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मंगलवार, 5 मार्च 2019

कवि अरूण कमल की योगफल की समीक्षा शहंशाह आलम की कलम से।




सुसुम धूप में फिर से ढूँढ़ो
वही शब्द लुप्त
संदर्भ : अरुण कमल की कविताओं का संग्रह योगफल
• शहंशाह आलम

          अभी ठीक से खेत कोड़ा भी नहीं
          अभी ठीक से मिट्टी बराबर भी नहीं की
          अभी ठीक से रोपनी भी नहीं हुई
          अभी ठीक से पटाया भी नहीं
          अभी ठीक से पौधा उठा भी नहीं
          अभी ठीक से बालियाँ भी नहीं फूटीं
          अभी ठीक से दाने पके भी नहीं
          अभी ठीक से कटनी भी नहीं हुई
          अभी ठीक से दौनी भी नहीं हुई
          अभी ठीक से ओसाई भी नहीं हुई
          अभी ठीक से दाने चाले भी नहीं गए
          अभी तो दाने बटोरे भी नहीं गए कि
          द्वार पर आकर खड़े हैं
          वसूली वाले

          नहीं महाराज, नहीं, अभी तैयार नहीं।

अपनी पसंद के कवियों को पढ़ते हुए अकसर सोचा करता हूँ कि एक अच्छे कवि की पहचान क्या है। हो सकता है, ऐसा सोचना, मेरे अंदर रह रहे कविआदमी के लिए कोई अच्छा लक्षण ना हो। स्वीकार्य है, यह वाला लक्षण मेरे जैसों के अंदर होना भी नहीं चाहिए। ख़ास कर, कविता के महान कवियों को पढ़ते हुए। यह है भी, तो एक कविधर्मी होने के कारण है। यही कारण है, अरुण कमल को पढ़ा-पढ़ी के समय भी यह ख़्याल आता रहा है कि एक अच्छे कवि की पहचान क्या है? सोचने का यह भाव, एक सनातन भाव है, सो ऐसा सोचते रहने को कोई ख़राब गुण मैं नहीं मानता। बहुत सारे मूर्धन्य आलोचक इस गुण को अच्छा नहीं मानते। उनका मानना है, इस गुण से उनके बहुत सारे प्रिय कवि कविता की आलोचना में आने से रह जाएँगे। आलोचना का यह जड़वाद है, जिसकी वजह से आज भी बहुत सारे जेनुइन कवि उनकी आलोचना का हिस्सा बनने से रह गए हैं। समकालीन हिंदी आलोचना की यह बड़ी कमज़ोरी रही है। पहले भी, अभी भी। यह कमज़ोरी आगे भी रहने वाली है।
     हिंदी आलोचना अरुण कमल की कविता के साथ ऐसा कोई जड़ रास्ता नहीं तलाश सकती थी। दरअसल कविताई का जो गुण अरुण कमल के पास था, बहुत कम हिंदी के कवियों के पास यह गुण होता है, जिनकी कविता सिर्फ़ हिंदी कविता को नहीं, विश्वकविता को प्रभावित करे। सीधे-सीधे कहिए, तो अरुण कमल की कविता, कविता का कोई विश्वकोश अगर है, तो उसी कोश में रखी जाने वाली कविता है। अरुण कमल की कविता हिंदी कविता की ऐसी निधि है, जो भविष्य के लिए संभाल कर रख ली जानी चाहिए। यह कविता हमारे वक़्त की ऐसी कविता है, जिसमें हमारे वक़्त का ज़ख़्म भी है और मरहम भी। वक़्त कहीं ख़ामोशी में है, तो कहीं हो-हल्ला में है। तभी हाकिमे वक़्त पूँजीपतियों से हमारा सौदा करता है और ऐसे सौदे पर बिना शर्मिन्दा हुए रक़्स करता है और रक़्स करते हुए हमको ज़ख़्म देता है और अरुण कमल की कविता मरहम देती है। उनकी कविता एक लोकप्रिय सरकार के सात दिन का आस्वाद लीजिए और समझिए कि कोई हाकिमे वक़्त रक़्स ही काहे करता है बिना शर्मिन्दा हुए : ‘पहले ही दिन सरकार ने आँगनबाड़ी सेविकाओं पर लाठियाँ भाँजीं / दूसरे दिन वृद्धावस्था पेंशन पर पानी के फ़व्वारे / तीसरे दिन छँटनीग्रस्त शिक्षामित्रों के धरने पर कुत्ते छोड़े / चौथे दिन उजड़े झोंपड़वासियों पर घोड़े दौड़ाए / पाँचवें दिन बेरोज़गारों के जुलूस को रौंदा / छटे दिन मूक-बधिर-नेत्रहीनों पर आँसू गैस के गोले ठोंके / सातवें दिन बालिकाहत्या का विरोध करतीं औरतों पर गोलियाँ दागीं / और सात को मौक़े पर ढेर किया / सबने स्वर से गाया / ऐसी लोकप्रिय न्यायप्रिय / देवानाम प्रिय प्रियदर्शी सरकार / धम्माशोक बाद कभी नहीं आई / कभी नहीं / नहीं।’ इस कविता के बाद एक और कविता माननीय के नाम सन्देश भी लीजिए और मेरे कहे का अर्थ निकालिए : ‘माननीय / आज इस ऐतिहासिक प्राचीर से / मैं, भारत का एक नागरिक / स्वाधीनता दिवस की पूर्व वेला में / आपको सम्बोधित कर रहा हूँ / और आपसे पाँच प्रश्न करता हूँ - / पहला, आपका ख़र्चा कौन चलाता है? / दूसरा, कौन-सी शक्ति है आपके पास? / तीसरा, यह शक्ति आपको कहाँ से आती है? / चौथा, आप यह शक्ति किसके हित में प्रयोग करते हैं? / और पाँचवाँ, आपकी अन्तिम इच्छा क्या है? / जय हिन्द!’

     अर्थ निकालने में कोई कठिनाई आ रही हो, तो सारे अर्थ मैं ही उद्घाटित कर देता हूँ। दोनों कविताओं का अर्थ सीधे-सीधे यही है कि अरुण कमल की कविता पढ़ते-गुनते-सुनते समय ऊपर-ऊपर शीत लगती है, तो इसके नीचे-नीचे बहती हुई धाह ऐसी है कि इससे निकलने वाली लपट किसी ज्वालामुखी के ताप से कम नहीं। यह कविता औरों की कविता से पृथक् इस मायने में है कि कवि ख़ुद अपनी कविता को ‘नीचे धाह ऊपर शीत’ कहता है और हमेशा की तरह कवि सच कहता है। बिना किसी लाग-लपेट के कहता है। तभी अरुण कमल की कविता काल-बोध की कविता है। तभी इनकी कविता कवि के जी रहे भारी दिनों का आख्यान है। आख्यान भी कैसा, जिसे कोई माननीय पढ़ ले, तो उसके होश उड़ जाएँ। सच ही तो है, कौन माननीय है, जो कविता में ख़ुद के विरुद्ध फैल रही इस लपट को, इस लौ को, इस अग्निशिखा को सह पाएगा, कोई नहीं। सहेगा वही, जो घाम वाले दिनों को सहकर जनता का सच्चा सेवक बना होगा। ख़ुद को ऊँचा उठाने की बजाय देश की जनता को ऊँचा उठाने की चाह लिए संसद या  राज्यसभा, विधानसभा या विधान परिषद् पहुँचा होगा। कवि का भी और मेरा भी अभिप्राय यही है कि जनता सबकुछ का आकलन करती है, आपके त्याग का भी, आपकी जुमलेबाज़ी का भी। असल कवि तो देश की असल जनता ही है बिरादर, हम तो माध्यम भर हैं, शब्द भर हैं, हम तो आवाज़ भर हैं।
     अरुण कमल की कविता किसी अँधेरी कोठरी की कविता नहीं है। यह कविता ऐसी है, जो हमेशा आदमी के दरमियाँ रहती आई है। वही आदमी, जिसको कोई योगफल निकालने नहीं आता। इन आदमियों का योगफल यानी आम आदमी के अच्छे-बुरे का हिसाब-किताब, जोड़-घटाव, लेखा-जोखा सब कवि ही करता रहता है। सच में, अगर जनता हिसाबी होती, तो देश का महामात्य जिस तरह से अपने हर भाषण में पूरी तरह निर्लज्ज उनकी इज़्ज़त-आबरू उछालता फिर रहा है, तार-तार करता फिर रहा है, ऐसे महामात्य को उसकी कुर्सी से खींचकर, उसे अपनी बस्ती लाकर उसकी लज्जा को बिना पछतावे के किसी बंदी गृह की तरह ढा नहीं देती। यह कितनी अच्छी बात है कि जनता को कवि पर इस बात का भी भरोसा है कि ऐसे नक़ली और फ़र्ज़ी महामात्य का पर्दाफ़ाश कोई कवि ही करेगा। तभी अरुण कमल देश की जनता का भरोसा अपनी कविता चलो पीते हैं चाय में बचाए रखते हैं : ‘चलो पीते हैं चाय, राजेश को बुलाते हैं / मंगलेश को, विष्णु नागर को, विजय को भी पुकार लो / सबको पुकारो, जो नहीं पीते उनको भी, शकील-वीरेन्द्र यादव / जगाओ नीलेश को, श्योराज भी तो यहीं होंगे / अरे यार, यही तो सही वक़्त है चाय का / रात है, चाँद है ढलता हुआ, हवा तेज़ / हत्यारे घूमते, फौज की गश्त, दरवाज़े बन्द / बत्तियाँ गुल, साँसें धौंकतीं / उठो-उठो मेरे दोस्त / वहाँ एक चूल्हा जल रहा है कोने में / गली के मुँह पर / एक बहुत बुढ़ी माँ वहाँ बैठी है देग में चाय उबालती / ये कैसी बेचैन भाप है जो बुला रही है — / चलो चाय पीते हैं आज इस रात के तीसरे पहर / अरे सब आ रहे हैं, ज्ञान जी आ रहे हैं इस ठण्ड में / कमाण्डर, देखो सब आ रहे हैं, अरे साथी ग़दर भी — / चलो चाय पीते हैं आज रात सबकी रात सबको पुकारे / केदार जी, चाय का पहला उल्लेख किस कवि में मिलता है / त्रिलोचन शास्त्री से पूछेंगे, चलो अभी चाय पीते हैं (सुबह की पहली ख़बर : सरकार ने चाय पर रोक लगाई)।’ या फिर : ‘प्रिय मित्र, आप ज़रा भी परेशान ना हों / आप में से किसी का नाम वहाँ नहीं है / ना तो संसद बुलाएगी काव्य-पाठ के लिए / ना राष्ट्र का प्रधान रात्रि भोज पर / मरने पर ग्यारह बन्दूक़ों की सलामी भी आपको नसीब नहीं / आपको भले ग़लतफ़हमी हो / किन्तु इस देश की सत्ता को कोई ग़लतफ़हमी नहीं / तुम्हारी जगह बाहर है, साथियो बाहर / तुम्हारी जगह उन लोगों के पास है साथियो / जिनके लिए कहीं कोई जगह नहीं।’

