शनिवार, 11 जून 2016

शहंशाह आलम की कविताएं

शहंशाह आलम साहित्य में एक परिचित नाम है जिनकी रचनाएं जीवन की दुश्वारियों से होकर गुजरती हैं जो आपके मर्मस्थान को छूती ही नहीं है बल्कि आपको सोचने पर भी विवश करती है कि हम कैसे समय में जी रहे हैं? हम कहां से कहां पहुंच गए हैं? आप स्वयं शहंशाह आलम की इन कविताओं को देखें और महसूस करें।

     एक बेघर की कविता
 
   
जिनके अपने घर नहीं होते वे नींद में चलते हुए अकसर
पहुँच जाते हैं किसी के भी घर का दरवाज़ा खटखटाने

उन्हें लगता है उनके सपनों से चुराकर बनाया गया है वह घर
जिसकी कुंडी पीट रहे होते हैं वे अपने हाथ से पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से
जैसे कि यह घर उसी का था और चुरा लिया गया था
उस घर के मालिक के द्वारा उसके समय के किसी हिस्से से

यह भी सच है हमारी कठिनाइयों हमारी परेशानियों के बीच
हमारी पसलियों से एक औरत तो बनाई गई ज़रूर
परन्तु हमारे माँस-मज्जे से एक घर नहीं बनाया गया
जोकि हमारे जीवन का पूरा यथार्थ था स्वार्थ से परे
इस पृथ्वी पर रहने-सहने के लिए बिंदास

यह भी सच है कि एक औरत भाग भी जाए
किसी प्रेमी के साथ
किसी दूसरे की घरवाले के साथ
या किसी औरत भगानेवाले के साथ
उनके बहकावे में आकर तो उस औरत को
वापस लाया जा सकता है समझा-बुझाकर

लेकिन कोई घर आपके जीवन से छूट जाए अचानक
अथवा लूट जाए तो उसे वापस लाना बेहद मुश्किल होता है

फिर किसी के पास सुंदर से सुंदर औरत हो
और आपके पास कम सुंदर औरत हो
तो उस अधिक सुंदर औरत का मरद आपको डाँटेगा नहीं
इस बात के लिए कि आपके पास कम सुंदर औरत क्यों है

लेकिन आपके पास आपका अपना घर नहीं है
तो वही औरत आपको डाँट पिलाएगी
या वही मरद आपको धिक्कारेगा इसके लिए
कि आपने उनके घर की तरफ़ देख भी कैसे लिया
जब आपके पास अपना घर नहीं है दिखाने के लिए

इसलिए कि आप दुर्बल हैं अगर आपके पास अपना घर नहीं है
और उनके लिए आप किसी भिखारी जैसे ही हैं
जो उनके घर को मैला करते रहते हैं बराबर आ-आकर।
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     कुश्तीबाज़
   

अपने रहने के ठिकाने से दूर कुश्तीबाज़ कुश्ती लड़ता है

अकसर अखाड़े में पूरे मुहल्ले के सामने कुश्ती लड़ी जाती रही है
अखाड़ा जो कुश्ती लड़ने कसरत करने के लिए बनाया जाता रहा है

लेकिन क्या बड़े-बड़े अखाड़ों में अपना कौशल दिखाने वाला
कोई अखाड़िया दिखाई देता है इन दिनों आपके शहर में कहीं

आप कहेंगे नहीं, लेकिन आपका कहा झूठ साबित होगा मेरे विचार से
इसलिए कि कुश्ती लड़ने का अखाड़ा न भी दिखाई दे तब भी
मैं रोज़ कुश्ती लड़ रहा हूँ अपने इस कुश्तीबाज़ समय से हतप्रभ

यही कुश्ती ऐतिहासिक कुश्ती बनकर रह गई है मेरे जीवन में
आपके जीवन में शायद जीत लेते हों अपने समय की सारी कुश्तियाँ
परन्तु मैं तो हारता रहा हूँ बार-बार अपने जीवन की कुश्ती सच में

इसलिए कि मैं नया मनुष्य हूँ जिसे बहुत कमज़ोर सिद्ध किया जा चुका है
जिसे बहुत बूढ़ा प्रसिद्ध किया जा चुका है, जो सत्ताधीश हैं, उनके द्वारा
इसलिए कि सारी कुश्तियाँ अब सत्ताधीश ही लड़ते दिखाई देते हैं
अगर आप राज्य हैं तो केन्द्र से आप केन्द्र हैं तो राज्य से
जिसे नूराकुश्ती मैं कहता हूँ जिसमें यह तय किया जा चुका होता है
कि एक दूसरे को चित नहीं करना है किसी भी क़ीमत पर
चित किसी को करना भी है तो जनता को करना है हमेशा की तरह

सच यही है कि जनता के जीवन की सारी माननीय-सम्माननीय स्थितियाँ
सारे सत्ताधीश ही क़ब्ज़ा किए चले आ रहे हैं सदियों से पूरी तरह अखाड़िया।
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     छलाँग
   

