सुशील कुमार समकालीन हिंदी कविता के उन कवियों में हैं, जिनकी कविताओं का स्वर, जिनकी कविताओं का आवेग और स्वाद अपनी एक अलहदा पहचान रखते हैं। यह सच है, सुशील कुमार के कविता-संग्रह 'जनपद झूठ नहीं बोलता' की कविताओं में उनके अनुभव, उनके विचार, उनके अवसाद, उनके जनसंघर्ष एकदम अंतरंग हो-होकर कविता के विशाल द्वार में प्रवेश पाते हैं। आज पढते हैं सुशील कुमार की कविता संग्रह "जनपद झूठ नहीं बोलता" की पुस्तक-समीक्षा, समीक्षक शहंशाह आलम के शब्दों में, जो कि लहक पत्रिका के ताजा अंक में भी प्रकाशित हुई है।साभार।
'जनपद झूठ नहीं बोलता' : नए शब्द, नए स्वर, नए मुहावरे, नए अचरज की कविताएँ
● शहंशाह आलम
मैं अकसर सोचता हूँ कि जिस तरह मनुष्य के पास एक जीवन होता है, क्या वैसा ही जीवन कविता के पास भी है? अगर ऐसा नहीं है तो कोई कविता मनुष्य की भावनाओं को कैसे व्यक्त कर लेती है। इसका उत्तर पाने के लिए मुझे कोई कठिनाई नहीं उठानी पड़ी। एक कवि होने के नाते मैं इतना तो समझ ही सकता हूँ कि किसी कवि में जब जीवन है, तो उसकी कविताओं में जीवन की झलक दिखाई देगी ही देगी। सुशील कुमार वैसे ही कवियों में हैं, जिनकी कविताओं में मनुष्य का जीवन पूरी तरह मुखर होता दिखाई देता है, बिलकुल जनोन्मुख। सुशील कुमार के कविता-संग्रह 'जनपद झूठ नहीं बोलता' की कविताएँ मनुष्य-जीवन के लोक और मनुष्य-जीवन के जनपद का ही वृत्तांत हैं। इसलिए कि सुशील कुमार का लोक और जनपद जनाकीर्ण है, मनुष्यों से भरा हुआ है, प्रकृति को इस जनाश्रय में समेटता हुआ :
दिन समेटकर उतरता है थकामाँदा बूढ़ा सूरज
पहाड़ के पीछे
अपने वन-प्रांतर की निःशेष होती गाथाएँ लिए
उसकी तमतमाई आँखों की ललाई पसर आती है
जंगलों से गुम हो रही हरियाली तक
दम तोड़ रही नदियों में फैल रहे रेतीले दयार तक
विलुप्त हो रहे पंछियों के इक्के-दुक्के नीड़ों तक('पहाड़िया'/पृ.15)।
सुशील कुमार समकालीन हिंदी कविता के उन कवियों में हैं, जिनकी कविताओं का स्वर, जिनकी कविताओं का आवेग और स्वाद अपनी एक अलहदा पहचान रखते हैं। यह सच है, सुशील कुमार के कविता-संग्रह 'जनपद झूठ नहीं बोलता' की कविताओं में उनके अनुभव, उनके विचार, उनके अवसाद, उनके जनसंघर्ष एकदम अंतरंग हो-होकर कविता के विशाल द्वार में प्रवेश पाते हैं। इस तरह उनकी कविताओं का पाठक भी उनके एकदम क़रीब महसूस करता है। इसलिए भी कि सुशील कुमार की कविताओं में फैशन की तरह कोई चीज़ न आकर किसी आंदोलन की तरह आती है। यह सुखद है। वरना आज अधिकतर कवि के एजेंडे में मनुष्य-जीवन न होकर उनका अपना निजी जीवन होता है, जिसमें किसी परिवर्तन की कामना नहीं होती, बल्कि वे बार-बार अपने जीवन के काले-घने अँधेरे में संशयग्रस्त लौटते दिखाई देते हैं। इसलिए कि ऐसे कवियों का न तो विचार स्पष्ट होता है, न प्रतिबद्धता, न जनपक्षधरता। और न यहाँ जन-आदेश का सम्मान ही दिखाई देता है। सुशील कुमार उन कवियों में हैं, जिनका विचार, जिनकी प्रतिबद्धता और जन-आदेश का सम्मान किसी आईने की तरह साफ़ और सूक्ष्म दिखाई पड़ता है :