     इस लोकप्रिय सरकार का कैसा हँगामा है, कैसा झूठा प्रचार-प्रसार है। जबकि सभी दुखी हैं। सभी परेशान हैं। और राष्ट्र का प्रधान, जो मासूम लोगों की ज़ात तक का सौदा करता फिर रहा है। यह प्रधान तो सौदा करना जानता है या फिर शोर करना जानता है। हालात अज़ीयतनाक हैं, बदतर हैं, ख़राब हैं। अरुण कमल ऐसे हालात का फ़ैसला किसी और पर ना छोड़कर अपनी कविता पर छोड़ते हैं। यही कारण है कि अरुण कमल की कविता वंदना, स्तुति अथवा प्रार्थना की कविता नहीं है। वंदना है भी, तो उस सुग्गे के लिए, जो उड़ते-उड़ते मरा। वंदना है भी, तो उस इंसान के लिए, जो ठनका गिरने से राख बन गया। वंदना है भी, तो उस शव के लिए, जिसको पहचानने वाला कोई नहीं। वंदना है भी, तो उन जन-मजूर परिवारों के लिए, जिनको चाशनी में तले मालपुए मयस्सर नहीं। वंदना है भी, तो उनके लिए, जिनके घर ढह गए। अब कोई भी लोकप्रिय सरकार हो, संभव यही है, आपके जीवन का योगफल बस इतना भर हो उस सत्ता की दृष्टि में कि आप उनको वोट दें और कोई चाह मन में ना रखें। चाहत रखनी भी होगी आपके द्वारा पूरे मनोयोग से चुनी हुई सरकार से, तो बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ रखेंगीं। झूठे समाचार बेचने वाले मालिकान रखेंगे। मक्कारी से चकाचौंध बाज़ार सजाने वाले रखेंगे। अरुण कमल को मालूम है, आपकी भूमिका इत्ती-सी है कि पाँच साल तक महँगाई का नौहा गाते रहें और बेबस होकर ज़िंदा रहें, फिर उसी सत्ता के झाँसे में आकर वोट दे आएँ, अगले पाँच वर्ष फिर रोने-धोने के लिए : ‘कितना वीभत्स है इन वृद्धों का यौन-नृत्य / के है अगला पी एम कौन कृत्य या भृत्य / उठो / चलो मेरे गुइयाँ उठो मेरे साथी उठो / वे जो मारे गए तुम्हें पुकार रहे हैं / वे हर दरवाज़ा पीट रहे हैं / वे खड़े हैं उस ओर / देखो वे रात में जगमग / जो जीवित हैं वे वंशज हैं मृतकों के।
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योगफल (कविता-संग्रह) / कवि : अरुण कमल / प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नयी दिल्ली – 110002 / मूल्य : ₹150 / मोबाइल संपर्क : 9931443866
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शहंशाह आलम
हुसैन कॉलोनी
पेट्रोल पाइप लेन के निकट
नोहसा बग़ीचा
नोहसा रोड
फुलवारी शरीफ़
पटना – 801505, बिहार
मोबाइल : 9835417537

गुरुवार, 21 जून 2018

गीताश्री का उपन्यास हसीनाबाद और शहंशाह आलम की टिप्पणी



स्त्री-जीवन के धुएँ और धुँध को हटाकर उम्मीदों वाले रंग का वैविध्य दिखाता कथा-समय
     संदर्भ : गीताश्री का उपन्यास 'हसीनाबाद'
     ● शहंशाह आलम



एक औरत की ज़िंदगी के जो सपने होते हैं, वे सपने अकसर धोखों से, परेशानियों से, बेचैनियों से भरे होते हैं। इनको सीढ़ियाँ भी अकसर चक्करदार ही मिला करती हैं चढ़ने के लिए। इनकी ज़िंदगी में अकसर जो मर्द आते हैं, वे कोई जादूगर नहीं होते, जो इनको सिर से पाँव तक ख़ुशरंग रोशनियों से नहलाएँ। वे अकसर-अकसर डरावने चेहरे और डरावनी आँखों वाले होते हैं। ज़िंदगी की चक्करदार सीढ़ियाँ चढ़ते-उतरते ये बेचारियाँ भी कहाँ रोशनी बिखेरने वाली रह जाती हैं। इनके होंठों पर हँसी भी आती है तो बस आकर रेंगती हुई-सी गुज़र जाती है। इन औरतों की रूहें बस इसी तरह आती और जाती रहती हैं। रूहें, जो गवाह भर होती हैं इनके धोखों से भरे हुए सपनों की। आज की राजनीति भी औरतों के आजू-बाजू कुछ-कुछ डरावने सपने की तरह आवाजाही करती रहती है। मगर 'हसीनाबाद' की गोलमी जो है, वह बिजली वाली लड़की है। यह लड़की डर पैदा करने वाले चेहरों से, उन चेहरों पर टँगी आँखों की ऊपर-नीचे करतीं पुतलियों से घबराती कहाँ है :
          चौदह साल की गोलमी नाच रही थी, जैसे वह हरदम नाचा करती थी, सुधबुध गँवाई के।
          उसके साथ पूरी पृथ्वी नाच रही थी। नाचते-नाचते वह देवलोक और पृथ्वीलोक की दूरियाँ पाट दिया करती थी। सब हतप्रभ होकर देख रहे थे कि ये हुनर इसने सीखा कहाँ से? न नृत्य की तालीम और न सुरों की पहचान! नाचते-नाचते बेसुध-सी जब दोनों हाथ ऊपर उठाती थी तो मानो आकाश थोड़ा और नीचे झुक जाता था और धरती थोड़ी और ऊपर उठ जाती थी ( पृ. 13 )।

     स्त्री-जीवन का क्रम कितना उलट-पुलट है। हैरत तब होती है, जब उसका जीवन उलट-पुलट रहते हुए भी वे अपने समय को कितना सहेजकर, सजाकर, संभालकर रखती हैं। यह सहेजना, सजाना, संभालना एक स्त्री ही तो कर सकती है। गीताश्री ने भी यह काम बख़ूबी किया है। यह उपन्यास लिखने से पहले गीताश्री ने अपनी किरदार गोलमी के जीवन-चक्र ख़ुद के भीतर आत्मसात किया होगा। तब इसे एक पूर्ण उपन्यास के एक पूर्ण पात्र के रूप में स्थापित कर पाई होंगी। तभी एक उपन्यास की बहती हुई नदी जैसी भाषा का ईजाद कर पाई होंगी। 'हसीनाबाद' को पढ़ते हुए इसकी भाषा की रवानी को देखकर आप भी महसूस करेंगे। इसकी भाषा मीठी है और खट्टी भी। जिस तरह गोलमी की पूरी ज़िंदगी मीठी और खट्टी रही है। गोलमी की माँ तक जब गीताश्री पहुँचती हैं गोलमी की ज़िंदगी और दमदार हो जाती है। गोलमी के पाँव में जिस तरह बिजली दौड़ती है और वह नाचते हुए कितनों को हतप्रभ कर जाती है, ख़ुद इसका और इसकी माँ की ज़िंदगी का सारा कुछ किसी नाच की तरह अथवा किसी झूमर गाने की तरह कहाँ था कि ख़ुश होकर दोनों माँ-बेटी ख़ुशी वाली तालियाँ बजा सकें। गोलमी की माँ सुन्दरी का जीवन ठाकुर-परंपरा से उबाऊ हो चला था :
          उस दिन सुन्दरी धम्म से आकाश से गिरी थी ज़मीन पर। लहूलुहान हो गई थी जैसे आत्मा और देह, दोनों। मालती ने आकर बताया कि बस्ती को सड़क-मार्ग से जोड़ा जा रहा था। और हसीनाबाद में स्कूल और डाकघर खुलेंगे। साथ ही चुनाव में वोटर बनेंगे यहाँ के लोग। जनगणना के लिए जल्दी ही लोग आएँगे। मालती ख़ुश थी, बहुत ख़ुश। ऐसा परिवर्तन वह सोच भी नहीं सकती थी। बस्ती थोड़ी बड़ी हो रही थी। बदल रही थी। उसे बदला जा रहा था।
          सुन्दरी को बस्ती के विकास से समस्या नहीं हुई। वह तो चीत्कार कर उठी, जब उसे मालती ने यह भी बताया कि बच्चों के पिता के नाम के आगे ठाकुरों के नहीं, उनके कारिंदों के होंगे ( पृ. 39 )।

     गीताश्री को पढ़ते हुए अकसर सोचता रहा हूँ कि इनके गद्य की पंक्तियाँ ऐसी हैं कि आप इनके लिखे को पढ़ते चले जाते हैं। बिना किसी रुकावट। बहुत सारे कथाकार की तरह इनके यहाँ जड़ शब्द नहीं आते। इनके शब्दों की ताज़गी आपको दूर और देर तक इनके लिक्खे को पढ़ा जाती है। आप गीताश्री को पढ़ते हुए थक नहीं जाते। इनकी कथावस्तु और इनका कथाशिल्प ज़्यादा दाँव-पेच नहीं जानते। 'हसीनाबाद' उपन्यास के पाठ के समय मैंने यही महसूस किया। आप इस उपन्यास को पढ़ना शुरू करते हैं और पढ़ते हुए कहीं ठहरते हैं तो यही सोचकर कि जो पढ़ा है, उस पढ़े हुए का रंग-रोग़न अपने ज़ेहन में बचाकर रख लिया जाए। मन बेचैन हो तो इस रंग-रोग़न से बेचैनी दूर की जा सके। गीताश्री का रंग-रोग़न उम्मीदों से भरा जो है। यही वजह है कि कइयों के मुक़ाबले इनके उपन्यास का कथातत्व मुझे ज़्यादा प्रभावकारी लगा। गीताश्री के कथातत्व से धपाधप की आवाज़ से साबक़ा न पड़कर एक ऐसी महीन आवाज़ से आपका साबक़ा पड़ता है, जो आपकी रूह तक को कई जीवन-चित्र दिखाती है और यह महीन आवाज़ आपके भीतर पैबस्त हो जाती है ताकि गीताश्री के कथा-समय से आप किसी तरह का अजनबीपन महसूस न कर सकें। इसी तरह आपको 'हसीनाबाद' के हर पात्र की हर अदा भी अपने क़ब्ज़े में कर लेती है। चूँकि 'हसीनाबाद' के सारे पात्र ज़िंदा पात्र हैं। सभी पात्र अपना पक्ष जीतने को तत्पर भी दिखाई देते हैं :
          ठाकुर सजावल सिंह के यहाँ आज रौनक़ थी। उनके बेटे रमेश का जन्मदिन था। रमेश को उन्होंने अपने मन से अपना लिया था, नाम दिया था, पहचान दी थी। बदनाम गली से ले आए थे अपनी कोठी पर ही। रमेश का नाम भी लिखवा दिया था स्कूल में। इस साल सब कुछ ठीक रहता तो इण्टर पास कर लेता। मगर रमेश का मन ही नहीं होता था बहुत कुछ करने का! रमेश को हर समय अपनी माँ का ध्यान आता। उसे हर समय लगता कि आख़िर ऐसा हुआ क्या था कि वह उसे छोड़कर चली गई? क्या उसके बाबा ने माँ को परेशान किया था? मगर बाबा की भी तो अपनी एक और बीवी है, जो दिल्ली में है और बाबा के बच्चे भी दिल्ली में पढ़ते हैं। तो वह उनका बेटा कैसे है? हसीनाबाद की गलियों में रहते-रहते वह हसीनाबाद के इतिहास से परिचित हो गया था ( पृ. 86 )।

     'हसीनाबाद' जैसी बदनाम बस्ती दुनिया भर में पहले भी थी। अब भी है। मेरे पैदायशी शहर मुंगेर में तो इस बदनाम बस्ती को मैंने बहुत क़रीब से देखा है। जाना भी है। इसी बदनाम बस्ती में मेरे जानने वाले एक कॉमरेड एक हसीना को दिल से बैठे। बाद में बाज़ाब्ता शादी कर ली। घर बसाया। बच्चों को ईमानदारी से अपना नाम दिया, किरदार दिया, ठिकाना दिया। गीताश्री के 'हसीनाबाद' के पात्र भी ऐसा करते हैं तो इसमें आश्चर्य जैसा कुछ भी नहीं है। आश्चर्य राजनीति के घातकपन से होता है। यह नया दौर है। इस नए दौर में राजनीति का चेहरा-मोहरा, रंग-ढंग, चाल-चलन सब जनता को परेशान करने को तत्पर रहता है। इस तत्परता का पर्दाफ़ाश भी इस उपन्यास में बख़ूबी किया गया है। पिंजरे के परिंदे जैसी हालत आज आज की राजनीति के कारण है। इसमें कोई शक नहीं। मगर गीताश्री इस बुरे अनुभवों के बारे में सबकुछ जानती हैं। समझती भी हैं। लेखिका की सार्थकता इसी में है।
     एक सच्चाई यह भी है कि इसको पढ़ते हुए जो नया समा बंधना चाहिए, नहीं बँधता। ऐसी बदनाम बस्ती पर और ऐसी तथाकथित राजनीति पर हिंदी में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। बहुत सारी फ़िल्में बनी हैं। इस वजह से भी किसी नए तत्व की चाह इस उपन्यास को पढ़कर रह ही जाती है। मगर इसका अर्थ यह क़तई नहीं कि गीताश्री का यह उपन्यास कम दिलचस्प है। क़िस्सागोई का तरीक़ा गीताश्री के पास है। अपने इस उपन्यास के बहाने इसके कथा-समय को छीलने में गीताश्री पूरी तरह सफल दिखाई देती हैं। यह उपन्यास एक गुमनाम और बदनाम बस्ती से होते हुए राजनीति के गलियारे तक जाता है। यही वजह है कि 'हसीनाबाद' हिंदी की उपन्यास-परंपरा के साँचे में पूरी तरह ढला लगता है। यह साँचा रचनात्मक है। यह उपन्यास आपको अपने आसपास बाँधे रखता है। प्रकाशक की तरफ़ से उपन्यास के बारे में दी हुई यह सफ़ाई सही है कि 'हसीबाबाद' के नाम से ये भ्रम हो सकता है कि यह उपन्यास स्त्रियों की दशा-दुर्दशा पर केंद्रित है लेकिन नहीं, 'हसीनाबाद' ख़ालिस राजनीतिक उपन्यास है जिसमें इसकी लेखिका औसत को केंद्र में लाने के उपक्रम में विशिष्ट को व्यापक से संबद्ध करती चलती है।' प्रकाशक का यह कथन सच है, तब भी यह उपन्यास स्त्रियों के बहाने ही अपने लोकजीवन को प्राप्त करता है। गीताश्री के इस 'हसीनाबाद' से गुज़रते हुए हम अपने दाँत निपोरकर रह नहीं जाते बल्कि राजनीति के विरुद्ध हमारा जो लोकस्वर होना चाहिए, वही अंत तक बचा रहता है। हम इस 'हसीनाबाद' को पढ़कर एक अच्छा गद्य लिखने का तरीका सीख सकते हैं।
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हसीनाबाद ( उपन्यास ) / लेखिका : गीताश्री / प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002 / मूल्य : ₹ 250 / मोबाइल संपर्क : 09818246059
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गुरुवार, 25 मई 2017

