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गुरुवार, 10 अगस्त 2023

एक फिल्म जो हर भारतीय को देखनी चाहिए - ओह माय गॉड -2. :- अजित राय

 एक फिल्म जो हर भारतीय को देखनी चाहिए - ओह माय गॉड -2.  

अजित राय 



आंकड़े बताते हैं कि हममें से अधिकतर लोगों ने अपनी किशोरावस्था में हस्थमैथुन जरूर किया होगा और डा प्रकाश कोठारी सहित अनेक सेक्स वैज्ञानिकों का मानना है कि यह न तो कोई अपराध है न बीमारी वल्कि यह एक स्वाभाविक क्रिया है और वयस्क होने पर कई बार तो इसे स्वस्थ जीवन के लिए जरूरी भी माना गया है।  सेक्स शिक्षा के अभाव में मैंने खुद हस्तमैथुन के कारण महीनों डिप्रेशन के बाद पटना के नामी फिजिशियन डा शिव नारायण सिंह से परामर्श लिया था। दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग में मनोवैज्ञानिक के रूप में काम करते हुए स्कूलों में मेरे पास सैकड़ों किशोर छात्र अपनी इसी तरह की समस्या लेकर आते थे। 

अमित राय ने बड़े तार्किक और दिलचस्प सिनेमाई कौशल के साथ अपनी नई फिल्म ' ओह माय गॉड -2 ' में यह सवाल उठाया है कि हमारे स्कूली पाठ्यक्रम में सेक्स एजुकेशन जरूरी क्यों है? उज्जैन के महाकाल मंदिर का पुजारी और शिवभक्त कांति मुद्गल ( पंकज त्रिपाठी) जिला अदालत में अपने बच्चे का अभिभावक होने के नाते खुद पर, स्कूल पर और अज्ञानता फैलाने वाली सेक्स की दुकान चलाने वाले लोगों पर मुकदमा कर देता है। उसका बेटा दोस्तों के बहकावे में आकर हस्तमैथुन की आदत का शिकार हो जाता है। स्कूल के बाथरूम में हस्तमैथुन करने के कारण उसे स्कूल से निकाल दिया गया है और वह डिप्रेशन में आत्महत्या करने की कोशिश करता है। उसका पिता अपने बच्चे को बचाने और सामान्य बनाने की लाख कोशिश करता है पर कुछ नही होता। अपने भक्त का मार्गदर्शन करने, मदद करने साक्षात भगवान शिव ( अक्षय कुमार) आते हैं। सेंसर बोर्ड के दबाव में इस चरित्र को शिव के गण में बदल दिया गया है जिसके कहने पर वह कोर्ट में केस करता है।इंटरवल के बाद की पूरी फिल्म इस मुकदमे की सुनवाई पर आधारित है। आश्चर्य है कि इसे सेंसर बोर्ड ने ' ए ' ( वयस्क) सर्टिफिकेट और+ 18 रेटिंग क्यों दी जबकि पूरी फिल्म में न तो कोई सेक्स सीन है न अश्लील संवाद, कोई चुंबन आलिंगन तक नहीं है। भारत जैसे देशों के लिए यह इतनी जरूरी और शिक्षाप्रद फिल्म है कि इसे देशभर के स्कूल कालेजों में दिखाया जाना चाहिए। इस फिल्म में कहीं कोई उपदेश या बड़बोलापन या डायलॉग बाजी नहीं है। सबकुछ सिनेमाई व्याकरण में  और मनोरंजन की शैली में कहा गया है। यहां यह भी याद दिलाना जरूरी है कि इसी साल 76 वें कान फिल्म समारोह में मोली मैनिंग वाकर की ब्रिटिश फिल्म ' हाऊ टू हैव सेक्स ' को अन सर्टेन रिगार्ड खंड में बेस्ट फीचर फिल्म का पुरस्कार मिला था।

