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मंगलवार, 8 मार्च 2016

प्रगतिशील समाज का वीभत्स रूप है अवधेश प्रीत की नई किताब “चांद के पार एक चाभी” - ( पुस्तक समीक्षा ) सुशील कुमार भारद्वाज

प्रगतिशील समाज का वीभत्स रूप है अवधेश प्रीत की नई किताब “चांद के पार एक चाभी”

चांद के पार एक चाभी


 सुशील कुमार भारद्वाज


वरिष्ठ कथाकार अवधेश प्रीत की नई किताब है- “चांद के पार एक चाभी”. अवधेश प्रीत उन गंभीर रचनाकारों में से एक हैं जो नृशंस, हस्क्षेप, हमजमीन, एवं कोहरे में कंदील, जैसी चर्चित कथासंग्रहों से लगातार सामाजिक समस्याओं पर प्रहार करते रहे हैं. जिनके यथार्थवादी रचनाओं में किस्स्गोई एवं शिल्पगत विशेषताओं के कारण यह फर्क करना मुश्किल हो जाता है कि कहानी वास्तविक है या काल्पनिक. प्रस्तुत संग्रह की भी सभी आठ कहानियां उसी परम्परा का निर्वाह करते हुए प्रगतिशील समाज में हो रहे सामाजिक, मानसिक, वैचारिक एवं आर्थिक बदलाव के बीच उत्पन्न बौखलाहट, छटपटाहट, शोर एवं व्याप्त अराजकता को निरुपित करती है. जहां संग्रह की कहानियों में एक तरफ ग्रामीण परिवेश का जातिगत समस्या है तो दूसरे तरफ शहर के भागदौड भरी जिंदगी के बीच असुरक्षा और साम्प्रदायिकता का दंश भी. भावना से अलग तटस्थता का भाव है तो मानवता और अस्तित्वरक्षा के लिए जूझते सवाल भी.   
संग्रह की पहली कहानी “चांद के पार एक चाभी” की ही बात करें तो यह उस विकासशील समाज के उपर एक जोरदार तमाचा है जहाँ शिक्षा एवं तकनीक का विस्तार तो हो रहा है लेकिन जातिगत संरचना अभी भी परंपरागत रूप से अपनी गहरी जड़ें दूर अंधेरे में जमाए हुए है. जहां सामंतवादी विचारधारा के लोग अपनी सुविधा के अनुसार समाज के कायदे कानून इस प्रकार गढे जा रहें हैं कि उससे निकलना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर जान पड़ता है. जिसमें बेबस कानून व्यवस्था भी रक्षक की बजाय भक्षक की ही भूमिका में नज़र आती है.
“नयका पोखरा” को पहली ही कहानी का विस्तार माना जा सकता सकता है जिसमें सामंतवादी विचार के प्रतिकार के रूप में जिस पिंटू कुमार का अंकुरण हुआ था वह सुमन के रूप में परिणत होते दिखती  है. सुमन “चांद के पार एक चाभी” की राजकुमारी की तरह समाज के ठेकेदारों के समक्ष आत्मसमर्पण एवं अपमान सहने के बाद आत्महत्या करने की बजाय अपने साथ हुए दुर्व्यवहार को मुखिया जी के सामने भरी सभा में रखती है और न्याय के लिए संघर्षरत दिखती है. साथ ही साथ इस बदलाव के कारण समाज के ठेकेदारों की कम होते प्रभुत्व का खींझ और बौखलाहट चेहरे और व्यवहार में भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगता है. जहां स्त्री पितृसत्तात्मक समाज को दलित कानून और राजनीति के सहारे एक साथ चुनौती देते हुए उनकी चूलें हिलाने की कोशिश करती हैं.