मनुष्य-देह की ताज़ा आग में तपी हुई कविताएँ हैं संजय कुमार शांडिल्य की कविता-संग्रह 'आवाज़ भी देह है' : शहंशाह आलम




  'आवाज़ भी देह है' की कविताएँ कवि की उस आत्मचेतना की कविताएँ हैं, जिस आत्मचेतना से कवि अपने आसपास की मिट्टी को देखता है, अपने आसपास के मौसम को महसूसता है, अपने आसपास के जीवन को हाशिए पर से आगे लाने का जतन करता है। इसलिए कि हर कवि अपने आदर्श से बँधकर मनुष्यता के बचाव के लिए ही तो सारे प्रयत्न करता आया है। संजय कुमार शांडिल्य भी अपनी आत्मचेतना को उसी आदर्श से बाँधकर मनुष्यता को बचाए रखने की मुहिम में लगे दिखाई देते हैं। तभी कवि आवाज़ को देह मानता है और मनुष्य-देह को इसी जादुई आवाज़ से जगमग भी करता है। प्रस्तुत है युवा कवि संजय कुमार शांडिल्य की कविता संग्रह "आवाज भी देह है" पर समीक्षक शहंशाह आलम की टिप्पणी -


'आवाज़ भी देह है' युवा कवि संजय कुमार शांडिल्य की ऐसी कविताओं का संग्रह है, जिसमें शामिल कविताओं की चमक ऐसी है, जिस चमक से समकालीन हिंदी कविता का चेहरा एक नई रौशनी से जगमग दिखाई देता है। इन कविताओं में कवि का लबो-लहजा ऐसा है जिसमें जाड़े की धूप की मिठास भरी दिखाई देती है। इस संग्रह की पहली कविता का लबो-लहजा आप सब देखिए :

          कुछ थोड़े-से लोग हमेशा टापुओं पर रहते हैं
          तो मैं रोज़ो-शब खुले समुद्र में रहता हूँ
          मुझे हर बार लहरें दूर बहुत दूर
          लाकर पटक देती हैं
          इतनी दूर कि मेरे देश का नौ क्षेत्र
          मुझे दिखाई नहीं देता
          एक बड़े झंझावात में इस दुनिया की छत
          उड़ रही होती है
          और हिमालय और आल्पस जैसे पहाड़
          भसकते हुए अपने मलबे के साथ
          मेरी ओर लुढ़कते हैं
          कुछ थोड़े-से लोग तब पबों में जाम टकराते
          हुए मेरी इस बेबसी पर हँसते हैं
          मुझे इस मृत्यु की नींद में उनके ठहाके
          सुनाई पड़ते हैं
          मैं जब एक दूब की तरह सिर उठाता हूँ
          अपने ऊपर के आसमान से मेरा सिर लगता है
          कुछ थोड़े-से लोग अंतरिक्ष से खेलते हैं
          और मेरी पृथ्वी रोज़ हिलती है ( 'हिलती है पृथ्वी', पृ. 13)।

     'आवाज़ भी देह है' की कविताएँ कवि की उस आत्मचेतना की कविताएँ हैं, जिस आत्मचेतना से कवि अपने आसपास की मिट्टी को देखता है, अपने आसपास के मौसम को महसूसता है, अपने आसपास के जीवन को हाशिए पर से आगे लाने का जतन करता है। इसलिए कि हर कवि अपने आदर्श से बँधकर मनुष्यता के बचाव के लिए ही तो सारे प्रयत्न करता आया है। संजय कुमार शांडिल्य भी अपनी आत्मचेतना को उसी आदर्श से बाँधकर मनुष्यता को बचाए रखने की मुहिम में लगे दिखाई देते हैं। तभी कवि आवाज़ को देह मानता है और मनुष्य-देह को इसी जादुई आवाज़ से जगमग भी करता है। दरअसल कवि की महत्ता भी इसी में है कि कवि मनुष्य-जीवन को नए सिरे से पकड़े और मनुष्य-जीवन को हर संकट से आज़ाद कराए। यहाँ आज़ादी दिलाने का मतलब यह है कि कवि मनुष्य को कमज़ोर कर रहे सारे तत्वों से आज़ाद कराए। आज सारा संकट मनुष्यता पर ही तो आ रहा है। बड़ा सवाल यही है कि यह संकट पैदा कौन कर रहा है, तो जवाब यह है कि आज मनुष्यता को संकट में देश की सरकारें ही तो ला रही हैं। मेरा स्पष्ट मानना है कि इन दिनों सबसे ज़्यादा संकट में कुछ है तो मनुष्यता है। अब की सरकारें 'फूट डालो राज करो' की नीति वाला अपना एजेंडा बख़ूबी लागू कर रही हैं। आदमी-आदमी के बीच भेदभाव बढ़ाकर आज सत्ता हासिल की जा रही है :

          याक की तरह सर्दी खुर बजा रही है
          जिनके जिस्म ओढ़े नहीं जा सकते
          वो मिट्टी ओढ़ रहे हैं
          ग्लैशियर-सी रात फ़िसलती हुई बह रही है
          हिंसा है इन रातों की नींद हिंसा है
          दुःख-आँच देकर जल रहा है दान का अलाव
          साँसों से हथेलियाँ गर्मा रही है रूह
          पत्तों पर ठोस हवा ठहरी है
          सूखी हुई लकड़ियाँ सब हरी हैं
          यह रात जैसे हड़ताल में अस्पताल
          इस महादेश में मौसम भी एक बीमारी है
          देह तानकर ओढ़ रहे हैं लोग
          इस ठंडे की आग लगे यह रोग ( 'इस महादेश में मौसम भी एक बीमारी है', पृ. 38 )।

     अथवा,

          पेड़ों के तने हथेलियों के स्पर्श से सख़्त हो जाते हैं
          और जड़ पृथ्वी के अँधेरे में धँसने लगती है
          पाँव सड़क पर इतने परिचित हैं कि मेरा आना-जाना
          उनमें ऊब पैदा करता है
          उससे अधिक रुचिकर तो आसमान में गर्दिश करते सितारे हैं
          इतनी लय से विज्ञापन आते हैं कि कहीं भी कुछ चौंकता नहीं
          गाड़ियों का शोर ओढ़ता-बिछाता शहर यातायत में डूब जाता है
          सब भाग रहे हैं एक परिचित त्वरा में कि
          धीमी गति की बैलगाड़ी इतनी भली लगती है
          कि भले लोग कहते हैं अच्छा हुआ इसके पहिए में
          बॉल बेयरिंग नहीं लगा
          अचानक अपने घर के दरवाज़े पर आप तय करते हैं कि
          हथेली की दस्तक बदल देंगे
          और आप आश्चर्य में हैं कि कोई बिना पूछे
          रोज़ की तरह दरवाज़ा खोल देता है ( 'रोज़ की तरह', पृ. 39 )।

     'देह भी आवाज़ है' की कविताएँ हमारे आजूबाजू जो कुछ बचा रह गया है, उस बचे रहने की कविताएँ हैं। हालाँकि जो कुछ बचा रह गया है, वह और कितने दिन बचा रह पाएगा, यह संदेह कवि-मन में एक डर की तरह छिपकर बैठा रहता है। कवि का यह डर अनुचित न होकर वाजिब है। आज जिस भीषण पराजय से आदमी जूझ रहा है, पहले ऐसा शायद हुआ हो। संजय कुमार शांडिल्य भी एक आदमी हैं और आदमी होने के नाते किसी आदमी का पराजित होना उन्हें बुरा लगता है। आदमी को हराए जाने की सौदागरी इन दिनों विश्व-स्तर पर जारी है। और आदमी को लेकर किसी भी सत्तापक्ष का यह लेनदेन घातक है। आज सत्तापक्ष होने का तात्पर्य इतना भर रह गया है कि जनता अपने हर मोर्चे पर हारती रहे और सत्तापक्ष अपने हर मोर्चे पर जीत हासिल करता रहे। सत्तापक्ष का कोई विस्फोट कभी असफल नहीं होता। स्थिति यह हो गई है कि हर आदमी दूसरे आदमी को घृणा से देख रहा है। आज के सत्ताधीशों की देन यही है कि हर घृणा को इतनी हवा दी जा रही है कि हर आदमी कन्फ्यूज़ है और हर आदमी को लग रहा है कि एक-दूसरे को मारकर ही ज़िंदा रहा जा सकता है। अब देश को बदलने का मतलब इतना भर बचा रह गया है सत्ताधीशों के पास कि प्रेम से नहीं घृणा से देश को भर दिया जाए। संग्रह की 'अब्दुल मियाँ', 'हम मृत्यु को प्रेमिकाओं से अधिक जानते हैं', 'हम जहाँ तक पहुँचते हैं वहाँ तक हमारी दुनिया है', 'पेड़ : एक, दो', 'अभी सिर्फ़ एक आँख जगी है', 'इन में', 'मैं हर बार 'अ' से शुरू करता हूँ', 'लड़ना उतना आसान होता नहीं', 'घर में एक तंबू है तो जॉर्डन एक नदी नहीं है', 'मैं इन उदास शामों में रहता हूँ', 'ख़ुश होने के लिए', 'पृथ्वी के छोर', 'बारिश गिर रही है', 'खेल की नीति-कथा', 'इतनी साजिशें हैं मौसम के', 'आश्चर्य', 'हज़ार दरवेश', 'हड़प्पा की स्त्रियाँ', 'वे सड़कें', 'स्वार्थ का वैश्विक गाँव', 'यह समय खच्चरों की उदासियों का है', 'टेक्सस से टिकारी तक', 'मेरी कविताओं में मैं', 'कोई मुझे भी खोदकर निकालेगा', 'मुझे नीली स्याही लगी एक दवात छोड़कर जाने दो', 'कसिया अभी आठ कोस है' आदि कविताएँ दुनिया भर की सरकारों की इसी नीति-कथा का बयान हैं।