एक घर मिला था टूटा-फूटा रास्ते में
सफ़र से लौटा तो वहाँ पर घर नहीं था
मकान था भव्य आलीशान अद्भुत
और यह छलाँग थी उस उस घर के मालिक की

उसी तरह एक युग का दूसरे युग में प्रवेश
कुछ इस तरह हुआ इस महाद्वीप पर इस चेतन में
जो चमत्कृत कर रहा था विस्मित कर रहा था सबको
कि अभी तो आज में थे हम सब जी रहे
और वही आज कल में बदल चुका इतनी जल्दी

अभी वह मनुष्य बच्चा पैदा हुआ था
अब था गबरू जवान बिलकुल

वह लड़की अभी थी पहाड़ के नीचे
अब थी पहाड़ की चोटी पर खड़ी मुस्करा रही
अपने छोटे गठीले स्तनों के साथ

वैसे ही वह लड़का था बैठा हँस रहा इस नदी के किनारे
उसने मार दी थी छलाँग अचानक नदी की छाती पर
अब था वह उस हरी भूमि पर उस हरी पृथ्वी पर
जो बची रह गई थी नदी के बीच में अनंत मैदान की तरह।
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     अज्ञातवास
   

इस टूटी हुई नाव में रहता हूँ मैं इन दिनों
अकेला जहाँ कोई नहीं है पानियों के सिवा
न कोई मनुष्य न कोई खंडहर न कोई कायरता

सुना था सच्चरित्र और त्यागी तपस्वी ऐसे ही किसी एकांत में
ऐसे ही स्थानों पर तपस्या किया करते थे सबकी दृष्टि से छिपकर
देवता तक किसी पेड़ की ओट से देख भर लिया करते थे
कि तपस्या का फल पाकर वे उनके समकक्ष खड़े नहीं हो जाएँ

लेकिन मेरे इस एकांतवास में न कोई तपस्वी मिला न कोई देवता
न वे स्त्रियाँ मिलीं जो भादों महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी को
व्रत रखती थीं और देवताओं से डरते हुए उन्हीं का शरणगृह चाहती थीं

मैंने अपनी इच्छा से लिया था यह एकांतवास नदी के बीचोबीच
एकांत को स्मरणीय-वरणीय मानकर अपने एकांत को सज्जित करने
जहाँ न आदिम भय हो न आदिम कोई धर्म जो डँसता रहता था

एकांत बस एकांत का जाप करने के बावजूद कोई था ज़रूर कोई था
जो मेरे इस नावघर को मेरे इस एकांतवास को मेरे इस कमलासन को
ढहाना चाहता था मटियामेट करना चाहता था मेरे भीतर जन्म ले रहे
नए शब्द से नए छंद से नए वृक्ष से नए पुरुष से नए विरोध से भयातुर।
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     बाघ
   

बचपन में बाघ झाँकता था
पेड़ों की ओट से झुरमुटों की ओट से
हमारे सपने में हमारी नींद में
कपास वाले दिनों में वापस ले जाने के लिए
जीवन वाले दिनों में घूमा-फिरा ले आने के लिए

लोहा पानी आग आम्रवृक्ष पहाड़ जंगल
सबकुछ लौटाने के लिए तत्पर
सबकुछ हस्तांतरित करने के लिए उत्सुक
हमें ही जैसे रहता था बाघ

मगर बाघ से भयभीत हम छिपते फिरते थे कमरे में
नींद का कमरा सुरक्षित-रक्षित होता था हमारे लिए
बाघ से बचपन वाले दिनों में

जबकि हत्यारे सदियों से झाँकते आ रहे थे हमारी नींद में
हमारे सपने में शातिर बिलकुल बेकल-बेचैन होकर

हमारे पास कोई कमरा नहीं होता था बचने के लिए
हत्यारे से हत्यारे के हथियार से
न बचपन के दिनों में न अब के दिवसों में

बाघ तो बस गुर्राता था शोर मचाता था नींद में हमारी
जंगली हवाओं के साथ अपनी उपस्तिथि दर्ज कराता
ज़्यादा से ज़्यादा चेतावनी देकर चला जाता था नींद से

नींद से उठने पर सारा कुछ यथावत् मिलता था
जो कुछ जैसा नींद में जाते वक़्त छोड़ते थे हम

हम अपने डर के कारण डर जाते थे बाघ से
नींद में और नींद से बाहर बुरी तरह
बाघ के विरुद्ध कई अर्थ-अनर्थ निकालकर

जब ठठ्ठा मार हँसता था हत्यारा अँधेरे में
रोटियों के टुकड़े उछाल हमारी तरफ़
बाघ उस समय अपनी बाघिन से
प्रेम-क्रीड़ा कर रहा होता था
या अपने शावकों को दौड़ना-भागना सिखा रहा होता था

अब आप पूछेंगे प्रश्न करेंगे कि
बाघ से भी बड़ा बर्बर शिकारी हुआ है भला
आप पूछेंगे पूछते ही जाएँगे एकदम कुशल प्रश्नकर्ता बन