            अमित राय की फिल्म ' ओह माय गॉड -2' कल ( शुक्रवार 11 अगस्त) से सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है। जिन लोगों ने अमित राय की पिछली फिल्में ( रोड टु संगम, आई पाड) देखी है, उन्हें पता है कि वे एक जीनियस डायरेक्टर- राइटर हैं।भीड़ के दृश्यों से अपना फोकस निकाल लेने में उनकी मास्टरी है। सांसारिक जीवन में मनुष्य के आपसी रिश्तों के मेलोड्रामा और उसके तनावों का सिनेमाई व्याकरण उन्हें आता है जिसके अभाव में अधिकांश मुंबईया फिल्में पटरी से उतर जाती है। इस फिल्म की पटकथा भी उन्होंने ही लिखी है जो इतनी कसी हुई हैं कि दर्शकों को एक बार भी मोबाईल फोन देखने का मौका नहीं देती। 

दूसरी खास बात यह है कि अभिनेता जितनी बात संवाद बोलकर नहीं बताते उससे अधिक अपने हाव भाव से अभिव्यक्त करते हैं। दुनिया भर के लोगों को मुंबईया फिल्मों से शिकायत ही यहीं रहती है कि यहां अभिनेता लगातार बोलते ही रहते हैं और कैमरा नब्बे प्रतिशत केवल उनके चेहरे के क्लोज शाट लेने में लगा रहता है। अमित राय ने इन दोनों बातों से बचते हुए फिल्म में एक आकर्षक माहौल और लोकेल रचा है। उन्होंने अक्षय कुमार जैसे टाइप्ड अभिनेता से बहुत उम्दा काम करवा लिया है लेकिन यह फिल्म तो पंकज त्रिपाठी की है। उनका अभिनय दमदार तो हैं ही, बेमिसाल भी है। उनके चेहरे की मासूमियत और मौन की अभिव्यक्तियां कमाल की है।वे एक क्षण में जादू करना जानते हैं। ऐसे दिग्गज अभिनेता जब किसी सुपर स्टार के साथ काम करते हैं तो इसके कई खतरे होते हैं। पंकज त्रिपाठी ने उन सारे खतरों से खुद को बचाते हुए अक्षय कुमार के साथ अच्छी केमिस्ट्री बनाई है।                     अमित राय ने छोटी-छोटी भूमिकाओं भी अपने कलाकारों से उम्दा काम करवा लिया है चाहे उज्जैन के महाकाल मंदिर के पुजारी बने गोविन्द नामदेव हैं या डाक्टर बने बृजेन्द्र काला या केमिस्ट के रोल में पराग छापेकर हों या स्कूल के मालिक बने अरुण गोविल। चेहरे पर नकाब चढ़ाए वेश्या की भूमिका में आर्या शर्मा (लंदन के लेखक तेजेन्द्र शर्मा की बेटी) ने केवल आंखों के एक्सप्रेशन से कोर्ट में पूरी बात कह दी है। वे आमिर खान के साथ लाल सिंह चड्ढा में भी ऐसा ही उम्दा काम कर चुकी हैं।कल सनी देओल के साथ उनकी दूसरी फिल्म गदर 2 भी रिलीज हो रही है। सेशन जज की भूमिका पवन मल्होत्रा ने निभाई है जिन्होंने जगह जगह अपने इंप्रोवाइजेशन से पटकथा में अच्छा प्रभाव जोड़ा है। वकील की भूमिका में यामी गौतम है। इसके अलावे भी कई अभिनेता अपनी छोटी छोटी भूमिकाओं में जंचे है। संवादों में मालवा की भाषा का स्पर्श हैं जिससे हास्य और करूणा का रस सृजित होता है। 

'ओह माय गॉड -2 ' का पूरा माहौल हमारे गांवों कस्बों का है। उज्ज्यनी नगरी तो प्रतीक मात्र है।सेंसर बोर्ड के कुल चौबीस कट और अड़ियल रवैए के बावजूद फिल्म पर इसका कोई असर नहीं दिखाई देता और फिल्म अपनी बात कह जाती है। यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि यह वहीं सेंसर बोर्ड है जो ' आदिपुरुष को बिना रूके पास कर देता है और ओह माय गॉड को यूए के बदले ए ( वयस्क) और+18 साल रेटिंग सर्टिफिकेट देता है जबकि कई मुस्लिम देशों में फिल्म को केवल एक कट के साथ और+12 साल रेटिंग के साथ रिलीज किया जा रहा है।