कितनी भोली
और अनजान हो तुम फूलमनी
इस धरती पर कि
वायुयान को
एक चील समझती हो
और रेलगाड़ी पर
कभी बैठने के सपने देखती हो('फूलमनी'/पृ. 26)।
इन दिनों अच्छे दिनों का हो-हल्ला और चिल्ल-पों इस तरह फैलाया गया है कि जो अभावग्रस्त जीवन जी रहे हैं, उन्हें हाशिए पर डाल दिया गया है। ऐसे लोगों के अच्छे जीवन के बारे में न सोचकर आज बुलेट ट्रेन चलाने का सपना दिखाया जा रहा है। जबकि सच्चाई यही है कि फूलमनी जैसी कितनी ही ज़िंदगियाँ अपने भीतर कोई एक अच्छा दिन तक नहीं पा सकी हैं, उस अच्छे दिन के लिए आज भी तरस रही हैं। यह भी कठोर सत्य है कि न इनकी आधारभूत संरचना में कोई परिवर्तन दिखाई देता है, न संवेदनागत कोई वैशिष्ट्य ही दिखाई देता है :
जब पूरा गाँव निढाल होता है नींद में
बहुत भोर में
मुर्ग़ा-बाँग से पहले ही
उठ-पुठ कर
जंगल चल देती हो
महुआ बिनती हो
लकड़ी चुनती हो
घास का बोझा बनाती हो
मन ही मन मगन हो
कोई प्रेमगीत गुनगुनाती हो
और वंदना-माधे परब के आने की
प्रतीक्षा करती हो(वही/पृ. 27-28)।
सुशील कुमार जिस लोक, जिस जनपद की बातें अपनी कविताओं में पूरी तरह मुखर कहते-रचते रहे हैं, उनका वह लोक, वह जनपद पूरी तरह देखा-भाला हुआ है। उनकी सारी कविताएँ इस बात की गवाही देती हैं। चर्चित कवि दिनेश कुशवाह उनकी कविताओं के बहाने सही ही कहते हैं, 'सुशील कुमार ने अपने जनपद के पहाड़, नदी, पेड़, जंगल, पशु, फूल, फल, विरह, संयोग, संघर्ष, आदिवासी, उनकी अंत:क्रियाएँ, परंपराएँ और अपरिमित दुःख को इस तरह आत्मसात् किया और रचा है, जैसे उनकी कविताएँ भीतर ही भीतर सुलगती अँगीठी का निर्धूम ताप हों।' सुशील कुमार की 'बाँसलोय में बहत्तर ऋतु', 'पहाड़ी नदी के बारे में', 'कब लौटोगे सुकल परदेस से', 'बंदगाँव की घाटियाँ', 'महुआ फूलने के मौसम में', 'असम से लौटकर हरिया सोरेन', 'ढीली पड़ती मुट्ठियाँ', 'दियारा में रेत होती ज़िन्दगी', 'यहाँ कभी बसंत नहीं आता', 'तुम्हारे स्त्री होने का मतलब', 'कोसी- शोक में डूबी एक नदी का नाम है', 'पेड़ प्रथम नागरिक हैं पृथ्वी पर', 'वे शहनाई के कबीर थे', 'माँ' आदि कविताएँ आपको कविता-काल के बहुत सारे रंग दिखाती हैं, परन्तु इन रंगों में आदिवासी जीवन का जो रंग दृश्यपटल पर उभर कर सामने आता है, वह रंग एकदम टटका है। वही एक रंग है जिसमें मानव-मुक्ति की सच्ची कामना छिपी हुई है। वही एक रंग है जिसमें हमारे समय का नवीन उन्मेष दिखाई देता है। यही वह रंग भी है, जो कवि को सार्थक संगति तक पहुँचाता है।
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जनपद झूठ नहीं बोलता(कविता-संग्रह)/कवि : सुशील कुमार/प्रकाशक : हिन्द-युग्म, 1, जिया सराय, हौज़ ख़ास, नई दिल्ली-110016/मूल्य : 250₹/कवि-संपर्क : 09006740311/आवरण : गौतम साव, वाज़दा ख़ान।
