रविवार, 5 जून 2016

शिवमूर्ति की रचना 'कुच्ची का कानून' और मनु का विधान

शिवमूर्ति उन चंद वरिष्ठ कथाकारों में से एक हैं जिनकी रचनाएं साहित्य की दुनियां में आते ही हलचल मचा देती है, बहसों की एक लंबी श्रृखंला शुरू कर देती है. और यही हुआ इस बार भी जब शिवमूर्ति की नई लम्बी कहानी या लघु –उपन्यास “कुच्ची का कानूनअखिलेश के संपादन में निकलने वाली पत्रिका “तद्भव” के 32 वें अंक में प्रकाशित हुई. किसी ने इसकी मौलिकता पर सवाल किया तो किसी ने इसकी विश्वसनीयता पर. किसी ने हंगामे को ही साजिश करार दिया तो किसी ने कुछ और. जबकि शिवमूर्ति जी के सच्चाई के प्रति अपनी वफ़ादारी के दावे हैं. बहस की इसी कड़ी में पढ़ते हैं युवा साहित्यकार नरेंद्र कुमार के विचार को जिसने इसे एक अलग नजरिये से देखने की कोशिश की है, जो कि पत्रिका लहक के मई –जून 2016 में प्रकाशित भी है. साभार!
नरेंद्र कुमार


