आत्महत्या कहकर हमारे गांव कुनबे को बदनाम न करो।देखो,मरना एक दिन सबको है।वीर मनुष्य
वही है जो भाग्य के भरोसे न बैठा रहे कि जब वह दिन आएगा तब मर लेंगे।ऐसा मान लेंगे
तो हमारी संस्कृति का विकास रुक जाएगा।इसलिए हम अपना दिन खुद चुनते हैं।कहा गया है
कि कर्म करो फल की इच्छा न करो।इसलिए किसान पेड़ पर विकास के फल की तरह लटक जाते
हैं। इन पंक्तियों को
लिखने वाले सुशील सिद्धार्थ समकालीन व्यंग्यकारों में एक प्रतिष्ठित नाम हैं. जिनके
व्यंग्य की एक अलग शैली है. इन्होंने चार व्यंग्य संग्रह और दो कविता संग्रह के
अलावे नौ पुस्तकों का संपादन किया है. जिन्हें आलोचना के लिए स्पंदन सम्मान से
सम्मानित किया गया है. पढ़ते हैं सुशील सिद्धार्थ जी के व्यंग्य एक था राजा को.
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एक था राजा
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*सुशील सिद्धार्थ
एक था राजा
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*सुशील सिद्धार्थ
यह एक
सरल,निष्कपट ,पारदर्शी और दयालु समय की कहानी
है।एक दिन किसी देश का राजा चिंता में पड़ गया।उसे देखकर रानी भी पड़ गई।पड़कर रानी
ने गुरुदेव को बुला भेजा।हरकारा रवाना हुआ।गुरुदेव बहुत दिनों से ताव खाए पड़े
थे।गुरुदेव दरबार से बुलाए जाने के लंबे इंतज़ार में हर आने जाने वाले को शाप दे
रहे थे।वे चिंतित थे कि कहीं राजा ने पत्नी, न्याय, नियम आदि की तरह गुरु भी तो
नहीं बदल लिया!हरकारे को देखकर हवन कुंड की तरह गुरु का इच्छा कुंड भभक उठा।वे
सोचने लगे कि अहा,वह चिंतक ही क्या जिसे सत्ता का सत्तू न मिल सके।हर दार्शनिक का लक्ष्य
दरबार की दुंदुभि बनना ही तो है।ऐसे आदि आदि विचार उछालते हुए गुरुदेव ख़याली घोड़े
पर सवार थे।हरकारे ने हांफते हुए उनको नीचे उतारा।जल्द पहुंचना था इसलिए हरकारे ने
उन्हें जीवित घोड़े पर बिठाया।घोड़ा गधे की भांति चल पड़ा।वह एक सरकारी घोड़ा था।
महल में पहुंचते ही गुरुदेव ने रानी को आनंद के अंतिम छोर पर खड़े होकर आशीर्वाद दिया।वे और देते कि राजा आ गया।आते ही उसने कहा कि ,'गुरुदेव,आज हम चिंतित हैं और कुछ सोच रहे हैं।' गुरुदेव यह सुनते ही दुखी हो गए।अपने दुख को माहौल में स्थापित किया।फिर बोले,'राजन यह तो अनर्थ है।सोचना और चिंतित होना तो प्रजा का धर्म माना गया है।बल्कि उत्तम राजा वह माना जाता है जो प्रजा के लिए सोचने और चिंतित होने के नित नए सुनहरे अवसर मुहैया कराता रहे।यही राजपरंपरा है।ऐसे अवसरों से ही राज्य में चिंतक पैदा होते रहे हैं।फिर भी,आप राजा हैं।कुछ भी कर सकते हैं।बताएँ मुझे किसलिए बुलाया है।'राजा बोला',गुरुदेव प्रजा मुझको क्या समझती है।उसके मन में मेरी कैसी छवि है!क्या आप बता सकते हैं।'