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संपर्क:-
~शहंशाह आलम, प्रकाशन विभाग, बिहार विधान परिषद्, पटना-800015/मोबाइल : 09835417537
'जनपद झूठ नहीं बोलता' : नए शब्द, नए स्वर, नए मुहावरे, नए अचरज की कविताएँ
● शहंशाह आलम
मैं अकसर सोचता हूँ कि जिस तरह मनुष्य के पास एक जीवन होता है, क्या वैसा ही जीवन कविता के पास भी है? अगर ऐसा नहीं है तो कोई कविता मनुष्य की भावनाओं को कैसे व्यक्त कर लेती है। इसका उत्तर पाने के लिए मुझे कोई कठिनाई नहीं उठानी पड़ी। एक कवि होने के नाते मैं इतना तो समझ ही सकता हूँ कि किसी कवि में जब जीवन है, तो उसकी कविताओं में जीवन की झलक दिखाई देगी ही देगी। सुशील कुमार वैसे ही कवियों में हैं, जिनकी कविताओं में मनुष्य का जीवन पूरी तरह मुखर होता दिखाई देता है, बिलकुल जनोन्मुख। सुशील कुमार के कविता-संग्रह 'जनपद झूठ नहीं बोलता' की कविताएँ मनुष्य-जीवन के लोक और मनुष्य-जीवन के जनपद का ही वृत्तांत हैं। इसलिए कि सुशील कुमार का लोक और जनपद जनाकीर्ण है, मनुष्यों से भरा हुआ है, प्रकृति को इस जनाश्रय में समेटता हुआ :
दिन समेटकर उतरता है थकामाँदा बूढ़ा सूरज
पहाड़ के पीछे
अपने वन-प्रांतर की निःशेष होती गाथाएँ लिए
उसकी तमतमाई आँखों की ललाई पसर आती है
जंगलों से गुम हो रही हरियाली तक
दम तोड़ रही नदियों में फैल रहे रेतीले दयार तक
विलुप्त हो रहे पंछियों के इक्के-दुक्के नीड़ों तक('पहाड़िया'/पृ.15)।
सुशील कुमार समकालीन हिंदी कविता के उन कवियों में हैं, जिनकी कविताओं का स्वर, जिनकी कविताओं का आवेग और स्वाद अपनी एक अलहदा पहचान रखते हैं। यह सच है, सुशील कुमार के कविता-संग्रह 'जनपद झूठ नहीं बोलता' की कविताओं में उनके अनुभव, उनके विचार, उनके अवसाद, उनके जनसंघर्ष एकदम अंतरंग हो-होकर कविता के विशाल द्वार में प्रवेश पाते हैं। इस तरह उनकी कविताओं का पाठक भी उनके एकदम क़रीब महसूस करता है। इसलिए भी कि सुशील कुमार की कविताओं में फैशन की तरह कोई चीज़ न आकर किसी आंदोलन की तरह आती है। यह सुखद है। वरना आज अधिकतर कवि के एजेंडे में मनुष्य-जीवन न होकर उनका अपना निजी जीवन होता है, जिसमें किसी परिवर्तन की कामना नहीं होती, बल्कि वे बार-बार अपने जीवन के काले-घने अँधेरे में संशयग्रस्त लौटते दिखाई देते हैं। इसलिए कि ऐसे कवियों का न तो विचार स्पष्ट होता है, न प्रतिबद्धता, न जनपक्षधरता। और न यहाँ जन-आदेश का सम्मान ही दिखाई देता है। सुशील कुमार उन कवियों में हैं, जिनका विचार, जिनकी प्रतिबद्धता और जन-आदेश का सम्मान किसी आईने की तरह साफ़ और सूक्ष्म दिखाई पड़ता है :
कितनी भोली
और अनजान हो तुम फूलमनी
इस धरती पर कि
वायुयान को
एक चील समझती हो
और रेलगाड़ी पर
कभी बैठने के सपने देखती हो('फूलमनी'/पृ. 26)।
