उस रात (लघुकथा)
- सुशील कुमार
भारद्वाज
उस रात दिल और दिमाग
दोनों में ही भयंकर हलचल मचा हुआ था| नैतिकता और जिम्मेवारी के सवाल अंदर तक धंसे
हुए थे| जीवन की यह पहली और शायद आखिरी घटना थी| अचानक बिजली भी गुल हो गई| लेकिन
मैं इस अन्धेरें में भी साफ़ – साफ़ देख रहा था कि वह बाजू वाले बिस्तर पर स्त्री –
सुलभ स्वभाव के अनुसार स्वयं को ढक कर लेटी थी| मन को विश्वास न था कि आज की रात
हमदोनो नींद से सो पाएँगें| एक दूसरे से अनजान न थे तो कई वर्षों से हमदोनो में
कोई बात या मुलाकात भी नहीं हुई थी| यह तो अजीब संयोग है कि दोनों होटल के इस कमरे
में रहने को मजबूर हो गए थे |
मैं सोचने लगा – “आज
वो मेरे साथ सो सकती थी| इस तरह अलग – अलग बिछावन पर सोने की जरुरत नहीं होती|
यूँही चुपी लादे सुबह होने का इंतज़ार करने की बजाय रात हंसी – ठिठोली में गुजर
सकती थी| मैंने उससे उसका यह हक छीन लिया| उसकी आँखों में आँसू के जो बूंद आये,
उसके लिए मैं भी कहीं न कहीं जिम्मेवार था| क्योंकि मैंने उससे शादी करने से इंकार
कर दिया था| नहीं – नहीं यह पूर्ण सत्य नहीं है| मैं इंकार या स्वीकार तो तब करता
जब बात मुझ तक पहुँचती| मुझे तो बाद में किसी ने बताया कि संजना के शादी का
प्रस्ताव आया था| घर वालों ने हँसते हुए यह कह कर लौटा दिया था कि दो परिवारों की
वर्षों की दोस्ती को दोस्ती ही रहने दिया जाय| उनका तर्क था कि दोस्ती कि वजह से
रिश्ते में करवाहट आ सकती है|
इसके बाद तो उसके
प्रति मेरी सोच ही बदल गयी| उससे अधिक दूरी बनाने की हर संभव कोशिश करने लगा| जब
कभी सामना हुआ तो धीरगंभीर बना रहा या यूँ गुजर गया जैसे उसपर मेरी नज़र ही न पड़ी
हो| चोर की तरह नज़रें चुराता फिरता| उसके व्यवहार से कभी –कभी सोच में पड़ जाता था
कि वह इतनी परिपक्व हो गई या सबकुछ से अंजान है जो बिना हिचक के सामने आ जाती है|
कभी – कभी इच्छा होती थी कि एक नज़र उसे निहार लूँ| पर डर जाता था कि कहीं मन की कोमल
भावनाएं न जग जायें| घर वाले क्या कहते या करते ये तो बाद की बात होती अगल – बगल
वाले पहले बदनाम कर देते| एक ही बात दिमाग में होती – “जब मैं उससे शादी ही नहीं
कर सकता तो उसे बदनाम क्यों करूँ?”
आज जब यहाँ हमदोनो
के सिवा कोई नहीं है तो मन की सारी भावनाएँ कमरे के इस अँधेरे में उफान मार रही है|
-“आखिर क्यों नहीं मुझे उससे शादी कर लेनी चाहिए? क्या
मैं घर वालों को समझा नहीं सकता? क्या मैं इतना कमजोर हूँ?”
तभी कमरे में एक
मीठी सी आवाज गूंजी जिसने मेरा ध्यान खींचा| संजना की मोबाइल बजी थी | और फिर संजना
–“ हाँ माँ! मैं ठीक से पहुँच गयी हूँ| ......ओह क्या बताऊँ? शहर में कोई होटल खाली
नहीं मिल रहा था बड़ी मुश्किल से एक डबल बेड का रूम मिल गया है| .....अकेले रहने के
कारण थोडा महंगा तो है लेकिन क्या करूँ एक ही रात की तो बात है | .......”
उसकी बात सुनकर
मुस्कुराये बगैर रह न सका| वाकई वह कमरे में अकेली है? थोड़ी देर पहले ही की तो बात
है| मैंने थक कर इस होटल में सिंगल बेड न मिलने के कारण इस कमरे को बुक करा लिया
था| उसी समय यह भी काउंटर पर आ पहुंची थी| निराश होकर लौटने ही वाली थी कि मैंने
अपना वाला कमरा उसे दे देने को होटल वाले से कहा| वह बहुत खुश हुई थी लेकिन तुरंत
पूछ बैठी –“फिर आप कहाँ जाइयेगा? ... प्लेटफोर्म पर?” मैं हामी में सिर हिलाता
उससे पहले ही –“आप पुरानीं सोच को छोडिये| वैसे भी यह कोई पटना नही है जो कोई
परिचित मिल जाएँगे? रात भर की ही तो बात है?” और असमंजस की स्थिति में मजबूरन उसके
साथ क्योंकर तो चल पड़ा?
फिर मेरा ध्यान भंग
हुआ जब वह मुझसे बोली –“जानते हैं आज की रात मेरे लिए खास है?” मैं पूछ
बैठा- कैसे? तो बोली –“अभी माँ बतायी कि लड़के वालों ने शादी के लिए हाँ कर दी है|
कल के बाद पता नहीं मैं कभी कोई परीक्षा दे भी पाऊँगी कि नहीं?.......”
संजना अपने लय में
बोले ही जा रही थी कि बिजली भी आ गयी| उसके चेहरे पर वर्षों बाद इतनी चमक देखी थी|
अजीब–सा महसूस हो रहा था| मेरे पास मुस्कुराने और उसे बधाई देने के सिवा कुछ नहीं
बचा था| इच्छा हुई कि वो सिर्फ बोलती ही रहें ताकि इस दरम्यान में उसे जी भर देख
सकूँ| भूल गया कि मैं भी कुछ कहना चाहता था? बातों में पूरी रात कब निकल गयी पता
ही न चला|
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