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शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

सुशील कुमार की कविता सुनना केवल तुम

भागमभाग की इस जिंदगी में चारों ओर सिर्फ शोर ही शोर सुनाई पड़ती है. शोर चाहे वो गुस्से में चिल्लाते इंसान की हो, या फिर अपनी तेज गति से दूरी की जवानी लेती गाड़ी की. लेकिन हैरत है कि इंसान समस्यओं से जूझने की बजाय उन तेज आवाजों में ही शांति की तलाश करने लगता है. जबकि वह जितने तेज आवाज का आदि होता जा रहा है वहां सुनाई नहीं पड़ती है तो खुद की आवाज, अपनों की आवाज, रिश्ते और मानवता की आवाज. और ऐसे में याद आती है कवि सुशील कुमार की कविता सुनना केवल तुम. आप खुद देखे इस कविता को.

सुशील कुमार 


सुनना केवल तुम


सुनना केवल तुम
वह आवाज़
जो बज रही है
इस तन-तंबूरे में
स्वाँस के नगाड़े पर
प्रतिपल दिनरात
वहाँ लय भी है,
और ताल भी,..तो
जरुर वहाँ नृत्य भी
होगा और दृश्य भी

ओह, कितना शोर है
सब-ओर
कितने कनफोड़ स्वर हैं
आवाज़ की इस दुनिया में
और कितनी बेआवाज़
हो रही है
अपनी ही आवाज़ यहाँ !

कहीं चीखें सुन रहा हूँ,
कहीं क्रंदन
मशीनों के बीच घूमता हुआ
खुद एक मशीन हो गया हूँ
भीड़ का तमाशाई बन रहा कहीं
तो कभी तमाशबीन हो गया हूँ !

कम करो कोई बाहर की
इन कर्कश-बेसूरी आवाज़ों को...
लौट आने दो मुझे अपने घर
सुनने दो आज
वह अनहद नाद
जन्म से ही मेरे भीतर
जो बज रहा है
मेरे सुने जाने की प्रतीक्षा में

उसकी लय और ताल पर
मुझे झूमने दो
मुझे थोड़ी देर यूँ ही
स्वांस-हिंडोला में
झूलने दो।


संपर्क :-
सुशील कुमार
हंस निवास / कालीमंडा
पुराना दुमका / दुमका / झारखंड 814101

ईमेल- sk.dumka@gmail.com

फोन न / मो. न. . 0657 2650744 / 09431310216  / 09006740311

सोमवार, 13 जून 2016

'जनपद झूठ नहीं बोलता' : नए शब्द, नए स्वर, नए मुहावरे, नए अचरज की कविताएँ

सुशील कुमार समकालीन हिंदी कविता के उन कवियों में हैं, जिनकी कविताओं का स्वर, जिनकी कविताओं का आवेग और स्वाद अपनी एक अलहदा पहचान रखते हैं। यह सच है, सुशील कुमार के कविता-संग्रह 'जनपद झूठ नहीं बोलता' की कविताओं में उनके अनुभव, उनके विचार, उनके अवसाद, उनके जनसंघर्ष एकदम अंतरंग हो-होकर कविता के विशाल द्वार में प्रवेश पाते हैं। आज पढते हैं सुशील कुमार की कविता संग्रह "जनपद झूठ नहीं बोलता" की पुस्तक-समीक्षा, समीक्षक शहंशाह आलम के शब्दों में, जो कि लहक पत्रिका के ताजा अंक में भी प्रकाशित हुई है।साभार।


'जनपद झूठ नहीं बोलता' : नए शब्द, नए स्वर, नए मुहावरे, नए अचरज की कविताएँ
● शहंशाह आलम