कुच्ची का कानून या मनु का विधान
शुरू में ही स्पष्ट कर दूं कि यह प्रसिद्ध कहानीकार शिवमूर्ति रचित लघु उपन्यास कुच्चीका कानूनकी तो आलोचना है ही समीक्षा।बस इसकी कथावस्तु में समाहित विचार एवं दर्शन को आज की प्रगतिशीलता एवं उत्तर आधुनिकता के मानक पर ठीक‌‌-ठीक रखकर देखना ही प्रमुख उद्देश्य है।मैंने इसके पूर्व शिवमूर्ति की कोई रचना नहीं पढी है, इस कारण उनके संबंध में कोई पूर्वाग्रह या विशेष लगाव नहीं है।
इस रचना का मुख्य उद्देश्य स्त्री की अस्मिता एवं अधिकार पर लगा प्रश्नचिह्न्हटाना है, जिसका पता कहानी के आरम्भ में ही चल जाता है।कहानी कुच्ची के कोख की जानकारी से ही आगे बढती है, जिसकी वैधता उसे साबित करनी है क्योंकि उसका पति बजरंगी दो वर्ष पूर्व ही जहरीली शराब के सेवन से मर चुका है।कुच्ची के सामने चुनौतियों का पहाङ खङा है।जाहिर है पुराणों एवं स्मृतियों द्वारा निर्धारित विवाह एवं अन्य संस्थाओं तथा रुढियों का भार अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में स्त्रियां ही उठाती रहीं हैं।उन्हें वस्तुमात्र बनाकर पुरुषों के भरोसे सारा जीवन गुजार देने का विधान इन्हीं स्मृतियों द्वारा बनाया गया है।प्राचीन काल से चली आ रही रुढियों को ढोने के लिये आज भी उन्हें समाज द्वारा बाध्य किया जाता है।तभी तो कुच्ची संघर्षशील होने के बावजूद कहती है---“मैं अपने कोख का उद्धार करना चाहती थी।बचपन से सुनती आ रही हूं कि कोख का उद्धार तभी होता है जब कोख फले।अपने जन्मेको दूध पीलाकर मैं माँ के दूध से उरिनहोना चाहती थी।
कुच्ची अपनी सुरक्षा एवं सास-ससुर की सेवा के खातिर अपने कोख में पल रहे बच्चे को जन्म देना चाहती है, पर इसमें कुछ कम बाधा नहीं है।पंचायत में बलई बाबा कुच्ची के कोख में पल रहे बच्चे को कानूनी वारिस मानने से इंकार कर देते हैं।वे कहते हैं‌‌--“नाजायज संतान को प्रापर्टी में धेला भी नहीं मिलेगा।इसके लिये वे पुराणों एवं स्मृतियों के कानून का सहारा लेते हैं।वे कहते हैं—“अरे मूरख, कानून रोज-रोज थोङे लिखा जाता है।विरासत का कानून याज्ञवल्क्य मुनि हजारों साल पहले लिख गये हैं।हजार साल पहले तो उसकी टीकायें लिखीं गयींमिताक्षरा, दायभाग, एकाध और।अपने यहाँ विज्ञानेश्वर की लिखी मिताक्षरा चलती है।बिहार में जीमूतवाहन की लिखी दायभाग।खैर, यह तेरी समझ में क्या आयेगा।इस गांव में ही किसी ने याज्ञवल्क्य मुनि का नाम नहीं सुना होगा।तब कोख पर अपने हक के संबंध में कुच्ची कहती है—“जब मेरे हाथ,पैर,आँख,कान पर मेरा हक है, इन पर मेरी मर्जी चलती है तो कोख पर किसका होगा, उस पर किसकी मर्जी चलेगी, इसे जाननेके लिये कौन-सा कानून पढने की जरूरत है।वह पलटकर पंचायत से ही पूछती है, “बात से कायल कर दीजिये या कायल हो जाइये।मेरी कोख पर मेरा हक है कि नहीं?”
यहाँ तक कहानी अपनी सही राह चलती है।इसके बाद खुद रचनाकार कुच्ची के सवाल का जवाब अपनी मौलिकता में खोज नहीं पाते हैं।लगताहै कि पंचायत की चुप्पी उनकी ही चुप्पी है।इस चुप्पी को कुच्ची ही तोङती है।
“----मेरे सवाल का जवाब आप सबके मन में है।आप देना नहीं चाहते।अब मैं दूसरा सवालपेश करती हूं।मेरे इस सवाल के पेट से ही चौधरी बाबा के सवाल का जवाब निकलेगा।मेरा सवाल है कि फसल पर पहला हक किसका है? खेत का कि बीज का? अगर पंच फैसला करते हैं कि फसल पर खेत का हक है तो पंच मुझसे बच्चे के पिता का नाम पूछने का हकदार नहीं बनते।अगर फैसला बीज के हक में होता है तो मैं बच्चे के पिता का नाम पेश कर दूंगी।
कुच्ची का यह सवाल लेखक का मौलिक सवाल नहीं है। इसके लिये वे मनुस्मृति की शरण में चले जाते हैं। अब कुच्ची के सवाल के में निहित मनु के विधानों की संगतता पर नजर डालते हैं जो मनुस्मृति के नवम्अध्याय से उद्धृत हैं।इस अध्याय में स्त्री-पुरूष के संबंधों एवं उत्तराधिकार के नियमों की व्याख्या की गयीं है।मनुस्मृति के नवम्अध्याय के 33वें श्लोक को देखते हैं जहाँ से यह सवाल शुरू होता है---
क्षेत्रभूता स्मृता नारी बीजभूतः स्मृतः पुमान्
क्षेत्रबीजसमायोगात्संभवः सर्वदेहिनाम्।।३३।।
अर्थात्स्त्री खेतरूप और पुरुष बीजरूप होता है।खेत और बीज के संयोग से ही सभी प्राणियों की उत्पत्ति होती है।
अब सवाल यह उठता है कि रचनाकार स्त्री की संवेदना को दरकिनार कर बीज और खेत का वह सिद्धांत क्यों चुनते हैं जो मनु द्वारा दिया गया है? क्या उनकी प्रगतिशीलता एवं मौलिकता इतनी कमजोर हो चली थी कि उन्हें मनुस्मृति का सहारा लेना पङा।...या फिर वे मनु के विधान को आज के आधुनिक एवं प्रगतिशील समाज में भी तर्क-वितर्क द्वारा प्रासंगिक ठहराना चाहते हैं।अब कुच्ची के सवालों का जवाब देखिए।
लछिमन चौधरी कहते हैं---“मेरे विचार से तो बीज ही परधान है।खेत किसी का हो, जो बोया जायेगा, वही पैदा होगा।आम के बीज से आम।बबूल के बीज से बबूल।बोया बीज बबूल का, आम कहाँ से होय?”
अब मनुस्मृति के उस अंश को देखते हैं जिसपर लछिमन चौधरी का संवाद आश्रित है---
बीजस्यचैवयोन्याश्चबीजंउत्कृष्टंउच्यते।
सर्वभूतप्रसूतिर्हिबीजलक्षणलक्षिता।।३५।।
यादृशंतूप्यतेबीजंक्षेत्रेकालोपपादिते।
तादृग्रोहतितत्तस्मिन्बीजंस्वैर्व्यञ्जितंगुणैः।।३६।।
अर्थात् बीज और खेत में बीज प्रधान है,क्योंकि सभी जीवों की उत्पत्ति बीजों के लक्षणानुसार ही होती है।जिसप्रकार का बीज उचित समय पर खेत में बोया जाता है, उसके गुण जैसा ही पौधा खेत में उत्पन्न होता है।
इयंभूमिर्हिभूतानांशाश्वतीयोनिरुच्यते।
नचयोनिगुणान्कांश्चिद्बीजंपुष्यतिपुष्टिषु।।३७।।
भूमावप्येककेदारेकालोप्तानिकृषीवलैः।
नानारूपाणिजायन्तेबीजानीहस्वभावतः।।३८।।
अर्थात् यह भूमि सभी प्राणियों का शाश्वत् उत्पत्ति स्थान है, परंतु भूमि के गुण से बीज पुष्ट नहीं होता है|एक समय में एक ही खेत में किसान अनेक बीज बोते हैं, परंतु सभी बीजों से अपने-अपने स्वभावानुसार अनेक प्रकार के पौधे उत्पन्न होते हैं।
व्रीहयःशालयोमुद्गास्तिलामाषास्तथायवाः।
यथाबीजंप्ररोहन्तिलशुनानीक्षवस्तथा।।३९।।
अन्यदुप्तंजातंअन्यदित्येतन्नोपपद्यते।
उप्यतेयद्धियद्बीजंतत्तदेवप्ररोहति।।४०
अर्थात् धान, मूंग, तिल, उङद, यव, लहसुन और ईख---सभी अपने बीज के अनुसार ही उत्पन्न होते हैं।ऐसा कभी नहीं होता कि बोया कुछ हो और उत्पन्न कुछ हो जाये।जो बीज बोया जाता है वही उत्पन्न होता है।
रचनाकार लछिमन चौधरी का जवाब सुघरा से दिवाते हैं जो गाँव की एक विधवा ठकुराईन है।
----सवाल यह नहीं है कि बोने से क्या पैदा होगा।इसे तो पीछे बैठकर हँस रहा वह बग्गङ भी जानता है।फिर सुघरा बोलती है-----सवाल यह है कि फसल पर हक किसका होगा? एक आदमी अपने खेत में गेहूं बो रहा है।उसके बीज के कुछ दाने बगल के जौ के खेत में छिटक कर चले गये।फसल तैयार होने पर साफ पता चल रहा है कि गेहूं के पौधे बगल वाले के बीज से पैदा हुये हैं।तो क्या गेहूं के खेत वाला जौ के खेत में उगे गेहूं के उन पौधों पर अपना हक जता सकता है?
बिल्कुल नहीं।कई आवाजें आती हैं---जिसके खेत में पैदा होता है, वही काटता है।
अब सुघरा के संवाद की संगतता मनुस्मृति के साथ देखते हैं---
येऽक्षेत्रिणोबीजवन्तःपरक्षेत्रप्रवापिणः
तेवैसस्यस्यजातस्यनलभन्तेफलंक्वचित्।।४९।।
अर्थात् जिसके पास अपना खेत नहीं है, यदि वह दूसरों के खेत में बीज बोता है तो वे उस खेत में उत्पन्न हुए अनाज के हकदार नहीं होते हैं।
यदन्यगोषुवृषभोवत्सानांजनयेच्छतम्।
गोमिनांएवतेवत्सामोघंस्कन्दितंआर्षभम्।।५०।।
तथैवाक्षेत्रिणोबीजंपरक्षेत्रप्रवापिणः।
कुर्वन्तिक्षेत्रिणांअर्थंनबीजीलभतेफलम् ।।५१।।
अर्थात् यदि दूसरों की गायों से सांङ सौ बछङे भी पैदा करे तो भी वे बछङे गाय वालों के होते हैं।सांङ का यह वीर्यसंचन निष्फल होता है।उसी प्रकार बिना खेत वाले का बीज दूसरे के खेत में बोने पर निष्फल जाता है।बीज वाला फल नहीं पाता।
फलंत्वनभिसंधायक्षेत्रिणांबीजिनांतथा
प्रत्यक्षंक्षेत्रिणांअर्थोबीजाद्योनिर्गलीयसी।।५२।।
अर्थात् जहाँ पर खेत के मालिक और बीज बोने वालों में कोई बात निश्चित नहीं हुई हो तो फल खेत के मालिक का होता है क्योंकि बीज से श्रेष्ठ खेत है।
क्रियाभ्युपगमात्त्वेतद्बीजार्थंयत्प्रदीयते।
तस्येहभागिनौदृष्टौबीजीक्षेत्रिकएवच।५३।।
ओघवाताहृतंबीजंयस्यक्षेत्रेप्ररोहति।
क्षेत्रिकस्यैवतद्बीजंनवप्तालभतेफलम्।।५४।।
अर्थात् जिस व्यक्ति का खेत है, फल भी उसीका है।जिस व्यक्ति ने बीज डाला है, फल उसका नहीं माना जाता।जिस खेत की उपज के विषय में खेत और बीज के मालिक के बीच आपस में तय हो गया है, उस खेत के फल में दोनों लोग भागी होते हैं।जो बीज जल या वायु के प्रवाह में दूसरे खेत में गिर कर उत्पन्न होते हैं, उसके फल का भागी खेत वाला ही होता है कि बीज बोने वाला।
इस तरह हम देखते हैं कि मनु के विधान को जिस तरह प्रगतिशील विचारों में बदलने की जो साजिश की गयी है यह पाठकों के साथ धोखा ही नहीं है वरन रचानाकार के रचनाकर्म पर ही सवालिया निशान लगा देती है।अब मनु का वह विधान देखा जाय जो स्त्रियों को पशु की श्रेणी में रखती है।
एषधर्मोगवाश्वस्यदास्युष्ट्राजाविकस्यच।
विहंगमहिषीणांचविज्ञेयःप्रसवंप्रति।।५५।।
इसमें कहा गया है कि बीज एवं खेत संबंधी यही व्यवस्था गाय, घोङा, दासी, ऊंट, बकरी, भेङ, पक्षी और भैंस की संतति के लिये भी मानना चाहिये।
क्या हम स्त्रियों के लिये यही व्यवस्था चाहेंगे जो उन्हें पशु की श्रेणी में रखे।उनकी संवेदनाओं का क्या कोई मूल्य नहीं?यहाँ हम देखते हैं कि रचना अपने मूल उद्देश्य से ही भटक गयी है।एक तरफ लेखक स्त्री कि अस्मिता एवं अधिकार के लिये संघर्ष मेंस्मृतियों और पुराणों को मृत मनते हुए स्त्रियों के संघर्ष को तार्किकता एवं आधुनिकता की कसौती पर कसना चाहते हैं वहीं दूसरी तरफ इस हेतु मनुस्मृतिके विधान को सामने लानेजैसा आत्मघाती कदम उठा लेते हैं।फिर अंत में वे स्मृतियों के विधान को झूठा एवं अप्रासंगिक ठहरानेका दिखावा भी करते हैं जिसका पता निम्न उद्धरण से चलता है---
बाजार से आयी महिलाओं के बीच से एक लङकी खङी होती है-----याज्ञवल्क्य कबके मर मरा गये लेकिन उनका बनाया फंदा अभी भी औरतों के गले में फंसा हुआ है।वक्त आ गया है कि मरे हुओं का कानून मरे हुओं के साथ दफन कर दिया जाये।ऐसा कानून बने जिससे हम भी जिंदा लोगों की तरह जिंदा रह सकें।
सामान्यतः ऐसा माना जाता है कि नगरों एवं शहरों कि स्त्रियाँ गाँव की स्त्रियों की अपेक्षा अधिक प्रगतिशील एवं आधुनिक होती हैं, पर रचनाकार उनके माध्यम से कोई आधुनिक कानून-व्यवस्था की व्याख्या नहीं करवाते हैं जबकि तीन-तीन औरत वकील पंचों की बराबरी में बैठती हैं।क्या उनका चुप रहना लेखक की चुप्पी की ओर ईशारा नहीं करता है? आँगनबाङी कार्यकर्ताओं, ग्राम सेविकाओं, स्वास्थ्य केंद्र की दाईयों, बैंक एवं ब्लॉक की कर्मचारियों और अध्यापकों की संख्या पंचायत में झुंड बनाकर बैठती हैं।परंतु ये सब बैठे-बैठे मोबाईल में फोटो खींचने के अलावा बहस में कोई योगदान नहीं दे पाती हैं।वे आम मध्यमवर्गीयलोगों की तरह मात्र नैतिक समर्थन दे पाती हैं, जबकि उनके साथ एक प्रशासनिक अधिकारी एडीओ पंचायत भी आयी है।आखिर रचनाकार क्या दिखाना चाहतेहैं?यही कि हमारे शहरों की आधुनिक एवं प्रगतिशील स्त्रियाँ केवल सेल्फी खींचने एवं तमाशा देखने के ही काबिल हैं।आजकल नगरों में आईवीएफ क्लिनिक, सरोगेसी, स्पर्म डोनर की चर्चा आम है।ऐसे आधुनिक समय में महिला मोर्चा की सदस्या मनोरमा कुच्ची द्वारा कोख के मुद्दे के सवाल पर कहती है---“दरअसल यह बहुत आगे का मुद्दा है, लेकिन गाँव में रहकर जब तुम्हारे जैसी औरत इसकी जरूरत महसूस कर रही है, इस मुद्दे को उठा रही है तो देरसबेर इसे वक्त की आवाज बनना होगा।जबकि बाजार की ही नर्स कुट्टी के बिना शादी एक बच्चा बनाने की बात लेखक इससे पहले कह चुके हैं जिसे वह गिफ्ट लेना कहती है।इसी तरह के और किस्से वह कुच्ची को बतलाती है।लगता है लेखक अपने ही पूर्वकथनों से तारतम्यता बना नहीं पाये हैं।
आखिर क्या कारण है कि वे आधुनिक शहरी समाज की महिलाओं को पिछङा दिखाते हैं जबकि गाँव की पिछङी महिला को संघर्षशील एवं जागरूक? चूंकि उनके पास कोख के अधिकार संबंधी कोई मौलिक तर्क नहीं है, जो आधुनिक एवं प्रगतिशील समाज के जीवन-दर्शन के अनुकूल हो। इक्कीसवीं सदी में भी इसका समाधान वे मनुस्मृति में ही पाते हैं।वह मनुस्मृति जो पुरुषों के सामने स्त्रियों की संवेदना को कोई महत्व नहीं देती है बल्कि सारी जिंदगी उन्हें पुरुषों के नियंत्रण में जीने का विधान रचती है।मेरी समझ से कोख पर प्राथमिक क्या...संपूर्ण अधिकार स्त्री का ही है।उसकी संवेदना ही आखिरी तर्क है चाहे वह कोख विवाह नामक संस्था से अलग या बलात्कार का ही परिणाम क्यों न हो।
इस प्रकार हम देखते हैं कि कुच्ची का कानून’‘मनु के विधानका ही आधुनिक रुपांतरण है क्योंकि इस रचना में मनु के विधान के आधार पर ही कुच्ची को कोख का अधिकार मिल पाता है।कुच्ची की संवेदना को दरकिनार कर याँत्रिक तर्क-वितर्क को लेखक महत्व देते हैं तथा इनके सहारे ही स्वयं को प्रगतिशील एवं नारीवादी दिखाने की कोशिश करते हैं।इस प्रसंग में गोदान की चर्चा न हो तो बात पूरी नहीं होगी।प्रेमचंद ने अपने उपन्यास में धनिया और सिलिया के संघर्ष को अधिक जीवंतता से दिखाया है।वे सीधे-सीधे सामंतवादियों एवं मनुवादियों से टकाराती हैं।सिलिया भी बिना विवाह किये बच्चे को जन्म देती है और धनिया उसे अपने घर में पनाह देती है।वे दोनों कभी भी झुकना पसंद नहीं करती हैं।प्रेमचंद अपनी रचना में पुराणों एवं स्मृतियों के विधानों द्वारा दलितों एवं स्त्रियों को अधिकार दिलाने की चेष्टा नहीं करते हैं।वे अपने तर्क मानवता एवं पात्रों की संवेदना में ढूंढते हैं।परंतु कुच्चीका कानूनमें उनकी परंपरा का पालन नहीं हुआ है।
अब आता हूं अपने इस आलेख की प्रासंगिकता पर...।अक्सर बहुत-से रचनाकारों की ऐसी रचनायें देखने को मिलती हैं जिनमें वे पाठकों की जागरूकता एवं बुद्धिमता को दरकिनार कर चालाकी दिखाने की कोशिश करते हैं।वे पाठकों की पठनीयता को ध्यान में नहीं रखते हैंऔर वे यही मात खा जाते हैं।अगर लेखक इस बात का ध्यान रखते तो कभी ऐसा आत्मघाती प्रयोग नहीं करते और न ही उनके रचनाकर्म पर सवालखङा होता।