गुरुदेव ज्ञानी तो बहुत थे।मगर यह जानते थे कि जिस ज्ञान से अपनी जान का संकट पैदा हो जाए वह अज्ञान है।बोले,'क्या क्या नहीं समझती है।आपका कहां तक बखान करूँ।' राजा मूर्ख तो बहुत था।मगर यह जानता था कि गुरुदेव हैं तो हमारे ही गुरुदेव।बोला, 'यह भी तो परंपरा रही है कि राजा लोग वेष बदलकर रात में किसी गांव वांव में जाकर सबके मन का हाल मालूम करते थे।क्या मेरा ऐसा करना सिंहासन को शोभा देगा?'गुरुदेव ने मन में अपशब्द निबद्ध अनेक शास्त्रीय बातें सोची।कहीं ऐसा तो नहीं कि यह सनकी आदमी मुझे भी साथ चलने को कह दे।कुछ देर बाद मन के बाहर गद्गद होकर बोले,'अहा के बाद अहहा भी कि आपने यह कहा।वैसे आपको वेष बदलने की ज़रूरत नहीं है।आपको अनेक वर्षों से जनसमुदाय ने देखा ही नहीं है।फिर भी सावधानी बरत कर जाना ही उचित होगा।अब पक्के तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता कि प्रजा का रवैया कैसा रहेगा।अजातशत्रु शब्द में भी शत्रु तो लगा ही है।प्रजा के रवैये के बारे में ग्लोबलम् उपनिषद में कहा गया है,' मीडिया न जानाति कुतो मनुष्य:।'
रानी ने तिलक लगाया।राजा निकल पड़ा।रानी ने बहुत दिन बाद ऐसी सांस ली जिसे चैन की सांस कहा जाता है।जिन पत्नियों के पति अधिकतर घर में ही रहते हैं वे इस सौभाग्य का अनुभव कर सकती हैं।दांम्पत्य दुर्दशा पुराण में ऐसी बातें विस्तार से लिखी गई हैं।बहरहाल,यह ताकीद कर दी गई कि किसी को कानोकान भी ख़बर न हो।आंखोआंख का तो सवाल ही नहीं उठता।
राजा ने अपने अत्यंत प्रिय वेषभूषाकार से अपना चेहरा मोहरा बदलवाया।चुपके से निकल पड़ा।राजा को ज़मीन पर पांव रखने में कष्ट तो हो रहा था,मगर उसे प्रजा की गर्दन पर पांव रखने का परंपरागत अभ्यास था।उसे ख़ास अटपटा भी नहीं लग रहा था।जब रात जैसी रात हो गई तब राजा एक गांव जैसे गांव में जा पहुंचा।वहाँ कुत्ते भौंक रहे थे।राजा यह जानकर ख़ुश हुआ कि हमने सबको अभिव्यक्ति की आजादी दे रखी है।महल में राजा को शिक्षा के दौरान प्रजा के जो पर्यायवाची रटाए गए थे उनमें कुत्ता और सुअर सबसे ऊपर थे।
राजा अब उस जगह की तलाश में था जहां भीड़ जैसे लोग मिलें।राजा उदार था।भीड़ और भेड़ जैसे शब्दों से उसे प्यार था।भेड़िया शब्द का तो वह आदर करता था।कुछ दूर पर सामने लोग दिखे।वह विनम्रता की मूर्ति बनकर आगे बढ़ा।राज्य में सर्वाधिक विनम्रता राजा की मूर्तियों पर ही दिखती थी।राज्य मूर्तियों के सहारे ही आगे बढ़ रहा था।राजा ने देखा।सामने एक चौपाल ।चौपाल में भीड़ जमा थी।वह निकट जाकर बोला,'भाइयो ,मैं राह भटक गया हूं।क्या आप सबसे बात करते हुए यहाँ रात बिता सकता हूं।'चौपाल के लोगों ने एक दूसरे को एक दूसरे की तरह देखा।राजा के लिए जगह बना दी गई।पानी वानी आया।उसने पिया।कुछ ताज़ा पानी अपनी आंखों में डाल लिया।ताज़ा पानी आंखों में मरने की प्रक्रिया में लग गया।कुछ हल्की फुल्की बातें शुरू हुईं।राजा आवाज़ बदलने में भी निपुण था।आवाज़ बदलकर पूछने लगा,'भाइयो,सुना है आप के गांव में कुछ किसानों ने आत्महत्या की है।