यूं तो फिल्म और
समाज का रिश्ता जगजाहिर है लेकिन जब बात सीधे फिल्म और आपके मन की हो तो बातें खास
हो जाती हैं क्योंकि फिल्मों का सीधा असर आपके मन –मस्तिष्क पर पड़ता है. और जब
रंगमंच एवं सिनेमा के प्रख्यात अभिनेता एवं मनोचिकित्सक डॉ मोहन अगाशे इस चर्चा
में शरीक होते हुए सवाल करते हैं कि तन की सुंदरता के लिए तो जगह जगह जिम खोले जा
रहे हैं लेकिन मन की सुंदरता के लिए क्या किया जा रहा है? तो चौंकना लाजिमी है. लेकिन
वे आगे कहते हैं कि मन को ठीक रखने के लिए साईंको जिम खोलने की जरूरत है. सायको
जिम का यह काम पुराने ज़माने में हमारे संस्कार करते थे, परिवार के बूढ़े बुजुर्ग
करते थे, लेकिन आज इन सब की जिम्मेवारियां टेलीविजन, मीडिया और इन्टरनेट के सहारे
रह गई हैं, जो कि संतुलित और पौष्टिक भोजन के बजाय वैसे जंक फ़ूड दे रहे हैं जो
हमारे तन के साथ साथ मन को भी बुरी तरह से प्रभावित कर रहे हैं.
जी हां, डॉ मोहन
अगाशे यह बात पटना स्थित पटना म्यूजियम के कर्पूरी ठाकुर सभागार में विजय मेमोरियल
ट्रस्ट के तत्वाधान में आयोजित “मनोवेद फिल्म फेस्टिवल” में राजधानी के सम्मानित
साहित्यकार, फ़िल्मकार, राजनेता एवं नौकरशाह के अलावे बुद्धिजीवी दर्शकों के बीच
में कह रहे थे.
पहली बार आयोजित
मनोवेद फिल्म फेस्टिवल के स्वागत भाषण में कार्यक्रम के आयोजक डॉ विनय कुमार ने
कहा कि इस नई पहल का उद्देश्य फिल्मों के भीड़ में से सार्थक, सोद्देश्य एवं
प्रश्नाकुल करती फिल्मों को आमजन तक पहुँचाना है. वैसी अंतर्राष्ट्रीय एवं भारतीय फिल्मों
को प्रदर्शित करने की कोशिश होगी जो भौगौलिक एवं भाषाई कारणों से हम तक पहुंच नहीं
पातीं हैं और जो खासतौर पर मनुष्य और समाज के स्वास्थ्य / मानसिक स्वास्थ्य से
जुड़े विषयों को संबोधित करती हो.
कार्यक्रम का
उद्घाटन करते हुए पद्मश्री उषा किरण खान ने कहा कि ऐसी फिल्मो का प्रदर्शन साल में
एक बार नहीं बल्कि चार बार हो तथा जनजागरूकता वाले ऐसे कार्यक्रमों की चर्चा भी
खूब होनी चाहिए ताकि लोग अपने तन के साथ साथ मन का भी ध्यान रख सकें .
समारोह में प्रदर्शित
पहली फिल्म अस्तु थी, जो कि इल्जाइमर्स डिमेंशिया रोग से ग्रसित सेवानिवृत बुजुर्ग
चक्रपाणी शास्त्री एवं उनके परिवार की कहानी है. ऐसी स्थिति में पति –पत्नी एवं
बड़े होते बच्चों वाले परिवार की क्या स्थिति होती है? साथ ही कहानी बताती है कि जब
शास्त्री बाजार में कुछ पल के लिए अकेला होने की स्थिति में गाड़ी से बाहर आ हाथी
वाले महावत के साथ पीछे –पीछे चले जाते हैं तो उनका दिन कैसे गुजरता है जबकि दोनों
ही एक दूसरे की भाषा समझने में असमर्थ हैं. दिखाई गई दूसरी फिल्म ‘जिंदगी जिंदाबाद’
भारतीय महानगर में एड्स के जटिल यथार्थ एवं जागरूकता पर केंद्रित फिल्म है , जिसमें
जीवन के मूलभूत संघर्ष एवं मानवीय रिश्तों के दरारों में पनपे यौन सम्बंध, भटकता
बचपन, ब्लड ट्रांसफ्यूजन आदि को उकेरने के साथ साथ मन में एड्स के प्रति बैठी
विभिन्न भ्रांतियों को भी तोड़ने की कोशिश की गई है.
संवाद सत्र के दौरान
फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम के साथ बातचीत में मोहन अगाशे ने कहा कि समाज में बढ़ते विचलन,
विखंडन के बीच सार्थक फिल्मों की बहुत
जरूरत है. आगे उन्होंने कहा कि हमलोग तो कहकर नाटक करते हैं लेकिन यहां लोग जीवन
में बिना कहे ही दिन रात नाटक करते रहते हैं, सुबह से शाम तक में अपनी भूमिकाएं
बदलते रहते हैं. हमलोगों ने अपनी जिंदगी को बहुत सारी जिम्मेवारियों को मोबाइल
जैसी तकनीकों के सहारे छोड़ रखा है जिससे बचने की जरूरत है.
मनोवेद फिल्म
फेस्टिवल की यह पहल खुशगवार मौसम में न सिर्फ दर्शकों को समेटने में सफल रही बल्कि
अपने उद्देश्यपूर्ति में भी आगे रही.

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