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गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

माया एंजेलो की कविता मणि मोहन मेहता के हिन्दी शब्दों में।

आज समाज में हर इंसान एक वस्तु अथवा उत्पाद बनता जा रहा है जिसका उपयोगिता तक ही महत्व है लेकिन स्त्रियां सदियों से उसी जीवन को जीती आ रही है। जहां उनकी इच्छाओं का दमन इस हद तक किया जाता है कि उनकी अंतर्आत्मा तक कराह उठती है। लेकिन उनमें कुछ ऐसी भी होती हैं जो अपने शिकारी अथवा पुरूष को कङी चुनौती प्रस्तुत करने की कोशिश करती है। सच है कि ये उनके ह्रदय की चित्कार है जो एक संकल्प के रूप में आती है कि तुम मुझे कुचल डालो जितनी तुममें शक्ति है लेकिन मैं उठूंगी जरूर। जलो तुम जितना जल सकते हो, लेकिन मुझे अब तेरी परवाह नहीं। अब अपने तरीके से जिंदगी को आगे ले जाऊंगी। जबकि दूसरी कविता में दिखलाने की कोशिश की गई है कि औरतें किस तरह घर को संभालने में व्यस्त रहती है कि उनका खुद का अस्तित्व ही खतरे में पङ जाता है। जहां वह अपने सपनों और इच्छाओं को पूरा करने की चाह रखती हैं। जिंदगी के कुछ रोमांचकारी क्षणों को महसूस करना चाहती है। तीसरी कविता वे घर गए उस स्त्री की दारूण व्यथा है जिसके पास सबकुछ है, सबकी प्यारी और दुलारी है लेकिन उसके पास इज्जत नहीं है। दूसरी कविता में जिस तरह अपना कहने की चाह है लेकिन अपना है कुछ भी नहीं है वही दर्द यहां भी है। सारे गुण होने के बाबजूद वह महज एक बाजार की वस्तु ही है। औरतों के जिस दारूण स्थिति को कवयित्री ने बेहद खूबसूरती से रचा -बसा है उसकी आत्मा को आत्मसात करते हुए अनुवादक मणि जी से उसी खूबसूरती के साथ हमलोगों के समक्ष प्रस्तुत किया है जिसके लिए वे विशेष रूप से बधाई के पात्र हैं क्योंकि अनुवाद में सारी सीमाओं एवं मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुए मूल रचना की गरिमानुसार कार्य करना बहुत ही श्रमसाध्य है। माया एंजेलो की कविताओं का मणि मोहन मेहता जी ने जिस तरह से अनुवाद किया है उसे आप स्वयं भी पढकर महसूस करें।
सुशील कुमार भारद्वाज


कवयित्री का परिचय : 4 अप्रैल , सन 1928 को सेन्ट लुइस में जन्मीं माया एंजेलो अमेरिका की सर्वाधिक चर्चित कवियत्री और रचनाकार हैं । वे एक अफ्रीकन अमेरिकन लेखिका के रूप में जानी जाती हैं , उन्होंने नस्लवाद और रंगभेद के विरुद्ध अपनी आवाज़ बुलंद की है । वे अपनी सात आत्मकथाओं seven autobiographies के लिए प्रसिद्ध हैं । इसके अलावा उनके हिस्से में पांच निबन्ध संग्रह , अनेक कविता संग्रह , नाटक तथा फिल्म और टेलिविजन शो हैं ।

🕵अनुवादक का परिचय – 2 मई 1967 को जन्मे मणि मोहन अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर व डॉक्टरेट हैं । उनके कविता संग्रह ' कस्बे का कवि एवं अन्य कवितायेँ ' पर उन्हें वागीश्वरी पुरस्कार मिला है । एक और कविता संग्रह ‘ शायद ‘ प्रकाशित है इसके अलावा  " भूमंडलीकरण और हिंदी उपन्यास " , " आधुनिकता बनाम उत्तर आधुनिकता " तथा " सुर्ख़ सवेरा " आलोचना पुस्तकों का संपादन उन्होंने किया है । रोमेनियन कवि मारिन सोरेसक्यू की कविताओं की अनुवाद पुस्तक  ' एक सीढ़ी आकाश के लिए ' भी प्रकाशित है ।

🚹मैं फिर उठती हूँ🚹
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तुम दर्ज कर सकते हो मुझे इतिहास में
अपने कड़वे और विद्रूप झूठ के साथ
कुचल सकते हो मुझे
इसी गन्दगी में
परन्तु फिर भी, धूल की तरह , मैं उठूंगी ।

क्या तुम मेरे अक्खड़पन से परेशान हो ?
तुम इतने निराश क्यों हो ?
क्या इसलिए कि मैं चलती हूँ इस तरह
मानों तेल के कुँए हों
मेरी बैठक में ।

चन्द्रमाओं और सूर्यों की तरह
ज्वार भाटों की निश्चितता के साथ
ऊपर उठती उम्मीद की तरह
मैं फिर उठूंगी ।

क्या तुम मुझे टूटा हुआ देखना चाहते थे ?
झुका हुआ सिर और झुकी नज़रें ?
नीचे गिरे कन्धे , आंसुओं की तरह ...
अपने रुदन में कमजोर ।

क्या मेरी हेकड़ी से तुम्हे चोट पहुंचती है ?
क्या बहुत बुरा लगता है ?
क्योंकि मैं हंसती हूँ जैसे मेरे पास
सोने की खदाने हों
घर के पिछवाड़े ।

अपने शब्दों से तुम मुझे शूट कर सकते हो
काट सकते हो अपनी नज़रों से
मार सकते हो मुझे अपनी घृणा से
पर फिर भी , हवा की तरह
मैं उठूंगी ।

क्या मेरा कामाकर्षण तुम्हे विचलित करता है?
क्या यह एक विस्मय की तरह
तुम्हारे सामने आता है
कि मैं नृत्य करती हूँ
जैसे मेरे पास हीरे हैं
जहां मिलती हैं मेरी दोनों जांघे ?

इतिहास की शर्म वाली झोंपड़ियों से बाहर निकलकर
मैं उठती हूँ
उस अतीत से ऊपर
जिसकी जड़ें दर्द से वाबस्ता हैं
मैं उठती हूँ ...
मैं एक काला समुद्र हूँ
उछलता - कूदता
बहता - उफनता
अपने भीतर लहरों को समाये ।

भय और आतंक की रातों को पीछे छोड़ते हुए
मैं उठती हूँ
लाती हूँ
वे तमाम तोहफे जो मेरे पूर्वजों ने दिए थे
मैं एक स्वप्न हूँ
और एक उम्मीद गुलामों की
मैं उठती हूँ
मैं उठती हूँ
मैं उठती हूँ ।

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🚺काम करती स्त्री🚺

मुझे बच्चों की देखभाल करनी है
कपड़े सिलना है
पोंछा लगाना है
बाजार से सामान लाना है
फिर चिकन फ्राई करना है
पोंछना है बच्चे का गीला बदन
पूरे कुनबे को खाना खिलाना है
बगीचे से खरपतवार हटाना है
कमीजों पर इस्त्री करनी है
कनस्तर काटना है
साफ करना है यह झोंपड़ी
बीमार लोगों की देखभाल करनी है
और कपास चुनना है ।

धुप , बिखर जाओ मुझ पर
बारिश, बरस जाओ मुझ पर
ओस की बूंदों , धीरे-धीरे गिरो मुझ पर
ठंडा करो मेरे माथे को ।

तूफ़ान , उड़ा ले चलो मुझे यहाँ से
अपनी प्रचंड हवा के साथ
तैरने दो मुझे आकाश में
जब तक पूरा न हो मेरा विश्राम ।

हिम-कण , धीरे-धीरे गिरो
छा जाओ मुझ पर
भर दो मुझे सफेद शीतल चुम्बनों से
और आराम करने दो मुझे
आज की रात ।

सूर्य , बारिश , सर्पिल आकाश
पहाड़ , समुद्र , पत्तियों और पत्थर
तारों की चमक , चंद्रमा की आभा
सिर्फ तुम हो
जिन्हें मैं अपना कह सकती हूँ ।

🚺वे घर गए 🚺
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वे घर गए और अपनी पत्नियों से कहा
कि अपनी पूरी ज़िन्दगी में एक बार भी
मेरे जैसी लड़की नहीं देखी
फिर भी ...वे अपने घर गए .

उन्होंने कहा के मेरा घर चमचमा रहा था
जो कुछ कहा मैंने उसमे एक भी शब्द भद्दा नहीं था
एक रहस्य था मेरे व्यक्तित्व में
फिर भी... वे अपने घर गए .

मेरी तारीफ सभी पुरुषों के लबों पर थी
उन्हें मेरी मुस्कान , मेरी हाजिरजवाबी
मेरे नितम्ब पसंद थे
उन्होंने रात गुजारी - एक , दो या फिर तीन
फिर भी ...............