अजीत राय के फेसबुक पेज से साभार 

रविवार, 28 मई 2023

सिर्फ़ एक बंदा काफ़ी है: प्रशांत विप्लवी

 सिर्फ़ एक बंदा काफ़ी है: प्रशांत विप्लवी 

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"सिर्फ़ एक बंदा काफ़ी है" की खूब चर्चा हो रही है। पत्रिकाओं , ब्लॉग्स और प्रसंशकों ने एक बार फिर मनोज वाजपेयी के अभिनय क्षमता की खूब तारीफ़ की है। मैं इस फ़िल्म पर कुछ और भी कहना चाहता हूँ। अपूर्व सिंह कार्की की यह पहली फीचर फ़िल्म है। अपूर्व सिंह कार्की ने चार टी वी सीरीज़ बनाएं हैं जिनमें aspirants ने अच्छी खासी चर्चा बटोरी है। 

इस फ़िल्म के बरक्स जॉली एलएलबी को रखकर देखिए क्योंकि यह भी एक कोर्ट रूम फ़िल्म है। जहां इस फ़िल्म में अरशद वारसी, वोमन ईरानी, सौरभ शुक्ला , संजय मिश्रा, मोहन अगासे , मनोज पहवा , बीजेन्द्र काला जैसे धुरंधर कलाकारोंने अपने अभिनय से एक जादू भर दिया है वहीं अकेले मनोज वाजपेयी ने "सिर्फ़ एक  बंदा काफ़ी है" के टाइटल को जस्टीफाइ कर दिया है। मनोज के अलीगढ़ को देखने के बाद अभी कुछ वर्ष और इंतज़ार करना पड़ेगा जिससे अलीगढ़ के उस  अभूतपूर्व अभिनय के ज़द से बाहर निकला जा सके। लेकिन यह फ़िल्म एक सच्ची घटना और हाई प्रोफाइल केस पर आधारित है इसलिए फ़िल्म मेकिंग के लिहाज़ से दृश्य, भूमिका और घटनाक्रम जॉली एलएलबी से बदल जाते हैं। भारतीय सिनेमा में मनोज वाजपेयी एक हीरा हैं। उनकी चमक बिलकुल अलग दिख जाती है , ख़ासकर ऐसी गंभीर फिल्मों के किरदार को तो वे इतना जीवंत कर देते हैं कि फ़िल्म खत्म होने के बाद तंद्रा टूटती है कि मनोज महज़ एक किरदार थे। इस फ़िल्म में भी सिर्फ़ मनोज थे। और मनोज के चारो ओर जितने भी क़िरदार थे वे अपनी क्षमता से मनोज को और भी प्रॉमिनेंट कर रहे थे। 

यहां गौर करने की बात यह है कि फ़िल्म जिस बाबा के ऊपर बनी है, वे कोई साधारण बाबा नहीं थे। उनके अधिकांश अनुयायियों का अब भी मोहभंग नहीं हुआ है। यह एक समझदार फिल्मकार की सोच है कि बाबा को फ़िल्म का कैमरा जितना कम फेस करवाना पड़े। पूरी फ़िल्म में बाबा सांकेतिक रूप से अपनी उपस्थिति और वर्चस्व का एहसास दिलाते रहे लेकिन बाबा का ना तो इंटेरोगेशन दिखाया गया और ना ही बाबा से कोई ज़िरह हुई। बाबा नॉट गिल्टी के अलावा कोर्ट के सम्मुख या पुलिस के सम्मुख कुछ नहीं बोले। आजकल 3 को 32000 दिखाने की जो राजनैतिक प्रवृति निर्देशकों में पनपी है उनके लिए इस युवा फ़िल्मकार ने चुनौती पेश की है। बाबा के कई कारनामों से सिर्फ़ एक कारनामा उठाकर एक मुकम्मल फ़िल्म बना देना इस फ़िल्मकार की काबिलियत है। प्रतिगामी सोच के फ़िल्मकारों को सिनेमा हॉल की फिल्में मिलती हैं, टैक्स फ्री भी होता है और केंद्र से लेकर राज्य की सरकारें प्रॉपगंडा फ़िल्मों के प्रचार-प्रसार में भिड़ जाते हैं जबकि एक सच्ची घटना पर अपनी बात मज़बूती से रखकर भी ओ टी टी प्लेटफॉर्म का सहारा लेना पड़ता है। फ़िल्म और डाक्यूमेंट्री के लिए इन अनुसंगिक माध्यमों ने बड़ा प्लेटफॉर्म तैयार किया है। इस फ़िल्म के बजट के बारे में मुझे नहीं पता लेकिन उनकी कास्टिंग बहुत बढ़िया है। फ़िल्म में ऐसा कुछ भी नहीं था जिसके विषय में हमें पता नहीं है। इसे हमने पाँच साल तक टी वी और अखबार के जरिये खूब देखा और पढ़ा है। जिसकी जानकारी हमें नहीं थी वो थी कोर्ट सेशन के दौरान की बहस। लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि असली के कोर्ट रूम में ऐसे नाटकीय अंदाज में ही बहस हुई होगी। 