मैं अकसर सोचता हूँ कि जिस तरह मनुष्य के पास एक जीवन होता है, क्या वैसा ही जीवन कविता के पास भी है? अगर ऐसा नहीं है तो कोई कविता मनुष्य की भावनाओं को कैसे व्यक्त कर लेती है। इसका उत्तर पाने के लिए मुझे कोई कठिनाई नहीं उठानी पड़ी। एक कवि होने के नाते मैं इतना तो समझ ही सकता हूँ कि किसी कवि में जब जीवन है, तो उसकी कविताओं में जीवन की झलक दिखाई देगी ही देगी। सुशील कुमार वैसे ही कवियों में हैं, जिनकी कविताओं में मनुष्य का जीवन पूरी तरह मुखर होता दिखाई देता है, बिलकुल जनोन्मुख। सुशील कुमार के कविता-संग्रह 'जनपद झूठ नहीं बोलता' की कविताएँ मनुष्य-जीवन के लोक और मनुष्य-जीवन के जनपद का ही वृत्तांत हैं। इसलिए कि सुशील कुमार का लोक और जनपद जनाकीर्ण है, मनुष्यों से भरा हुआ है, प्रकृति को इस जनाश्रय में समेटता हुआ :
     दिन समेटकर उतरता है थकामाँदा बूढ़ा सूरज
     पहाड़ के पीछे
     अपने वन-प्रांतर की निःशेष होती गाथाएँ लिए
     उसकी तमतमाई आँखों की ललाई पसर आती है
     जंगलों से गुम हो रही हरियाली तक
     दम तोड़ रही नदियों में फैल रहे रेतीले दयार तक
     विलुप्त हो रहे पंछियों के इक्के-दुक्के नीड़ों तक('पहाड़िया'/पृ.15)।

सुशील कुमार समकालीन हिंदी कविता के उन कवियों में हैं, जिनकी कविताओं का स्वर, जिनकी कविताओं का आवेग और स्वाद अपनी एक अलहदा पहचान रखते हैं। यह सच है, सुशील कुमार के कविता-संग्रह 'जनपद झूठ नहीं बोलता' की कविताओं में उनके अनुभव, उनके विचार, उनके अवसाद, उनके जनसंघर्ष एकदम अंतरंग हो-होकर कविता के विशाल द्वार में प्रवेश पाते हैं। इस तरह उनकी कविताओं का पाठक भी उनके एकदम क़रीब महसूस करता है। इसलिए भी कि सुशील कुमार की कविताओं में फैशन की तरह कोई चीज़ न आकर किसी आंदोलन की तरह आती है। यह सुखद है। वरना आज अधिकतर कवि के एजेंडे में मनुष्य-जीवन न होकर उनका अपना निजी जीवन होता है, जिसमें किसी परिवर्तन की कामना नहीं होती, बल्कि वे बार-बार अपने जीवन के काले-घने अँधेरे में संशयग्रस्त लौटते दिखाई देते हैं। इसलिए कि ऐसे कवियों का न तो विचार स्पष्ट होता है, न प्रतिबद्धता, न जनपक्षधरता। और न यहाँ जन-आदेश का सम्मान ही दिखाई देता है। सुशील कुमार उन कवियों में हैं, जिनका विचार, जिनकी प्रतिबद्धता और जन-आदेश का सम्मान किसी आईने की तरह साफ़ और सूक्ष्म दिखाई पड़ता है :
     कितनी भोली
     और अनजान हो तुम फूलमनी
     इस धरती पर कि
     वायुयान को
     एक चील समझती हो
     और रेलगाड़ी पर
     कभी बैठने के सपने देखती हो('फूलमनी'/पृ. 26)।