     संजय कुमार शांडिल्य हमारे समय के ऐसे कवि हैं, जिन्हें दुनिया का, दुनियादारी का और डगमग विचारधारा के बारे में ख़ूब पता है। उनकी कविताओं का आकाश-मंडल इतना बड़ा है, इतना फैला हुआ है, इतना तपा हुआ है कि 'आवाज़ भी देह है' की कविताएँ पढ़ते हुए पाठक कहीं दूसरी जगह भटक नहीं जाता बल्कि इन कविताओं की आकाशीय आभा से टिका रहता है। इन कविताओं में जब पृथ्वी चौंकती है, तब हम-आप भी चौंकते हैं कि आज की निरंकुश व्यवस्था ने हमारी देह को कहाँ-कहाँ छेदा है। संजय कुमार शांडिल्य कविता के उन लोहारों में हैं, जिनकी कविताएँ बिलकुल ताज़ा आग में तपकर हम-आप तक पहुँचती हैं यानी संजय कुमार शांडिल्य कमाल के कवि हैं, जो एक नए क़िस्म की आवाज़ हमें सौंपते हैं। हमारे दुश्मन हमको दरिया में बहा आते हैं और यह कवि हमको दरिया से बाहर निकाल लाता है पूरी हिफ़ाज़त से। तभी पूरी ताक़त लगाकर कवि कह पाता है, 'तुम हमारी आवाज़ें खा रहे हो / रुई के फ़ाहों-सी / हवाओं के दस्तक-सी / निरपराध आवाज़ें… ( 'आवाज़ भी देह है', पृ. 52 )।'
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आवाज़ भी देह है ( कविता-संग्रह ) / कवि : संजय कुमार शांडिल्य / प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, एफ़-77, सेक्टर-9, रोड नम्बर-11, करतारपुरा इण्डस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर-302006 / मोबाइल संपर्क : 09839018087 / 09431453709 / मूल्य : ₹100


समीक्षक संपर्क : शहंशाह आलम, हुसैन कॉलोनी, नोहसा बाग़ीचा, नोहसा रोड, पेट्रोल पाइप लेन के नज़दीक, फुलवारीशरीफ़, पटना-801505, बिहार / 09835417547

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सोमवार, 22 मई 2017

शहंशाह आलम की तीन कविताएं


समकालीन कवि शहंशाह आलम की सबसे बड़ी खासियत है कि वे न सिर्फ कविताएं लिखते हैं बल्कि अचूक मारक कविताएं लिखते हैं। उनकी पैनी नजर आस-पास की हर गतिविधि पर होती है। यदि वे अपने शहर में फैल रहे अत्याचार और अराजकता पर नजर रखते हैं तो वे नोटबंदी, आधार कार्ड और जीएसटी जैसे निर्णय से होने वाली कठिनाइयों एवं सहुलियतों पर भी ध्यान रखते हैं। ध्यान तो इस बात का भी रखते हैं कि अलबत्ता शातिर शासक किस कदर भोलीभाली जनता को दूसरे मुद्दों में उलझाकर अपना उल्लू सीधा करती है। साथ ही साथ कवि इस ओर भी इंगित करते हैं कि माहौल इतना गंदा और भयाक्रांत है कि विरोध के स्वर फुटें उससे पहले ही दबा देने की पूरी तैयारी है। आइये पढ़ते शहंशाह आलम की तीन बेहतरीन कविताएं जो हमारे वर्त्तमान परिवेश और परिदृश्य को बखूबी रेखांकित करती हैं। -- सुशील कुमार भारद्वाज

तुम्हारे शहर में
     ● शहंशाह आलम

तुम्हारे शहर में चाँद निकलता है
मेरे शहर में क़ातिल निकलते हैं रोज़ रात को
हुकूमत की तरफ़ से फुसलाकर भेजे हुए

तुम्हारे शहर में फूल खिला किए हैं
मेरे शहर में बबूल उगा किए हैं
मेरे थके-हारे पाँवों के नीचे काँटेदार

तुम्हारे शहर में रोटियाँ बाआसानी मिल जाया करती हैं
साबुन भी तेल भी कपड़ा भी घैला भी कनस्तर भी

मेरे यहाँ तो नल में पानी तक उनके इशारे पर आता है
जिन्होंने मेरे घोड़े के चारों पाँव क़ैद कर लिए हैं
जिन्होंने मेरी कश्ती के लिए बची नदी चुरा ली है

जानेमन, तुम मेरे किस शहर की बात करते हो
जहाँ चाँद निकलता है क़ातिल नहीं
जहाँ फूल खिलते हैं बबूल नहीं उगा करते
जहाँ रोटियाँ बाआसानी मिल जाया करती हैं
जहाँ फ़ाक़ाकशी नहीं है ज़ुल्म नहीं है

तुम्हारे शहर का ज़िलाधिकारी यही एलान कराता रहा है
तुम्हारे शहर का पुलिस कप्तान यही कहता आया है
कि तुम्हारा शहर एक बेहद स्मार्ट शहर है
जहाँ रोटियाँ रख दो तो चींटियाँ नहीं लगतीं
जहाँ रात को सोओ तो मच्छर नहीं काटा करते
जहाँ घूमने निकलो तो उचक्के सामान लेकर नहीं भागते

जानेमन, मेरे शहर का ज़िलाधिकारी
सारा झूठ ही एलान कराता है
मेरे शहर का पुलिस कप्तान
एक बेहद मक्कार पुलिस कप्तान है

क़ब्र खोदने वाले सबसे ज़्यादा मेरे शहर में
पेट्रोल कम देने वाले सबसे ज़्यादा मेरे शहर में
औरतों को जलाकर मारने वाले सबसे ज़्यादा मेरे शहर में
घूस लेकर काम करने वाले सबसे ज़्यादा मेरे शहर में
दवाइयाँ नहीं मिलने वाले हॉस्पिटल सबसे ज़्यादा मेरे शहर में
बिना उस्ताद वाले स्कूल सबसे ज़्यादा मेरे शहर में

अब बस भी कीजिए हुज़ूर
मैं आपका दिल नहीं दुखाना चाहता था
मैं आपके शहर को सचमुच
एक अच्छा शहर मानता आया था

चलो, तब हम ऐसा करते हैं
मिलकर एक ऐसा कोई शहर
एक ऐसा कोई नगर तलाशते हैं
जहाँ शहतूत के पेड़ बचे हों
जहाँ शहद के छत्ते बचे हों
जहाँ किसी का ख़ून नहीं किया जाता हो
जहाँ औरतों की इज़्ज़त नहीं ली जाती हो
जहाँ बच्चाचोर बताकर लोग बेगुनाहों का क़त्ल नहीं करते हों
जहाँ मुंसिफ़ बिना डरे सच्चा इंसाफ़ करता हो

जानेमन, इस सदी का सबसे बड़ा जोक आपने सुना दिया
मेरे शहर में बलात्कार नहीं होगा ख़ून नहीं होगा
लोग भूखे मारे नहीं जाएँगे दिक़्क़्त में नहीं होंगे
तो हुकूमत आला ऑफ़िसरों की तरक़्क़ी रोक देगी

तुम्हारे शहर में भी चाँद नहीं क़ातिल निकला किए हैं
तुम्हारे शहर में भी शायर नहीं क़ातिल रहा किए हैं
मैंने मान लिया मैंने समझ लिया मैंने जान लिया।

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तुम काहे से डरते हो अनजाने मुसाफ़िर
                         
 

तुम काहे से डरते हो अनजाने मुसाफ़िर
मैं डरता हूँ नोटबंदी से आधार से जीएसटी से

नोटबंदी से तुम काहे डरते हो
इससे हम पैसे के लिए लाइन में लगे-लगे मारे जाएँगे
राजा लोग के पैसे उन्हें घर बैठे मिल जाया किएँगे

आधार से तुम काहे डरते हो
इससे हमें हमारे मुल्क में शरणार्थी
घोषित किए जाने का ख़दशा है
राजा लोग चूँकि राजा लोग होंगे
उन्हें हमेशा की तरह कोई दिक़्क़्त नहीं होगी

जीएसटी से तुम काहे डरते हो
इससे हमारे खाने की चीज़ों की क़ीमतें बढ़ जाएँगी
राजा लोग की अय्याशी के सामान की क़ीमतें घट जाएँगी

फिर मुल्क का वित्त मंत्री इन सबको लागू करने के लिए
इतना हड़बड़ाया-घबराया हुआ क्यों है अनजाने मुसाफ़िर

वित्त मंत्री को पता है कि गाय की तीन तलाक़ की
मंदिर की मस्जिद की बेमक़सद बहसों के बीच
नोटबंदी को आधार को जीएसटी को लागू कर लेना ज़रूरी है
इससे पहले कि अवाम वित्त मंत्री की असली मंशा जानकर
सड़कों पर उतर आएँ उनकी सरकार के ख़िलाफ़

तुम और काहे से डरते हो अनजाने मुसाफ़िर
उन ख़तरनाक कवियों से जो बातें तो गांधी की करते हैं
लेकिन अपने ख़्वाब में गोडसे को पुकारा किए हैं

लेकिन यह तो जनम-जनम का क़िस्सा है मेरे अनजाने मुसाफ़िर

हाँ, यह जनम-जनम का क़िस्सा है हमारे बनाव-बिगाड़ का
इसलिए कि अब मुंसिफ़ के हाथ में ख़ंजर है बम-बारूद है
और अब मुल्क में क़ातिल को सज़ा नहीं देने का नया रिवाज है।

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मेरा ठिकाना उनके निशाने पर है
                 


मुझे अच्छी तरह से मालूम है
मेरा ठिकाना उनके निशाने पर है
जिस ठिकाने पर मैं उनके ख़िलाफ़ नज़्में
लिखता हूँ कमरे में आई धूप के साथ मिलकर

मैं उनके ख़िलाफ़ क्यों न लिक्खूँ नज़्में
जोकि मेरी छत पर का चाँद चुरा ले जाते हैं
घर के दरो-दीवार का रंग-रोगन नोच डालते हैं
कनस्तर में रखी चीज़ें बाहर फेंक आते हैं

उनके घोड़े ज़ख़्मी हो चुके हैं
मुझे कुचलने की चाहत में
उनके निगराँ थक चुके हैं
मुझे दबाने की उम्मीद में

मैं जो पहले से सताया जाता रहा हूँ
मैं जो पहले से दबा-कुचला रहा हूँ
मुझे उनकी गालियों का ख़ौफ़ कैसा

उनके हमले तो मेरे पुश्त-दर-पुश्त पर होते चले आए हैं
उनकी बेईमानियों में इज़ाफ़े भी होते रहे हैं मुसलसल

ये उनके ख़ुफ़िया फ़ैसले हैं ख़ुफ़िया एजेंडे भी
कि मैं सैर के लिए निकलूँ और मेरी क़लम उठा ली जाए
कि मैं सोने जाऊँ और मुझे समुंदर में बहा दिया जाए

उन्हें मालूम है अदालतें उन्हीं की हैं
मुंसिफ़ लोग उन्हीं के हैं
हर जल्लाद उनके ख़रीदे हुए ग़ुलाम हैं

उन्हें मालूम है मेरे जैसे आदमी का अग़वा करना
बेहद मुश्किल कामों में एक काम है
वे मेरा क़त्ल भी करवा नहीं सकते इस बदनामी के डर से
कि वे जब भी मारते हैं मरे हुओं को मारते हैं।

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संपर्क : शहंशाह आलम, प्रकाशन विभाग, बिहार विधान परिषद, पटना-800015 / मोबाइल : 09835417537

शनिवार, 13 मई 2017

समीक्षक शहंशाह आलम की टिप्पणी राधेश्याम तिवारी की रचना "कनस्तर में गंगा" पर


              राधेश्याम तिवारी उन कवियों में हैं, जो आदतन बिना किसी दबाव के कविता लिखते रहे हैं। सच यह भी है, कविता जब जीवन से जुड़ी होगी तो उसका कला-स्तर जैसा भी होगा, मान्य होगा, इसलिए कि एक सच्चे कवि के लिए मनुष्य-जीवन हमेशा ज़रूरी होता है, महान आलोचकों की बताई हुई कला नहीं। एक सचेत कवि मनुष्य-जीवन को अधिक महत्व देगा-ही-देगा। राधेश्याम तिवारी अपनी कविताओं के साथ अकसर यही करते हैं। कवि अपनी कविता में इसीलिए हर प्यार वाली झिड़की पाने के लिए मनुष्य-जीवन के बिलकुल क़रीब खड़ा रहता आया है। पढ़ते हैं कवि-समीक्षक शहंशाह आलम की टिप्पणी राधेश्याम तिवारी की रचना "कनस्तर में गंगा" पर।

                                                                                  'कनस्तर में गंगा' ( राधेश्याम तिवारी ) : एक ऐसे कवि की कविताएँ जो सूअर को सूअर और कुत्ता को कुत्ता बोलने का हुनर जानता है
● शहंशाह आलम