बाबा की पैरवी में जिन हाई प्रोफाइल वकीलों को बहस करते हुए दिखाया गया है उसकी झलक हमने वोमन ईरानी के रूप में देख चुके हैं। उनसे बेहतर इस तेवर को दिखा पाना मुमकिन भी नहीं था। कुछ पत्रिकाओं में मनोज की तारीफ़ करते हुए उन्हें एक मामूली वकील बताया है क्योंकि भारतीय समाज का मनोविज्ञान यही है कि जीतने वालों को हारने वालों के मुकाबले इतना छोटा दिखा दो कि यह एक असंभव लगने वाला जादू लगे। दरअसल ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के प्रति हमारा यह  दया भाव ही कई बार हमारी ही इच्छाशक्ति को नष्ट करता है। वकील की डिग्री एक ही होती है। जिन्हें हम महिमा मंडित करते हुए हाई प्रोफाइल वकील कहते हैं वे दरअसल बड़े अपराधियों को मुक्ति दिलाने का काम करते हैं। ऐसे वकीलों की भर्त्सना अगर लिखने वाले नहीं करेंगे तो भला कौन करेंगे। खैर , इस फ़िल्म ने जिस तरह से सबकुछ बचाकर न्याय मिल जाने की कहानी को दिखाया है उस पर सवाल भी उठता है। सिर्फ़ बाबा के गुंडों के द्वारा ही अड़चन डालने के दृश्यों को दिखाया गया है। उनके द्वारा गवाहों की हत्याएं दिखाई गई हैं लेकिन एक पीड़िता को समाज और सिस्टम से जो लड़ाई करनी पड़ती है , उसका फ़िल्म में अभाव है। एक रेप विक्टिम नाबालिग लड़की की मनोदशा को अद्रिजा सिन्हा ने जीवंत कर दिया है। कुछ दृश्य बहुत विचलित करते हैं। बाबा के प्रति घृणा तो पनपती है लेकिन घिन पैदा करने से बचा ले जाते हैं फ़िल्मकार। सिनेमा आपकी संवेदना और विवेक को भी नापती है और यही एक संवेदनशील फ़िल्मकार का काम है। नफ़रत फैलाने वाले फ़िल्मकारों के लिए यह फ़िल्म एक सीख की तरह है। 

अंत इस बात से करना चाहता हूँ कि अच्छी फिल्में समाज को धीरे-धीरे बदल सकती है लेकिन बुरी और नफ़रत के लिए बनाई गई फ़िल्मों का असर समाज पर तुरंत होता है। इसलिए अच्छी फ़िल्मों को तरज़ीह मिले इसी बाबत इसकी खूब चर्चा होनी चाहिए। अगर आप फ़िल्मों पर नहीं भी लिखते हैं तब भी ऐसी फ़िल्मों पर अवश्य लिखें, यह एक गंभीर सिनेमा प्रेमी का दायित्व है।

