा सही होता है।इस सोच पर मोच आए इससे पहले कर्मभूमि में कूद पड़ा।भागा।फिर उसने मुड़कर नहीं देखा इस मुहावरे को विकसित किया।यानी किसी ओर भी कहीं भी नहीं देखा।वह प्रवीण हो गया।साहब के हर समारोह में वींणा बजाने लगा।साहब निर्णय लें इससे पहले तारीफ करने लगा।साहब के पांव में रुखाई दिखे इससे पेशतर घानी का शुद्ध तेल लगाने लगा।घानी का तेल चुनने के दो राष्ट्रीय कारण हैं।पहला यह कि बॉस के चेहरे पर भले ही रुखाई दिखे पैरों पर नहीं दिखनी चाहिए।आचरण भले धुंधला हो चरण चमकने चाहिए।दूसरा यह कि अच्छा सहायक साहब को कोल्हू का बैल बनाए रखता है।आज वे कोल्हू तो न के बराबर दिखते हैं अलबत्ता कोल्हू के बैलों की संख्या बढ़ रही है।फिर सहायक ने व्यवस्था विभ्रम नामक सेमी आयातित ग्रंथ के पृष्ठ उलट पलट कर देखे।उसमें लिखा था कि वैसे तो हर साहब गलती करता है लेकिन साहब को गलती करने में मज़ा आने लगे यह बिना सहायक की मेहनत और क़िस्मत के नहीं होता।गलती करने वाले साहबों को आईएएस और पीसीएस लॉबी भी देवतातुल्य आदर देती है।सहायक ने यह बात भी गांठ बांध ली।इसके बाद वह दफ्तर में सब पर सवारी गांठने लगा।उसने कई कीर्तिमान बनाए हैं।मैं उससे मिलकर जीवन के कुछ और रहस्य जानना चाहता हूं।वह समय नहीं दे रहा।वह समय का सहायक है।जिसका समय निकल जाता है उसे विनम्रता से लात मारकर बाहर निकाल देता है।
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गुरुवार, 16 जून 2016

सुशील सिद्धार्थ का व्यंग्य एक था राजा

आत्महत्या कहकर हमारे गांव कुनबे को बदनाम न करो।देखो,मरना एक दिन सबको है।वीर मनुष्य वही है जो भाग्य के भरोसे न बैठा रहे कि जब वह दिन आएगा तब मर लेंगे।ऐसा मान लेंगे तो हमारी संस्कृति का विकास रुक जाएगा।इसलिए हम अपना दिन खुद चुनते हैं।कहा गया है कि कर्म करो फल की इच्छा न करो।इसलिए किसान पेड़ पर विकास के फल की तरह लटक जाते हैं। इन पंक्तियों को लिखने वाले सुशील सिद्धार्थ समकालीन व्यंग्यकारों में एक प्रतिष्ठित नाम हैं. जिनके व्यंग्य की एक अलग शैली है. इन्होंने चार व्यंग्य संग्रह और दो कविता संग्रह के अलावे नौ पुस्तकों का संपादन किया है. जिन्हें आलोचना के लिए स्पंदन सम्मान से सम्मानित किया गया है. पढ़ते हैं सुशील सिद्धार्थ जी के व्यंग्य एक था राजा को.