अवधेश प्रीत जितनी बेबाकी से समाजवाद पर कलम चलाते हैं उतनी ही बेबाकी से मार्क्सवाद और पूंजीवाद के टसल को भी निशाने पर लेते हैं. उनकी अगली कहानी “999” समाजवाद से इतर मार्क्सवादी विचारधारा की कहानी है, जो कि बहुदेशीय कंपनियों में टारगेट बनते पेशेवर युवाओं के संघर्ष की पृष्ठभूमि में लिखी गई है. जहां बदले माहौल में बदलते जीवन शैली, मूल्य, एवं रिश्तों में पनप रहे भ्रष्टाचार, आर्थिक एवं भावनात्मक शोषण के बीच दिवाकर अंकल जैसे यूनियन लीडर की जरूरत महसूस की जाती है.
जबकि अगली कहानी “एक मामूली आदमी का इन्टरव्यू” को हित टकराव की कहानी के रूप में भी देखा जा सकता है. जहां एक तरफ पूर्ण जड़, विकास के अंधी दौर से दूर आम आदमी के शक्ति का एहसास होता है वहीं पत्रकारिता में हो रहे आमूलचूल व्यवहारिक परिवर्तन को भी रेखांकित किया गया है. जहां इनोवेशन के काम में भी विज्ञापनदाताओं के हितों को आमजन के समस्याओं पर तरजीह दी जाती है. पत्रकारिता अब मिशन नहीं मुनाफा का वह जरिया है जहां हित टकराव की स्थिति में पत्रकार के रोजीरोटी पर भी बन आती है.
पत्रकारिता जगत की ही क्रूर सच्चाइयों के पृष्ठभूमि में लिखी गई है संग्रह की अगली कहानी “सपने”. इस कहानी में उन युवाओं के बनते-बिखरते अरमानों और बेबशी की झलक मिलती है जो बड़े बड़े सपनों के साथ पत्रकारिता संस्थानों में नामांकन तो लेते हैं लेकिन वस्तु स्थिति एवं मूल्यों के टकराव के बाद जीविकोपार्जन के लिए जिंदगी के सारे सपनों से समझौता करने को तैयार हो जाते हैं.
इस संग्रह की सबसे जुदा कहानी है –“सदमा”. जिसमें लेखक ने बदलते माहौल में क्षय होते नैतिक मूल्यों को ही न सिर्फ निशाने पर लिया है बल्कि जीवन के विविध स्वरूपों में समाये भ्रष्टाचार को भी रेखांकित किया गया है. जिसने भरोसा और विश्वास जैसे शब्दों को ही बेकार साबित कर दिया है. अब यह विश्वास कि हम गलत नहीं हैं इसलिए हमारे साथ गलत नहीं होगा, टूट कर बिखरता जा रहा है. कहानी में न तो उपदेश है न आदर्श की स्थापना, लेकिन घातक यथार्थवाद के सहारे सुसुप्त होते मानवता को झकझोरने की भरपूर कोशिश की गई है.
अवधेश प्रीत अपने कलम का प्रयोग अपनी सामाजिक जिम्मेवारी को निभाने में भी करते हैं. आज जब हमारे चारो ओर का माहौल भयाक्रांत होता जा रहा है. सांप्रदायिक सद्भाव खतरे में है, धार्मिक कट्टरता एवं आतंकवाद एक दूसरे का पर्याय बनते जा रहे हैं तो अलगाव एवं वैमनष्यता के सायकी को भेदने की कोशिश करती है उनकी अगली कहानी “अम्मी”. ताकि समाज के असंख्य निर्दोषों को होने वाले जुल्मों से बचाया जा सके. जबकि संग्रह की सबसे अंतिम कहानी “रैकेटवा” चोट करती है उस भ्रष्ट शासन व्यवस्था पर जहां न्याय पाने की बजाय प्रतिभा दलालों के चंगुल में फंस कर बर्बाद हो जाती है.
अवधेश प्रीत की शिल्प-कला उनके शब्दों एवं प्रयोगों में साफ़ साफ़ परिलक्षित होती है जो न सिर्फ पाठकों को गुदगुदाती और रूलाती है बल्कि अपने आगोश में समा कर एक लम्बी सैर भी कराती है, जो सोचने समझने को मजबूर करती है कि एक मनुष्य के रूप में उसका क्या कर्तव्य बनता है? क्या होना चाहिए था और क्या हो रहा है?