प्रशांत विप्लवी 



सोमवार, 3 अप्रैल 2017

अविनाश दास ने दिया अनारकली ऑफ आरा के सहयोगियों को धन्यवाद

पत्रकार से फिल्मकार बने अविनाश दास अपनी फिल्म "अनारकली ऑफ आरा" के आने और उसके प्रदर्शन के बाद आज अपने फेसबुक वॉल से फिल्म से जुड़े हर कलाकार को धन्यवाद दे रहे हैं। जितनी अच्छी फिल्म थी उतने ही अच्छे इंसान हैं अविनाश भाई। एक औपचारिक धन्यवाद देकर अविनाश भाई ने बता दिया कि हम मिट्टी के लोग मिट्टी से जुड़े रहना जानते हैं। हम न सफलता पाकर अहम् में डूब जाते हैं न ही असफलता पर रूक जाते हैं बल्कि अपने कर्मों का ईमानदारी पूर्वक वहन करते हुए आगे बढ़ते रहते हैं। अविनाश भाई जीवन में हमेशा सफल होते रहें, एक से बढ़कर एक अच्छी फिल्मों को करते हुए अपना और बिहार का नाम रौशन करते रहें । इन्हीं शुभकामनाओं के साथ पढ़ते हैं उनके शब्दों को।


फिल्म आयी, गयी। बातें हैं, बातें रहेंगी। हमारी तरफ किसी भी आयोजन की शुरुआत मंगलाचरण (Invocation) से होती है और समापन समदाउन (Thanksgiving Song) से होता है।


मैं सबसे पहले स्वरा [Swara Bhasker] का शुक्रिया करता हूं, जो अनारकली को कंसीव करने से लेकर स्क्रिप्ट और बाद की पूरी प्रक्रिया में पूरी तरह इनवाॅल्व रही। काफी ख़ून जलाया और कई बार ज़ख़्मी हुई, बीमार पड़ी।

डायरेक्टर आॅफ फोटोग्राफ़ी अरविंद कन्नाबिरन [Arvind Kannabiran] नहीं होते, तो शायद मैं बहुत असहाय होता। उन्होंने हमेशा मेरा उत्साह बनाये रखा, ढाढ़स देते रहे। सेट पर तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बाद भी मेरे प्रति अपने सम्मान और विश्वास में उन्होंने कोई कमी नहीं आने दी।

एडिटर जबीन मर्चेंट [Jabeen Merchant], जिन्होंने अनारकली को टेबल पर लगभग री-राइट किया। मेरी हर बात को धैर्यपूर्वक सुना और फिल्म की मूल भावना को लेकर स्क्रिप्टिंग के समय से बहुत उत्साहित रहीं।

संगीतकार रोहित शर्मा [Rohit Sharma] इस फिल्म की रीढ़ रहे। बिहार की आत्मा उन्होंने अनारकली के संगीत में उकेरने की कोशिश की और सफल रहे। रोहित जी के बिना अनारकली की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

असोसिएट डायरेक्टर रवींद्र रंधावा [Ravinder Randhawa] पूरी ख़ामोशी से मेरे हिस्से का विष पीते रहे और पूरी समझदारी से इस फिल्म को बेहतर और बेहतर बनाने में लगे रहे। ख़ास बात ये कि जिस क्लाइमेक्स की चर्चा हो रही है, वह गीत उन्होंने लिखा। वरना मेरे पास तो क्रांतिकारी कवि गोरख पांडे के गीत "गुलमिया अब हम नाही बजइबो, अजदिया हमरा के भावेले" का रेफरेंस था!

प्रोडक्शन डिज़ायनर अश्विनी श्रीवास्तव [Ashwini Shrivastav] ने कम संसाधनों के बावजूद अनारकली की दुनिया को रीयल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

एक नाम, जिसका ज़िक्र करना लाज़िमी है, वह नाम है तुषार सेठ [Tushar Seth] का। वह हमारे फर्स्ट एडी थे। तुषार ने टाइट टाइम-लाइन का हमेशा सबसे ज़्यादा ख़याल रखा। प्रोड्यूसर के दिये गये समय के भीतर हम तुषार की वजह से ही फिल्म बना पाये।

काॅस्ट्यूम डिज़ायनर रूपा चौरसिया [Rupa Chourasia] का डंका तो बज ही रहा है। तो हम भी उनकी जय जय कर लेते हैं।

बाक़ी हमारे कास्टिंग डायरेक्टर जीतेंद्र नाथ जीतू [Jitendra Nath Jeetu], असिस्टेंट डायरेक्टर्स निधि [Pandey Nidhi Singh], अमित [Amit Mishra] और मुहित [Muhitt Agarwaal] ने जो दिन-रात एक किया था, उसे शुक्रिया जैसे औपचारिक शब्दों से नहीं निपटाया जा सकता। पार्टी होगी दोस्तों और ज़रूर होगी।