इन दिनों अच्छे दिनों का हो-हल्ला और चिल्ल-पों इस तरह फैलाया गया है कि जो अभावग्रस्त जीवन जी रहे हैं, उन्हें हाशिए पर डाल दिया गया है। ऐसे लोगों के अच्छे जीवन के बारे में न सोचकर आज बुलेट ट्रेन चलाने का सपना दिखाया जा रहा है। जबकि सच्चाई यही है कि फूलमनी जैसी कितनी ही ज़िंदगियाँ अपने भीतर कोई एक अच्छा दिन तक नहीं पा सकी हैं, उस अच्छे दिन के लिए आज भी तरस रही हैं। यह भी कठोर सत्य है कि न इनकी आधारभूत संरचना में कोई परिवर्तन दिखाई देता है, न संवेदनागत कोई वैशिष्ट्य ही दिखाई देता है :
     जब पूरा गाँव निढाल होता है नींद में
     बहुत भोर में
     मुर्ग़ा-बाँग से पहले ही
     उठ-पुठ कर
     जंगल चल देती हो
     महुआ बिनती हो
     लकड़ी चुनती हो
     घास का बोझा बनाती हो
     मन ही मन मगन हो
     कोई प्रेमगीत गुनगुनाती हो
     और वंदना-माधे परब के आने की
     प्रतीक्षा करती हो(वही/पृ. 27-28)।
शहंशाह आलम

सुशील कुमार जिस लोक, जिस जनपद की बातें अपनी कविताओं में पूरी तरह मुखर कहते-रचते रहे हैं, उनका वह लोक, वह जनपद पूरी तरह देखा-भाला हुआ है। उनकी सारी कविताएँ इस बात की गवाही देती हैं। चर्चित कवि दिनेश कुशवाह उनकी कविताओं के बहाने सही ही कहते हैं, 'सुशील कुमार ने अपने जनपद के पहाड़, नदी, पेड़, जंगल, पशु, फूल, फल, विरह, संयोग, संघर्ष, आदिवासी, उनकी अंत:क्रियाएँ, परंपराएँ और अपरिमित दुःख को इस तरह आत्मसात् किया और रचा है, जैसे उनकी कविताएँ भीतर ही भीतर सुलगती अँगीठी का निर्धूम ताप हों।' सुशील कुमार की 'बाँसलोय में बहत्तर ऋतु', 'पहाड़ी नदी के बारे में', 'कब लौटोगे सुकल परदेस से', 'बंदगाँव की घाटियाँ', 'महुआ फूलने के मौसम में', 'असम से लौटकर हरिया सोरेन', 'ढीली पड़ती मुट्ठियाँ', 'दियारा में रेत होती ज़िन्दगी', 'यहाँ कभी बसंत नहीं आता', 'तुम्हारे स्त्री होने का मतलब', 'कोसी- शोक में डूबी एक नदी का नाम है', 'पेड़ प्रथम नागरिक हैं पृथ्वी पर', 'वे शहनाई के कबीर थे', 'माँ' आदि कविताएँ आपको कविता-काल के बहुत सारे रंग दिखाती हैं, परन्तु इन रंगों में आदिवासी जीवन का जो रंग दृश्यपटल पर उभर कर सामने आता है, वह रंग एकदम टटका है। वही एक रंग है जिसमें मानव-मुक्ति की सच्ची कामना छिपी हुई है। वही एक रंग है जिसमें हमारे समय का नवीन उन्मेष दिखाई देता है। यही वह रंग भी है, जो कवि को सार्थक संगति तक पहुँचाता है।
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जनपद झूठ नहीं बोलता(कविता-संग्रह)/कवि : सुशील कुमार/प्रकाशक : हिन्द-युग्म, 1, जिया सराय, हौज़ ख़ास, नई दिल्ली-110016/मूल्य : 250₹/कवि-संपर्क : 09006740311/आवरण : गौतम साव, वाज़दा ख़ान।
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संपर्क:-

~शहंशाह आलम, प्रकाशन विभाग, बिहार विधान परिषद्, पटना-800015/मोबाइल : 09835417537


   











शुक्रवार, 10 जून 2016

सुशील कुमार की ‘जनपद झूठ नहीं बोलता’ की कुछ कविताएं

जिंदगी आसान नहीं होती और पहाड़ों में तो बिल्कुल ही नहीं. भले ही कुछ समय के लिए उन पहाड़ों के बीच मौज –मस्ती कर वापस आ जाते हों लेकिन उन पहाड़ों के बीच की जीवनशैली को शायद ही कभी हम देख पाते हैं. और चूक जाते हैं एक पूरी संस्कृति से. जबकि कवि सुशील कुमार ने वर्षों से दुमका में रहते हुए पहाड़ों की जिंदगी को करीब से महसूसा है, उसकी मिट्टी से खुद को जोड़ा है और उसे शब्दबद्ध कर अपने कविता संग्रह “जनपद झूठ नहीं बोलता” में प्रस्तुत किया है. प्रस्तुत है संग्रह की पहाड़ों पर आधारित कुछ कविताएं.