कविता को जहाँ से आना होता है, वह आती है। एक सत्य यह भी है कि कविता को जहाँ पर आना होता है, आ जाती है। यूँ कहिए कि कविता को आने के लिए कोई दिन, कोई तारीख़ अथवा कोई समय पहले से मुक़र्रर नहीं होता। अब कोई दुष्ट आदमी यह कह सकता है कि अपनी दुष्टता सिद्ध करने के लिए जब वह दिन, तारीख़ और समय वह निर्धारित कर सकता है तो कोई कवि अपनी कविता के लिए ऐसा क्यों नहीं कर सकता। अब जो दुष्ट है, वह ऐसा ही कुछ सोचेगा। लेकिन कवि किसी कविता को आने देने के लिए ऐसा कुछ कर ही नहीं सकता। कविता जब आप जागे हैं, तब आती है। आप सोए हैं, तब भी आ सकती है। और आप सोए से उठकर कविता क़लमबद्ध कर लेते हैं। अब कोई कवि देवता तो होते नहीं कि खर्राटे मारकर अपनी कविता पूरी कर लेंगे, जैसे देवता लोग खर्राटे मारते हुए भी अपना सारा काम कर लेते हैं, ऐसा देवता-कवि-प्रेमी लोगों से सुना है। हालाँकि मैं इस बात से इनकार नहीं कर रहा कि जो कवि अपने को देवता टाइप मानते होंगे, वे खर्राटे भरते हुए कविता पूरी नहीं कर लेते होंगे। लेकिन राधेश्याम तिवारी समकालीन हिंदी कविता के देवता-कवियों में नहीं हैं। अगर देवता-कवि होते तो अपने कनस्तर में गंगा को बचाए रखने की बात नहीं करते। टीन के बने कनस्तर में हम सिर्फ़ पानी भर नहीं रखते, घी, तेल, आटा आदि भी रखते हैं। आम आदमी से गहरे भावनात्मक जुड़े कवि राधेश्याम तिवारी को मालूम है कि आम आदमी के कनस्तर से घी, तेल, आटा आज की सरकारों ने कबका चुरा लिया है। अब 'नमामि गंगे' के नाम पर आज की संवेदनहीन सरकारें बची-खुची गंगा भी ग़ायब कर देंगी, इस कवि को पता है। कवि को यह भी पता है कि आज की सरकारें जब ख़ुद अपने हिस्से की सारी गंदगी गंगा में डालती आई हैं तो 'नमामि गंगे' का हश्र क्या होगा, यह हमें स्वत: जान लेना चाहिए। यही वजह है कि राधेश्याम तिवारी जैसे कोमल, विनम्र और कठोर जनता के कवि अपनी सद्य प्रकाशित कविताओं की किताब का नाम 'कनस्तर में गंगा' रखते हैं। ताकि कहीं नहीं तो जीवन को बचाए रखने वाली गंगा कवि के कनस्तर में ही बची रहेगी। यह हमारे समय का सौभाग्य है कि सरकारें जब आम आदमी के हिस्से का सारा कुछ हड़प लेने के इंतज़ार में घात लगाए बैठी हैं तो आम आदमी के हिस्से का सबकुछ कवि बचाने के जतन में लगा है। राधेश्याम तिवारी की कोशिशें और इनकी बेचैनियाँ इस बात में अधिक हैं कि इनकी कोई कविता व्यक्तिवादी न होकर उस जमात के लोगों के लिए हो, जो समय के हर हिस्से से बेदख़ल कर दिए जाते रहे हैं। मेरा ख़ुद का यही मानना है कि जो कविताएँ वंचित समाज, वंचित जन, वंचित समय के लिए लिखी जाती हैं, वे ही कविताएँ कविता-इतिहास में बहुमूल्य बनी रहेंगी :

          लुधियाना स्टेशन पर
          अगर कभी आप जाएँ
          और सामान हो कुछ ज़्यादा
          तो बिल्ला नम्बर-56 की कुली
          आपके सामने खड़ी मिल जाएगी
          भारतीय रेल के इतिहास में
          यह पहली महिला कुली है
          जिसका नाम है मायादेवी
          जो सत्ता की मायादेवियों से अलग है

          मायादेवी अपने यूनिफॉर्म में
          सुबह नौ बजे
          हाज़िर हो जाती है स्टेशन पर
          और दिन ढलते ही चली जाती है घर
          वहाँ भी उसके लिए
          बोझ कुछ कम नहीं है
          जिसे वह धरती की तरह वहन करती है
          फिर भी वह जीवन से नहीं हारी
          उसे पूरा भरोसा है
          कि उसका इकलौता बेटा
          एक दिन ज़रूर बनेगा
          रेलवे अधिकारी

          वह बेटे को पढ़ाकर
          अपने दिवंगत कुली पति का
          सपना पूरा करना चाहती है
          जो एक असाध्य रोग का
          हो गया था शिकार
          मायादेवी को अनुकंपा पर
          मिला है यह आधार
          उसे बिल्ला देते हुए
          रेलवे के बाबू को
          कुछ संशय ज़रूर हुआ था
          मगर अब उसे मायादेवी पर गर्व है

          पहले-पहल लुधियाना स्टेशन पर
          जब वह मिली थी
          तो पत्नी ने अचरज से पूछ लिया
          'क्या तुम कुली हो?'
          सामान उठाते हुए
          मायादेवी ने कहा -
          'बहन जी,
          औरत के लिए इसमें नया क्या है…!'

          उस समय लगा
          जैसे पूरी धरती लुधियाना स्टेशन हो
          और हर स्त्री मायादेवी ( 'बिल्ला नम्बर-56', पृ. 17-18 )।

     राधेश्याम तिवारी की कविताएँ दो टूक, जिसे आप खरी-खोटी कहना कहते हैं, हमारे हिस्से का जो कुछ कहना होता है, कह जाती हैं। हमारे समय के महान आलोचकों के इस बयान से बेफ़िक्र कि दो टूक कहने वाली कविताएँ अपना वास्तविक सौंदर्य खो चुकी होती हैं। अब कोई सोची-समझी कविता लिखेगा, तब न कविता के सौंदर्य को बचाने का मामला आड़े आएगा। राधेश्याम तिवारी उन कवियों में हैं, जो आदतन बिना किसी दबाव के कविता लिखते रहे हैं। सच यह भी है, कविता जब जीवन से जुड़ी होगी तो उसका कला-स्तर जैसा भी होगा, मान्य होगा, इसलिए कि एक सच्चे कवि के लिए मनुष्य-जीवन हमेशा ज़रूरी होता है, महान आलोचकों की बताई हुई कला नहीं। एक सचेत कवि मनुष्य-जीवन को अधिक महत्व देगा-ही-देगा। राधेश्याम तिवारी अपनी कविताओं के साथ अकसर यही करते हैं। कवि अपनी कविता में इसीलिए हर प्यार वाली झिड़की पाने के लिए मनुष्य-जीवन के बिलकुल क़रीब खड़ा रहता आया है।

     राधेश्याम तिवारी बीज को बोने के बाद उसके बढ़ने का इंतज़ार करते हैं। इसी बोए हुए बीज के पास खड़ा रहकर इस धरती को सेतु बनाते हुए हर रोज़ नई सुबह का स्वागत भी करते हैं ताकि कवि का अपना भोर आए और कवि मजूर के, किसान के, दुकानदार के, कुली के, रिक्शा-ठेले वाले साथियों के पसीने की गंध से अपनी कविताओं को सराबोर कर सके। कवि इसी देह-गंध में विभोर रहना चाहता है, मस्त-मत्त रहना चाहता है। यह सब होना यहीं संभव है। आप पेड़ काटते जाएँगे, राधेश्याम तिवारी पेड़ उगाते जाएँगे। आप अँधेरा खड़े करते जाएँगे, राधेश्याम तिवारी आपके खड़े किए अँधेरे को अपने चराग़ से गिराते जाएँगे। यह कमाल यही कर सकते हैं, सो राधेश्याम तिवारी यह कमाल करते चले आ रहे हैं। तभी 'कनस्तर में गंगा' की कविताएँ हर उस आदमी की तरफ़ हाथ बढ़ाती हैं, जो मनुष्य-जीवन को किसी-न-किसी तरह बचाए रखने में विश्वास रखते हैं। आज हर तरफ़ रंजो-ग़म यानी चिंता और दुःख पसरा हुआ है। ऐसे में कविताएँ जब आदमी को सहारा देती हैं तो आदमी अपनी चिंता, अपना दुःख कुछ देर के लिए ही सही, अपने जीवन के पतझड़ के पत्तों को भुलाकर अपने शहद-से मीठे दिनों को याद ज़रूर कर लेता है : मेरा आना तो / उसी दिन तय था / जिस दिन शुरू हुई / पृथ्वी बनने की प्रक्रिया / पृथ्वी के साथ-साथ / मैं भी बनने लगा / धीरे-धीरे / तब यह पृथ्वी अग्निपिंड थी / फिर भी मैं उसी तरह बचा रहा / जिस तरह / बाघिन के जबड़े में /  दबा उसका बच्चा / लम्बे समय तक आग के साथ रहते हुए / इसी से आत्मीयता हो गई गहरी / कि आज भी उसकी गर्माहट / मुझमें मौजूद है / इससे दूर होते ही / ठंडा हो जाता है बदन / बर्फ़ की तरह / कौन जानता था / इस पृथ्वी पर / लौटूँगा बार-बार मैं / रूप बदल-बदलकर / नदी की तरह कहाँ-से-कहाँ होता हुआ / मैं यहाँ पहुँचा हूँ / लेकिन यह तो तय है / कि मेरे भीतर / सृष्टि का वह प्राणी / अभी तक जीवित है / वह पहला प्राणी भी कोई और नहीं / मैं ही हूँ / धरती के सभी मनुष्यों में / मेरी ही व्याप्ति है / यह है एक ऐसा मर्म / जिसे जान लेने के बाद / एक लगने लगी है पृथ्वी / सारी नस्लें / और सारे धर्म / करोड़ों वर्ष बीत गए / इस धरती माँ के साथ रहते हुए / आगे भी रहना है अनंत काल तक / इसी के साथ / कहना है बस यही / जब तक यह धरती रहेगी / किसी न किसी रूप में / बचा रहूँगा मैं भी / मेरे हैं सारे धर्म / सभी नाम मेरे हैं / इसीलिए यह मत पूछना / कि मैं कौन हूँ / मैं वह मौन हूँ / जिसकी अभिव्यक्ति / भाषा में संभव नहीं ( 'भाषा में संभव नहीं', पृ. 11-12-13 )।

     राधेश्याम तिवारी की कविताएँ किसी हरीफ़ के ख़िलाफ़ लिखी गई कविताएँ नहीं हैं। तब भी ये कविताएँ घुट-घटकर जी-मर रहे आदमियों की कविताएँ ज़रूर हैं। आज का पूँजीवादी, आज का सत्तावादी, आज का सट्टावादी, आज का कट्टरतावादी, आज का धर्मवादी, आज का मारकाटवादी, आज का जातिवादी, आज का शत्रुवादी समय हम कवियों की जमात को सिर्फ़ इसलिए अलग-थलग करता आया है कि हमारी जमात ऐसे किसी समय की भर्त्सना सदियों से करते आई है और इसीलिए यह जमात सदियों से वंचितों की जमात में शामिल है। यहाँ उन दरबारी कवियों के बारे में क़तई नहीं कहा जा रहा, जो सत्ता के संरक्षण में रहते हुए हमेशा ख़ुद को सुरक्षित-संरक्षित रखते आए हैं। ये वे कवि होते हैं, जिन्हें सत्ता की निंदा और लांछन और गाली झेलनी नहीं होती है। जबकि राधेश्याम तिवारी वंचित कवियों की जमात के कवि हैं यानी सत्ता की निंदा और लांछन और गाली सुनने वाली जमात के कवि हैं। इसमें संदेह नहीं। उजाड़ रास्ते के कवि-सरीखे राधेश्याम तिवारी अपनी कविताओं के ज़रिए भटके हुए मुसाफ़िरों को बेहद उम्दा तरीक़े से रास्ता दिखाते हैं। इनके 'सागर प्रश्न', 'बारिश के बाद', 'इतिहास में चिड़िया' के बाद आया 'कनस्तर में गंगा' कविता-संग्रह की कविताएँ पहले की कविताओं से ज़रा अलग तेवर और मिज़ाज की कविताएँ हैं। ऐसा इसलिए कि इस ताज़ा संग्रह की कविताओं में कवि सूअर को सूअर और कुत्ता को कुत्ता कहने की हिम्मत किसी प्रार्थना की तरह नहीं बल्कि इस अँधेरे के जंगल में पूरी ताक़त लगाकर कहता है। कवि का यह रंगो-नूर थोड़ा जुदा है, थोड़ा अलहदा है और थोड़ा नई चमक लिए हुए भी है। 'कनस्तर में गंगा' की कविताओं के ये रंग 'शब्द-संवेदन', 'शब्द-भंगिमा' तथा 'धारा के विरुद्ध' खण्डों के माध्यम से प्रकट किए गए हैं। पहले हिस्से में चौदह, दूसरे में उनचास तथा तीसरे में तेईस कविताएँ हैं। राधेश्याम तिवारी की इन सारी कविताओं की चमक ऐसी है, इन कविताओं का मंज़र ऐसा है, इन कविताओं का विस्तार ऐसा है कि ये कविताएँ हमारी रगों में दौड़ने को बेक़रार दिखाई देती हैं। यह सच है कि कवि के आगे हमेशा खुला आसमान रहता है और कवि जो चाहता है, जब चाहता है, जैसा चाहता है धूप को अपनी क़लम से लपेटकर लिख डालता है :