आख़िर में निर्माता संदीप कपूर [Sandiip Kapur] का धन्यवाद, जिनके बिना अनारकली सिनेमा के पर्दे पर कभी नहीं आ पाती। आज भी परदे के पीछे के सामाजिक अंधेरे में टाॅर्च की रोशनी पर नाचती रहती और सारा दुख अकेली झेलती रहती।

#AnaarkaliOfAarah

शनिवार, 22 अक्टूबर 2016

31अक्टूबर :सनसनी के बहाने दर्शकों को जुटाने की नाकाम कोशिश

31अक्टूबर :सनसनी के बहाने दर्शकों को जुटाने की नाकाम कोशिश
-सुशील कुमार भारद्वाज
गूगल से साभार


फिल्मकार फिल्म बनाते समय फिल्म की कहानी, विषय, कलाकार तथा कमाई जैसे अन्य चीजों पर भी विचार करते हैं। लेकिन इन दिनों फिल्म की सफलता की गारंटी के लिए कुछ खास नुस्खों का भी उपयोग किया जाने लगा है बिल्कुल समाचार चैनलों की तरह समाचार सनसनी फैलाने और लोगों को आकर्षित करने की नीयत से। शायद निर्देशक शिवाजी लोटन पाटिल और निर्माता हैरी सचदेवा ने कुछ सनसनी फैलाने और कम बजट में अधिक मुनाफा कमाने के इरादे से ही फिल्म का नाम "31 अक्टूबर" रखा। इतना ही नहीं वर्ष 1984 और भारत शब्द को भी पोस्टर में टिकट की तरह प्रस्तुत किया गया है। और यदि 31 अक्टूबर 1984 का भारतीय इतिहास में कोई खास महत्व है तो इसलिए कि उस दिन भारत के तत्कालीन महिला प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गाँधी की हत्या उनके ही दो सिख अंगरक्षकों ने कर दी थी जिसका तात्कालिक कारण ब्लू अॉपरेशन यानि सेना का अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में घुसकर आतंकवादियों का मार गिराने की अनुमति देना था। और इंदिरा गाँधी की हत्या की खबर फैलते ही दिल्ली और आसपास के इलाके में साथ ही देश के लगभग सभी राज्यों में कमोवेश हिंसा का एक लहर चल पडा। दंगे की आग में काफी जानमाल की क्षति हुई थी। बाद के वर्षों में जाँच और अदालत की भी बातें हुईं लेकिन परिणाम सिफर ही रहा। तब से अब तक में एक लंबा दौर गुजर चुका है। इस बीच अनेक अन्य दंगें भी हुए और दंगों के बहानें कुछ फिल्में भी आईं।
लेकिन सोहा अली खान, वीर दास, दयाशंकर पांडे, लखा लखविंदर सिंह, प्रीतम कांगे, और सेजल शर्मा अभिनित फिल्म "31 अक्टूबर" न तो इंदिरा गाँधी की कहानी है न उनके हत्या की कहानी बल्कि यह एक दंगा पीडित परिवार की कहानी है जो अपने धर्म के कारण पहले तो अपनों के बीच शक की निगाह से देखा जाता है और बाद की उसकी जिंदगी बने माहौल की वजह से दुश्वारियों से भर जाती है। वे न्याय की आस में आगे बढते हैं जहाँ उन्हें कुछ लोगों का साथ तो मिल जाता है लेकिन न्याय नहीं।
फिल्म में कलाकारों के अभिनय और गीत संगीत पर कुछ कहना अलग बात है लेकिन सवाल उठता है कि क्या फिल्मकार के लिए फिल्म का नाम न्यायोचित है? क्या 1984 के भारत को पूर्णत: दिखाने में सफलता मिली? क्या दंगा पीडित की प्रस्तुत स्थिति सिर्फ इसी दंगें में हुई थी या कमोबेश यही स्थिति हर दंगें की होती है? क्या फिल्मकार ऐतिहासिक फिल्म बनाने की कोशिश कर रहे थे? यदि नहीं तो फिर फिल्म का नाम सनसनी फैलाने के लिए क्यों? जब फिल्म 2015 में ही तैयार हो गई थी तो 2016 में वह भी अक्टूबर के महीने में प्रदर्शित करने की क्या वजह बनी? शायद फिल्म निर्देशक कहीं न कहीं भ्रम की स्थिति में रहे जिसका खामियाजा यकीनन फिल्म को भुगतना पड रहा है या पडेगा। फिल्म की सफलता के लिए फिल्म की सारी कसौटियों पर खडा उतरना भी निहायत ही जरूरी है। और दर्शकों के नब्ज को पकडने की जरूरत भी