ऐसा क्यों हुआ।क्या राज्य की व्यवस्था ठीक नहीं है?' एक बुजुर्ग कहने लगा,'ओ मेहमान भाई।आत्महत्या कहकर हमारे गांव कुनबे को बदनाम न करो।देखो,मरना एक दिन सबको है।वीर मनुष्य वही है जो भाग्य के भरोसे न बैठा रहे कि जब वह दिन आएगा तब मर लेंगे।ऐसा मान लेंगे तो हमारी संस्कृति का विकास रुक जाएगा।इसलिए हम अपना दिन खुद चुनते हैं।कहा गया है कि कर्म करो फल की इच्छा न करो।इसलिए किसान पेड़ पर विकास के फल की तरह लटक जाते हैं।वे इस लटकने के फल की इच्छा नहीं करते।वे जानते हैं कि इस अमर फल का बटवारा करनेवाले आते ही होंगे।और यह भी समझ लो ,जब मौत माता का बुलावा आ जाता है तब कौन रुक सका है।हम तो आभारी हैं राजा जी के कि दिन रात ऐसे बुलावों का शिलान्यास करने में व्यस्त रहते हैं।संतजन कह गए हैं कि चलो बुलावा आया है।'इतना सुनते ही सारी चौपाल ने हाथ जोड़ लिए और जयकारा भी लगाया।
राजा भक्ति भाव में डूब गया।खुश होकर बोला,'वाह।आप लोग कितने होशियार हैं।दार्शनिक हैं।फिर भी कुछ तबकों द्वारा यह सवाल उठाया जाता है कि देश का राजा सेठों महाजनों के पीछे पीछे चल रहा है।'राजा का वाक्य पूरा होते होते चौपाल में सबने अपने कानों पर हाथ रख लिए।कि उफ, हम ये बातें सुन भी नहीं सकते।एक युवक आवेश में कहने लगा,'ओ परदेसी भाई।ऐसे सवाल उठाने वालों को इस राज्य का कानून उठा क्यों नहीं लेता।इसीलिए राजधानी में बार बार भूकंप आता है।गैया के सींग पर टिकी धरती मैया भी ऐसा झूठ बर्दाश्त नहीं कर पाती।तुम पहले बात को समझो।हर वक्त जो चालू है वही चलता है।कहा गया है--महाजनो येन गता स पंथा:।महाजन सेठ पूंजीधर व्यापारी जिस पथ पर चलें वही पथ है।बाकी सब लथपथ है।इसलिए हमारे राजाजी इनके पीछे चल रहे हैं।मैं तो कहता हूँ यह लिख देना चाहिए जगह जगह कि विकास के वास्ते महाजन के रास्ते। समाज के हर रास्ते को किसी न किसी पूंजीधर के नाम कर देना चाहिए।दुख की बात है कि अभी भी राज्य के बहुत कम मार्गों पर ऐसा हो सका है।मैं यह नहीं कह रहा कि हमारे राजाजी ने इस मामले में कोई कोताही की है।ना ना।ऐसा सोचना भी पाप है।वे तो चौबीस घंटे इस काम में लगे हैं।हमारे भीतर ही कोई खोट है जो इसकी गति धीमी है।'राजा ने मन ही मन तय किया कि वापस लौटते ही इस काम को गतिमान करना है।चुपके से इस युवक को बुलाकर दरबार में कोई ज़िम्मेदार पद देना है।ये प्रजा के मन की बातें हैं।प्रजा की भावनाओं को समझना ही राजा का पहला धर्म है।
राजा इतना प्रसन्न हुआ कि उसका मन किया असली भेस में आ जाए।मगर इच्छा को दबा लिया।कहने लगा ,'इसी कारण यह राज्य उन्नति कर रहा है प्रजा और राजा मिलकर एक जैसा ही सोच रहे हैं।अब चलना चाहिए।बातों बातों में रात खत्म होने को आई।' एक अधेड़ ने हाथ जोड़ लिए 'साहेब क्या उम्दा बात कही।जब अंधेरा होता है तब हम अंधेरा दूर करने की बातें करने लगते हैं।'तभी एक अन्य ने अधेड़ को रोक कर कहा,' वो तो ठीक कहा ।मगर कुछ करना भी चाहिए।हमें मनुष्य जीवन मिला है। ओ मेहमान जी,अभी कुछ रौशनी कम है।रुकिए,हम निकट के गांव में आग लगवाने का इंतजाम करते हैं।ताकि कुछ तो उजाला हो सके।'