इन दिनों अच्छे दिनों का हो-हल्ला और चिल्ल-पों इस तरह फैलाया गया है कि जो अभावग्रस्त जीवन जी रहे हैं, उन्हें हाशिए पर डाल दिया गया है। ऐसे लोगों के अच्छे जीवन के बारे में न सोचकर आज बुलेट ट्रेन चलाने का सपना दिखाया जा रहा है। जबकि सच्चाई यही है कि फूलमनी जैसी कितनी ही ज़िंदगियाँ अपने भीतर कोई एक अच्छा दिन तक नहीं पा सकी हैं, उस अच्छे दिन के लिए आज भी तरस रही हैं। यह भी कठोर सत्य है कि न इनकी आधारभूत संरचना में कोई परिवर्तन दिखाई देता है, न संवेदनागत कोई वैशिष्ट्य ही दिखाई देता है :
जब पूरा गाँव निढाल होता है नींद में
बहुत भोर में
मुर्ग़ा-बाँग से पहले ही
उठ-पुठ कर
जंगल चल देती हो
महुआ बिनती हो
लकड़ी चुनती हो
घास का बोझा बनाती हो
मन ही मन मगन हो
कोई प्रेमगीत गुनगुनाती हो
और वंदना-माधे परब के आने की
प्रतीक्षा करती हो(वही/पृ. 27-28)।
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सुशील कुमार जिस लोक, जिस जनपद की बातें अपनी कविताओं में पूरी तरह मुखर कहते-रचते रहे हैं, उनका वह लोक, वह जनपद पूरी तरह देखा-भाला हुआ है। उनकी सारी कविताएँ इस बात की गवाही देती हैं। चर्चित कवि दिनेश कुशवाह उनकी कविताओं के बहाने सही ही कहते हैं, 'सुशील कुमार ने अपने जनपद के पहाड़, नदी, पेड़, जंगल, पशु, फूल, फल, विरह, संयोग, संघर्ष, आदिवासी, उनकी अंत:क्रियाएँ, परंपराएँ और अपरिमित दुःख को इस तरह आत्मसात् किया और रचा है, जैसे उनकी कविताएँ भीतर ही भीतर सुलगती अँगीठी का निर्धूम ताप हों।' सुशील कुमार की 'बाँसलोय में बहत्तर ऋतु', 'पहाड़ी नदी के बारे में', 'कब लौटोगे सुकल परदेस से', 'बंदगाँव की घाटियाँ', 'महुआ फूलने के मौसम में', 'असम से लौटकर हरिया सोरेन', 'ढीली पड़ती मुट्ठियाँ', 'दियारा में रेत होती ज़िन्दगी', 'यहाँ कभी बसंत नहीं आता', 'तुम्हारे स्त्री होने का मतलब', 'कोसी- शोक में डूबी एक नदी का नाम है', 'पेड़ प्रथम नागरिक हैं पृथ्वी पर', 'वे शहनाई के कबीर थे', 'माँ' आदि कविताएँ आपको कविता-काल के बहुत सारे रंग दिखाती हैं, परन्तु इन रंगों में आदिवासी जीवन का जो रंग दृश्यपटल पर उभर कर सामने आता है, वह रंग एकदम टटका है। वही एक रंग है जिसमें मानव-मुक्ति की सच्ची कामना छिपी हुई है। वही एक रंग है जिसमें हमारे समय का नवीन उन्मेष दिखाई देता है। यही वह रंग भी है, जो कवि को सार्थक संगति तक पहुँचाता है।
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जनपद झूठ नहीं बोलता(कविता-संग्रह)/कवि : सुशील कुमार/प्रकाशक : हिन्द-युग्म, 1, जिया सराय, हौज़ ख़ास, नई दिल्ली-110016/मूल्य : 250₹/कवि-संपर्क : 09006740311/आवरण : गौतम साव, वाज़दा ख़ान।
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~शहंशाह आलम, प्रकाशन विभाग, बिहार विधान परिषद्, पटना-800015/मोबाइल : 09835417537


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