    पहाड़िया



( साहेबगंज-पाकुड़ की पहाड़ी जिन्दगी से रु-ब-रु होकर )

दिन समेटकर उतरता है थका-माँदा बूढ़ा सूरज
पहाड़ के पीछे
अपने साथ वन-प्रांतरों की निःशेष होती गाथाएँ लिये
तमतमायी उसकी आँखों की ललाई पसर आती है
जंगलों से गुम हो रही हरियाली तक
दम तोड़ रही नदियों में फैल रहे रेतीले दयार तक
विलुप्त हो रहे पंछियों के इक्के-दुक्के नीड़ों तक

उँची-नीची पगडंडियों पर कुलेलती
लौटती है घर पहाड़न
टोकनी-भर महुआ
दिन की थकान
होठों पर वीरानियों से सनी कोई विदागीत लिये

उबड़-खाबड़ जंगल-झाड़ के रस्ते लौट आते हैं
बैल-बकरी, सुअर, कुत्ते, गायें भी दालान में
साँझ की उबासी लिये
साथ लौटता है पहाड़िया बगाल
निठल्ला अपने सिर पर ढेर-सा आसमान
और झोलीभर सपने लिये

-2-
घिर जाती है साँझ और गहरी
अंधरे के दस्तक के साथ ही
घर-ओसारे में उतर आते हैं महाजन
खटिया पर बैठ देर तक
गोल-गोल बतियाते हैं पहाड़िया से
हँसी-ठिठोली करते घूरते हैं पहाड़न को
फिर खोलते हैं भूतैल खाते-बहियाँ अपनी
और भुखमरी भरे जेठ में लिये गये उधार पर
बेतहाशा बढ़ रहे सूद का हिसाब पढ़ते हैं
दूध, महुआ, धान, बरबट्टी और बूटियों के दाम से
लेकर पिछली जंगल-कटनी तक की मजूरी घटाकर भी
कई माल-मवेशी बेच-बीकन कर भी
जब उरिन नहीं हो पाता पहाड़िया तो
गिरवी रख लते हैं महाजन
पहाड़न के चांदी के जेवर, हंसुली, कर्णफूल, बाले वगैरह..
तेज उसाँसें भरता अपने कलेजे में पहाड़िया
टिका देता है अपना माथा महाजन के पैर पर
तब महाजन देते हैं भरोसा
कोसते हैं निर्मोही समय को
वनदेवता से करते हैं कोप बरजने की दिखावटी प्रार्थनाएँ
अपनेपन का कराते हैं बोध पहाड़िया को
गलबहियाँ डाल महाजन साथ मिलकर दुःख बांटने का
और संग-संग पीते हैं 'हंडिया-दारू' भी
भात के हंडियों में सीझने तक,

फिर देते हैं, एक जरूरी सुझाव जल्दी उरिन होने का,
जंगल कटाई का -
फफक-फफककर असहमति में सिर हिलाता रो पड़ता है पहाड़िया
पहाड़न गुस्से से लाल हो बिफरती है
गरियाती है निगोड़े महाजन को
करमजले अपने मरद को भी
पर बेबस पहाड़िया
निकल पड़ता है माँझी-थान में खायी कसमें तोड़
हाथ में टांगी, आरा लिये निविड़ रात्रि में
भोजन-भात कर, गिदरा-गिदरी को सोता छोड़
पहाड़न से झगड़ कर
महाजन के साथ बीहड़ जंगल