राजा ख़ुश हुआ।जाड़े में हाथ तापने और सरकारी गश्त के समय रौशनी करने का यह पुराना तरीका था।थोड़ी ही देर में रास्ते पर रौशनी दिखने लगी।राजा जलते गांव की रौशनी में अपना लिखा राज्यगीत गाता हुआ आगे बढ़ चला।
अब चौपाल पर सारे लोग अपना अपना मेकअप उतार रहे थे।एक बुजुर्ग दिखते आदमी ने कहा,' आप सब दरबारियों ने अच्छा अभिनय किया।ख़ैर हमको अभ्यास भी है।हम बरसों से यही करते चले आए हैं।ऐसा करो,अब असली गांव वालों को रिहा कर दो जो सुबह से बंधक पड़े हैं।' एक युवक बोला',चाचा आप जान कैसे गए थे कि राजासाहब यहीं आएंगे।'बुजुर्ग हंसा,' ऐसा है ,राजा की चाल से ही अंदाजा लग जाता है कि वह कहां जा रहा है।'
महल में पहुंचते ही गुरुदेव ने रानी को आनंद के अंतिम छोर पर खड़े होकर आशीर्वाद दिया।वे और देते कि राजा आ गया।आते ही उसने कहा कि ,'गुरुदेव,आज हम चिंतित हैं और कुछ सोच रहे हैं।' गुरुदेव यह सुनते ही दुखी हो गए।अपने दुख को माहौल में स्थापित किया।फिर बोले,'राजन यह तो अनर्थ है।सोचना और चिंतित होना तो प्रजा का धर्म माना गया है।बल्कि उत्तम राजा वह माना जाता है जो प्रजा के लिए सोचने और चिंतित होने के नित नए सुनहरे अवसर मुहैया कराता रहे।यही राजपरंपरा है।ऐसे अवसरों से ही राज्य में चिंतक पैदा होते रहे हैं।फिर भी,आप राजा हैं।कुछ भी कर सकते हैं।बताएँ मुझे किसलिए बुलाया है।'राजा बोला',गुरुदेव प्रजा मुझको क्या समझती है।उसके मन में मेरी कैसी छवि है!क्या आप बता सकते हैं।'
गुरुदेव ज्ञानी तो बहुत थे।मगर यह जानते थे कि जिस ज्ञान से अपनी जान का संकट पैदा हो जाए वह अज्ञान है।बोले,'क्या क्या नहीं समझती है।आपका कहां तक बखान करूँ।' राजा मूर्ख तो बहुत था।मगर यह जानता था कि गुरुदेव हैं तो हमारे ही गुरुदेव।बोला, 'यह भी तो परंपरा रही है कि राजा लोग वेष बदलकर रात में किसी गांव वांव में जाकर सबके मन का हाल मालूम करते थे।क्या मेरा ऐसा करना सिंहासन को शोभा देगा?'गुरुदेव ने मन में अपशब्द निबद्ध अनेक शास्त्रीय बातें सोची।कहीं ऐसा तो नहीं कि यह सनकी आदमी मुझे भी साथ चलने को कह दे।कुछ देर बाद मन के बाहर गद्गद होकर बोले,'अहा के बाद अहहा भी कि आपने यह कहा।वैसे आपको वेष बदलने की ज़रूरत नहीं है।आपको अनेक वर्षों से जनसमुदाय ने देखा ही नहीं है।फिर भी सावधानी बरत कर जाना ही उचित होगा।अब पक्के तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता कि प्रजा का रवैया कैसा रहेगा।अजातशत्रु शब्द में भी शत्रु तो लगा ही है।प्रजा के रवैये के बारे में ग्लोबलम् उपनिषद में कहा गया है,' मीडिया न जानाति कुतो मनुष्य:।'