साहित्य हमारे जीवन और समाज का आईना होता है जिसमें जीवन की विभिन्न विविधताएं साफ़ साफ़ झलकती हैं. साहित्य सिर्फ प्रतिरोध का एक जरिया ही नहीं होता है बल्कि जीवन जीने की कला और प्रेरणा का स्रोत भी होता है. जीवन के पथ पर नित-नित हो रहे सकारात्मक एवं नकारात्मक परिवर्तनों के बीच नई उम्मीद की किरणों में खुद को पहचानने और अपने अस्तित्व के जंग को जीत लेने की जीवटता अंदर तक झकझोर देती है. ऐसा तभी हो पता है जब कोई लेखक गंभीरता के साथ समय में जरूरी हस्तक्षेप करता है. सच्चाई को बेबाकी के साथ साहित्यिक लहजे में बिना किसी कलुषित भावना के सलीके से प्रस्तुत करता है. और निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि अवधेश प्रीत इसमें सफल रहे हैं.
पुस्तक – चांद के पार एक चाभी
कथाकार – अवधेश प्रीत
मूल्य – 199/- (पेपरबैक)
प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली.



गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

विकासोन्मुख गांव की जातिगत समस्या है अवधेश प्रीत की कहानी चाँद के पार एक चाभी



विकासोन्मुख गांव की जातिगत समस्या है : चाँद के पार एक चाभी
-    सुशील कुमार भारद्वाज
अवधेश प्रीत अपनी कहानियों में सामाजिक समस्याओं को बहुत ही मार्मिक रूप में प्रस्तुत करते हैं. उनकी कहानियों में सिर्फ विमर्श ही नहीं होता है बल्कि भूत, भविष्य के साथ-साथ वर्तमान का भी एक प्रतिरूप नज़र आता है. उन्होंने अपनी लंबी कहानी “चाँद के पार एक चाभी” में भी बदलते समय के साथ विकासोन्मुख ग्रामीण परिवेश में एक विचारणीय सामाजिक कहानी को ही मूलभूत जातिगत समस्याओं के साथ प्रस्तुत किया है.
इसमें कोई दोमत नहीं है कि बदलते समय और शिक्षा की जागरूकता के बीच विकासोन्मुख ग्रामीण परिवेश में जाति-धर्म की दीवारें दरकने लगी है. चाहे इसे निजी स्वार्थ कहें या आवश्यकता, लेकिन परिस्थितियां बदल रही हैं. लेकिन सुदूर कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों, जहाँ जातिवाद गहरी जड़ तक धंसी हैं वहां छुआछूत, शोषण, और दबंगई जैसी समस्याएं अभी भी गंभीर हैं. मुशहरों से लोग एक दूरी बनाये रखने में ही अपने संस्कार की भलाई मानते हैं, विकल्पहीनता की ही स्थिति में वे दलितो के शरणागत होंगे, वह भी उनकी औकात बताते हुए. चाह कर भी कोई उनकी मदद नहीं कर सकता, समाज से कोई भी आदमी किसी और के लिए बेबजह पंगा नहीं लेना चाहता है. यदि कोई नौजवान आगे आएगा भी तो रूढ़िवादी और शक्तिसंपन्न राजनीतिक बुजुर्गों के हथकण्डो को ही भेंट चढ़ जाएगा.
कथा नायक पिंटू भी अपनी वस्तुस्थिति से परिचित है. बदले माहौल में इज्जत की रोटी खाने के लिए लुधियाना से मोबाइल बनाने की कला सीखकर आता है. बूढी माँ की सेवा की खातिर ढिबरी बाजार में ही एक दुकान से अपने जीवन की गुजर बसर करना चाहता है. आगे की पढाई न कर पाने के कसक के साथ किसी-न-किसी किताब और पत्रिका में उलझा रहता है. उसे ऊंच-नीच का भान है लेकिन दिल पर किसका जोर चलता है? तारा खुद मोबाइल बनवाने आयी और खुद ही वह उसे फोन करने लगी, और फिर दोनों के बीच थोड़ी आत्मीयता पनप गई तो इसमें उसका क्या कसूर है? सबों के साथ वह मेलजोल से रहना चाहता है. अपने घर, जमीन, और लोगों को छोड़ कर वह कहाँ और क्यों जाये? वह अपनी सीमा जानता है. छल-प्रपंच की हवा उसे भी है, तभी तो अपने टूटते सपने की तरह राजकुमारी पासिन के भी बिखरते सपने का भान मात्र होने से ही उसके अंदर एक व्यंग्यात्मक दर्द उभरता है– “अभागी को नही पता कि रमेश पांडे उसे छल रहा है. बाभन सब दुआरी मुंह मारेगा, अपने दुआरी झांकने भी न देगा.”