-3-
रातभर दुःख में कसमसाती
अपने भीतर सपने टूटते देखती है पहाड़न
रात गिनती
मन की परत-परत गाँठें खोल पढती है पहाड़न
नशे में धुत्त पहाड़िया रातभर
पेड़ों के सीने पर चलाता है आरा, टांगी
और काटता रहता है अपने दुःखों के जंगल
बनमुरगे की कुट्टियाँ नोंचते
रहरह कर दारू, बीड़ी पीते
जगे रहते हैं संग-संग धींगड़े महाजन भी रातभर

-4-
शीशम, सागवान, साल की सिल्लियाँ लादे
जंगल से तराई की ओर बैलगाड़ियाँ पार कराते महाजन,
बिन दातुन-पानी किये, बासी भात और अपनी गिदरे
पीठ पर गठियाये महुआ बीनने पहाड़न,
मवेशियों को हाँक लगाता बगाल पहाड़िया
कब के उतर चुके होते हैं पहाड़ी ढलान !
बहुत सुबह, सूरज के उठान के काफी पेश्तर ही !!

खाली रहती है बहुधा पहाड़ी बस्तियाँ दिनभर
बचे रहते हैं पहाड़ पर सिर्फ़
सुनसान माँझी-थान में पहाड़ अगोरते वनदेवता
उधर पूरब में जलता-भुनता सूरज
और गेहों में लाचार कई वृद्ध-वृद्धाएँ ।

 बाँसलोय में बहत्तर ऋतु
(पाकुड़ और दुमका को विभक्त करती संथाल परगना की एक पहाड़ी नदी की व्यथा – कथा)

 एक -

संथाल परगना के जंगल
पहाड़ और बियावानों में
भटकती हुई
एक रजस्वला नदी हो तुम
नाम तुम्हारा बाँसलोय है
बाँस के झाड़-जंगलों से निकली हो
रेत ही रेत है तुम्हारे गर्भ में
काईदार शैलों से सजी हो

तुम्हारे उरोज पर
रितु किलकती है केवल
बरसात में
तब अपने कुल्हे थिरकाती
पहाड़ी बालाओं के संग
गीत गाती
अहरह बहती हो

पहाड़ी बच्चे तुम्हारी गोद में खेलते,
टहनियों की ढेर चुनते हैं तब,
भोजन –भात पकता है
पहाड़ियों के गेहों में
उनके उपलों से

कलकल निनाद का निमंत्रण पा
दक्षिणी छोर से
क्रीड़ा करती हुई
मछलियाँ भी आ जाती हैं
और पत्थरों की चोट से
अधमरी हो
रेत के खोहों में समा जाती हैं
या फिर, मछुआरों के जाल में फँस जाती हैं

इतनी चंचला, आवेगमयी होती हो
आषाढ़ में तुम कि,
कोई नौकायन नहीं कर सकता

ठूँठ जंगलों से रूठकर
कठकरेज मेघमालाएँ पहाड़ से उतरकर
फिर जाने कहाँ बिला जाती हैं
और तुम अबला सी मंद पड़ जाती हो
क्षितिज तक गमन करती पतली
रेत की वक्र रेखा भर रह जाती हो
तब लगता है तुम्हारे तट पर
ट्रक – ट्रैक्टरों का मेला
आदिवासी औरतें अपने स्वेद –कणों से
सींचती हुई तुम्हें
कठौती सिर पर लिये
उमस में बालू ढोती जाती हैं

सूर्य की तपिश में हो जाती हो
तवे की तरह गर्म
उनके पैर सीझ जाते हैं
तुम्हारे अंचल में चलचलकर तब

 -2-

नदी माँ, तुम्हारी ममता में
बहत्तर ऋतुओं को जिया है मैंने

देखता हूँ तिल-तिल जलती हो
दिन-दिन सूखती हो
क्षण–क्षण कुढ़ती हो
मन ही मन कोसती हो जंगल के सौदागरों को
रेत के घूँघट में मुँह ढाँप
रात–रात भर रोती हो

तुम्हारी जिन्दगी दुःख का पहाड़ है
सचमुच पहाड़ की छंदानुगामिनी हो तुम !
बूढ़े पहाड़ की तरह तुम्हें भी
शहर लीलता है हर साल थोड़ा-थोड़ा
इसीलिए इतनी बीहड़, उदास, कृशा हो तुम !

