तपती धरती और चिलचिलाती गर्मी में आई बारिश की
बूंदों से धरा का आंगन ही नहीं खिलखिला रही है बल्कि आत्मा को भी अजीब खुशी मिल
रही है. मनुष्य के साथ-साथ सृष्टि का हर जीव खुशी का गीत गुनगुनाए जा रहा है.
सूखती नदियाँ अपनी जवानी को फिर से पाकर इठला रही है. लेकिन इन सबों के बीच भी याद
आती है एक जिंदगी – दियारा के लोगों की जिंदगी. जी हां, नदियों के बालू में पलने
वाली जिंदगी, उसके सुख और दुःख के पल, जिनकी जिंदगी बारिस की बूंदों से ही
प्रभावित होती है. और याद आती है कवि सुशील कुमार की दियारा में रेत
होती जिंदगी. खुद ही करीब से महसूसें सुशील कुमार की कविताओं में दियारा की
जिंदगी को.
दियारा में रेत होती ज़िन्दगी
दियारा - (एक) :
न शहर न गाँव है
न ठाँव है कहीं न छाँव है
रेत से पटा दयार है
दूर तलक पसरा सन्नाटा है
निस्पंद गंगा के कछार का
हाँ, यह दियारा इलाका है
ठौर-ठौर जल-जमाव है
छिछली नदी में एक – दो नाव हैं
नाव में चढ़ते-उतरते दियारा के लोग
नाव में चढ़ते-उतरते दियारा के लोग
और लोगों को टेरते मल्लाह
खेते जाते हैं अपनी पतवार,
मगन होकर गुनगुनाते जाते हैं
खेते जाते हैं अपनी पतवार,
मगन होकर गुनगुनाते जाते हैं
दु:ख से भींजे कोई गीत
मौन दियारावासी खुले आसमान के नीचे
बीच कभी ठुठ्डियों पर
मौन दियारावासी खुले आसमान के नीचे
बीच कभी ठुठ्डियों पर
अपनी उंगलियाँ टिकाये,
कभी घुटनों के बल टिके
तो कोई निर्निमेष निहारता जाता
क्षितिज पर अनंत शून्य
तो कोई नाप रहा होता
जल राशि के अपार विस्तार के साथ
कभी घुटनों के बल टिके
तो कोई निर्निमेष निहारता जाता
क्षितिज पर अनंत शून्य
तो कोई नाप रहा होता
जल राशि के अपार विस्तार के साथ
मन ही मन अपनी घनीभूत पीड़ा
समय मानों ठहर गया हो यहाँ !
न जाने किस दुश्चिंता में ऊब-डूब
कांतिम्लान इन चेहरों पर उछरी
समय मानों ठहर गया हो यहाँ !
न जाने किस दुश्चिंता में ऊब-डूब
कांतिम्लान इन चेहरों पर उछरी
कितनी-कितनी लकीरें
कहती हैं दियारा के दर्द की अनगिन गाथाएँ !
समय के प्रवाह में बहता जीवन की
नाव, फिर हिचकोलें खाती है
केवट का स्वर-लय टूटता है
नदी का मौन भंग हो जाता है
आ जाता है घाट
और पथ
उतारता है नाविक यात्रियों को
उस पार हौले-हौले
जहाँ मयस्सर है सिर्फ़
गंगोटी का बलुआही सफ़र --
रेत की सर्पिल पगडंडियाँ --
जहाँ देखता हूँ कुली-पिट्ठूओं का दल
जो घाट पर कब से उनकी बाट जोह रहे हैं !
मौसम के सिवा यहाँ कुछ भी खुशग़वार नहीं
रेत होती दियारावासियों की ज़िन्दगी में
खुशियाँ कम हैं ग़म ज़्यादा
विकास की आखिरी किरण से महरुम
जनपद-मुख्यालय से कटा
दियारा में सुविधाओं का नामोंनिशान नहीं ;
झोपड़पट्टियों में बेहाल लोग
न सड़कें न बिजली न पेयजल
न पक्के मकान न दुकान
हाथ हज़ार पर रोजगार नहीं
अर्द्धनग्न या लंगोट पहने
थिगड़ों में लिपटे पुरुष
दीखते हैं दियारा में कहीं तो
कहती हैं दियारा के दर्द की अनगिन गाथाएँ !