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एक था राजा
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सुशील सिद्धार्थ
यह एक सरल,निष्कपट ,पारदर्शी और दयालु समय की कहानी है।एक दिन किसी देश का राजा चिंता में पड़ गया।उसे देखकर रानी भी पड़ गई।पड़कर रानी ने गुरुदेव को बुला भेजा।हरकारा रवाना हुआ।गुरुदेव बहुत दिनों से ताव खाए पड़े थे।गुरुदेव दरबार से बुलाए जाने के लंबे इंतज़ार में हर आने जाने वाले को शाप दे रहे थे।वे चिंतित थे कि कहीं राजा ने पत्नी, न्याय, नियम आदि की तरह गुरु भी तो नहीं बदल लिया!हरकारे को देखकर हवन कुंड की तरह गुरु का इच्छा कुंड भभक उठा।वे सोचने लगे कि अहा,वह चिंतक ही क्या जिसे सत्ता का सत्तू न मिल सके।हर दार्शनिक का लक्ष्य दरबार की दुंदुभि बनना ही तो है।ऐसे आदि आदि विचार उछालते हुए गुरुदेव ख़याली घोड़े पर सवार थे।हरकारे ने हांफते हुए उनको नीचे उतारा।जल्द पहुंचना था इसलिए हरकारे ने उन्हें जीवित घोड़े पर बिठाया।घोड़ा गधे की भांति चल पड़ा।वह एक सरकारी घोड़ा था।
महल में पहुंचते ही गुरुदेव ने रानी को आनंद के अंतिम छोर पर खड़े होकर आशीर्वाद दिया।वे और देते कि राजा आ गया।आते ही उसने कहा कि ,'गुरुदेव,आज हम चिंतित हैं और कुछ सोच रहे हैं।' गुरुदेव यह सुनते ही दुखी हो गए।अपने दुख को माहौल में स्थापित किया।फिर बोले,'राजन यह तो अनर्थ है।सोचना और चिंतित होना तो प्रजा का धर्म माना गया है।बल्कि उत्तम राजा वह माना जाता है जो प्रजा के लिए सोचने और चिंतित होने के नित नए सुनहरे अवसर मुहैया कराता रहे।यही राजपरंपरा है।ऐसे अवसरों से ही राज्य में चिंतक पैदा होते रहे हैं।फिर भी,आप राजा हैं।कुछ भी कर सकते हैं।बताएँ मुझे किसलिए बुलाया है।'राजा बोला',गुरुदेव प्रजा मुझको क्या समझती है।उसके मन में मेरी कैसी छवि है!क्या आप बता सकते हैं।'
गुरुदेव ज्ञानी तो बहुत थे।मगर यह जानते थे कि जिस ज्ञान से अपनी जान का संकट पैदा हो जाए वह अज्ञान है।बोले,'क्या क्या नहीं समझती है।आपका कहां तक बखान करूँ।' राजा मूर्ख तो बहुत था।मगर यह जानता था कि गुरुदेव हैं तो हमारे ही गुरुदेव।बोला, 'यह भी तो परंपरा रही है कि राजा लोग वेष बदलकर रात में किसी गांव वांव में जाकर सबके मन का हाल मालूम करते थे।क्या मेरा ऐसा करना सिंहासन को शोभा देगा?'गुरुदेव ने मन में अपशब्द निबद्ध अनेक शास्त्रीय बातें सोची।कहीं ऐसा तो नहीं कि यह सनकी आदमी मुझे भी साथ चलने को कह दे।कुछ देर बाद मन के बाहर गद्गद होकर बोले,'अहा के बाद अहहा भी कि आपने यह कहा।वैसे आपको वेष बदलने की ज़रूरत नहीं है।आपको अनेक वर्षों से जनसमुदाय ने देखा ही नहीं है।फिर भी सावधानी बरत कर जाना ही उचित होगा।अब पक्के तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता कि प्रजा का रवैया कैसा रहेगा।अजातशत्रु शब्द में भी शत्रु तो लगा ही है।प्रजा के रवैये के बारे में ग्लोबलम् उपनिषद में कहा गया है,' मीडिया न जानाति कुतो मनुष्य:।'