✳माया एंजेलो✳

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

फिर मिलने के वादे के साथ समाप्त हो गया 28 वाँ लघुकथा सम्मेलन

फिर मिलने के वादे के साथ समाप्त हो गया 28 वाँ लघुकथा सम्मेलन  
सुशील कुमार भारद्वाज
लघुकथा पाठ सत्र में मंचासीन ख्याति प्राप्त साहित्यकार


भागदौड़ भरी जिन्दगीं में जब लोगों के पास अपने निजी काम के लिए समय का अभाव होता जा रहा है तब लंबी –लंबी कहानियों एवं उपन्यास रूपी प्रचलित साहित्यों से उनका दूर होते चला जाना लाजिमी ही लगता है. लेकिन लघुकथा एक ऐसी विधा है जो राह चलते और फेसबुक एवं व्हाट्सअप्प के माध्यम से भी सामान्य जनों के बीच अपनी पैठ बनाने में सफल है. लघुकथा ऐसी विधा है जिनमें शक्ति है कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक एवं हास्य –व्यंग्य के साथ धीर –गंभीर बातों को भी  कह गुजरने की. लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि इस फटाफट जिंदगी में आसानी से लोगों के बीच पैठ बनाती यह लघुकथा अभी भी अपने यथोचित सम्मान से दूर है. जो कहीं ना कहीं झलक ही जाता है.
जी हां, 17 अप्रैल 2016 को जब पटना के भारतीय नृत्य कला मंदिर के एमपीसीसी सभागार में अखिल भारतीय प्रगतिशील लघुकथा मंच के तत्वावधान में आयोजित 28 वाँ लघुकथा सम्मेलन के दूसरे सत्र (आलेख पाठ सत्र) में लघुकथा के विभिन्न बिंदुओं पर चर्चा हो रही थी, तब न सिर्फ इस पर चर्चा हुई कि लघुकथा क्या है? इसके आवश्यक तत्व क्या हैं? वर्तमान में इसकी स्थिति क्या है? और इसके लिए भविष्य में क्या संभावनाएं हैं? बल्कि इस पर भी चर्च हुई कि इसे पाठ्यक्रम में शामिल कराने के लिए क्या किया जाय? और जब विभिन्न कलाओं के लिए सम्मान सरकारों द्वारा ससमय दिया जा रहा है तो लघुकथा ही उपेक्षित क्यों रहें?


जबकि उद्घाटन सत्र में बिहार के कला संस्कृति मंत्री श्री शिवचंद्र राम ने अपनी बातों को रखते हुए कहा कि जब शहर में जब नाटक, नृत्य के केंद्र बने हैं तो साहित्य के केंद्र क्यों नहीं बनेगें? जबकि मंच पर ही आसीन विधान पार्षद श्री नवल किशोर यादव ने अपने वक्तव्य में कहा कि मंत्रीजी साहित्य भवन बनाने की बात करते हैं और राजधानी में पहले से बने हिन्दी भवन पर दूसरे लोगों का कब्ज़ा ऐसा है कि साहित्यकार वहां घुस भी नहीं सकते.
इन राजनीतिक बयानों से इतर अखिल भारतीय प्रगतिशील लघुकथा मंच के अध्यक्ष सतीशराज पुष्करणा ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि जल्द ही दिशा प्रकाशन की ओर से लघुकथा कोश प्रकाशित होने जा रहा है. साथ ही साथ उन्होंने लघुकथा के इतिहास लिखने की योजना की भी जानकारी दी. बंगलुरू से आई व्ही ललिताम्बा ने कहानी के बढ़ते दायरे की बात कहीं, तो मेजर बलबीर सिंह भसीन ने सलाह देते हुए कहा कि लघुकथा में दर्द भी उभरे और अनुशासन भी बना रहे. जबकि रामदेव प्रसाद ने लघुकथा में संवेदनशीलता, संक्षिप्तता और समाज सापेक्ष मूल्यों पर बल देने की बात कही. नागपुर से आए डा मिथिलेश अवस्थी ने भाषा के साथ साथ लघुकथा में शब्द सीमा और अनुशासन पर ध्यान देने की बात कही. जबकि नागेन्द्र प्रसाद सिंह ने लघुकथा में पुनार्चनावाद की सम्भावना पर अपनी बातों को रखा.



तीसरे सत्र में जहां तकनीकी सत्र में रखी गई बातों पर ही डा शंकर प्रसाद, कांता रॉय, पुष्पा जमुआर समेत अन्य वक्ताओं ने अपने विविध विचार रखे वहीं चौथे सत्र में जीवन के विविध क्षेत्रों के पृष्ठभूमि में रची गई 34 लघुकथाओं का पाठ किया गया. इन लघुकथाकारों में न सिर्फ सतीशराज पुष्करणा, वीरेन्द्र कुमार भारद्वाज, सिद्धेश्वर, ध्रुव कुमार, मिथिलेश अवस्थी, पुष्पा जमुआर, सुशील कुमार भारद्वाज, अनीता राकेश, देवेन्द्र नाथ साह,  कांता रॉय, रेखा रश्मि, पूनम आनंद, मेहता नागेन्द्र, आलोक भारती भगवान सिंह भास्कर आदि शामिल रहे बल्कि किलकारी के प्रियांतरा भारती और प्रवीण कुमार समेत अन्य भी रहे. और इन लघुकथा पाठों पर अपने समीक्षात्मक वक्तव्य दिए प्रतिष्ठित साहित्यकार नागेन्द्र प्रसाद सिंह, अवधेश प्रीत, एवं संतोष कुमार ने.
सम्मलेन में जहां फूलों की माला के बदले, फलों की टोकरी देकर अतिथियों का स्वागत किया गया, वहीं देश के विभिन्न राज्यों से आए अथिति लघुकथाकार डा सच्चिदानंद सिंह साथी, डा मिथिलेश अवस्थी, डा शरद नारायण खरे, मिथिलेश कुमारी मिश्र, नागेन्द्र प्रसाद सिंह, डा देवेन्द्र नाथ साह, पुष्पा जमुआर, तथा आलोक भारती को लघुकथा सम्मान से सम्मानित किया गया, जबकि राघवेन्द्र कुमार कौशल को लघुकथा सम्भावना सम्मान से सम्मानित किया गया. किलकारी के प्रियांतरा भारती एवं प्रवीण कुमारत को लघुकथा अंकुर सम्मान दिया गया.
सम्मलेन में सन्नाटा बोल उठा (डा मिथिलेश कुमारी मिश्र), आस पास कि बातें (डा पुष्प जमुआर), वृक्ष ने कहा (डा मेहता नागेन्द्र), परदेस का पंछी (बीरेंद्र कुमार भारद्वाज), बंद मुट्ठी में सूरज (आलोक भारती), और साहित्य प्रहरी (लघुकथा पर केंद्रित पत्रिका –भगवान सिंह भास्कर) का लोकार्पण भी किया गया. और अगले साल फिर मिलने के वादे के साथ समारोह का समापन हो गया .

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शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

सनातन धर्म संकट के दौर में (आलेख)

शर्म आनी चाहिए उनलोगों को जो सनातन धर्म में जन्म लेकर भी कुछ स्वार्थी तत्वों के बहकावे में आकर खुद को बर्बाद करने में दिन रात लगे हुए हैं। एक विशाल परिवार में सबों को एक समान ही प्रेम मिल जाए कोई जरूरी नहीं। यह एक सामान्य व मानवीय चुक है जो हमारे दैनिक जीवन में अक्सर दिख जाते हैं। इस सनातन धर्म में समय के साथ परिवर्तन हुए, फिर भी कुछ व्यवहारिक बाह्य आडंबर शेष है जो कि हमारे शिक्षित एवं जागरूक बंधुओं के प्रयास से दूर किया जा रहा है। मैं स्वयं कर्मकांडो का विरोधी हूं और सर्वधर्म समभाव की भावना से जीवन व्यतीत करता हूं लेकिन जिस प्रकार से इस धर्म पर हाल के महीने में हमला हुआ है, उससे व्यथित हूं। ऐसा जान पङता है कि सनातन धर्म संकट में है। भारत जैसे देश में ही जब यह अपनों के द्वारा ही अपमानित किया जा रहा है तो शेष की क्या बात की जाए? क्या यह इसकी उदारता नहीं है कि अनेक धर्म इसी से अलग हुए हैं? क्या यह सत्य नहीं है कि आज मौजूद कुछ धर्म हाल के वर्षों की उपज है जिसमें कट्टरता इससे कहीं अधिक और कूट कूट कर भरी है? आप किसी भी धर्म को अपना लें लेकिन कोई भी धर्म आपको मुफ्त की रोटी नहीं दे सकता। आपके दुख दर्द का आपके धर्म से कोई लेना देना नहीं है। धर्म आपको सिर्फ एक रास्ता दिखलाता है। संस्कार सिखलाता है। आप आस्तिक की बजाय नास्तिक ही हो जाऐंगें तो कौन आपका क्या बिगाङ लेगा? सामान्य जीवन में धर्म पर बहुत चर्चा करने की भी तो कोई बजह नहीं? फिर आप क्यों पुरानी बातों व ग्रंथों की बातों में उलझते हैं? ग्रंथ व्यक्ति विशेष द्वारा लिखी गई है जहाँ साहित्यिक सुविधा के अनुसार छूट लेने से इंकार नहीं किया जा सकता है। फिर आज के शिक्षित समाज में इन पोंगा पंथियों की सुनता ही कौन है? आपके धर्म परिवर्तित कर लेने से देश समाज का कुछ घट जाएगा ऐसा भी कुछ नहीं है लेकिन कहा जाता है न कि जो तुम्हें बदल कर प्यार करे वह प्यार नहीं। बस इतना ही कहूंगा विद्वान बनना गुनाह नहीं लेकिन बहकावे में आकर खुद का घर जला लेना जरूर अपराध है। अभी जो अपराध आप खुशी खुशी कर रहे हैं कहीं उसके विनाश होने पर कहीं पछताना न पङे। वैश्वीकरण के इस दौर में कब कौन कैसी राजनीति कर जाए कहना मुश्किल है।