समय के प्रवाह में बहता जीवन की
नाव, फिर हिचकोलें खाती है
केवट का स्वर-लय टूटता है
नदी का मौन भंग हो जाता है
आ जाता है घाट
और पथ
उतारता है नाविक यात्रियों को
उस पार हौले-हौले
जहाँ मयस्सर है सिर्फ़
गंगोटी का बलुआही सफ़र --
रेत की सर्पिल पगडंडियाँ --
जहाँ देखता हूँ कुली-पिट्ठूओं का दल
जो घाट पर कब से उनकी बाट जोह रहे हैं !
मौसम के सिवा यहाँ कुछ भी खुशग़वार नहीं
रेत होती दियारावासियों की ज़िन्दगी में
खुशियाँ कम हैं ग़म ज़्यादा
विकास की आखिरी किरण से महरुम
जनपद-मुख्यालय से कटा
दियारा में सुविधाओं का नामोंनिशान नहीं ;
झोपड़पट्टियों में बेहाल लोग
न सड़कें न बिजली न पेयजल
न पक्के मकान न दुकान
हाथ हज़ार पर रोजगार नहीं
अर्द्धनग्न या लंगोट पहने
थिगड़ों में लिपटे पुरुष
दीखते हैं दियारा में कहीं तो
स्त्रियाँ फटे बसन अपनी देह चुरातीं
बच्चे भी नंग-धड़ंग
जो स्कूल जाने के बजाय गृहस्थी में हाथ बटाते –
बच्चे भी नंग-धड़ंग
जो स्कूल जाने के बजाय गृहस्थी में हाथ बटाते –
मछलियाँ-केकड़े-घोंघे की खोज में
चहबच्चों में कमर तक कीचड़ गहडोरते,
कितना हृदयविदारक है –
चहबच्चों में कमर तक कीचड़ गहडोरते,
कितना हृदयविदारक है –
उन बाल-गोपालों के हाथ
कभी कलम नहीं गहे
ले-देकर बस एक खेती है गुजर-बसर को
कभी कलम नहीं गहे
ले-देकर बस एक खेती है गुजर-बसर को
और खेत भी ज्यादातर रेत-सने हैं !
फसल के साथ इलाके में
अपराध भी खूब फलते हैं
बोता कोई है, काटता कोई है
फसल के साथ इलाके में
अपराध भी खूब फलते हैं
बोता कोई है, काटता कोई है
फसल-कटाई के दिनों कई बार
पसीने की जगह खू़न टपकते हैं खेतों में
हत्याएँ और लूट तो सरेआम है
दियारा - (दो) :
साँझ गहराते ही
बच्चों की आँख की तरह
बंद हो जाते हैं दियारा के रास्ते
दूर-दराज गाँवों में कहीं
जुगनुओं की तरह टिमटिमाती हैं लालटेनें
बाकी सारा दियारा निमग्न होता है
घुप्प अँधेरे में,
झिंगुरों की आवाज़ में
टोडों की टर्राहट में
तेज हवाओं की सरसराहट में
लाचार हो या बीमार कोई
राशन - पानी का इंतजाम करना हो
या दवा - दारु का,
कोसों पैदल चलकर ही
तय होती है दियारा में
बाज़ार-अस्पताल की दूरियाँ
दियारा :(तीन)
आषाढ़ के आते - आते नदी फूलने लगती है
तब राई सी मुसीबत भी पहाड़ बन जाती है
दियारावासी लहरों पर अपनी आँख बिछाये
पसीने की जगह खू़न टपकते हैं खेतों में
हत्याएँ और लूट तो सरेआम है
दियारा - (दो) :
साँझ गहराते ही
बच्चों की आँख की तरह
बंद हो जाते हैं दियारा के रास्ते
दूर-दराज गाँवों में कहीं
जुगनुओं की तरह टिमटिमाती हैं लालटेनें
बाकी सारा दियारा निमग्न होता है
घुप्प अँधेरे में,
झिंगुरों की आवाज़ में
टोडों की टर्राहट में
तेज हवाओं की सरसराहट में
लाचार हो या बीमार कोई
राशन - पानी का इंतजाम करना हो
या दवा - दारु का,
कोसों पैदल चलकर ही
तय होती है दियारा में
बाज़ार-अस्पताल की दूरियाँ
दियारा :(तीन)
आषाढ़ के आते - आते नदी फूलने लगती है
तब राई सी मुसीबत भी पहाड़ बन जाती है
दियारावासी लहरों पर अपनी आँख बिछाये