रानी ने तिलक लगाया।राजा निकल पड़ा।रानी ने बहुत दिन बाद ऐसी सांस ली जिसे चैन की सांस कहा जाता है।जिन पत्नियों के पति अधिकतर घर में ही रहते हैं वे इस सौभाग्य का अनुभव कर सकती हैं।दांम्पत्य दुर्दशा पुराण में ऐसी बातें विस्तार से लिखी गई हैं।बहरहाल,यह ताकीद कर दी गई कि किसी को कानोकान भी ख़बर न हो।आंखोआंख का तो सवाल ही नहीं उठता।
राजा ने अपने अत्यंत प्रिय वेषभूषाकार से अपना चेहरा मोहरा बदलवाया।चुपके से निकल पड़ा।राजा को ज़मीन पर पांव रखने में कष्ट तो हो रहा था,मगर उसे प्रजा की गर्दन पर पांव रखने का परंपरागत अभ्यास था।उसे ख़ास अटपटा भी नहीं लग रहा था।जब रात जैसी रात हो गई तब राजा एक गांव जैसे गांव में जा पहुंचा।वहाँ कुत्ते भौंक रहे थे।राजा यह जानकर ख़ुश हुआ कि हमने सबको अभिव्यक्ति की आजादी दे रखी है।महल में राजा को शिक्षा के दौरान प्रजा के जो पर्यायवाची रटाए गए थे उनमें कुत्ता और सुअर सबसे ऊपर थे।
राजा अब उस जगह की तलाश में था जहां भीड़ जैसे लोग मिलें।राजा उदार था।भीड़ और भेड़ जैसे शब्दों से उसे प्यार था।भेड़िया शब्द का तो वह आदर करता था।कुछ दूर पर सामने लोग दिखे।वह विनम्रता की मूर्ति बनकर आगे बढ़ा।राज्य में सर्वाधिक विनम्रता राजा की मूर्तियों पर ही दिखती थी।राज्य मूर्तियों के सहारे ही आगे बढ़ रहा था।राजा ने देखा।सामने एक चौपाल ।चौपाल में भीड़ जमा थी।वह निकट जाकर बोला,'भाइयो ,मैं राह भटक गया हूं।क्या आप सबसे बात करते हुए यहाँ रात बिता सकता हूं।'चौपाल के लोगों ने एक दूसरे को एक दूसरे की तरह देखा।राजा के लिए जगह बना दी गई।पानी वानी आया।उसने पिया।कुछ ताज़ा पानी अपनी आंखों में डाल लिया।ताज़ा पानी आंखों में मरने की प्रक्रिया में लग गया।कुछ हल्की फुल्की बातें शुरू हुईं।राजा आवाज़ बदलने में भी निपुण था।आवाज़ बदलकर पूछने लगा,'भाइयो,सुना है आप के गांव में कुछ किसानों ने आत्महत्या की है।ऐसा क्यों हुआ।क्या राज्य की व्यवस्था ठीक नहीं है?' एक बुजुर्ग कहने लगा,'ओ मेहमान भाई।आत्महत्या कहकर हमारे गांव कुनबे को बदनाम न करो।देखो,मरना एक दिन सबको है।वीर मनुष्य वही है जो भाग्य के भरोसे न बैठा रहे कि जब वह दिन आएगा तब मर लेंगे।ऐसा मान लेंगे तो हमारी संस्कृति का विकास रुक जाएगा।इसलिए हम अपना दिन खुद चुनते हैं।कहा गया है कि कर्म करो फल की इच्छा न करो।इसलिए किसान पेड़ पर विकास के फल की तरह लटक जाते हैं।वे इस लटकने के फल की इच्छा नहीं करते।वे जानते हैं कि इस अमर फल का बटवारा करनेवाले आते ही होंगे।और यह भी समझ लो ,जब मौत माता का बुलावा आ जाता है तब कौन रुक सका है।हम तो आभारी हैं राजा जी के कि दिन रात ऐसे बुलावों का शिलान्यास करने में व्यस्त रहते हैं।संतजन कह गए हैं कि चलो बुलावा आया है।'इतना सुनते ही सारी चौपाल ने हाथ जोड़ लिए और जयकारा भी लगाया।