          भूख  है  तो  भोजन  नहीं
          भोजन  है  तो  भूख  नहीं
          प्यास  है  तो   पानी  नहीं
          पानी  है  तो   प्यास  नहीं
          घास  है  तो  घोड़ा   नहीं
          घोड़ा  है  तो   घास  नहीं
          जिसे       नहीं       चाहा
          वह    कितना   पास   है
          जिसे      बहुत     चाहा  
          वह    मेरे  पास     नहीं ( 'वह मेरे पास नहीं', पृ. 33 )।
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कनस्तर में गंगा ( कविता-संग्रह ) / कवि : राधेश्याम तिवारी / प्रकाशक : संजना प्रकाशन, डी-70/4, अंकुर एन्कलेव, करावल नगर, दिल्ली-110090 / मोबाइल संपर्क : 08860898399 / मूल्य : ₹300


समीक्षक संपर्क : शहंशाह आलम, प्रकाशन विभाग, बिहार विधान परिषद, पटना-800015 / मोबाइल : 09835417537

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सोमवार, 3 अप्रैल 2017

राधेश्याम तिवारी एवं अन्य का पटना में कविता-पाठ (रपट): शहंशाह आलम

राधेश्याम तिवारी एवं अन्य का पटना में कविता-पाठ
शहंशाह आलम
       

     कवयित्री डॉ. भावना शेखर के आवास सी-43, अमरावती अपार्टमेंट, बेली रोड, पटना में 'सृजन संगति' के तत्वावधान में दिल्ली से पधारे कवि राधेश्याम तिवारी का एकल-पाठ तथा पटना के अन्य प्रतिनिधि कवियों के कविता-पाठ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य-अतिथि डॉ. शिवनारायण थे, अध्यक्ष डॉ. श्रीराम तिवारी थे। संचालन ऋषीकेश पाठक ने किया। आतिथ्य डॉ. भावना शेखर जी ने संभाला।


     इस अवसर पर दिल्ली से पधारे चर्चित कवि राधेश्याम तिवारी ने अपनी - भाषा में संभव, बिल्ला नम्बर-56, हुसैन जी को नहीं जाना था 'कतर', राजेन्द्र यादव की कुर्सी, छाता, कनस्तर में गंगा, राजघाट में गोडसे, हम लड़ेंगे, दिल्ली में सियार, दिल्ली : उजड़े हुए लोगों का घर, कुत्ते की प्रार्थना, पूँजी का नंगा नाच, तुम कहाँ खड़े हो, तुम्हारे बोलने का मतलब, लोकतंत्र की ऐसी माया, समय के साथ, मुर्दा लोग, नयी सुबह के स्वागत में, फिर किसी ने छेड़ दिया - आदि कविताओं का पाठ किया। राधेश्याम तिवारी जी की कविताओं ने अपने पाठ किए जाने के समय पूरी सहजता से अपनी ताज़गी को बरक़रार रखा और आदमी के कठिन समय को बेहद बारीकी से प्रकट किया। उनकी कविताओं की ख़ासियत यही कि उनकी कविताएँ जितनी सहज दिखाई देती हैं, कविताओं का असर उतना ही गहरा होता है। राधेश्याम जी की कविताएँ समकालीन कविता की दुनिया में लम्बे अरसे तक टिके रहने वाली कविताएँ हैं।


     कार्यक्रम के दूसरे सत्र में श्रीराम तिवारी, शिवनारायण, भावना शेखर, रानी श्रीवास्तव, शहंशाह आलम, भागवत शरण झा 'अनिमेष', हरींद्र विद्यार्थी, निविड़ शिवपुत्र, ऋषीकेश पाठक, विजय गुँजन, सुजीत वर्मा, रमेश पाठक, राजकुमार प्रेमी, रवीन्द्र कुमार सिन्हा, हृदय नारायण झा, सरोज तिवारी, बाँके बिहारी आदि कवियों / कवयित्रियों ने अपनी-अपनी प्रतिनिघि कविताओं का पाठ किया।

     आए हुए कवियों, कवयित्रियों, श्रोताओं का आभार निविड़ शिवपुत्र ने व्यक्त किया।

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गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

सुषमा सिंहा की बहुत दिनों के बाद पर शहंशाह आलम की टिप्पणी

समकालीन कविता के महत्व को बढ़ाने वाली स्त्री-कविता की ओजपूर्ण कवयित्री सुषमा सिन्हा की कविताओं का संग्रह 'बहुत दिनों के बाद' की कविताएँ आदमी के घर को बचाने की कविताएँ हैं। 'बहुत दिनों के बाद' पंक्ति से सुषमा सिन्हा यह स्पष्ट करती जाती हैं कि आदमी के लिए यह दुनिया कितनी ज़रूरी है। यह कवयित्री की अपनी ताक़त है कि दुःख से भरे हुए समय में भी आदमी के घर यानी आदमी की दुनिया के लिए उम्मीदों के ख़्वाब बुनना चाहती हैं। यहाँ 'घर वापसी' का अर्थ यह भी है कि मुक्तिबोध ने जिन गढ़ों और मठों को तोड़ने के लिए अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाए थे, वे गढ़ और मठ फिर से बेहिसाब खड़े कर दिए गए हैं और यह निर्माण-कार्य आदमी के घरों को तोड़ कर किए जा रहे हैं। यह सुषमा सिन्हा अकस्मात नहीं बल्कि पूरे होशोहवास में रह कर कहना चाहती हैं कि आदमी के घरों को बचाने के लिए आदमी के विरुद्ध खड़े किए गए गढ़ों और मठों को ढाने ही होंगे। तभी आदमी की सच्ची घर वापसी होगी, जिस घर वापसी का सपना कुमार विकल ने कभी देखा था। यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाना चाहिए कि मुक्तिबोध और कुमार विकल की ताक़त सुषमा सिन्हा के पास नहीं है, ना दावा, लेकिन मुक्तिबोध और कुमार विकल की उम्मीदें उनके पास हैं, जो हर नेक नीयत और सच्चे कवि के पास होती हैं। पेश है समीक्षक शहंशाह आलम की टिप्पणीः-


'बहुत दिनों के बाद' ( सुषमा सिन्हा ) : घर लौटने के सुख का ख़्वाब बुनने की एक अप्रत्याशित दुनिया
● शहंशाह आलम

आज जब आदमी से उम्मीदें, सपने, घर, रोशनियाँ, स्मृतियाँ सब छीनी जा रही हैं, बदले में नाउम्मीदी, ख़ौफ़, फुटपाथ, अँधेरा और भीषण उदासी से लबालब भरी दुनिया हमें दी जा रही है, कोई अपना है, जो हमारे घर लौटने का ख़्वाब अब भी बुन रहा है : हमने ही तो चाहा था जाना घर से दूर / ताकि बचा रहे घर लौटने का सुख / आज बहुत दिनों के बाद / लौटी हूँ अपने घर / एक सुकून के साथ / दरवाज़े ने हँस कर मेरा स्वागत किया / खिड़कियों ने खुलते-खुलते / आख़िर पूछ ही लिया / उस दुनिया के बारे / जो खिड़की से दिखती ही नहीं / रोशनदानों ने हुलस कर कहा- हमने बचा रखी है / तुम्हारे लिए उम्मीद की कई किरणें / तन्हाइयों ने मुस्कुरा कर देखा मुझे / और गले लगा कर रोईं बहुत / बहुत दिनों के बाद / घर के कमरे, दीवारें, छत, बालकनी / ख़ामोश हसरत भरी नज़रों से देख रहे हैं / मेरे छूते ही सिसकियों की आवाज़ / तेज़ हो आई है / देखा कि ज़ख़्म अब भी हरे हैं / और दर्द आज भी / हर जगह बिखरा पड़ा है / हिम्मत कर के फिर से / समेटने लगी हूँ उन्हें / कि हरकत हुई है घर में / घर जो ख़त्म हो रहा था / मैंने उसे बचाना चाहा / बहुत दिनों के बाद ( 'बहुत दिनों के बाद', पृ. 13-14 )। यह सच है कि 'घर' शब्द उस लोकशब्द की तरह है, जिसमें आदमी का अपना पूरा लोक झलकता है, आदमी की अपनी  गंध फैली मिलती है। समकालीन कविता के महत्व को बढ़ाने वाली स्त्री-कविता की ओजपूर्ण कवयित्री सुषमा सिन्हा की कविताओं का संग्रह 'बहुत दिनों के बाद' की कविताएँ आदमी के घर को बचाने की कविताएँ हैं। 'बहुत दिनों के बाद' पंक्ति से सुषमा सिन्हा यह स्पष्ट करती जाती हैं कि आदमी के लिए यह दुनिया कितनी ज़रूरी है। यह कवयित्री की अपनी ताक़त है कि दुःख से भरे हुए समय में भी आदमी के घर यानी आदमी की दुनिया के लिए उम्मीदों के ख़्वाब बुनना चाहती हैं। यहाँ 'घर वापसी' का अर्थ यह भी है कि मुक्तिबोध ने जिन गढ़ों और मठों को तोड़ने के लिए अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाए थे, वे गढ़ और मठ फिर से बेहिसाब खड़े कर दिए गए हैं और यह निर्माण-कार्य आदमी के घरों को तोड़ कर किए जा रहे हैं। यह सुषमा सिन्हा अकस्मात नहीं बल्कि पूरे होशोहवास में रह कर कहना चाहती हैं कि आदमी के घरों को बचाने के लिए आदमी के विरुद्ध खड़े किए गए गढ़ों और मठों को ढाने ही होंगे। तभी आदमी की सच्ची घर वापसी होगी, जिस घर वापसी का सपना कुमार विकल ने कभी देखा था। यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाना चाहिए कि मुक्तिबोध और कुमार विकल की ताक़त सुषमा सिन्हा के पास नहीं है, ना दावा, लेकिन मुक्तिबोध और कुमार विकल की उम्मीदें उनके पास हैं, जो हर नेक नीयत और सच्चे कवि के पास होती हैं : देखती हूँ / जिस घर में नहीं होतीं / माँ, बहन, बेटियाँ / तरसते हैं उस घर के लोग / इन ख़ूबसूरत रिश्तों के लिए / फिर सोचती हूँ / जिस घर में होती हैं / माँ, बहन, बेटियाँ / कैसे हो सकते हैं / उस घर के लोग बलात्कारी / माफ़ी माँगना चाहती हूँ / उन तमाम बेटियों से / जिन्हें जन्म देने के बाद / हम उनकी हिफ़ाज़त नहीं कर पाए / अफ़सोस करना चाहती हूँ / दुनिया की उन तमाम औरतों के लिए / जिनकी कोख से / इंसान की शक्ल में हैवान पैदा हुए / रोना चाहती हूँ / उन तमाम बहनों की क़िस्मत पर / जिनके भाइयों द्वारा / किसी माँ, बहन, बेटी के साथ / किया गया ऐसा घृणित कार्य / और पूछना चाहती हूँ / दुनिया के तमाम लोगों से / क्यों हो रहा किसी माँ का / दामन तार-तार / क्यों लुटी-पीटी-मारी जा रही हैं / हमारी जन्मी-अजन्मी बेटियाँ / क्या माँ होना गुनाह है / या फिर / माँ बनने लायक़ इंसान होना गुनाह है ( ' पूछना चाहती हूँ', पृ. 24-25 )।

