प्रगतिशील समाज का वीभत्स
रूप है अवधेश प्रीत की नई किताब “चांद के पार एक चाभी”
![]() |
| चांद के पार एक चाभी |
सुशील कुमार भारद्वाज
वरिष्ठ कथाकार अवधेश
प्रीत की नई किताब है- “चांद के पार एक चाभी”. अवधेश प्रीत उन गंभीर रचनाकारों
में से एक हैं जो नृशंस, हस्क्षेप, हमजमीन, एवं कोहरे में कंदील, जैसी चर्चित
कथासंग्रहों से लगातार सामाजिक समस्याओं पर प्रहार करते रहे हैं. जिनके यथार्थवादी
रचनाओं में किस्स्गोई एवं शिल्पगत विशेषताओं के कारण यह फर्क करना मुश्किल हो जाता
है कि कहानी वास्तविक है या काल्पनिक. प्रस्तुत संग्रह की भी सभी आठ कहानियां उसी
परम्परा का निर्वाह करते हुए प्रगतिशील समाज में हो रहे सामाजिक, मानसिक, वैचारिक
एवं आर्थिक बदलाव के बीच उत्पन्न बौखलाहट, छटपटाहट, शोर एवं व्याप्त अराजकता को
निरुपित करती है. जहां संग्रह की कहानियों में एक तरफ ग्रामीण परिवेश का जातिगत
समस्या है तो दूसरे तरफ शहर के भागदौड भरी जिंदगी के बीच असुरक्षा और
साम्प्रदायिकता का दंश भी. भावना से अलग तटस्थता का भाव है तो मानवता और
अस्तित्वरक्षा के लिए जूझते सवाल भी.
संग्रह की पहली कहानी
“चांद के पार एक चाभी” की ही बात करें तो यह उस विकासशील समाज के उपर एक जोरदार
तमाचा है जहाँ शिक्षा एवं तकनीक का विस्तार तो हो रहा है लेकिन जातिगत संरचना अभी
भी परंपरागत रूप से अपनी गहरी जड़ें दूर अंधेरे में जमाए हुए है. जहां सामंतवादी
विचारधारा के लोग अपनी सुविधा के अनुसार समाज के कायदे कानून इस प्रकार गढे जा
रहें हैं कि उससे निकलना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर जान पड़ता है. जिसमें बेबस कानून
व्यवस्था भी रक्षक की बजाय भक्षक की ही भूमिका में नज़र आती है.
“नयका पोखरा” को
पहली ही कहानी का विस्तार माना जा सकता सकता है जिसमें सामंतवादी विचार के
प्रतिकार के रूप में जिस पिंटू कुमार का अंकुरण हुआ था वह सुमन के रूप में परिणत
होते दिखती है. सुमन “चांद के पार एक
चाभी” की राजकुमारी की तरह समाज के ठेकेदारों के समक्ष आत्मसमर्पण एवं अपमान सहने
के बाद आत्महत्या करने की बजाय अपने साथ हुए दुर्व्यवहार को मुखिया जी के सामने
भरी सभा में रखती है और न्याय के लिए संघर्षरत दिखती है. साथ ही साथ इस बदलाव के
कारण समाज के ठेकेदारों की कम होते प्रभुत्व का खींझ और बौखलाहट चेहरे और व्यवहार
में भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगता है. जहां स्त्री पितृसत्तात्मक समाज को दलित
कानून और राजनीति के सहारे एक साथ चुनौती देते हुए उनकी चूलें हिलाने की कोशिश
करती हैं.
अवधेश प्रीत जितनी
बेबाकी से समाजवाद पर कलम चलाते हैं उतनी ही बेबाकी से मार्क्सवाद और पूंजीवाद के
टसल को भी निशाने पर लेते हैं. उनकी अगली कहानी “999” समाजवाद
से इतर मार्क्सवादी विचारधारा की कहानी है, जो कि बहुदेशीय कंपनियों में टारगेट
बनते पेशेवर युवाओं के संघर्ष की पृष्ठभूमि में लिखी गई है. जहां बदले माहौल में
बदलते जीवन शैली, मूल्य, एवं रिश्तों में पनप रहे भ्रष्टाचार, आर्थिक एवं भावनात्मक
शोषण के बीच दिवाकर अंकल जैसे यूनियन लीडर की जरूरत महसूस की जाती है.
जबकि अगली कहानी “एक
मामूली आदमी का इन्टरव्यू” को हित टकराव की कहानी के रूप में भी देखा जा सकता है.
जहां एक तरफ पूर्ण जड़, विकास के अंधी दौर से दूर आम आदमी के शक्ति का एहसास होता है
वहीं पत्रकारिता में हो रहे आमूलचूल व्यवहारिक परिवर्तन को भी रेखांकित किया गया है.
जहां इनोवेशन के काम में भी विज्ञापनदाताओं के हितों को आमजन के समस्याओं पर तरजीह
दी जाती है. पत्रकारिता अब मिशन नहीं मुनाफा का वह जरिया है जहां हित टकराव की
स्थिति में पत्रकार के रोजीरोटी पर भी बन आती है.
पत्रकारिता जगत की ही
क्रूर सच्चाइयों के पृष्ठभूमि में लिखी गई है संग्रह की अगली कहानी “सपने”. इस
कहानी में उन युवाओं के बनते-बिखरते अरमानों और बेबशी की झलक मिलती है जो बड़े बड़े
सपनों के साथ पत्रकारिता संस्थानों में नामांकन तो लेते हैं लेकिन वस्तु स्थिति एवं
मूल्यों के टकराव के बाद जीविकोपार्जन के लिए जिंदगी के सारे सपनों से समझौता करने
को तैयार हो जाते हैं.