सोमवार, 21 मार्च 2016

ये भोजपुरी वाले अभी तक चोली –लहंगा में ही अटके हुए हैं:संजय मिश्रा









-सुशील कुमार भारद्वाज


बिहार में वर्ष 2016 की शुरूआत फिल्मों के नजरिए से अच्छी मानी जा सकती है. एक महीने के भीतर राजधानी पटना में तीन फिल्म फेस्टिवल आयोजित किए गए और तीनों ही अपने अपने कारणों से अलग स्वरूप में दिखे. पहला पटना फिल्म फेस्टिवल पूर्णतः कला संस्कृति एवं युवा विभाग के तत्वावधान में आयोजित किया गया, जहां एक सप्ताह तक मोना और एलिफिन्स्टन में 28 चुनिन्दा एवं भारतीय पैनोरमा की फ़िल्में दिखाई गई साथ ही साथ फिल्मकारों से साक्षात् बातचीत भी हुए. वहीं मनोवेद फिल्म फेस्टिवल का आयोजन पहली बार पटना संग्रहालय के कर्पूरी ठाकुर सभागार में निजीतौर पर डॉ विनय कुमार के निजी प्रयास से विजय मेमोरियल ट्रस्ट के बैनर तले आयोजित हुआ जिसमें भाषा व क्षेत्रीय विविधता के कारण दर्शकों से दूर सार्थक फिल्मों (खासतौर से मानसिक स्वास्थ्य व अन्य)को आमजन तक लाने की कोशिश की गई. जबकि अधिवेशन भवन में  ग्रामीण स्नेह फाउंडेशन के तत्वावधान में आयोजित “बिहार; एक विरासत कला एवं फिल्म महोत्सव 2016” का आयोजन सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों के सहयोग से किया गया. इस फेस्टिवल की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि यह पूर्णरूप से बिहार की सभ्यता- संस्कृति एव कला –फिल्म पर केंद्रित थी. सचिवालय परिसर में स्थित अधिवेशन भवन में मुंबई –दिल्ली आदि शहरों में रहकर फ़िल्मी दुनियां में परचम फहराने वाले बिहार के बेटे –बेटियों का ही जमावड़ा नहीं लगा बल्कि कुछ राष्ट्रीय स्तर के नेताओं, नौकरशाहों एवं बुद्धिजीवियों के मिलन का भी यह साक्षी बना. जहां पूरे परिसर को मिथिला की कलाकृतियों से सजाने की कोशिश की गई वहीं बिहारी पहचान को बिखेरती एक से बढ़कर एक नक्काशी के नमूनों, कपड़ों आदि की दुकानें भी सजाई गई. 
साथ ही राज्य के नौवों प्रमंडल से प्रतियोगिता के आधार पर चुनकर आए प्रतिभागियों के कलाओं का प्रदर्शन एवं पुरस्कार वितरण भी किया गया. और इन सब से हटकर जो सबसे खास बात रही वह थी बिहारी फिल्मकारों द्वारा बिहार से जुड़ी फ़िल्मी समस्याओं पर खुलकर बोलना एवं कला –संस्कृति मंत्री शिव चन्द्र राम द्वारा आश्वासनों की झड़ी लगा देना.
17 मार्च से 20 मार्च तक आयोजित इस चार दिवसीय कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र के दौरान फिल्मकार शत्रुघ्न सिन्हा, शेखर सुमन, नीतू चंद्रा, नितिन चंद्रा, अविनाश दास, चंद्र प्रकाश द्विवेदी, अजय ब्रह्मात्मज, शारदा सिन्हा आदि लोग उपस्थित थे जिन्होंने बिहार की सभ्यता संस्कृति के इतिहास, वर्तमान एवं संभावनाओं पर जमकर बातें कहीं. बिहारी सभ्यता-संस्कृति के गुणगान के बीच शत्रुघ्न सिन्हा ने बिहार, बिहारी के अलावे अपने नए किताब “खामोश..” की भी चर्चा की. सुबह के सत्र में जहां “गूंजा” फिल्म दिखाई गई वहीं बाद के सत्र में “मिथिला मखान” फिल्म का प्रदर्शन हुआ.
18 मार्च को प्रकाश झा की फिल्म “सुनहरी दास्तान” के बाद बातचीत के दौरान चाणक्य धारावाहिक से जुड़ी कहानियों को सुनाते हुए चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने कहा –“बिहार की पहचान इसके विचारों में है. क्रांति करने की शक्ति में है. बिहारी मतलब अड़ियल, अपनी बातों पर अड़े रहने वाला. यही इसका सकारात्मक पक्ष भी है और नकारात्मक भी.” दर्शकों के बीच से एक सवाल उछला कि क्यों नहीं सिनेमा को भी स्कूली पाठ्यक्रम में जोड़ा जाए ताकि माता –पिता बच्चों की बातों को समझ उन्हें कुछ हद तक छूट दे सकें जिसके जबाब में उन्होंने फ़िल्म एवं टेलिविज़न क्षेत्र में कार्यरत कलाकारों के वास्तविक संघर्ष की बात बताते हुए कहा कि इस क्षेत्र में हर तरीके के त्याग की जरूरत होती है और कोई भी इंसान व्यक्तिगत प्रतिभाओं के बदौलत ही इसमें टिक सकता है.चक दे इण्डिया से सुर्ख़ियों में आई वैशाली की शिल्पा शुक्ला ने भी इसी सत्र में अपने फ़िल्मी सफर और 18 वर्ष की उम्र में पाकिस्तान जाने और अपने परवरिश की बात बताई. साथ ही बिहार केंद्रित फिल्म बनाने की बात भी कही.


“बिहार में फिल्म की चुनौतियां” सत्र में मनोज वाजपेयी ने भोजपुरी फिल्मकारों को बिहारी संस्कृति को देशभर में बदनाम करने और सरकारी स्तर पर मिलने वाले असहयोग के लिए खूब बोले. जिनमें उनका साथ दिया नितिन चंद्रा, शिल्पा शुक्ला, और आर एन दास ने. जबकि अविनाश दास सिर्फ अपनी मोडरेटर की ही भूमिका में ही रहे. बाद में राज्यसभा सदस्य पवन वर्मा एवं चिल्ड्रेन फिल्म सोसाइटी के सीओ श्रवण कुमार ने भी अपनी बातें रखी. शाम के सत्र में “गंगा मैया तोहे पियरी चढैइबो” का प्रदर्शन हुआ.
19 मार्च को “मिर्च मसाला” और “मांझी द माउंटेन मैन” जैसी फिल्मों को बनाने वाले केतन मेहता ने बताया कि जब वे बिहार में शूटिंग के लिए तैयारी कर रहे थे तो किस तरह लोगों ने बिहार के नाम पर डराया था – अपहरण हो जाने तक की बातें कहीं. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है. अब यह सब भ्रम दूर हो गया. बेहतर लोकेशन हैं, लोगों का प्यार और सहयोग है. जो दिक्कते आई वे दूसरी जगहों पर भी आती हैं. यहां कई कहानियां हैं जिन्हें फिल्माने की जरूरत है. “नयना जागीन” फिल्म प्रदर्शन के बाद “पर्दे पर कैसा दिखता है बिहार” में चर्चित अभिनेता संजय मिश्रा, अखिलेन्द्र मिश्रा, ऋचा सिंह, शिल्पा शुक्ला आदि ने फिर से भोजपुरी कलाकारों को निशाने पर लिया. चंद्रकांता में क्रूर सिंह की भूमिका निभाने वाले अखिलेन्द्र मिश्रा ने कहा – “बिहार को जाने बिना बिहार पर फ़िल्में बनाई जा रही है. बिहार की कहानियां दिखाई जा रही है लेकिन उसमें बिहार कहीं दिखता नहीं.” आँखों देखी और मसान जैसी फिल्मों के लिए पुरस्कृत संजय मिश्रा ने कहा –“ये भोजपुरी वाले अभी तक चोली –लहंगा में ही अटके हुए हैं. पूरी संस्कृति का सत्यानाश कर दिया है.” आगे उन्होंने कहा कि यदि सरकार सहूलियतें दें तो वे मुफ्त में यहां की फिल्मों में काम करने के लिए तैयार हैं. शिल्पा शुक्ला ने कहा –“यहां बहुत ही सुन्दर गांव हैं. अच्छी शूटिंग की जा सकती है.” मिसेज यूनिवर्स साउथ एशिया ऋचा सिंह ने भी सहूलियत मिलने पर काम करने की बातें कहीं. शाम के सत्र में “तीसरी कसम” फिल्म का प्रदर्शन हुआ.
20 मार्च को अखिलेन्द्र मिश्रा ने जहां बातचीत में बिहार की संस्कृति को नुकसान पहुँचने वाले पर अंकुश लगाने और बेहतरीन फिल्मों के निर्माण के लिए सबके सहयोग की बात कही वहीं संजय मिश्रा, अविनाश दास, प्रवीण कुमार, विनीत कुमार, शिल्पा शुक्ला, संजय झा, केतन मेहता, रेखा झा आदि ने भी सकारात्मक सहयोग एवं माहौल की बातें दुहराई जबकि सिने स्टार और लोकसभा के सदस्य मनोज तिवारी ने आयोजक गंगा कुमार और स्नेहा राउट्रे को धन्यवाद देते हुए कहा कि यदि वे उनके पास फिल्म निर्माण का कोई प्रस्ताव लेकर आएंगें तो वे आर्थिक मदद करने को तैयार हैं.
सभी प्रतिभागियों एवं सम्मानितों को पुरस्कार देने के बाद समापन समारोह में कला संस्कृति मंत्री शिवचंद्र राम ने जब अपना जोशीला भाषण देते हुए शत्रुघ्न सिन्हा, सोनाक्षी सिन्हा से भोजपुरी कलाकार निरहुआ और खेसारी लाल का गुणगान करने लगे. मंत्री जी अपने जिस अंदाज में बोल रहे थे उससे लोगों की आशाएं बढ़ गई लेकिन आश्वासनों की झड़ी में कुछ भी नया नहीं मिला. अपने भाषण में राजगीर में फिल्म सिटी बनने और राज्य में फिल्म नीति बनने की बातें बताई. जहां उन्होंने शीघ्र ही पटना में फिल्म सेंसर बोर्ड के शाखा के खुलने की बात बताई वहीं बिहारी सभ्यता संस्कृति पर केंद्रित और पचहत्तर प्रतिशत बिहारी कलाकारों के साथ फिल्म बनाने वालों को पचास प्रतिशत राज्य से अनुदान देने की बात कही, जो कि पटना फिल्म फेस्टिवल के उद्घाटन समारोह में भी कही गई थी.
फिल्म “मांझी : द माउंटेन मैन” के प्रदर्शन के बाद समारोह का समापन इस घोषणा के साथ हुआ कि फिर हमलोग 14 नवम्बर 2016 को चिल्ड्रेन फिल्म सोसाइटी की ओर से आयोजित बाल फिल्म समारोह में और ग्रामीण स्नेह फाउंडेशन के तहत आगामी जनवरी –फरवरी 2017 में मिलेंगें .
इस तरह कलाकारों के एक दूसरे पर आरोप- प्रत्यारोप और मांगों के बीच बिहारी सभ्यता-संस्कृति पर बहस चारों दिन चलती रही. संभावनाओं के साथ सहयोग से काम करने के वादे होते रहे. और अंत में सरकार की ओर से आश्वासनों की झड़ी लगा दी गई. जिसके साथ ही महीने भर से चला आ रहा फिल्म समारोहों का दौर थम गया.