     सुषमा सिन्हा का पहला कविता-संग्रह 'मिट्टी का घर' नाम से 2004 में शिल्पायन, दिल्ली से आया था। एक दशक से थोड़ा अधिक समय के बाद उनका यह दूसरा कविता-संग्रह 'बहुत दिनों के बाद' प्रकाशन संस्थान, दिल्ली से छप कर आना किसी घटना से कम नहीं है। पहले संग्रह से दूसरे संग्रह के बीच इस अंतराल का अर्थ यही है कि सुषमा सिन्हा ने इस अंतराल के बीच कविता के बोलने-बतियाने वाले बिम्बों को, कविता के सच्चे अभिप्रायों को काफ़ी हद तक पकड़ने-साधने का काम बख़ूबी किया है। इस बीच उन्होंने यह भी तय किया है कि कविता का जो सच्चा पक्ष है, उसे स्थगित नहीं किया जाए। इस दूसरे कविता-संग्रह की कविताओं की जीवनानुभूतियाँ इस प्रमाण हैं। इस नए संग्रह की कविताओं में कविता को पूरी महीनी से पकड़े रहने का गुण भी उन्होंने सीख लिया है और यह क़ाबिले-तारीफ़ है। ऐसा कविता के प्रति उनके भीतर आए गहरे आत्मविश्वास की वजह से भी होता दिखाई देता है। कविता का यह संतुलन समकालीन स्त्री-कविता का संतुलन कहा जाना यहाँ पर ज़्यादा उचित होगा। सुषमा सिन्हा का कविता-स्वर आधी आबादी का अपना स्वर है, जो पुरुष-समाज की चालाकी, धोखेबाज़ी, काइयाँगिरी के विरुद्ध ग़ुस्से, आक्रोश के साथ-साथ टूटन और घुटन को परदे से बाहर लाता है। इसका यह अर्थ नहीं निकाल जाना चाहिए कि ये कविताएँ किसी टूटी और घुटी हुई स्त्री के पक्ष का स्वर मात्र हैं बल्कि ये कविताएँ उन स्त्रियों की कविताएँ हैं, जिनमें लोहा लेने का हुनर आ गया है : जिस डर की आशंका से / काँप जाते हैं हम हमेशा / वक़्त बुरा हो तो / गुज़र जाता है वह हम पर / लेकिन बर्दाश्त करने की हमारी / ज़बर्दस्त है क्षमता / झेल कर वैसे लम्हों को भी / रह जाते हैं हम ज़िंदा / यूँ ही नहीं हम चलते हैं / नंगे पाँव जलते हुए अंगारों पर / नाचते हैं शीशे के टुकड़ों पर / गिर पड़ने की हद तक / चलते हैं पतली रस्सियों पर / मारते हैं कोड़े अपने बदन पर / दिखाते हैं अजीबो-ग़रीब करतब / जान पर खेल जाने का / ना जाने कितनी बार गुज़रते हैं हम / डर की हद से / कि डरते नहीं अब किसी भी बात से / दर्द की हद भी जानते हैं हम / और यह भी जानते हैं / कि मृत्यु से भी ज़्यादा / भयावह होती है भूख / यह भूख जब वक़्त बुरा हो तो / करवा ही लेती है हमसे / सभी तरह के काम / फिर भी नहीं होती है ख़त्म ( 'भूख', पृ. 15-16 )। दरअसल सुषमा सिन्हा की कविताएँ किसी ढोल की तरह डिन-डिन-डिन डिडिक-डिडिक की या ढम-ढम-ढम की आवाज़ ना भी निकाल पाती हैं तब भी ये कविताएँ उस नदी की तरह ज़रूर हैं, जो जब तक शांत है, तभी तक ख़ामोश दिखाई देती है, लेकिन तेज़ हवाओं के मौसम में वबाल मचा देने का दमखम रखती है। मैं सुषमा सिन्हा की कविताओं की इन्हीं अदाओं पर मोहित हूँ। ये कविताएँ क्रांतिकारी नहीं भी हैं तब भी इन कविताओं में एक स्त्री की आग दबी हुई ज़रूर है : छोटी-सी मुनियाँ / खेला करती / लड़कों के ही सारे खेल / गोली, कंचे, गिल्ली-डंडे / पतंगें भी उड़ाती ख़ूब ऊँचे / ढेर सारे सपनों के साथ / पड़ोस की चाचियाँ / शिकायत करतीं अम्माँ से / बिगड़ रही है तुम्हारी बेटी / दिन-दुपहरिया घूमती रहती है / मुहल्ला भर के छोकरों के साथ / समझातीं ऊँच-नीच / किसे पता वही मुनिया / लड़कों से ही कर-कर के मुक़ाबला / जीत लेगी अपने हिस्से के सारे कंचे / गिल्ली-डंडे से मारते हुए / पा लेगी एक मुकाम / और पतंगों के साथ-साथ / पहुँच जाएगी एक ऊँचाई पर ( 'मुनियाँ', पृ. 32-33 )।

     सुषमा सिन्हा की कविताएँ अपने आसपास के जीवन के लिए दुष्कर कुछ भी नहीं रचतीं बल्कि अपने शांत मिज़ाज के हिसाब से जीवन की कठिनाइयाँ दूर करने का भरसक प्रयास करती हैं। यहाँ ऐसा करते हुए सुषमा सिन्हा समकालीन कविता को शैली की कोई नवीनता अथवा प्रतीकों का कोई अनूठापन ना भी दे सकी हैं, लेकिन समकालीन कविता को नई गहराई और व्यापकता ज़रूर देने में सक्षम हुई हैं। एक स्त्री, जिसका जीवन सिर्फ़ अपना जीवन नहीं है, अगर रात के अपने एकांत से कविता के विश्व के लिए करवटें बदल-बदल कर कुम्हार के चाक-सा कुछ-कुछ बढ़िया रच रही हैं तो विश्व-कविता के लिए असंभव में संभव जैसा मैं मानता हूँ। सुषमा सिन्हा के इन्हीं प्रयासों को सराहते हुए समकालीन कविता के महत्वपूर्ण कवि अरुण कमल लिखते हैं, 'तमाम धूल-धक्कड़ और साहित्य लोक के आंतरिक प्रपंचों से दूर, सुषमा जी ने अपने कौटुम्बिक तथा प्रशासकीय दायित्वों का सफल निर्वाह हुए अपने ही आस-पड़ोस, घर-बार और चतुर्दिक जीवन को उत्तम कविता में बदला है। यहाँ कवि का निजी संसार तो है ही, साथ ही वह कठोर प्रस्तर-जीवन भी है जो झारखंड के आदिवासी-लोक का प्रतिनिधित्व करता है।' यह सच है कि सुषमा सिन्हा की आवाज़ एक नए मौसम के आने की आवाज़ है। यह आवाज़ ऐसी है जो बिना किसी अवरोध के हम तक पहुँचती है : हर रोज़ हम / ना जाने कितनी सीढ़ियाँ चढ़ते हैं / और ना जाने कहाँ-कितनी / उतर जाते हैं, अपने-आप / हर रोज़ हम / ना जाने कितने सपने बुनते हैं / और ना जाने कब कितने सपने / उधड़ जाते हैं, चुपचाप / हर रोज़ हम / ना जाने कितनी बातें तुमसे करते हैं / और ना जाने कितनी चाहतें / छुपा जाते हैं, ख़ामोशी में / हर रोज़ हम / वक़्त की उँगली थाम / शुरू करते हैं चलना / और वक़्त अपनी उँगली छुड़ा / निकल जाता है हमसे बहुत आगे / हर रोज़ हम / ना जाने कितनी कोशिशें / करते हैं जीने की / सहेजते रहते हैं जीवन को / सपनों को, तुमको और वक़्त को / जबकि यह जानते हैं हम / कि ख़त्म हो रहा है / धीरे-धीरे सब कुछ / बहुत ही ख़ामोशी से ( 'हर रोज़', पृ. 81-82 )।
शहंशाह आलम


     सुषमा सिन्हा का लहज़ा यानी बोलने का, बातचीत करने का ढंग अपना है, ख़ास है, सलीके वाला है। यही तमीज़, यही शऊर उनकी कविताओं ने उन्हीं से सीख रखा है। एक ख़ास बात यह भी नोट करने वाली है कि सुषमा सिन्हा की आत्मा जितनी पाक-साफ़ है, उनकी कविताएँ उन्हीं की आत्मा जैसी हैं। इसलिए कि सुषमा सिन्हा जिस लफ़्ज़ को छू भर देती हैं, वह नया हो जाता है। इसीलिए मैंने यहाँ लिखा कि सुषमा सिन्हा की आत्मा उनके एक-एक शब्द में छुपी दिखाई मुझे देती है। इसीलिए उनकी कविताएँ अपने पाठ किए जाते समय किसी को तोड़ती नहीं, जोड़ती हुई चलती हैं : अपने घर को, अपने प्रेम को, अपने आस-पड़ोस को, अपने संघर्ष को, अपने अतीत-वर्तमान को और हमारे जीवन के खंडहर को भी। ये कविताएँ बारिश के बाद धुल कर साफ़ हुए मकान की तरह हैं। संग्रह की 'अच्छे दिनों को याद करते हुए', 'रेस', 'एहसास', 'विनाश', 'तुम्हारा सपना', 'संभावनाएँ', 'चौराहा', 'इच्छा', 'सपने', 'माँ' ( दो कविताएँ ), 'घर', 'यादें', 'पानी', 'रास्ता', 'मदद', 'चूल्हा-रोटी-औरत', 'हिम्मत', 'अँधेरा', 'चाहत', 'भीड़', 'सच', 'शक', 'प्रेम का अर्थ', 'डर तो होता है', 'बदलाव', 'ख़बरें', 'आख़िर कब तक', 'रोक', 'असंभव', 'ख़ुशियाँ', 'मृत्यु' आदि कविताएँ हमारे समय को बग़ैर किसी संशय के प्रकट करती हैं और प्रेरित भी। सुषमा सिन्हा अपनी कविताओं के माध्यम से जीवन का पुनर्संयोजन जिस तरह करती हैं, यह उनके कविता-समय का भी पुनर्संयोजन है। ऐसा इसलिए भी है कि कविता मनुष्य को उसके कठिन दिनों से मुक्ति दिलाने का माध्यम भी है : रेगिस्तान में ओस की बूँद / आँधियों में थरथराता दीया / काली-अँधेरी रात का ध्रुवतारा / हिम्मत देता हुआ / अनजानी-अनचाही / आवाज़ों के बीच / ठहरी-सी एक आवाज़ / घने जंगल से गुज़रती हुई / पतली-सी एक राह / भागते-दौड़ते रास्ते पर / मील का एक पत्थर / एक सुकून देता हुआ / 'जीवन में प्रेम' / बस ऐसा ही तो है ( 'जीवन में प्रेम', पृ. 116 )।
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बहुत दिनों के बाद ( कविता-संग्रह ) / कवि : सुषमा सिन्हा / प्रकाशक : प्रकाशन संस्थान / 4268/B-3, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002 / मूल्य ₹ 250
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शनिवार, 1 अक्टूबर 2016

सत्येन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव के काव्य संग्रह 'रोटियों के हादसे' पर शहंशाह आलम की टिप्पणी.

इस संग्रह को पढ़कर इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि हमारे शत्रु कौन हैं और कहाँ-कहाँ छिपे-घात लगाए बैठे हैं। अब एक कवि आपके शत्रुओं की निशानदेही ही न करेगा, अपने शत्रुओं को छिपने वाली जगहों से खींचकर निकालना तो आप ही को है न बंधु, उन्हें सज़ा भी आपको ही देनी है। कवि तो आपके प्रति हमेशा से सजग है। आप ही विमुख हो-होकर अपने शत्रुओं को क्षमादान देते आए हैं। तभी तो सरकारें, न्यायपालिकाएँ, प्रशासनें, दक्षिणवादी संगठनें यानी सबके-सब आप ही पर चढ़े दिखाई देते हैं। पढ़ते हैं सत्येन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव के काव्य संग्रह 'रोटियों के हादसे' पर शहंशाह आलम की टिप्पणी.
                        
