मंगलवार, 21 जून 2016

माँ पर केंद्रित सुभाष रूपेला की कुछ कविताएं।

सुभाष रूपेला
माँ शब्द जितना पवित्र एवं व्यापक है उतना ही अनमोल भी। एक माँ अपने बच्चों की खुशी के लिए क्या-क्या नहीं करती? हां, ये अलग बात है कि समय के साथ माँ के रहन-सहन में बदलाव आया है लेकिन इससे माँ के महत्व में कहीं कोई कमी नहीं आ जाती। आज पढते हैं माँ पर केंद्रित सुभाष रूपेला की कुछ कविताएं।

माँ
है होती नसीब माँ से दुनिया,
बिन माँ कोई जग में आया कहां?
पला कहां, जिया कहां?
इंसान तो क्या, भगवान भी,
क्या माँ की गोद में नहीं पला?
कौशल्या देवकी और यशोदा को
राम और कृष्ऩ क्यों भूलें भला?
त्याग नींद अपनी, लाल को वो सुलाती,
दुख की धूप को वो, ममता-छाया से हरती,
हरि तो जग में हैं दिखते किसको?
माँ तो मिलती है हर किसी को.
ऑक्सीजन है जीवन में माँ,
सूरज है अंधेरे में माँ,
जल है प्यास में माँ,
सहारा है संकट में माँ,
बहार है खिजां में मां,
है हँसती हुई हस्ती माँ.
लाल की दौलत-ए-जन्नत है माँ.
सबकी कामना यही है माँ,
कुछ भी बदले इस जहां में,
बदले न कभी प्यारी न्यारी माँ,
मदर डे क्या, हर दिन ही,
बेटा न भूले कभी माँ.

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क्यों रहे माँ बेचैन
करुऩा बन उमड़ पड़ी ममता उस माँ की,
सोते-जागते दिखने लगी, सूरत अपने लाल की.
पूछती फिरती नुस्खे प्रगति के, है कौन-सी गली वो है न भटकी?
रटती थी लाल का नाम यों, जपती हो मानो राम राम,
मन्नत दुआ सब करती, चाहे हो सुबह या हो फिर शाम.
तीर्थ-तीर्थ वो जाती, पीर बाबा सब वो मानती,
झाड़-फूँक सब वो करवाती, बाँवरी-सी सब कहीं फिरती.
फिरकी-सी थी वो फिरती, थकती नहीं, वस रहती सदा चलती.
नंबर वन बना बेटे को रहेगी, उसकी साँस है जब तक चलती.
चिंता के पानी में चीनी-सी थी वो घुलती,
धुन देख उसकी लोग समझते उसे सनकी.
आते-आते रैंक रह गया,
आई. आई. टी. का चांस रह गया,
जाते जाते प्राऩ बच गया,
दिमाग लेकिन गुम हो गया.
जीने का चैन उड़ गया,
मुर्दे-सा जिस्म हो गया.
आज भी दिखती वो माता,
कलेजा मुँह को आ जाता.
खुद की लगन से आता है रैंक, खोलो क्वालिटी टाइम बैंक
झाड़े से है सुधरा कभी, किसी के दिमाग का टैंक?
ऐसी सनक न किसी को चढ़ाए भगवान!
पास हो जाए लाल, बस इतना रहे अरमान.

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माँ का दर्द
माँ तो लुटा देती है सब,
पर बेटा लौटाता है कब?
“इससे तो बेहतर है बैंक, हे नाथ,
लौटाता है मूलधन ब्याज के साथ।“
श्रीमती की आपत्ति
लाखों कमाती हूँ,
गरीब श्रीमान के हाथ थमाती हूं,
उनके रिश्तेदार फिर भी मुझे भार ही समझते हैं –
तभी तो मुझे श्रीमती गरीब चंद नहीं, उनकी भार्या ही कहते हैं।
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मस्त लापरवाह माँ
गोलगप्पे खाती रही, गप्पें लगाती रही;
सखियों संग मस्त सदा, सुध घर की जाती रही।
किट्टी में जाती रही, क्लबों में छाती रही;
मॉल में डोलती रही, बच्चों ने ये सब सही।
बड़ा बेटा फ़ेल हुआ, रात घर से भाग गया;
चिंता क्या उसकी करे, धब्बा था जो धुल गया।
एक दर्पऩ टूट गया, रोशनी वो लूट गया;
आँखों में था वो लगा, मँझला नाबीना हुआ।
गली में ठग आ गया, छोटे को उठा ले गया;
माँ को थी फुरसत कहां? आज़ादी वो दे गया।
रग रग में ड्रग घुस गई, पुड़िया से गुड़िया गई;
मस्ती का नशा माँ पे, अपने में वो खोती गई।
ध्यान से जो न पालती, औलाद क्यों वो जनती?
लापरवाह माँ होती, बच्चे रुल जाते तभी।
बच्चे तो फूल-से हैं, माली-सी माँ सीँचती;
घर की फुलवारी सदा, रखवाली से खिलती।
बच्चों की कीमन पे, ऐश करना न तुम कभी;
गोदी के तारे हैं ये, हीरे जवाहर सभी।
मोमबत्ती-सी माँ हो, करुऩा को पिघलती हो;
रोशनी को जलती हो, लाल को दुलारती हो!
भगवान मेहर करना, हर घर पे नज़र रखना;
बच्चों में खोई रहे, ममता-सी माँ भेजना!!!
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