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सोमवार, 14 मार्च 2016

समाज में बढ़ते विचलन, विखंडन के बीच सार्थक फिल्मों की बहुत जरूरत है: मोहन अगाशे

सुशील कुमार भारद्वाज
यूं तो फिल्म और समाज का रिश्ता जगजाहिर है लेकिन जब बात सीधे फिल्म और आपके मन की हो तो बातें खास हो जाती हैं क्योंकि फिल्मों का सीधा असर आपके मन –मस्तिष्क पर पड़ता है. और जब रंगमंच एवं सिनेमा के प्रख्यात अभिनेता एवं मनोचिकित्सक डॉ मोहन अगाशे इस चर्चा में शरीक होते हुए सवाल करते हैं कि तन की सुंदरता के लिए तो जगह जगह जिम खोले जा रहे हैं लेकिन मन की सुंदरता के लिए क्या किया जा रहा है? तो चौंकना लाजिमी है. लेकिन वे आगे कहते हैं कि मन को ठीक रखने के लिए साईंको जिम खोलने की जरूरत है. सायको जिम का यह काम पुराने ज़माने में हमारे संस्कार करते थे, परिवार के बूढ़े बुजुर्ग करते थे, लेकिन आज इन सब की जिम्मेवारियां टेलीविजन, मीडिया और इन्टरनेट के सहारे रह गई हैं, जो कि संतुलित और पौष्टिक भोजन के बजाय वैसे जंक फ़ूड दे रहे हैं जो हमारे तन के साथ साथ मन को भी बुरी तरह से प्रभावित कर रहे हैं.
जी हां, डॉ मोहन अगाशे यह बात पटना स्थित पटना म्यूजियम के कर्पूरी ठाकुर सभागार में विजय मेमोरियल ट्रस्ट के तत्वाधान में आयोजित “मनोवेद फिल्म फेस्टिवल” में राजधानी के सम्मानित साहित्यकार, फ़िल्मकार, राजनेता एवं नौकरशाह के अलावे बुद्धिजीवी दर्शकों के बीच में कह रहे थे.
पहली बार आयोजित मनोवेद फिल्म फेस्टिवल के स्वागत भाषण में कार्यक्रम के आयोजक डॉ विनय कुमार ने कहा कि इस नई पहल का उद्देश्य फिल्मों के भीड़ में से सार्थक, सोद्देश्य एवं प्रश्नाकुल करती फिल्मों को आमजन तक पहुँचाना है. वैसी अंतर्राष्ट्रीय एवं भारतीय फिल्मों को प्रदर्शित करने की कोशिश होगी जो भौगौलिक एवं भाषाई कारणों से हम तक पहुंच नहीं पातीं हैं और जो खासतौर पर मनुष्य और समाज के स्वास्थ्य / मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विषयों को संबोधित करती हो.
कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए पद्मश्री उषा किरण खान ने कहा कि ऐसी फिल्मो का प्रदर्शन साल में एक बार नहीं बल्कि चार बार हो तथा जनजागरूकता वाले ऐसे कार्यक्रमों की चर्चा भी खूब होनी चाहिए ताकि लोग अपने तन के साथ साथ मन का भी ध्यान रख सकें .
समारोह में प्रदर्शित पहली फिल्म अस्तु थी, जो कि इल्जाइमर्स डिमेंशिया रोग से ग्रसित सेवानिवृत बुजुर्ग चक्रपाणी शास्त्री एवं उनके परिवार की कहानी है. ऐसी स्थिति में पति –पत्नी एवं बड़े होते बच्चों वाले परिवार की क्या स्थिति होती है? साथ ही कहानी बताती है कि जब शास्त्री बाजार में कुछ पल के लिए अकेला होने की स्थिति में गाड़ी से बाहर आ हाथी वाले महावत के साथ पीछे –पीछे चले जाते हैं तो उनका दिन कैसे गुजरता है जबकि दोनों ही एक दूसरे की भाषा समझने में असमर्थ हैं. दिखाई गई दूसरी फिल्म ‘जिंदगी जिंदाबाद’ भारतीय महानगर में एड्स के जटिल यथार्थ एवं जागरूकता पर केंद्रित फिल्म है , जिसमें जीवन के मूलभूत संघर्ष एवं मानवीय रिश्तों के दरारों में पनपे यौन सम्बंध, भटकता बचपन, ब्लड ट्रांसफ्यूजन आदि को उकेरने के साथ साथ मन में एड्स के प्रति बैठी विभिन्न भ्रांतियों को भी तोड़ने की कोशिश की गई है.
संवाद सत्र के दौरान फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम के साथ बातचीत में मोहन अगाशे ने कहा कि समाज में बढ़ते विचलन, विखंडन के बीच  सार्थक फिल्मों की बहुत जरूरत है. आगे उन्होंने कहा कि हमलोग तो कहकर नाटक करते हैं लेकिन यहां लोग जीवन में बिना कहे ही दिन रात नाटक करते रहते हैं, सुबह से शाम तक में अपनी भूमिकाएं बदलते रहते हैं. हमलोगों ने अपनी जिंदगी को बहुत सारी जिम्मेवारियों को मोबाइल जैसी तकनीकों के सहारे छोड़ रखा है जिससे बचने की जरूरत है.

मनोवेद फिल्म फेस्टिवल की यह पहल खुशगवार मौसम में न सिर्फ दर्शकों को समेटने में सफल रही बल्कि अपने उद्देश्यपूर्ति में भी आगे रही.

मंगलवार, 8 मार्च 2016

प्रगतिशील समाज का वीभत्स रूप है अवधेश प्रीत की नई किताब “चांद के पार एक चाभी” - ( पुस्तक समीक्षा ) सुशील कुमार भारद्वाज

प्रगतिशील समाज का वीभत्स रूप है अवधेश प्रीत की नई किताब “चांद के पार एक चाभी”

चांद के पार एक चाभी


 सुशील कुमार भारद्वाज


वरिष्ठ कथाकार अवधेश प्रीत की नई किताब है- “चांद के पार एक चाभी”. अवधेश प्रीत उन गंभीर रचनाकारों में से एक हैं जो नृशंस, हस्क्षेप, हमजमीन, एवं कोहरे में कंदील, जैसी चर्चित कथासंग्रहों से लगातार सामाजिक समस्याओं पर प्रहार करते रहे हैं. जिनके यथार्थवादी रचनाओं में किस्स्गोई एवं शिल्पगत विशेषताओं के कारण यह फर्क करना मुश्किल हो जाता है कि कहानी वास्तविक है या काल्पनिक. प्रस्तुत संग्रह की भी सभी आठ कहानियां उसी परम्परा का निर्वाह करते हुए प्रगतिशील समाज में हो रहे सामाजिक, मानसिक, वैचारिक एवं आर्थिक बदलाव के बीच उत्पन्न बौखलाहट, छटपटाहट, शोर एवं व्याप्त अराजकता को निरुपित करती है. जहां संग्रह की कहानियों में एक तरफ ग्रामीण परिवेश का जातिगत समस्या है तो दूसरे तरफ शहर के भागदौड भरी जिंदगी के बीच असुरक्षा और साम्प्रदायिकता का दंश भी. भावना से अलग तटस्थता का भाव है तो मानवता और अस्तित्वरक्षा के लिए जूझते सवाल भी.   
संग्रह की पहली कहानी “चांद के पार एक चाभी” की ही बात करें तो यह उस विकासशील समाज के उपर एक जोरदार तमाचा है जहाँ शिक्षा एवं तकनीक का विस्तार तो हो रहा है लेकिन जातिगत संरचना अभी भी परंपरागत रूप से अपनी गहरी जड़ें दूर अंधेरे में जमाए हुए है. जहां सामंतवादी विचारधारा के लोग अपनी सुविधा के अनुसार समाज के कायदे कानून इस प्रकार गढे जा रहें हैं कि उससे निकलना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर जान पड़ता है. जिसमें बेबस कानून व्यवस्था भी रक्षक की बजाय भक्षक की ही भूमिका में नज़र आती है.
“नयका पोखरा” को पहली ही कहानी का विस्तार माना जा सकता सकता है जिसमें सामंतवादी विचार के प्रतिकार के रूप में जिस पिंटू कुमार का अंकुरण हुआ था वह सुमन के रूप में परिणत होते दिखती  है. सुमन “चांद के पार एक चाभी” की राजकुमारी की तरह समाज के ठेकेदारों के समक्ष आत्मसमर्पण एवं अपमान सहने के बाद आत्महत्या करने की बजाय अपने साथ हुए दुर्व्यवहार को मुखिया जी के सामने भरी सभा में रखती है और न्याय के लिए संघर्षरत दिखती है. साथ ही साथ इस बदलाव के कारण समाज के ठेकेदारों की कम होते प्रभुत्व का खींझ और बौखलाहट चेहरे और व्यवहार में भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगता है. जहां स्त्री पितृसत्तात्मक समाज को दलित कानून और राजनीति के सहारे एक साथ चुनौती देते हुए उनकी चूलें हिलाने की कोशिश करती हैं.
अवधेश प्रीत जितनी बेबाकी से समाजवाद पर कलम चलाते हैं उतनी ही बेबाकी से मार्क्सवाद और पूंजीवाद के टसल को भी निशाने पर लेते हैं. उनकी अगली कहानी “999” समाजवाद से इतर मार्क्सवादी विचारधारा की कहानी है, जो कि बहुदेशीय कंपनियों में टारगेट बनते पेशेवर युवाओं के संघर्ष की पृष्ठभूमि में लिखी गई है. जहां बदले माहौल में बदलते जीवन शैली, मूल्य, एवं रिश्तों में पनप रहे भ्रष्टाचार, आर्थिक एवं भावनात्मक शोषण के बीच दिवाकर अंकल जैसे यूनियन लीडर की जरूरत महसूस की जाती है.
जबकि अगली कहानी “एक मामूली आदमी का इन्टरव्यू” को हित टकराव की कहानी के रूप में भी देखा जा सकता है. जहां एक तरफ पूर्ण जड़, विकास के अंधी दौर से दूर आम आदमी के शक्ति का एहसास होता है वहीं पत्रकारिता में हो रहे आमूलचूल व्यवहारिक परिवर्तन को भी रेखांकित किया गया है. जहां इनोवेशन के काम में भी विज्ञापनदाताओं के हितों को आमजन के समस्याओं पर तरजीह दी जाती है. पत्रकारिता अब मिशन नहीं मुनाफा का वह जरिया है जहां हित टकराव की स्थिति में पत्रकार के रोजीरोटी पर भी बन आती है.
पत्रकारिता जगत की ही क्रूर सच्चाइयों के पृष्ठभूमि में लिखी गई है संग्रह की अगली कहानी “सपने”. इस कहानी में उन युवाओं के बनते-बिखरते अरमानों और बेबशी की झलक मिलती है जो बड़े बड़े सपनों के साथ पत्रकारिता संस्थानों में नामांकन तो लेते हैं लेकिन वस्तु स्थिति एवं मूल्यों के टकराव के बाद जीविकोपार्जन के लिए जिंदगी के सारे सपनों से समझौता करने को तैयार हो जाते हैं.
इस संग्रह की सबसे जुदा कहानी है –“सदमा”. जिसमें लेखक ने बदलते माहौल में क्षय होते नैतिक मूल्यों को ही न सिर्फ निशाने पर लिया है बल्कि जीवन के विविध स्वरूपों में समाये भ्रष्टाचार को भी रेखांकित किया गया है. जिसने भरोसा और विश्वास जैसे शब्दों को ही बेकार साबित कर दिया है. अब यह विश्वास कि हम गलत नहीं हैं इसलिए हमारे साथ गलत नहीं होगा, टूट कर बिखरता जा रहा है. कहानी में न तो उपदेश है न आदर्श की स्थापना, लेकिन घातक यथार्थवाद के सहारे सुसुप्त होते मानवता को झकझोरने की भरपूर कोशिश की गई है.
अवधेश प्रीत अपने कलम का प्रयोग अपनी सामाजिक जिम्मेवारी को निभाने में भी करते हैं. आज जब हमारे चारो ओर का माहौल भयाक्रांत होता जा रहा है. सांप्रदायिक सद्भाव खतरे में है, धार्मिक कट्टरता एवं आतंकवाद एक दूसरे का पर्याय बनते जा रहे हैं तो अलगाव एवं वैमनष्यता के सायकी को भेदने की कोशिश करती है उनकी अगली कहानी “अम्मी”. ताकि समाज के असंख्य निर्दोषों को होने वाले जुल्मों से बचाया जा सके. जबकि संग्रह की सबसे अंतिम कहानी “रैकेटवा” चोट करती है उस भ्रष्ट शासन व्यवस्था पर जहां न्याय पाने की बजाय प्रतिभा दलालों के चंगुल में फंस कर बर्बाद हो जाती है.
अवधेश प्रीत की शिल्प-कला उनके शब्दों एवं प्रयोगों में साफ़ साफ़ परिलक्षित होती है जो न सिर्फ पाठकों को गुदगुदाती और रूलाती है बल्कि अपने आगोश में समा कर एक लम्बी सैर भी कराती है, जो सोचने समझने को मजबूर करती है कि एक मनुष्य के रूप में उसका क्या कर्तव्य बनता है? क्या होना चाहिए था और क्या हो रहा है?
साहित्य हमारे जीवन और समाज का आईना होता है जिसमें जीवन की विभिन्न विविधताएं साफ़ साफ़ झलकती हैं. साहित्य सिर्फ प्रतिरोध का एक जरिया ही नहीं होता है बल्कि जीवन जीने की कला और प्रेरणा का स्रोत भी होता है. जीवन के पथ पर नित-नित हो रहे सकारात्मक एवं नकारात्मक परिवर्तनों के बीच नई उम्मीद की किरणों में खुद को पहचानने और अपने अस्तित्व के जंग को जीत लेने की जीवटता अंदर तक झकझोर देती है. ऐसा तभी हो पता है जब कोई लेखक गंभीरता के साथ समय में जरूरी हस्तक्षेप करता है. सच्चाई को बेबाकी के साथ साहित्यिक लहजे में बिना किसी कलुषित भावना के सलीके से प्रस्तुत करता है. और निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि अवधेश प्रीत इसमें सफल रहे हैं.
पुस्तक – चांद के पार एक चाभी
कथाकार – अवधेश प्रीत
मूल्य – 199/- (पेपरबैक)
प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली.