शहंशाह आलम


'रोटियों के हादसे' ( सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव ) : हमें रोज़-रोज़ भूखा रखने वालों के विरुद्ध लोहा लेती कविताएँ
शहंशाह आलम
कविता किसी सीमा को नहीं मानती। कोई सीमा मानती भी है, तो उसकी सीमा में उसका लक्ष्य होता है, कि उसे कहाँ पर और कब वार करना है, किस गति से करना है। इसीलिए मेरा मानना है कि कविता का अपने लक्ष्य के प्रति सीमा को मानते रहना चाहिए। इससे कविता को अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहने की तीव्रता मिलती है। अब यहाँ यह सवाल उठता है कि क्या कवि किसी सेना में काम कर रहा होता है, जो कवि को धावा बोलने के लिए अपने लक्ष्य के प्रति किसी सीमा की आवश्यकता पड़ती है? इस प्रश्न का उत्तर 'हाँ' में मेरा हमेशा रहा है। एक कवि किसी-न-किसी मोर्चे पर ही तो सक्रिय रहता आया है और धावित भी। इसलिए कि कवि का काम अपने श्रोताओं और पाठकों का काम मनोरंजन करना नहीं, उन्हें उनके समय से परिचित कराना है। यही वजह है कि समाज में और साहित्य में कवि को ऊँचा दर्जा दिया गया है। मेरी इस दृष्टि से देखें, तो कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव उन कवियों में मुझे दिखाई देते हैं, जो अपने कवि-कर्म को सीधे उस वर्ग का हिस्सा बनाते हैं, जिस वर्ग को हमारे समर्थन की ज़रूरत सदियों से रही है। इस कवि की वास्तविक छवि यही है कि यह कवि दुनिया-भर के आम आदमी के संघर्ष में साथ देने के लिए खुल्लम-खुल्ला डटा खड़ा है। कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव यह कमाल इनके सद्य: प्रकाशित कविता-संग्रह 'रोटियों के हादसे' की कविताओं में बाकमाल होकर प्रकट होता है। इसलिए कि इनकी कविताओं में बहुत सारे कवियों की तरह कवि का अभिनय-भर दिखाई नहीं देता बल्कि अपने समय के सिस्टम के विरुद्ध जिस लड़ाई की बात-भर हम करते आए हैं, उस लड़ाई को कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव साक्षात् लड़ते दिखाई देते हैं :
रास्ता रोका है मज़दूरों ने
क्योंकि उन्हें
रोटी की ज़रूरत है
पुलिस ने बरसाए हैं डंडे
क्योंकि भूख उन्हें भी लगती है ( 'सिस्टम', पृ. 13 )
अथवा,
आज भी
नहीं जला चूल्हा
आज भी
उदास है माँ
आज भी हैं आँसू
वो पूछते हैं
माँ, रोज़ भूख क्यों लगती है ( 'रोज़-रोज़ भूख', पृ. 15 )
यह स्पष्ट है कि कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की कविताएँ शासन-प्रशासन की उन नीतियों के विरुद्ध हैं, जिन नीतियों ने हमें 'कोल्हू का बैल' मुद्दतों से बनाए रखा है। यही तो कटु सत्य है। अब आप क्या हैं, हमें नहीं मालूम, लेकिन हम अपने बारे में कहें, तो हम 'बैल' भी हैं और 'दबैल' भी। यानी देश की सरकारें हमें बैल की तरह खटाती भी रही हैं और खटने के एवज़ अपने हिस्से की रोटियाँ माँगने पर हमें दबाती भी रही हैं। कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की कविताएँ अपनी लघुता में, अपनी दीर्घता में विस्तार से यही समझाती आई हैं। इनकी हर कविता का सूत्र यही कहता है कि हम जो सदियों से आम जन हैं, ख़ास जन का जीवन न सही, हमारे लिए बोटियाँ न सही, रोटियाँ तो रहने दो! तुम तो हमारे हिस्से की बोटियाँ और रोटियाँ सब छिनते आए हो! लेकिन हमारे क़िस्से का यह सत्य-खंड कोई स्वीकारने वाला दिखाई कहाँ देता है इस काल-खंड में। कवि की यह अनुभूति कवि के हृदय से निकलकर अपनी विराटता के साथ कविता में अंकित होती है। यथार्थ का यह सूक्ष्म आयाम कोई सच्चा और अच्छा कवि ही पकड़ सकता है। इस तरह से देखें, तो कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव एक सच्चे और अच्छे कवि सिद्ध होते हैं :
पहली बार उसे डर लगा
रोटी को देखकर
उसे विश्वास ही नहीं हुआ
इतनी डरावनी भी
हो सकती है रोटी
उसे लगा
व्यर्थ हो गई
हर मेहनतकश के लिए
उसकी रोटी की लड़ाई
उसके सामने पड़ी
ख़ून से सनी रोटी पर
भिनभिना रही थीं मक्खियाँ
मानो हँस रही थीं
उसकी विफलता पर
वह काँप उठा
नहीं
अब सिर्फ़
रोटी के लिए
नहीं लड़ेगा
बल्कि
ढूँढ़ेगा उन हाथों को भी
जो रोटी को
रक्तरंजित कर रहे हैं ( 'दूसरा पहलू', पृ. 24-25 )
यहाँ कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव का इस पूँजीवादी समाज के प्रति ग़ुस्सा वाजिब है। मेरे ख़्याल से सरकारों को यही समाज समर्थ करता आया है और सरकारें पूँजीवादी समाज के लिए हमेशा से तत्पर रहती आई हैं। यह कैसी विडंबना है कि सरकारें बनवाते तो हम हैं, मगर लाभ पूँजीवाद उठा ले जाता है। इसका अर्थ यही है कि जिस भी विचारधारा की सरकारों को चुनें, सरकारें पूँजीवादियों को ही चूमती-चाटती आई हैं। इन कविताओं का उद्देश्य यही है कि आम आदमी के जटिल-कठिन जीवन के प्रति हमारी संवेदना जीवित हो। यह आकस्मिक या अचानक नहीं होता आ रहा है कि एक वर्ग अपने ऐश्वर्य में ऐश्वर्यवान और ऐश्वर्यशाली हो-होकर जी रहां है और एक वर्ग चंद रोटियों के लिए इतनी मशक्कत करता फिरे कि बेचारा दम तक तोड़ डाले। कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव का मिशन यही है कि आम आदमी की मुख्य समस्याओं का हल अब निकलना ही चाहिए। हमें युद्ध नहीं अनाज चाहिए :
रोटी
थाली की जगह
ख़बरों नें है
भूखा बच्चा रोटी समझ
चाँद को लपकना चाहता है
लेकिन काट दिए जाते हैं उसके पंख
वो फड़फड़ाता है
छटपटाता है
उसका पंख लेकर
कोई और उड़ जाता है
उसके हिस्से में ना तो रोटी है
ना ही उड़ान
उसके हिस्से में सिर्फ़ भूख है
बेटे से किया वादा पूरा करना चाहता है
परकटा बाप
वो उसे पेट-भर रोटी खिलाना चाहता है
लेकिन वो उसी पेड़ से लटका मिलता है
जिसे उसी ने कभी रोपा था
ये किसानों के हवा में लटकने का दौर है
ज़मीन उसे रास नहीं आ रही ( 'हवा में लटकने का दौर', पृ. 28 )
कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव बग़ैर किसी लटके-झटके के कवितारत हैं। ये अभिजात संस्कार के विरुद्ध हैं। यह संस्कार है भी तो ख़तरनाक! आम आदमी के जीवन की बहुत सारी विषमताएँ, बहुत सारी समस्याएँ, बहुत सारी कुरूपताएँ इस अभिजात संस्कार ने अकेले दी हैं। यह अभिजाततंत्र अथवा यह अभिजातकी जितना हमारे लिए ख़तरनाक है, उतना ही चालाक भी है। यह हम जैसों को फलने-फूलने नहीं देता। स्थिति इतनी नाज़ूक हो गई है कि सारा त्याग यह वर्ग हमीं से चाहता है। अब हम लाख नए समाज का ढिंढोरा पीटत रहें। मेरी मुनादी यही कहती है कि आज की सरकारें, आज की न्याय-व्यवस्थाएँ, आज की शासन प्रणालियाँ, सब-की-सब इसी वर्ग की चाकरी में लगी दिखाई देती हैं। गर ऐसा नहीं है, तो हम पिछड़े दिनों-दिन अत्यधिक पिछड़ते क्यों जा रहे हैं? सामाजिक विषमताएँ इस सभ्य समाज में ज़्यादा बढ़ती क्यों जा रही हैं? इन सब विषमताओं का समाधान निकल क्यों नहीं रहा है? हमारी परिस्थितियाँ ठीक होने-होने को होती हैं, तो हम पर महँगाई, बेरोज़गारी, दंगे ( और अब युद्ध का भय भी ) क्यों लाद देतो हो तुम? तुम्हें उत्तरप्रदेश चाहिए, तुम्हें बिहार चाहिए, तुम्हें बंगाल चाहिए, तुम्हें दिल्ली चाहिए, तो सब ले लो भइया, पर यह सब लेने से पहले हमें इतना डरा-धमका क्यों देते रहे हो? तुम इतना घबराते काहे हो, जो तुम्हें हमें पुरस्कृत और तिरस्कृत नहीं करने देने का बयान देना पड़ता है, सलाह देनी पड़ती है अपने लगुए-भगुए को? संग्रह की कमोबेश सारी ही कविताएँ ऐसे दमघोट प्रश्न उठाती हैं।
इस संग्रह को पढ़कर इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि हमारे शत्रु कौन हैं और कहाँ-कहाँ छिपे-घात लगाए बैठे हैं। अब एक कवि आपके शत्रुओं की निशानदेही ही न करेगा, अपने शत्रुओं को छिपने वाली जगहों से खींचकर निकालना तो आप ही को है न बंधु, उन्हें सज़ा भी आपको ही देनी है। कवि तो आपके प्रति हमेशा से सजग है। आप ही विमुख हो-होकर अपने शत्रुओं को क्षमादान देते आए हैं। तभी तो सरकारें, न्यायपालिकाएँ, प्रशासनें, दक्षिणवादी संगठनें यानी सबके-सब आप ही पर चढ़े दिखाई देते हैं। तभी तो सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव का कवि यह कह रहा है कि :
डरे हुए लोगों की भीड़ में
उसे तलाश रहा हूँ मैं
सहमी, डरी, सशंकित नज़रें
किसी गंभीर प्रश्न के साथ
टटोलती हैं मुझे
खड़े हो जाते हैं मेरे रोंगटे
राइफ़ल, बारूद
विस्फ़ोट, चीख़
ख़ून
इन सबसे अभ्यस्त मेरी आँखें
डर जाती हैं
सहमी, डरी, सशंकित नज़रों से
इसलिए उसे
तलाश रहा हूँ मैं
नहीं
फ्लड लाइट नहीं
दीया जलाकर लाओ
दीए की रौशनी में ही
पकड़ में आ सकता है
वह शख़्स
फ्लड लाइट में
उसकी कमज़ोर नज़रें
चुंधिया जाएँगी
और सत्तर साल का
वह डरपोक, कमज़ोर
कुपोषण का शिकार बुड्ढा
जाकर छिप जाएगा
किसी घने जंगल में
जंगल
मत पूछो
इसकी परिभाषा मुझसे
परिभाषा के दायरे से
बाहर निकल गया है जंगल
क्योंकि
हिंस्र-ख़ूनख़ार जानवरों से भी
क्रूर जीव
घूम रहे हैं शहरों में
गाँवों में, बस्तियों में
सच तो यह है
कि जंगल अब
शहरों में बसता है
और इसी जंगल में
ठेकेदारों
हत्यारों
खद्दरधारियों
पूँजीवादी सर्वहाराओं
और ऐसे ही अनेक
भले मानुषों की भीड़ में
कहीं खो गया है अपना स्वराज
लाओ
दीया जलाकर लाओ
हम उसे ढ़ूँढ़ निकालेंगे ( 'स्वराज', पृ. 74-76 )
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रोटियों के हादसे ( कविता-संग्रह ) / कवि : सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव / प्रकाशक : लिटरेचर प्वाइंट, जी-2, प्लॉट नंबर-156, मीडिया एन्क्लेव, सेक्टर-6, वैशाली, ग़ाज़ियाबाद ( उत्तरप्रदेश ) / मूल्य : ₹100 / मोबाइल संपर्क : 09582869580

समीक्षक-संपर्क : शहंशाह आलम, हुसैन कॉलोनी, नोहसा बाग़ीचा, नोहसा रोड, पेट्रोल पाइप लेन के नज़दीक, फुलवारीशरीफ़, पटना-801505, बिहार / मोबाइल : 09835417537
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