नदी-माँ से कोप बरजने की प्रार्थनाएँ करते
कोशी-बलान-कमला-गंडक भी उफनती
गंगा से गले मिलती हैं सावन में
पर सँभाल नहीं पाती गंगा अपनी बहनों की बाढ़
नेपाल का बैराज खुलते ही
बेतरह खौलने लगती है वह
और तटबंध भहराने लगते हैं
लोग घर-बार छोड़ भागने लगते हैं
लील जाती है कई बार हहराती गंगा
पूरा का पूरा दियारा
बह जाते हैं कई जानें-माल–मवेशी
गंगा से गले मिलती हैं सावन में
पर सँभाल नहीं पाती गंगा अपनी बहनों की बाढ़
नेपाल का बैराज खुलते ही
बेतरह खौलने लगती है वह
और तटबंध भहराने लगते हैं
लोग घर-बार छोड़ भागने लगते हैं
लील जाती है कई बार हहराती गंगा
पूरा का पूरा दियारा
बह जाते हैं कई जानें-माल–मवेशी
किसानों के सालों सँजोये सपने भी
जो बच पाते हैं इस विभीषिका से
उनकी आँखों में होता है
दु:खों के अंतहीन जंगल
और सिर पर उनके खुला आसमान
दियारा-(चार) :
जब मेघ उतर आते है खाड़ी में
नई जलोढ़ मिट्ट्याँ पट जाती है समूचे दियारा पर
और मृण्मय श्मशानी चुप्पियां फैल जाती है दूर तक
फिर होती है कई सरकारी घोषणाएँ
और राहत के नाम पर एक बार फिर
लूट का बाज़ार गर्म होता है
कुछ सेर मोटे अनाज और कुछ रुपये
मुआवज़े के बतौर बाँटकर
दियारावासियों को फुसला लिया जाता है
उनकी आँखों में होता है
दु:खों के अंतहीन जंगल
और सिर पर उनके खुला आसमान
दियारा-(चार) :
जब मेघ उतर आते है खाड़ी में
नई जलोढ़ मिट्ट्याँ पट जाती है समूचे दियारा पर
और मृण्मय श्मशानी चुप्पियां फैल जाती है दूर तक
फिर होती है कई सरकारी घोषणाएँ
और राहत के नाम पर एक बार फिर
लूट का बाज़ार गर्म होता है
कुछ सेर मोटे अनाज और कुछ रुपये
मुआवज़े के बतौर बाँटकर
दियारावासियों को फुसला लिया जाता है
हर बरसात में
घर-दुआर माल-मवेशी खेत-खलिहान
घर-दुआर माल-मवेशी खेत-खलिहान
ओसारों में चहकते छोरे
खेतों में लहलहाते धानों की बालियाँ
चौपालों में गूँजते गीत
पागुर करती गायों के स्वर
यानि कि विस्थापन का पूरा स्मृतिचित्र ही
खेतों में लहलहाते धानों की बालियाँ
चौपालों में गूँजते गीत
पागुर करती गायों के स्वर
यानि कि विस्थापन का पूरा स्मृतिचित्र ही
दिन-रात तैरता है बेबस आँखों में
और हरदम एक हूक-सी
उठती है दियारावासियों के दिल में।
और हरदम एक हूक-सी
उठती है दियारावासियों के दिल में।
कवि का परिचय-वृत
सुशील
कुमार
- जन्म-13/09/1964.
पटना
सिटी (बिहार) में।
- सम्प्रति मानव संसाधन विकास विभाग,रांची
(झारखंड) में कार्यरत ।
- संपर्क
-
सहायक निदेशक/प्राथमिक शिक्षा निदेशालय/ स्कूली
शिक्षा एवं साक्षरता विभाग/एम डी आई भवन(प्रथम तल)/ पोस्ट-धुर्वा /रांची
(झारखंड)
– 834004
ईमेल – sk.dumka@gmail.com
मोबाईल न. – 0 9431310216 / 0 9006740311
मोबाईल न. – 0 9431310216 / 0 9006740311
§ प्रकाशित कृतियां – कविता-संग्रह कितनी
रात उन घावों को सहा है (2004), तुम्हारे शब्दों से अलग (2011), जनपद
झूठ नहीं बोलता (2012)
- कविताएं और आलेख साहित्य की मानक पत्रिकाओं व अंतर्जाल-पत्रिकाओं में
निरंतर प्रकाशित।