राजा भक्ति भाव में डूब गया।खुश होकर बोला,'वाह।आप लोग कितने होशियार हैं।दार्शनिक हैं।फिर भी कुछ तबकों द्वारा यह सवाल उठाया जाता है कि देश का राजा सेठों महाजनों के पीछे पीछे चल रहा है।'राजा का वाक्य पूरा होते होते चौपाल में सबने अपने कानों पर हाथ रख लिए।कि उफ, हम ये बातें सुन भी नहीं सकते।एक युवक आवेश में कहने लगा,'ओ परदेसी भाई।ऐसे सवाल उठाने वालों को इस राज्य का कानून उठा क्यों नहीं लेता।इसीलिए राजधानी में बार बार भूकंप आता है।गैया के सींग पर टिकी धरती मैया भी ऐसा झूठ बर्दाश्त नहीं कर पाती।तुम पहले बात को समझो।हर वक्त जो चालू है वही चलता है।कहा गया है--महाजनो येन गता स पंथा:।महाजन सेठ पूंजीधर व्यापारी जिस पथ पर चलें वही पथ है।बाकी सब लथपथ है।इसलिए हमारे राजाजी इनके पीछे चल रहे हैं।मैं तो कहता हूँ यह लिख देना चाहिए जगह जगह कि विकास के वास्ते महाजन के रास्ते। समाज के हर रास्ते को किसी न किसी पूंजीधर के नाम कर देना चाहिए।दुख की बात है कि अभी भी राज्य के बहुत कम मार्गों पर ऐसा हो सका है।मैं यह नहीं कह रहा कि हमारे राजाजी ने इस मामले में कोई कोताही की है।ना ना।ऐसा सोचना भी पाप है।वे तो चौबीस घंटे इस काम में लगे हैं।हमारे भीतर ही कोई खोट है जो इसकी गति धीमी है।'राजा ने मन ही मन तय किया कि वापस लौटते ही इस काम को गतिमान करना है।चुपके से इस युवक को बुलाकर दरबार में कोई ज़िम्मेदार पद देना है।ये प्रजा के मन की बातें हैं।प्रजा की भावनाओं को समझना ही राजा का पहला धर्म है।
राजा इतना प्रसन्न हुआ कि उसका मन किया असली भेस में आ जाए।मगर इच्छा को दबा लिया।कहने लगा ,'इसी कारण यह राज्य उन्नति कर रहा है प्रजा और राजा मिलकर एक जैसा ही सोच रहे हैं।अब चलना चाहिए।बातों बातों में रात खत्म होने को आई।' एक अधेड़ ने हाथ जोड़ लिए 'साहेब क्या उम्दा बात कही।जब अंधेरा होता है तब हम अंधेरा दूर करने की बातें करने लगते हैं।'तभी एक अन्य ने अधेड़ को रोक कर कहा,' वो तो ठीक कहा ।मगर कुछ करना भी चाहिए।हमें मनुष्य जीवन मिला है। ओ मेहमान जी,अभी कुछ रौशनी कम है।रुकिए,हम निकट के गांव में आग लगवाने का इंतजाम करते हैं।ताकि कुछ तो उजाला हो सके।'
राजा ख़ुश हुआ।जाड़े में हाथ तापने और सरकारी गश्त के समय रौशनी करने का यह पुराना तरीका था।थोड़ी ही देर में रास्ते पर रौशनी दिखने लगी।राजा जलते गांव की रौशनी में अपना लिखा राज्यगीत गाता हुआ आगे बढ़ चला।
अब चौपाल पर सारे लोग अपना अपना मेकअप उतार रहे थे।एक बुजुर्ग दिखते आदमी ने कहा,' आप सब दरबारियों ने अच्छा अभिनय किया।ख़ैर हमको अभ्यास भी है।हम बरसों से यही करते चले आए हैं।ऐसा करो,अब असली गांव वालों को रिहा कर दो जो सुबह से बंधक पड़े हैं।' एक युवक बोला',चाचा आप जान कैसे गए थे कि राजासाहब यहीं आएंगे।'बुजुर्ग हंसा,' ऐसा है ,राजा की चाल से ही अंदाजा लग जाता है कि वह कहां जा रहा है।'

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