रानी ने तिलक लगाया।राजा निकल पड़ा।रानी ने बहुत दिन बाद ऐसी सांस ली जिसे चैन की सांस कहा जाता है।जिन पत्नियों के पति अधिकतर घर में ही रहते हैं वे इस सौभाग्य का अनुभव कर सकती हैं।दांम्पत्य दुर्दशा पुराण में ऐसी बातें विस्तार से लिखी गई हैं।बहरहाल,यह ताकीद कर दी गई कि किसी को कानोकान भी ख़बर न हो।आंखोआंख का तो सवाल ही नहीं उठता।
राजा ने अपने अत्यंत प्रिय वेषभूषाकार से अपना चेहरा मोहरा बदलवाया।चुपके से निकल पड़ा।राजा को ज़मीन पर पांव रखने में कष्ट तो हो रहा था,मगर उसे प्रजा की गर्दन पर पांव रखने का परंपरागत अभ्यास था।उसे ख़ास अटपटा भी नहीं लग रहा था।जब रात जैसी रात हो गई तब राजा एक गांव जैसे गांव में जा पहुंचा।वहाँ कुत्ते भौंक रहे थे।राजा यह जानकर ख़ुश हुआ कि हमने सबको अभिव्यक्ति की आजादी दे रखी है।महल में राजा को शिक्षा के दौरान प्रजा के जो पर्यायवाची रटाए गए थे उनमें कुत्ता और सुअर सबसे ऊपर थे।
राजा अब उस जगह की तलाश में था जहां भीड़ जैसे लोग मिलें।राजा उदार था।भीड़ और भेड़ जैसे शब्दों से उसे प्यार था।भेड़िया शब्द का तो वह आदर करता था।कुछ दूर पर सामने लोग दिखे।वह विनम्रता की मूर्ति बनकर आगे बढ़ा।राज्य में सर्वाधिक विनम्रता राजा की मूर्तियों पर ही दिखती थी।राज्य मूर्तियों के सहारे ही आगे बढ़ रहा था।राजा ने देखा।सामने एक चौपाल ।चौपाल में भीड़ जमा थी।वह निकट जाकर बोला,'भाइयो ,मैं राह भटक गया हूं।क्या आप सबसे बात करते हुए यहाँ रात बिता सकता हूं।'चौपाल के लोगों ने एक दूसरे को एक दूसरे की तरह देखा।राजा के लिए जगह बना दी गई।पानी वानी आया।उसने पिया।कुछ ताज़ा पानी अपनी आंखों में डाल लिया।ताज़ा पानी आंखों में मरने की प्रक्रिया में लग गया।कुछ हल्की फुल्की बातें शुरू हुईं।राजा आवाज़ बदलने में भी निपुण था।आवाज़ बदलकर पूछने लगा,'भाइयो,सुना है आप के गांव में कुछ किसानों ने आत्महत्या की है।ऐसा क्यों हुआ।क्या राज्य की व्यवस्था ठीक नहीं है?' एक बुजुर्ग कहने लगा,'ओ मेहमान भाई।आत्महत्या कहकर हमारे गांव कुनबे को बदनाम न करो।देखो,मरना एक दिन सबको है।वीर मनुष्य वही है जो भाग्य के भरोसे न बैठा रहे कि जब वह दिन आएगा तब मर लेंगे।ऐसा मान लेंगे तो हमारी संस्कृति का विकास रुक जाएगा।इसलिए हम अपना दिन खुद चुनते हैं।कहा गया है कि कर्म करो फल की इच्छा न करो।इसलिए किसान पेड़ पर विकास के फल की तरह लटक जाते हैं।वे इस लटकने के फल की इच्छा नहीं करते।वे जानते हैं कि इस अमर फल का बटवारा करनेवाले आते ही होंगे।और यह भी समझ लो ,जब मौत माता का बुलावा आ जाता है तब कौन रुक सका है।हम तो आभारी हैं राजा जी के कि दिन रात ऐसे बुलावों का शिलान्यास करने में व्यस्त रहते हैं।संतजन कह गए हैं कि चलो बुलावा आया है।'इतना सुनते ही सारी चौपाल ने हाथ जोड़ लिए और जयकारा भी लगाया।