तुम्हारा जन्म
किसी हिमालय की गंगोत्री में नहीं,
पहाड़ी ढलानों में अनचाहे उग आये
बाँस की झुरमुटों से हुआ है
मुझे डर है,
आदिम सभ्यता की आखिरी निशानी
जोग रही हो
पर बचा नहीं पा रही अपनी अस्मिता

सारे पत्ते गिराकर जंगल नंगे हो रहे हैं
पेड़ दम तोड़ रहे हैं
पंछी नीड़ छोड़ रहे हैं
नित तुम्हारा सर्वांग हरण हो रहा है
और मानवीय पशुता के बीच
गहरी उसांसें भरती नित
मैली हो रही हो तुम

मुझे दुःख है ,
अपनी छायाओं में फली-फूली
आदिम सभ्यता के मनोहर चित्र
रेत के वबंडरों से पाटती हुई
लोक-कथाओं में
तुम स्वयं एक दिन
किवदन्ती बनकर दर्ज हो जाओगी।

    मैं पहाड़ की बेटी

झरना ......
ओ झर... ना ! 
कल-कल तेरे जल में
खूब नहाऊँगी 

नदी माँ ........  
रेत के घूँघट में 
मुँह ढाँप तू मत रोना 
तेरी बेटी हूँ
तू बह माँ ! 
तू बह ना !!...

जल से तेरे 
आचमन करूँगी । 
लाल, पीले, बैगनी 
अपनी आँचल में फूल 
खिला माँ ! 
खिला ना ......

खोपा में खोसूँगी, 
करधनी बनाऊँगी, 
माँग सजाऊँगी, 
ओ पतझड़ के 
निदर्य बयार ....!
वन-उपवन के पत्ते   
सब मत गिरा, 
हरित –लोहित वर्ण से
घर-ओसारे में
भित्ति-चित्र बनाऊँगी  



ओ बसंत, लौट आ......
लौट आ ना...!
माँदल की थाप पर 
पहाड़नों के दल बना 
खूब नाचूँगी, ठुमकूँगी, 
परब मनाऊँगी। 


वनवासी ...
ओ वनवासी ...
बेल, बूटे 
शीशम  महुआ
केंदू-पत्ते
बुरी नजर से बचा......,
वह अपनी थाती है !
खोह हैं
हे पहाड़ जोगते वनदेवता !
बापू की तरह 
बूढ़ा पहाड़ 
बहुत बीमार है 
बड़े –बड़े घाव हैं
बड़े-बड़े

उसकी देह में

उसे ढाढ़स देना, 
मेघ देना, पानी देना, 
खेत में अन्न उगाना, 
जंगल बचाना
वनदेवता जंगल बचाना 
दिक्कुओं के पाप
मत सहना 

हे वनदेवी 
पुकार मेरी सुनना!
महाजन से मेरी 
देह बचाना 
नदी-माँ की लाज बचाना ! 
पहाड़ की बेटी हूँ,
मेरी आर्त-विनती  
सुन माँ ! 
... सुन ना......


