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शुक्रवार, 4 मार्च 2016

पटना फिल्म फेस्टिवल 2016 : एक नई पहल (सुशील कुमार भारद्वाज)

  


जब प्रकृति ऋतुओं के राजा वसंत के स्वागत में खड़ी थी, पेड़-पौधे अपने पुराने पत्तों को छोड़ नए रूप में धरती पर नयनाभिराम हरितिमा की एक अलख जगाने के लिए मचल रही थी, उसी पल बिहार के पावन धरती पर उत्साह –उमंग का एक महोत्सव चल रहा था. नए वर्ष में लिखेंगें नई कहानी के तर्ज पर वसंत ऋतु के गुनगुने धूप-छांव में राजनीतिक एवं गैर- राजनीतिक शोरशराबे से कहीं दूर, जीवन के विविध कलाओं से पूर्ण क्लासिकल फिल्मों का प्रदर्शन पटना में चल रहा था. पटना फिल्म महोत्सव (पटना फिल्म फेस्टिवल) का आयोजन कला संस्कृति एवं युवा विभाग की ओर से पहली बार किया गया. जिसके उद्घाटन सत्र में राज्य के सबसे युवा उप –मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव अपने सम्बोधन में कह रहे थे कि बिहार के सकारात्मक पहलुओं पर काम किया जाय. नकारात्मक छवि को प्रस्तुत कर राज्य पर बदनुमा दाग देने की बजाय बिहार के कला संस्कृति में निखार लाने की कोशिश की जाय. उन्होंने फिल्मकारों को आश्वासन भी दिया कि बिहार में बिहारी कलाकारों के साथ मिलजुल कर बिहारी सभ्यता संस्कृति पर काम करने वालों को वे अपनी तरफ हर संभव मदद देंगें.  कला संस्कृति एवं युवा विभाग के मंत्री शिवचंद्र राम ने भी अपनी बात रखते हुए सरकार के स्तर पर विविध सुविधा मुहैया कराने की बात कही. जबकि विभाग के प्रधान सचिव विवेक कुमार सिंह ने अपने संबोधन में खुशखबरी दी कि फिल्म सिटी के निर्माण के लिए 20 एकड़ जमीन का अधिग्रहण राजगीर में कर लिया गया है. फिल्म नीति भी बनकर तैयार है जिसके एक दो महीने में सार्वजनिक हो जाने की सम्भावना है. गाँधी मैदान स्थित श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में आयोजित इस उद्घाटन समारोह के साक्षी बने फिल्म निर्देशक नितिन कक्कड़, अभिनेत्री दिव्या दत्ता, कुमुद मिश्र, शेखर सुमन, कला, संस्कृति विभाग के प्रधान सचिव विवेक कुमार सिंह, विभाग के निदेशक सत्यप्रकाश मिश्र, और केन्द्रीय फिल्म महोत्सव निदेशालय के निदेशक सी सेंथिल राजन एवं अन्य गणमान्य लोग. मोना सिनेमा में उद्घाटन फिल्म राम सिंह चार्ली के प्रदर्शन के पूर्व आगंतुकों ने स्थानीय कलाकारों द्वारा प्रस्तुत बिहार गीत एवं बिहार गौरव गीत का आनंद लिया.
ज्ञात हो कि पटना की धरती पर फिल्म समारोह का यह सिलसिला हाल के वर्षों में वर्ष 2006 से चल रहा है. काफी उत्साह–उमंग के साथ शुरू हुए पहले फिल्म महोत्सव में बिहार के फ़िल्मकार प्रकाश झा समेत बॉलीवुड के कई सितारे शरीक हुए थे. जिसकी चर्चा काफी दिनों तक चली थी. 11- 18 फरवरी 2006, फरवरी 2007, और 5-12 अप्रैल 2008 के बाद फिल्म महोत्सव का यह सिलसिला बंद हो गया था. पिछले वर्ष 2015 में एक निजी प्रयास से चार दिवसीय अन्तराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का आयोजन किया गया था. और इस बार कला, संस्कृति एवं युवा विभाग ने खुद अपनी रूचि दिखलाई.
लेकिन लंबे अरसे बाद शुरू हुए इस फिल्म समारोह की सबसे अच्छी बात यह रही कि भारतीय पैनोरमा की आठ भाषाओं की स्तरीय (राष्ट्रीय) एवं क्लासिकल फिल्मों को देखने के लिए किसी को न तो रुपए खर्च करने पड़े न ही किसी को पास का इंतज़ार. दर्शक सिर्फ अपने एक पहचान पत्र के सहारे पटना के गाँधी मैदान स्थित मोना एवं एलिफिस्टन सिनेमा में पहुँच, पहले आओ पहले पाओं की तर्ज पर 19  फरवरी से 25 फरवरी तक साठ के दशक से अब तक बनी 28 चुनिन्दा सामाजिक फिल्मों का आनंद सुबह दस बजे से चार शो में लेते रहे. इनमें 14 फ़िल्में हिन्दी, पांच बांग्ला, भोजपुरी, मराठी और अंग्रेजी की दो –दो और संस्कृत, मलयालम एवं कोंकणी की एक –एक थी. समारोह की शुरुआत मोना सिनेमा हॉल में रामसिंह चार्ली से हुई तो समापन बजरंगी भाईजान के प्रदर्शन के साथ. दिखाई गई अन्य फीचर एवं ड्कुमेंटरी फिल्मों में ‘द कौफिन मेकर, दो