राजा भक्ति भाव में डूब गया।खुश होकर बोला,'वाह।आप लोग कितने होशियार हैं।दार्शनिक हैं।फिर भी कुछ तबकों द्वारा यह सवाल उठाया जाता है कि देश का राजा सेठों महाजनों के पीछे पीछे चल रहा है।'राजा का वाक्य पूरा होते होते चौपाल में सबने अपने कानों पर हाथ रख लिए।कि उफ, हम ये बातें सुन भी नहीं सकते।एक युवक आवेश में कहने लगा,'ओ परदेसी भाई।ऐसे सवाल उठाने वालों को इस राज्य का कानून उठा क्यों नहीं लेता।इसीलिए राजधानी में बार बार भूकंप आता है।गैया के सींग पर टिकी धरती मैया भी ऐसा झूठ बर्दाश्त नहीं कर पाती।तुम पहले बात को समझो।हर वक्त जो चालू है वही चलता है।कहा गया है--महाजनो येन गता स पंथा:।महाजन सेठ पूंजीधर व्यापारी जिस पथ पर चलें वही पथ है।बाकी सब लथपथ है।इसलिए हमारे राजाजी इनके पीछे चल रहे हैं।मैं तो कहता हूँ  यह लिख देना चाहिए जगह जगह कि विकास के वास्ते महाजन के रास्ते। समाज के हर रास्ते को किसी न किसी पूंजीधर के नाम कर देना चाहिए।दुख की बात है कि अभी भी राज्य के बहुत कम मार्गों पर ऐसा हो सका है।मैं यह नहीं कह रहा कि हमारे राजाजी ने इस मामले में कोई कोताही की है।ना ना।ऐसा सोचना भी पाप है।वे तो चौबीस घंटे इस काम में लगे हैं।हमारे भीतर ही कोई खोट है जो इसकी गति धीमी है।'राजा ने मन ही मन तय किया कि वापस लौटते ही इस काम को गतिमान करना है।चुपके से इस युवक को बुलाकर दरबार में कोई ज़िम्मेदार पद देना है।ये प्रजा के मन की बातें हैं।प्रजा की भावनाओं को समझना ही राजा का पहला धर्म है।
राजा इतना प्रसन्न हुआ कि उसका मन किया असली भेस में आ जाए।मगर इच्छा को दबा लिया।कहने लगा ,'इसी कारण यह राज्य उन्नति कर रहा है प्रजा और राजा मिलकर एक जैसा ही  सोच रहे हैं।अब चलना चाहिए।बातों बातों में रात खत्म होने को आई।' एक अधेड़ ने हाथ जोड़ लिए 'साहेब क्या उम्दा बात कही।जब अंधेरा होता है तब हम अंधेरा दूर करने की बातें करने लगते हैं।'तभी एक अन्य ने अधेड़ को रोक कर कहा,' वो तो ठीक कहा ।मगर कुछ करना भी चाहिए।हमें मनुष्य जीवन मिला है। ओ मेहमान जी,अभी कुछ रौशनी कम है।रुकिए,हम निकट के गांव में आग लगवाने का इंतजाम करते हैं।ताकि कुछ तो उजाला हो सके।'
राजा ख़ुश हुआ।जाड़े में हाथ तापने और सरकारी गश्त के समय रौशनी करने का यह पुराना तरीका था।थोड़ी ही देर में रास्ते पर रौशनी दिखने लगी।राजा जलते गांव की रौशनी में अपना लिखा राज्यगीत गाता हुआ आगे बढ़ चला।
अब चौपाल पर सारे लोग अपना अपना मेकअप उतार रहे थे।एक बुजुर्ग दिखते आदमी ने कहा,' आप सब दरबारियों ने अच्छा अभिनय किया।ख़ैर हमको अभ्यास भी है।हम बरसों से यही करते चले आए हैं।ऐसा करो,अब असली गांव वालों को रिहा कर दो जो सुबह से बंधक पड़े हैं।' एक युवक बोला',चाचा आप जान कैसे गए थे कि राजासाहब यहीं आएंगे।'बुजुर्ग हंसा,' ऐसा है ,राजा की चाल से ही अंदाजा लग जाता है कि वह कहां जा रहा है।'


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