   गुम्मा पहाड़ पर बसंत

पूरी आत्मीयता से खड़े हैं
गुम्मा पहाड़
और तराई में
कोस-भर फैली
जगह-जगह डबरे में
जल भरी बाँसलोय नदी
वक्र गड़ारी-सी
फागुन के लौट आने की इच्छा से भरी हुई
अपने भीतर तरुण भाव लिये
किसी उत्सव के आगमन की प्रतीक्षा में

बँसवाड़ी में
गुल्म-लताएँ-झाड़ियाँ हिलग रहे-हुलस रहे
पूरवैया के मादक झोंकों से

पलाश-पत्र सब झड़ गये
शिखाओं पर उनके लाल फूल दहक रहे
करंज-कचनार-शाल सब
दुधिया धवल पुष्प-गुच्छों से लद रहे
डहु, अमलतास और कुसुम के पीले फूल
तरी से शिखर तक पहाड़ पर
लाल-सफ़ेद खिले फूलों के बीच
पूरे अंचल में खिल रहे

पूरा पहाड़ जाग रहा धीरे-धीरे
नये रंग और उमंग में
फागुन की आहट सुन
बसंतोत्सव की तैयारी में

जंगल में पंछी गा रहे
ढेचुआ कर रहा ढेचुँ-चुँ, ढेचुँ-चु
फिकरो फिक-क फिक-क
पेडुकी करे घु-घु-चुघु-घु-चु
तीतर सुना रहा खु-टी-च-र, खु-टी-च-र
कोयल कूक रही बेतरह
पियो बुला रहा पि-उ, पि-उ
हरिला फुनगी पर फल कुतर-कुतर खा रहा

बीते मौसम की दुस्सह यादें भूल
पहाड़ी बस्तियाँ
माँदल की थाप और नगाड़े की आवाज से
गूँज रही , लोग गा रहे, थिरक रहे
बाँसूरी बजा रहे
फसल-गीत गा रहे-ठुमक रहे
अपने पैरों में नेवर बाँध
महुआ-रस के खुमारी में
खलिहान को भरा-पूरा देख
फूलों और फसलों का पर्व बाहा-टुसू मना रहे

वनदेवता पहाड़ी थानों में
फूल-पत्र और नैवेद्य स्वीकार रहे
जंगल और पहाड़ के दु:ख
निस्तार के वास्ते

पर बसंत के प्रस्थान के बाद
जेठ के आते-आते
वनदेवता मौन हो जाते हैं
पूजा-स्थलों पर आवाजाही न्यून हो जाती है
पहाड़ी नदी-नाले-झरने निर्जल हो जाते हैं
पहाड़ के अन्न ओरा जाते है
पहाड़ी बस्तियाँ खाली हो जाती हैं
पहाड़ी युवक और यौवनाएँ
कूच कर जाते हैं पहाड़ को छोड़
शहरों की ओर काम की तलाश में
अन्न-जल और जीवन की टोह में

देखता आया हूँ हर बार
गुम्मा पहाड़ के इलाके में
सन्नाटा-सा पसरा होता है
ऋतु के बाकी दिन ,
नजर आते  हैं तब यहाँ
बचे हुए पहाड़ी बच्चे
और लाचार वृद्धाएँ ही सिर्फ़
अपनी पहाड़-सा जिंदगी ढोते हुए |    





    पहाड़ पर भोर


सुबह घर से निकला तो
पगडंडियों के बाजू
पलाश के फूलों पर चटक देखी
चमकती ओस की मोतियों पर आब
लाल-गुच्छ फूलों के नोंक से लिपटी
बूँदों को टघरते
पहाड़ की देह पर 
टप-टप गिरते-सूखते,
सूरज की मद्धिम धूप में
सुबह को अलसाते
दिन को पहाड़ पर
धीरे-धीरे उठते और अनमने जंगल-झाड़ों को
को झपकियाँ लगाते, हिलते-डुलते देखा

आदिवासी कलूटों की झोंपड़पट्टियों से
निकलते बच्चे अपना बस्ता बगोचे
पाँच मील पर स्कूल की पहली घंटी
पकड़ने भागते हुए तो कोई
हाथ में पतली छोकनी लिये
अपनी गैया-बकरियाँ हँकाते

पहाड़ी छोरों के चेहरों पर
तंग होती मुस्कुराहटों के बीच
अधखिले बचपन के उड़ते रंग  ,
उसकी मंद पड़ती चहक देखी