इस संग्रह की सबसे
जुदा कहानी है –“सदमा”. जिसमें लेखक ने बदलते माहौल में क्षय होते नैतिक मूल्यों
को ही न सिर्फ निशाने पर लिया है बल्कि जीवन के विविध स्वरूपों में समाये
भ्रष्टाचार को भी रेखांकित किया गया है. जिसने भरोसा और विश्वास जैसे शब्दों को ही
बेकार साबित कर दिया है. अब यह विश्वास कि हम गलत नहीं हैं इसलिए हमारे साथ गलत
नहीं होगा, टूट कर बिखरता जा रहा है. कहानी में न तो उपदेश है न आदर्श की स्थापना,
लेकिन घातक यथार्थवाद के सहारे सुसुप्त होते मानवता को झकझोरने की भरपूर कोशिश की
गई है.
अवधेश प्रीत अपने
कलम का प्रयोग अपनी सामाजिक जिम्मेवारी को निभाने में भी करते हैं. आज जब हमारे
चारो ओर का माहौल भयाक्रांत होता जा रहा है. सांप्रदायिक सद्भाव खतरे में है, धार्मिक
कट्टरता एवं आतंकवाद एक दूसरे का पर्याय बनते जा रहे हैं तो अलगाव एवं वैमनष्यता
के सायकी को भेदने की कोशिश करती है उनकी अगली कहानी “अम्मी”. ताकि समाज के असंख्य
निर्दोषों को होने वाले जुल्मों से बचाया जा सके. जबकि संग्रह की सबसे अंतिम कहानी
“रैकेटवा” चोट करती है उस भ्रष्ट शासन व्यवस्था पर जहां न्याय पाने की बजाय प्रतिभा
दलालों के चंगुल में फंस कर बर्बाद हो जाती है.
अवधेश प्रीत की
शिल्प-कला उनके शब्दों एवं प्रयोगों में साफ़ साफ़ परिलक्षित होती है जो न सिर्फ पाठकों
को गुदगुदाती और रूलाती है बल्कि अपने आगोश में समा कर एक लम्बी सैर भी कराती है,
जो सोचने समझने को मजबूर करती है कि एक मनुष्य के रूप में उसका क्या कर्तव्य बनता
है? क्या होना चाहिए था और क्या हो रहा है?
साहित्य हमारे जीवन
और समाज का आईना होता है जिसमें जीवन की विभिन्न विविधताएं साफ़ साफ़ झलकती हैं.
साहित्य सिर्फ प्रतिरोध का एक जरिया ही नहीं होता है बल्कि जीवन जीने की कला और
प्रेरणा का स्रोत भी होता है. जीवन के पथ पर नित-नित हो रहे सकारात्मक एवं
नकारात्मक परिवर्तनों के बीच नई उम्मीद की किरणों में खुद को पहचानने और अपने
अस्तित्व के जंग को जीत लेने की जीवटता अंदर तक झकझोर देती है. ऐसा तभी हो पता है
जब कोई लेखक गंभीरता के साथ समय में जरूरी हस्तक्षेप करता है. सच्चाई को बेबाकी के
साथ साहित्यिक लहजे में बिना किसी कलुषित भावना के सलीके से प्रस्तुत करता है. और
निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि अवधेश प्रीत इसमें सफल रहे हैं.
पुस्तक – चांद के
पार एक चाभी
कथाकार – अवधेश
प्रीत
मूल्य – 199/- (पेपरबैक)
प्रकाशक – राजकमल
प्रकाशन, नई दिल्ली.

अवधेश प्रीत जी द्वारा लिखित कहानी 'हंस' में आई थी- 'चाँद के पार एक चाभी'.
जवाब देंहटाएंकहानी को पढ़ना शुरू किया तो मै उसी में डूबता चला गया और एक ही बार में पढ़
लिया जो मेरे दिल को छू गई मैंने उसी तय कऱ लिया की इस कहानी का मंचन ज़रूर करूँगा अवधेश सर से अनुमति लेकर कहानी के मंचन में लगा गया और अभी तक लखनऊ की संस्था थियेट्रॉन के सहयोग से ४ प्रस्तुति हो चुकी है-
पहली प्रस्तुति १ / १२ /२०१७ को राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह कैसरबाग लखनऊ उत्तर प्रदेश
दूसरी प्रस्तुति २६ / १ /२०१८ को लखनऊ महोत्सव के अंतर्गत राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह कैसरबाग लखनऊ उत्तर प्रदेश
तृतीय प्रस्तुति ६ / २ /२०१९ को प्रांगण द्वारा आयोजित पाटलिपुत्र नाट्य महोत्सव २०१९ कालिदास रंगालय, पूर्वी गाँधी मैदान, पटना, बिहार
चर्तुथ प्रस्तुति ३ / ३ /२०१९ को माध्यम फाउंडेशन द्वारा आयोजित
त्रिवेणी नाट्य महोत्सव २०१९ मध्य विद्यालय सोनारू, फतुहा, पटना, बिहार
इसके आगे मंचन का प्रयास जारी है एक बार फिर अवधेश जी का थियेट्रॉन संस्था ( Theatron ) हृदय की अनंत गहराई से आभार व्यक्त करती है ।