शुक्रवार, 4 मार्च 2016

पटना फिल्म फेस्टिवल 2016 : एक नई पहल (सुशील कुमार भारद्वाज)

  


जब प्रकृति ऋतुओं के राजा वसंत के स्वागत में खड़ी थी, पेड़-पौधे अपने पुराने पत्तों को छोड़ नए रूप में धरती पर नयनाभिराम हरितिमा की एक अलख जगाने के लिए मचल रही थी, उसी पल बिहार के पावन धरती पर उत्साह –उमंग का एक महोत्सव चल रहा था. नए वर्ष में लिखेंगें नई कहानी के तर्ज पर वसंत ऋतु के गुनगुने धूप-छांव में राजनीतिक एवं गैर- राजनीतिक शोरशराबे से कहीं दूर, जीवन के विविध कलाओं से पूर्ण क्लासिकल फिल्मों का प्रदर्शन पटना में चल रहा था. पटना फिल्म महोत्सव (पटना फिल्म फेस्टिवल) का आयोजन कला संस्कृति एवं युवा विभाग की ओर से पहली बार किया गया. जिसके उद्घाटन सत्र में राज्य के सबसे युवा उप –मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव अपने सम्बोधन में कह रहे थे कि बिहार के सकारात्मक पहलुओं पर काम किया जाय. नकारात्मक छवि को प्रस्तुत कर राज्य पर बदनुमा दाग देने की बजाय बिहार के कला संस्कृति में निखार लाने की कोशिश की जाय. उन्होंने फिल्मकारों को आश्वासन भी दिया कि बिहार में बिहारी कलाकारों के साथ मिलजुल कर बिहारी सभ्यता संस्कृति पर काम करने वालों को वे अपनी तरफ हर संभव मदद देंगें.  कला संस्कृति एवं युवा विभाग के मंत्री शिवचंद्र राम ने भी अपनी बात रखते हुए सरकार के स्तर पर विविध सुविधा मुहैया कराने की बात कही. जबकि विभाग के प्रधान सचिव विवेक कुमार सिंह ने अपने संबोधन में खुशखबरी दी कि फिल्म सिटी के निर्माण के लिए 20 एकड़ जमीन का अधिग्रहण राजगीर में कर लिया गया है. फिल्म नीति भी बनकर तैयार है जिसके एक दो महीने में सार्वजनिक हो जाने की सम्भावना है. गाँधी मैदान स्थित श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में आयोजित इस उद्घाटन समारोह के साक्षी बने फिल्म निर्देशक नितिन कक्कड़, अभिनेत्री दिव्या दत्ता, कुमुद मिश्र, शेखर सुमन, कला, संस्कृति विभाग के प्रधान सचिव विवेक कुमार सिंह, विभाग के निदेशक सत्यप्रकाश मिश्र, और केन्द्रीय फिल्म महोत्सव निदेशालय के निदेशक सी सेंथिल राजन एवं अन्य गणमान्य लोग. मोना सिनेमा में उद्घाटन फिल्म राम सिंह चार्ली के प्रदर्शन के पूर्व आगंतुकों ने स्थानीय कलाकारों द्वारा प्रस्तुत बिहार गीत एवं बिहार गौरव गीत का आनंद लिया.
ज्ञात हो कि पटना की धरती पर फिल्म समारोह का यह सिलसिला हाल के वर्षों में वर्ष 2006 से चल रहा है. काफी उत्साह–उमंग के साथ शुरू हुए पहले फिल्म महोत्सव में बिहार के फ़िल्मकार प्रकाश झा समेत बॉलीवुड के कई सितारे शरीक हुए थे. जिसकी चर्चा काफी दिनों तक चली थी. 11- 18 फरवरी 2006, फरवरी 2007, और 5-12 अप्रैल 2008 के बाद फिल्म महोत्सव का यह सिलसिला बंद हो गया था. पिछले वर्ष 2015 में एक निजी प्रयास से चार दिवसीय अन्तराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का आयोजन किया गया था. और इस बार कला, संस्कृति एवं युवा विभाग ने खुद अपनी रूचि दिखलाई.
लेकिन लंबे अरसे बाद शुरू हुए इस फिल्म समारोह की सबसे अच्छी बात यह रही कि भारतीय पैनोरमा की आठ भाषाओं की स्तरीय (राष्ट्रीय) एवं क्लासिकल फिल्मों को देखने के लिए किसी को न तो रुपए खर्च करने पड़े न ही किसी को पास का इंतज़ार. दर्शक सिर्फ अपने एक पहचान पत्र के सहारे पटना के गाँधी मैदान स्थित मोना एवं एलिफिस्टन सिनेमा में पहुँच, पहले आओ पहले पाओं की तर्ज पर 19  फरवरी से 25 फरवरी तक साठ के दशक से अब तक बनी 28 चुनिन्दा सामाजिक फिल्मों का आनंद सुबह दस बजे से चार शो में लेते रहे. इनमें 14 फ़िल्में हिन्दी, पांच बांग्ला, भोजपुरी, मराठी और अंग्रेजी की दो –दो और संस्कृत, मलयालम एवं कोंकणी की एक –एक थी. समारोह की शुरुआत मोना सिनेमा हॉल में रामसिंह चार्ली से हुई तो समापन बजरंगी भाईजान के प्रदर्शन के साथ. दिखाई गई अन्य फीचर एवं ड्कुमेंटरी फिल्मों में ‘द कौफिन मेकर, दो बीघा जमीन, चाइनीज विस्पर्स, सिनेमावाला, नाचोम-इया- कुम्पसर, पान सिंह तोमर, डैडी ग्रैंड पा एंड माई लेडी, मसान, प्रियमानस, कागज के फूल, आंखों देखी, कामाक्षी, तिनकहों, देवदास, सीक एंड हाइड, उत्ताल, जल, नाटोकेर मोटो, काबुलीवाला, गूंगा पहलवान, अनवर का अजब किस्सा, कत्यार कलजात घुसाली, लिसेन अमाया, मेघे धाकातारा, ऐन, हम बाहुबली, प्रमुख रही. संस्कृत, मराठी, कोंकणी, मलयालम आदि अन्य भाषाओं की फिल्मों के दर्शक अपेक्षाकृत कुछ कम रहे, लेकिन पान सिंह तोमर, दो बीघा जमीन, कागज के फूल, देवदास, बजरंगी भाईजान, आदि फिल्मों को देखने के लिए अपार भीड़ उमर पड़ी. हॉल के अंदर का नज़ारा यह था कि युवा तो युवा लगभग सत्तर की उम्र पार कर चुके दर्शक भी नजर आ रहे थे.
पटना फिल्म फेस्टिवल की सबसे अनोखी बात रही फ्रेजर रोड स्थित बहुद्देशीय सांस्कृतिक परिसर में रोजाना साढ़े बारह बजे से ढाई बजे तक आयोजित फिल्म प्रदर्शनी एवं कार्यशाला. भारतीय नृत्यकला मंदिर की आर्ट गैलरी में 16 फरवरी को फिल्म अभिलेखागार पुणे की ओर से पोस्टर प्रदर्शनी लगाई गई जिसमे 1940 -1980  के बीच की चर्चित फिल्मों औरत, भूमिका, भुवन सोम समेत 74 फिल्मों के पोस्टरों को  शामिल किया गया. दरअसल संवाद कार्यक्रम का उद्देश्य था फ़िल्मकार, रंगकर्मी एवं अन्य फिल्म प्रेमी सीधे रूप में ख्यातिप्राप्त अभिनेता, निर्देशक, निर्माता, छायाकार आदि के अनुभवों को न सिर्फ सुने बल्कि फिल्म निर्माण से जुड़ी जानकारी भी ले सकें. साक्षात् रूप में वे उनसे अपने प्रश्न कर सकें. जहां आमंत्रित नितिन कक्कड़, बुद्धदेव दासगुप्ता, इम्तियाज अली, अभय सिन्हा, मोनालिसा, सिद्धार्थ सिवा, महेश अने, अविनाश दास, पंकज त्रिपाठी, पंकज केशरी जैसे फिल्कारों ने अपने फ़िल्मी सफर एवं अनुभवों को बताया वहीं फिल्मों के बारें में भी विविध पहलुओं एवं तकनीकों की भी जानकारी दी. इम्तियाज अली और नितिन कक्कड़ ने विशेष रूप से फिल्म निर्माण से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें भी बताई. इस कार्यक्रम की सफलता को आप इससे भी आंक सकते हैं कि अधिकांश दिन हॉल में पीछे तक लोग जमे रहे. कुछ फिल्म मर्मज्ञों ने भी अपने प्रश्न जड़ बातचीत को एक नया आयाम दिया. साथ ही साथ सिनेमा के क्षेत्र में अपने जीवन की शुरुआत करने के इच्छुक कुछ लोग सीधे रूप से निर्माता–निर्देशक से मिल अपनी बातें रखीं और संभावनाओं के रास्ते भी तलाशे. और सबसे खास बात ये रही कि अधिकांश आमंत्रित फ़िल्मकार किसी ना किसी रूप में बिहारी ही थे जो अपनी पहचान राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय स्तर पर बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
इस फिल्म समारोह के बहाने न सिर्फ बिहार से जुड़े फिल्मकारों ने अपनी समस्याओं से विभाग को अवगत कराया बल्कि सुविधा मिलने की स्थिति में यहीं फिल्म निर्माण करने की भी बात कही. जहां शेखर सुमन ने उद्घाटन सत्र में ही जेपी (लोकनायक जय प्रकाश नारायण) पर फिल्म बनाने की बात कही वहीं भोजपुरी सिनेमा के निर्माता अभय सिन्हा ने बाबू वीर कुंवर सिंह पर फिल्म बनाने की बात कही. जहां फिल्मकारों ने वर्षों से विभाग में लटकी अपनी मांगों एवं योजनाओं का स्मरण कराया वहीं विभाग की ओर से भी इस क्षेत्र में हो रहे विकास कार्यों से लोगों को अवगत कराया गया. साथ ही बहुत जल्द फिल्म सेंसर बोर्ड की शाखा पटना में भी खुलने की खुशखबरी दी. जिसपर फिल्मकारों ने भी भरपूर सहयोग करने की बात कही.
सिनेमा हॉल में भीड़ तो खूब जुटी लेकिन कुछ लोग यह भी चर्चा करते नज़र आए कि मैथिली, मगही आदि क्षेत्रीय फिल्मों को भी अपने ही जमीन पर थोड़ा सम्मान मिलता तो जुड़े कलाकारों का उत्साह उमंग और बढ़ता. वे अपनी सहभागिता में और योगदान देते. फिर भी विभाग की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम को लोगों ने काफी सराहा.
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मंगलवार, 1 मार्च 2016