सड़क पर हल्की धूप में गरमाते
सुकोमल बदनों पर
समय की उघरती खराँचे भी देखी

फिर पहाड़ी यौवनाओं के सिर पर
दतुवन-घास का बोझा
हिलते उसके माथ 
सुर्ख होंठों की कँपकपाहटें
खिलते यौवन में गुम होते वन-श्रृंगार
के बीच
उनकी कातर आँखों की भाषा पढ़ी
और तब अपनी आँखें भी
नम हो गयीं

कोसों साइकिलों के आगे-पीछे
लौह-पत्थरों के मन-मन भारी बोझे बाँधे
हाँफते-धकेलते पैदल चल रहे पहाड़ियों
के फटे बिवाईयों के घाव
से बहता मवाद देखा तो
कलेजा मुँह को आ गया और फिर
गुस्सा भी कि ...
पूरे पहाड़ को जब धीरे-धीरे बिला ही
जाना है तो पलाश की चटक
और महुआ की खुमारी
का मतलब क्या है यहाँ ? फिर भी..

उन चेहरों पर अनगिन नरम झुर्रियों में
घर-संसार-पेट की फँसी चिंतायें
खुली आँखों से पढ़ता रहा
और ऊब और तमक़ से
अपने हाथ मलता रहा

फिर...पहाड़ पर लड़ते साँढ़ों को देख
आँखों में काँटे-सी चुभन होने लगी
किशोर चेहरों पर छाँह-सी काली चतें
और खुश्क होंठों पर पड़ती पपड़ियों ने
जगंल के मेरे सँजोये सपनों के रंग सब
बदरंग कर दिये।

आप मानें या न मानें,
इतनी गरमी पड़ रही है
इस भोरउवा पहर में भी
मेरे अंदर
और इस पहाड़ पर भी कि
कि ओस ठहरती ही नहीं कहीं-
न फूल पर न पत्थर पर न जंगल में

हृदय में बजता है सिर्फ़ पहाड़ का बंजर सुनापन
जो टूटता है लौह-पत्थरों से भरी
मालगाड़ियों के घर्घराहटों से

बाहर की उदासी मन को
चीरती हुई धँसी जाती है
भीतर के खोह में और
दु:ख के चौरस
पठार-सा नज़र आता है
पूरा पहाड़ इस भोर में ।


   पहाड़ का दु:ख

पहाड़ की नग्न काया पर
पतझड़ का संगीत
बज रहा है
पहाड़ी लड़कियाँ
कोई विरह-गीत गुनगुना रही हैं
गीत में पहाड़ का दुःख
समा रहा है
लाज से सिकुड़ी नदी
सिसक रही है
पहाड़ी जंगल तोड़ रहे हैं
पहाड़ का मौन
अपने आर्त्तनाद से 


पहाड़ियों की आँखें
और पसर गयी हैं
मुँह और फट गये हैं
पीठ उनके और
उकडूँ हो गये हैं
कंधे और झुक गये हैं


गाड़ी भर-भर पहाड़ी लड़कियाँ
परदेस जा रही हैं
पहाड़ी लड़के भी संग जा रहे हैं
उनके गीतों का कोरस
घाटियों में गूँज रहा है
कूच कर रही है रातभर
जंगलों से लदी गाड़ियाँ
पहाड़ से शहर की ओर


हाँफ रहे हैं दिनभर
खड्ढ-मड्ड पहाड़ी रस्ते
पत्थर और बालू ढोते
बड़े-बड़े डम्फरों के पहियों तले 


क्रशरमशीनों और मालवाहक यानों की
कर्कश घड़घड़ाहटों में
गीतों के स्वर टूटकर
बिखर रहे हैं पहाड़ पर
और जम रहे हैं धीरे-धीरे
धूल के नये, भूरे पहाड़
वीरान हो रहे पहाड़ पर

पहाड़ के हिस्से में इस तरह
नित आ रहे हैं नये
दुःख के पहाड़ |
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