लेकिन रमेश पांडे राजकुमारी पासिन से दगा नहीं करता है. पटना भाग कर मंदिर में शादी रचा लेता है. परंतु मुखिया जी की राजनीति और भ्रष्ट थानेदार की मिली-भगत से उनकी प्रेम कहानी तब भी तबाह हो जाती है जबकि वे पंचायत में भी साथ-साथ जीने मरने की कसम खाते हैं , गुहार लगाते हैं. राजकुमारी के रोने-बिलखने का कोई असर समाज के निष्ठुर ठेकेदारों पर नही पड़ता है और माथा मुड़ाकर सारे गांव घूमने के बाद भुतहा बगीचा में बरगद के पेड़ पर लटकना ही उसकी नियति बन जाती है.
तारा का मोबाइल से बात करते पकड़ाने और किताब मिल जाने के बाद पिंटू की नियति सामान्य तौर पर लिखी जा चुकी थी. दोनों फिर से कुछ साहस बटोर कर कुछ गुल खिलाते उससे पहले ही तारा की शादी करनी थी और इस विषम परिस्थिति में रमेश से बेहतर कोई लड़का चाह कर भी शायद इतनी जल्दी और इस परिस्थिति में नही मिलता. पिंटू भी अपने प्रेम करने की सजा झेलकर तीन महीने बाद बाहर आ गया. इसमें तारा जीवन भर ताना सुनने और घूंट–घूंट कर मरने को ही अपनी नियति मान चुकी. यहाँ एक बिंदु रखना चाहूँगा कि बाभन समाज में अपनी बेटियों के प्रति एक अजीब सहानुभूति देखी जाती है और यहाँ तारा की शादी समाज के द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर परिवार को दबाने के रूप में देखा जाना चाहिए. क्योंकि तारा के पिता गरीब हैं लेकिन अपने को दूसरे से श्रेष्ठ समझते हैं और उसकी शादी सरयूपार वाले से ही करने की बात सोचते थे.
कथाकार संस्मरणात्मक शैली में कहानी की शुरुआत करते हुए कथानायक पिंटू कुमार के सामाजिक, आर्थिक, मानसिक एवं बौद्धिक परिस्थिति से हमारा परिचय कराते हैं. कहानी बढते हुए जब मूल रूप में आने लगती है तब तक समय काफी बदल चुका होता है, साथ ही साथ पिंटू कुमार की परिस्थिति भी बदल चुकी होती है. पहली बार जहाँ वह संकोचवश या फिर अस्पृश्यता के भोगे हुए दंश की वजह से थोडा असहज महसूस करता है, वहीं दूसरी बार वह आत्मविश्वास से लबालब ही नहीं बल्कि कथाकार से आत्मीय-अधिकार व अपेक्षा के भाव से भी मिलता है. उसका यह परिवर्तन लुधियाना में बिताये समय की वजह से हुआ जहाँ उसे किसी सामाजिक विद्रूपता का सामना नहीं करना पड़ा.