बीघा जमीन, चाइनीज विस्पर्स, सिनेमावाला, नाचोम-इया- कुम्पसर, पान सिंह तोमर, डैडी ग्रैंड पा एंड माई लेडी, मसान, प्रियमानस, कागज के फूल, आंखों देखी, कामाक्षी, तिनकहों, देवदास, सीक एंड हाइड, उत्ताल, जल, नाटोकेर मोटो, काबुलीवाला, गूंगा पहलवान, अनवर का अजब किस्सा, कत्यार कलजात घुसाली, लिसेन अमाया, मेघे धाकातारा, ऐन, हम बाहुबली, प्रमुख रही. संस्कृत, मराठी, कोंकणी, मलयालम आदि अन्य भाषाओं की फिल्मों के दर्शक अपेक्षाकृत कुछ कम रहे, लेकिन पान सिंह तोमर, दो बीघा जमीन, कागज के फूल, देवदास, बजरंगी भाईजान, आदि फिल्मों को देखने के लिए अपार भीड़ उमर पड़ी. हॉल के अंदर का नज़ारा यह था कि युवा तो युवा लगभग सत्तर की उम्र पार कर चुके दर्शक भी नजर आ रहे थे.
पटना फिल्म फेस्टिवल की सबसे अनोखी बात रही फ्रेजर रोड स्थित बहुद्देशीय सांस्कृतिक परिसर में रोजाना साढ़े बारह बजे से ढाई बजे तक आयोजित फिल्म प्रदर्शनी एवं कार्यशाला. भारतीय नृत्यकला मंदिर की आर्ट गैलरी में 16 फरवरी को फिल्म अभिलेखागार पुणे की ओर से पोस्टर प्रदर्शनी लगाई गई जिसमे 1940 -1980  के बीच की चर्चित फिल्मों औरत, भूमिका, भुवन सोम समेत 74 फिल्मों के पोस्टरों को  शामिल किया गया. दरअसल संवाद कार्यक्रम का उद्देश्य था फ़िल्मकार, रंगकर्मी एवं अन्य फिल्म प्रेमी सीधे रूप में ख्यातिप्राप्त अभिनेता, निर्देशक, निर्माता, छायाकार आदि के अनुभवों को न सिर्फ सुने बल्कि फिल्म निर्माण से जुड़ी जानकारी भी ले सकें. साक्षात् रूप में वे उनसे अपने प्रश्न कर सकें. जहां आमंत्रित नितिन कक्कड़, बुद्धदेव दासगुप्ता, इम्तियाज अली, अभय सिन्हा, मोनालिसा, सिद्धार्थ सिवा, महेश अने, अविनाश दास, पंकज त्रिपाठी, पंकज केशरी जैसे फिल्कारों ने अपने फ़िल्मी सफर एवं अनुभवों को बताया वहीं फिल्मों के बारें में भी विविध पहलुओं एवं तकनीकों की भी जानकारी दी. इम्तियाज अली और नितिन कक्कड़ ने विशेष रूप से फिल्म निर्माण से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें भी बताई. इस कार्यक्रम की सफलता को आप इससे भी आंक सकते हैं कि अधिकांश दिन हॉल में पीछे तक लोग जमे रहे. कुछ फिल्म मर्मज्ञों ने भी अपने प्रश्न जड़ बातचीत को एक नया आयाम दिया. साथ ही साथ सिनेमा के क्षेत्र में अपने जीवन की शुरुआत करने के इच्छुक कुछ लोग सीधे रूप से निर्माता–निर्देशक से मिल अपनी बातें रखीं और संभावनाओं के रास्ते भी तलाशे. और सबसे खास बात ये रही कि अधिकांश आमंत्रित फ़िल्मकार किसी ना किसी रूप में बिहारी ही थे जो अपनी पहचान राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय स्तर पर बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
इस फिल्म समारोह के बहाने न सिर्फ बिहार से जुड़े फिल्मकारों ने अपनी समस्याओं से विभाग को अवगत कराया बल्कि सुविधा मिलने की स्थिति में यहीं फिल्म निर्माण करने की भी बात कही. जहां शेखर सुमन ने उद्घाटन सत्र में ही जेपी (लोकनायक जय प्रकाश नारायण) पर फिल्म बनाने की बात कही वहीं भोजपुरी सिनेमा के निर्माता अभय सिन्हा ने बाबू वीर कुंवर सिंह पर फिल्म बनाने की बात कही. जहां फिल्मकारों ने वर्षों से विभाग में लटकी अपनी मांगों एवं योजनाओं का स्मरण कराया वहीं विभाग की ओर से भी इस क्षेत्र में हो रहे विकास कार्यों से लोगों को अवगत कराया गया. साथ ही बहुत जल्द फिल्म सेंसर बोर्ड की शाखा पटना में भी खुलने की खुशखबरी दी. जिसपर फिल्मकारों ने भी भरपूर सहयोग करने की बात कही.
सिनेमा हॉल में भीड़ तो खूब जुटी लेकिन कुछ लोग यह भी चर्चा करते नज़र आए कि मैथिली, मगही आदि क्षेत्रीय फिल्मों को भी अपने ही जमीन पर थोड़ा सम्मान मिलता तो जुड़े कलाकारों का उत्साह उमंग और बढ़ता. वे अपनी सहभागिता में और योगदान देते. फिर भी विभाग की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम को लोगों ने काफी सराहा.
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शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