मेरा उत्तर होगा मेरा आग्रह होगा कि
बाघ ने कितनी दफ़ा शिकार किया आपका
आप ज़रूर कहेंगे : एक बार भी नहीं

मैं फिर कहूँगा आपको याद दिलाऊँगा
आप तो रोज़ शिकार किए जा रहे होते हैं
किसी अमात्य के द्वारा किसी महामात्य के द्वारा
किसी पुलिसवाले किसी दुकानदार के द्वारा
किसी बैंक मैनेजर किसी सूदख़ोर के द्वारा
किसी स्त्री किसी पुरुष के द्वारा
किसी आतंकी झंडे किसी पार्टी के प्रवक्ता द्वारा
एकदम अभ्यस्त एकदम शिकार कर लिए जाने को तैयार

सच यही था अब भी अंतर्राष्ट्रीय
बाघ का संरक्षण-संवर्द्धन हम करें न करें
उनका संरक्षण-संवर्द्धन ज़रूर करते आ रहे हैं
जो हमारे असल हत्यारे थे जो हमारे असल शिकारी थे
जोकि असल में बर्बर थे दमघोंटू थे

उन्हीं हत्यारे की शैली उन्हीं के विचार
उन्हीं की भोगवृत्ति उन्हीं के भाव उन्हीं के उच्चारण
उन्हीं के अन्तर्विरोध को अपनाते हुए
हम पार करना चाहते थे ध्वनि और प्रकाश और अन्तरिक्ष
अपने-अपने जीवन का सारा कुछ भूल-भुलाकर
इसलिए कि हर हत्यारा भुखमरा होता है आदिकालीन

आप भी तो भुखमरी के शिकार हुए जा रहे हैं इन दिनों

जबकि आपके जीवन में किसी हत्यारे की नहीं
एक बाघ की ज़रूरत थी जो आपकी रक्षा कर सके

आपके जीवन में पत्थर की लकड़ी की लोहे की तांबे-पीतल की ज़रूरत थी
जिनसे आप अपने हत्यारे को अपने बलात्कारी को
अपने शोषक को मार भगा सकें
उनके विरुद्ध पूरी व्याघ्रता से

आपके अन्तःकरण के भय का निवारण वहाँ कहाँ है बंधु
जहाँ आप ढूँढ़ते रहे हैं शताब्दियों से सच में
और मारते रहे हैं बेचारे बाघ को सपने तक में

आप इतने समझदार इतने नेक होने के बाद भी
अपने अन्दर भरे भय का अन्वेषण कहाँ कर पा रहे हैं
उन पुलिसवालों उन सूदख़ोरों उन हत्यारों उन चोरों
उन अमात्य-महामात्य उन जटिल परिस्थितियों
उन दरिद्रताओं उन क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं को
मार भगाने के लिए आज भी अब भी।
                         ( मुंगेर / 21 जुलाई 2015 )




कवि का परिचय


      शहंशाह आलम

जन्म : 15 जुलाई, 1966, मुंगेर, बिहार

शिक्षा : एम. ए. (हिन्दी)

प्रकाशन : 'गर दादी की कोई ख़बर आए', 'अभी शेष है पृथ्वी-राग', 'अच्छे दिनों में ऊंटनियों का कोरस', 'वितान', 'इस समय की पटकथा' पांच कविता-संग्रह प्रकाशित। सभी संग्रह चर्चित। 'गर दादी की कोई ख़बर आए' कविता-संग्रह बिहार सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा पुरस्कृत। 'मैंने साधा बाघ को' कविता-संग्रह शीघ्र प्रकाश्य। 'बारिश मेरी खिड़की है' बारिश विषयक कविताओं का चयन-संपादन। 'स्वर-एकादश' कविता-संकलन में कविताएं संकलित। 'वितान' (कविता-संग्रह) पर पंजाबी विश्वविद्यालय की छात्रा जसलीन कौर द्वारा शोध-कार्य।
हिन्दी की सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित। बातचीत, आलेख, अनुवाद, लघुकथा, चित्रांकन, समीक्षा भी प्रकाशित।

पुरस्कार/सम्मान : बिहार सरकार का राजभाषा विभाग, राष्ट्रभाषा परिषद पुरस्कार तथा बिहार प्रगतिशील लेखक संघ का प्रतिष्ठित पुरस्कार 'कवि कन्हैया स्मृति सम्मान' के अलावे दर्जन भर से अधिक महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान मिले हैं।

संप्रति, बिहार विधान परिषद् के प्रकाशन विभाग में सहायक हिन्दी प्रकाशन।

संपर्क : हुसैन कॉलोनी, नोहसा बाग़ीचा, नोहसा रोड, पेट्रोल पाइप लेन के नज़दीक, फुलवारीशरीफ़, पटना-801505, बिहार।

मोबाइल :  09835417537

ई-मेल : shahanshahalam01@gmail.com





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