जबकि जाति विभेद से विकृत मानसिकता का ही एक रूप ढिबरी गांव में दिखता है जब रामधारी पासी कहता है “कोई मरे, चाहे जिये. हमरी बेटी ना मिली तो हम केस करेंगे,केस”. तब विशम्भर मिश्रा कहते हैं – “स्साला पासी, बेटी से ताड़ी बेचवाता था, तब ना कुछ सोचा. अब केस–मुकदमा बतियाता है. हम लोग क्या यहाँ चूड़ी पहिन के बैठे हैं, रे मादर....” वहीं मुखिया दिगम्बर मिश्रा ने भी फरमान दिया – “पंचायत के बाहर जो जाएगा, उसको गांव में वास न मिलेगा.” जबकि पिंटू और तारा के मामले में रातों-रात थाना में इस कदर सबकुछ निबटा लिया जाता है कि न किसी पंचायत की जरुरत होती है न किसी का गांव से निर्वासन. इससे एक बात तो स्पष्ट है कि जातिवाद और नियतिवाद दोनों ही सामर्थ्य जनों के सुविधानुसार ही व्यवहृत होते हैं.
कथाकार ने बहुत ही बेहतरीन तरीके से स्पष्ट किया है कि मनुष्य किस कदर और कब तक दोहरे चेहरे को जीता है? बात चाहे मिश्रा जी का हो, चाहे पांडे जी का हो, या फिर यादव जी का. जन्मजात गाली देने की आदत ना वे छोड़ते हैं ना ही अपना काम निकालने के लिए जी हुजूरी करने से पीछे हटते हैं. मजे की बात तो देखिये कि शुद्दर बाभन का काम नही कर सकता, वह शास्त्र नही जान सकता है. लेकिन रमेश पांडे पिंटू के साथ फोकट की दारू पी सकते हैं, मोबाइल लोग उसके यहाँ बनवा सकते हैं, उसके दिये किराये या रूपये को ही मिश्रा जी जेब में नही रख सकते हैं बल्कि गोतिया को झूठी शानोशौकत और रूतबा दिखाने के लिए सरकारी स्कूल के पास गैरमजरुआ जमीन और संरक्षण भी उसे दे सकते हैं.
हमारे समाज की यही नियति है जहाँ शक्तिसंपन्न लोग अपने इशारे पर कानून को धत्ता बताते हुए निर्बलों को हर तरीके से प्रताड़ित और शोषित करते रहते हैं. इस स्थिति के बदलने में शायद अभी काफी समय शेष है.
 कहानी में एक चुनौती लेखक समुदाय के लिए भी है. आपके उन आदर्शवादी शब्दों के क्या मायने हैं जो चारदीवारियों के बीच कल्पना के उड़ानों पर सवार होकर रची जाती है जबकि यथार्थ की जमीन बेहद ही रुखड़ी और रोंगटे खड़े करने वाले हैं? जहाँ मोबाइल नंबर याद रखने के बजाय उसे सेव करते हैं, और मेमोरी फुल होने पर दूर के परिचितों को लिस्ट से बेदर्दी से बिना कोई अपराध किये उडा देते हैं? क्या सिर्फ पाठकों से सहानुभूति बटोर लेने और उन्हें कोरी कल्पनाओं के सहारे आने वाले समय में शिक्षा और जागरूकता के बदौलत सामाजिक परिवर्तन के सपने बेचते रहेंगें? यदि हाँ, तो फिर इंतज़ार करते रहिये पिंटू कुमार का, जो चाँद के पार फेंके गए उस चाभी को लेने आ रहा है, जिसे उसने अपने जिंदगी की सबसे हसीन हंसी को सात तालों में महफूज रखकर चाँद की ओर उछाल दिया था. वही पिंटू, जो कहानी पर प्रतिक्रिया के बहाने अपनी पीड़ा को शब्द दे रहा है, जो आपकी लफ्फाजियों में खुद के लिए जीवन जीने की एक कला की तलाश तब कर रहा है जब लोग मुशहर को इंसान नहीं समझते हैं, मुसीबत इतनी की कोई चाहकर भी इस नारकीय जीवन से उठ पाने में असहाय महसूस करता हो.
एक बड़ा ही लाजिमी सवाल है – प्यार करने का अधिकार. लेकिन प्रेम करने का अधिकार किसे है? इस सवाल का जबाब सिर्फ एक है – जिसके पास सत्ता है, शक्ति है और जो व्यवस्था में या तो शरीक है या फिर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उसे प्रभावित करने का माद्दा रखता है.
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