पटना फिल्म फेस्टिवल 2016

पटना फिल्म फेस्टिवल 2016

नए वर्ष में लिखेंगें नई कहानी के तर्ज पर बिहार की राजधानी पटना में राजनीतिक एवं गैर- राजनीतिक शोरशराबे के माहौल से दूर प्रेममयी वसंत ऋतु के धूप-छांव में ‘पटना फिल्म फेस्टिवल’ कला, संस्कृति एवं युवा विभाग के तरफ से पहली बार आयोजित किया गया है. जबकि पटना की धरती पर फिल्म समारोह की शुरुआत विभिन्न विभागों एवं आयोजकों के सहयोग से वर्ष 2006  से अब तक तीन बार हो चुका है. 11- 18 फरवरी 2006, फरवरी 2007, 5-12 अप्रैल 2008 के बाद फिल्मों का यह सिलसिला बंद हो गया था. लंबे अरसे बाद शुरू हुए इस फिल्म समारोह की सबसे अच्छी बात है कि भारतीय पैनोरमा की विभिन्न भाषाओँ की क्लासिकल फिल्मों को देखने के लिए किसी को न रुपए खर्च करने हैं न ही किसी पास का इंतज़ार. महज अपना एक पहचान पत्र लेकर पटना के गाँधी मैदान स्थित मोना एवं एलिफिस्टन सिनेमा में पहुँच, पहले आओ पहले पाओं की तर्ज पर 20 फरवरी से 25 फरवरी तक वर्ष 1956 से अब तक के बने चुनिन्दा सामाजिक फिल्मों का आनंद सुबह दस बजे से चार शो में लें लिया जा सकता है. दिखाई जाने वाली प्रमुख फिल्मों में द कौफिन मेकर, दो बीघा जमीन, चाइनीज विस्पर्स, सिनेमावाला, नाचोम-इया- कुम्पसर, पान सिंह तोमर, डैडी ग्रैंड पा एंड माई लेडी, मसान, प्रियमानस, कागज के फूल, आंखों देखी, कामाक्षी, तिनकहों, देवदास, सीक एंड हाइड, उत्ताल, जल, नाटोकेर मोटो, काबुलीवाला, गूंगा पहलवान, अनवर का अजब किस्सा, कत्यार कलजात घुसाली, लिसेन अमाया, मेघे धाकातारा, ऐन, देसवा, बजरंगी भाईजान, एवं राम सिंह चार्ली है. सबसे अनोखी बात है कि इस फेस्टिवल में सिर्फ फिल्म ही नहीं दिखाए जाएंगें बल्कि रोजाना साढ़े बारह बजे से ढाई बजे तक बहुद्देशीय सांस्कृतिक परिसर, फ्रेजर रोड में प्रदर्शनी एवं कार्यशाला का भी आयोजन किया गया है.

पटना फिल्म फेस्टिवल का उद्घाटन करते तेजस्वी यादव 
समारोह का का उद्घाटन बिहार के उप-मुख्यमंत्री श्री तेजस्वी प्रसाद यादव, कला, संस्कृति मंत्री श्री शिवचंद्र राम, मुख्य सचिव श्री अंजनी कुमार सिंह, संस्कृति एवं युवा विभाग के प्रधान सचिव विवेक कुमार सिंह, समेत शेखर सुमन आदि बालीवुड कलाकारों, एवं गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति में सिनेमा ‘राम सिंह चार्ली’ के प्रदर्शन के साथ श्री कृष्ण मेमोरियल, हाल में आज 19 फरवरी को हुआ. जबकि फेस्टिवल का अंत ‘बजरंगी भाईजान’ के साथ होगा. कहने की जरूरत नहीं कि बिहार स्टेट फिल्म डेवलपमेन्ट एंड फिनांस कार्पोरेशन, फिल्म समारोह निदेशालय, एवं राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय के सहयोग से आयोजित पटना फिल्म फेस्टिवल से न सिर्फ माहौल में बदलाव आएगा बल्कि नए एवं कला से जुड़े लोगों को प्रेरणा एवं बहुत कुछ सिखने को मिलेगा.  
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