उस रात (लघुकथा) - सुशील कुमार भारद्वाज

                उस रात (लघुकथा)
- सुशील कुमार भारद्वाज



उस रात दिल और दिमाग दोनों में ही भयंकर हलचल मचा हुआ था| नैतिकता और जिम्मेवारी के सवाल अंदर तक धंसे हुए थे| जीवन की यह पहली और शायद आखिरी घटना थी| अचानक बिजली भी गुल हो गई| लेकिन मैं इस अन्धेरें में भी साफ़ – साफ़ देख रहा था कि वह बाजू वाले बिस्तर पर स्त्री – सुलभ स्वभाव के अनुसार स्वयं को ढक कर लेटी थी| मन को विश्वास न था कि आज की रात हमदोनो नींद से सो पाएँगें| एक दूसरे से अनजान न थे तो कई वर्षों से हमदोनो में कोई बात या मुलाकात भी नहीं हुई थी| यह तो अजीब संयोग है कि दोनों होटल के इस कमरे में रहने को मजबूर हो गए थे |
मैं सोचने लगा – “आज वो मेरे साथ सो सकती थी| इस तरह अलग – अलग बिछावन पर सोने की जरुरत नहीं होती| यूँही चुपी लादे सुबह होने का इंतज़ार करने की बजाय रात हंसी – ठिठोली में गुजर सकती थी| मैंने उससे उसका यह हक छीन लिया| उसकी आँखों में आँसू के जो बूंद आये, उसके लिए मैं भी कहीं न कहीं जिम्मेवार था| क्योंकि मैंने उससे शादी करने से इंकार कर दिया था| नहीं – नहीं यह पूर्ण सत्य नहीं है| मैं इंकार या स्वीकार तो तब करता जब बात मुझ तक पहुँचती| मुझे तो बाद में किसी ने बताया कि संजना के शादी का प्रस्ताव आया था| घर वालों ने हँसते हुए यह कह कर लौटा दिया था कि दो परिवारों की वर्षों की दोस्ती को दोस्ती ही रहने दिया जाय| उनका तर्क था कि दोस्ती कि वजह से रिश्ते में करवाहट आ सकती है|
इसके बाद तो उसके प्रति मेरी सोच ही बदल गयी| उससे अधिक दूरी बनाने की हर संभव कोशिश करने लगा| जब कभी सामना हुआ तो धीरगंभीर बना रहा या यूँ गुजर गया जैसे उसपर मेरी नज़र ही न पड़ी हो| चोर की तरह नज़रें चुराता फिरता| उसके व्यवहार से कभी –कभी सोच में पड़ जाता था कि वह इतनी परिपक्व हो गई या सबकुछ से अंजान है जो बिना हिचक के सामने आ जाती है| कभी – कभी इच्छा होती थी कि एक नज़र उसे निहार लूँ| पर डर जाता था कि कहीं मन की कोमल भावनाएं न जग जायें| घर वाले क्या कहते या करते ये तो बाद की बात होती अगल – बगल वाले पहले बदनाम कर देते| एक ही बात दिमाग में होती – “जब मैं उससे शादी ही नहीं कर सकता तो उसे बदनाम क्यों करूँ?”
आज जब यहाँ हमदोनो के सिवा कोई नहीं है तो मन की सारी भावनाएँ कमरे के इस अँधेरे में उफान मार रही है| -“आखिर क्यों नहीं मुझे उससे शादी कर लेनी चाहिए? क्या मैं घर वालों को समझा नहीं सकता? क्या मैं इतना कमजोर हूँ?
तभी कमरे में एक मीठी सी आवाज गूंजी जिसने मेरा ध्यान खींचा| संजना की मोबाइल बजी थी | और फिर संजना –“ हाँ माँ! मैं ठीक से पहुँच गयी हूँ| ......ओह क्या बताऊँ? शहर में कोई होटल खाली नहीं मिल रहा था बड़ी मुश्किल से एक डबल बेड का रूम मिल गया है| .....अकेले रहने के कारण थोडा महंगा तो है लेकिन क्या करूँ एक ही रात की तो बात है | .......”
उसकी बात सुनकर मुस्कुराये बगैर रह न सका| वाकई वह कमरे में अकेली है? थोड़ी देर पहले ही की तो बात है| मैंने थक कर इस होटल में सिंगल बेड न मिलने के कारण इस कमरे को बुक करा लिया था| उसी समय यह भी काउंटर पर आ पहुंची थी| निराश होकर लौटने ही वाली थी कि मैंने अपना वाला कमरा उसे दे देने को होटल वाले से कहा| वह बहुत खुश हुई थी लेकिन तुरंत पूछ बैठी –“फिर आप कहाँ जाइयेगा? ... प्लेटफोर्म पर?” मैं हामी में सिर हिलाता उससे पहले ही –“आप पुरानीं सोच को छोडिये| वैसे भी यह कोई पटना नही है जो कोई परिचित मिल जाएँगे? रात भर की ही तो बात है?” और असमंजस की स्थिति में मजबूरन उसके साथ क्योंकर तो चल पड़ा?
फिर मेरा ध्यान भंग हुआ जब वह मुझसे बोली –“जानते हैं आज की रात मेरे लिए खास है?” मैं पूछ बैठा- कैसे? तो बोली –“अभी माँ बतायी कि लड़के वालों ने शादी के लिए हाँ कर दी है| कल के बाद पता नहीं मैं कभी कोई परीक्षा दे भी पाऊँगी कि नहीं?.......”
संजना अपने लय में बोले ही जा रही थी कि बिजली भी आ गयी| उसके चेहरे पर वर्षों बाद इतनी चमक देखी थी| अजीब–सा महसूस हो रहा था| मेरे पास मुस्कुराने और उसे बधाई देने के सिवा कुछ नहीं बचा था| इच्छा हुई कि वो सिर्फ बोलती ही रहें ताकि इस दरम्यान में उसे जी भर देख सकूँ| भूल गया कि मैं भी कुछ कहना चाहता था? बातों में पूरी रात कब निकल गयी पता ही न चला|
 

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