सुशील कुमार भारद्वाज

सोमवार, 21 मार्च 2016

ये भोजपुरी वाले अभी तक चोली –लहंगा में ही अटके हुए हैं:संजय मिश्रा









-सुशील कुमार भारद्वाज


बिहार में वर्ष 2016 की शुरूआत फिल्मों के नजरिए से अच्छी मानी जा सकती है. एक महीने के भीतर राजधानी पटना में तीन फिल्म फेस्टिवल आयोजित किए गए और तीनों ही अपने अपने कारणों से अलग स्वरूप में दिखे. पहला पटना फिल्म फेस्टिवल पूर्णतः कला संस्कृति एवं युवा विभाग के तत्वावधान में आयोजित किया गया, जहां एक सप्ताह तक मोना और एलिफिन्स्टन में 28 चुनिन्दा एवं भारतीय पैनोरमा की फ़िल्में दिखाई गई साथ ही साथ फिल्मकारों से साक्षात् बातचीत भी हुए. वहीं मनोवेद फिल्म फेस्टिवल का आयोजन पहली बार पटना संग्रहालय के कर्पूरी ठाकुर सभागार में निजीतौर पर डॉ विनय कुमार के निजी प्रयास से विजय मेमोरियल ट्रस्ट के बैनर तले आयोजित हुआ जिसमें भाषा व क्षेत्रीय विविधता के कारण दर्शकों से दूर सार्थक फिल्मों (खासतौर से मानसिक स्वास्थ्य व अन्य)को आमजन तक लाने की कोशिश की गई. जबकि अधिवेशन भवन में  ग्रामीण स्नेह फाउंडेशन के तत्वावधान में आयोजित “बिहार; एक विरासत कला एवं फिल्म महोत्सव 2016” का आयोजन सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों के सहयोग से किया गया. इस फेस्टिवल की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि यह पूर्णरूप से बिहार की सभ्यता- संस्कृति एव कला –फिल्म पर केंद्रित थी. सचिवालय परिसर में स्थित अधिवेशन भवन में मुंबई –दिल्ली आदि शहरों में रहकर फ़िल्मी दुनियां में परचम फहराने वाले बिहार के बेटे –बेटियों का ही जमावड़ा नहीं लगा बल्कि कुछ राष्ट्रीय स्तर के नेताओं, नौकरशाहों एवं बुद्धिजीवियों के मिलन का भी यह साक्षी बना. जहां पूरे परिसर को मिथिला की कलाकृतियों से सजाने की कोशिश की गई वहीं बिहारी पहचान को बिखेरती एक से बढ़कर एक नक्काशी के नमूनों, कपड़ों आदि की दुकानें भी सजाई गई. 
साथ ही राज्य के नौवों प्रमंडल से प्रतियोगिता के आधार पर चुनकर आए प्रतिभागियों के कलाओं का प्रदर्शन एवं पुरस्कार वितरण भी किया गया. और इन सब से हटकर जो सबसे खास बात रही वह थी बिहारी फिल्मकारों द्वारा बिहार से जुड़ी फ़िल्मी समस्याओं पर खुलकर बोलना एवं कला –संस्कृति मंत्री शिव चन्द्र राम द्वारा आश्वासनों की झड़ी लगा देना.
17 मार्च से 20 मार्च तक आयोजित इस चार दिवसीय कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र के दौरान फिल्मकार शत्रुघ्न सिन्हा, शेखर सुमन, नीतू चंद्रा, नितिन चंद्रा, अविनाश दास, चंद्र प्रकाश द्विवेदी, अजय ब्रह्मात्मज, शारदा सिन्हा आदि लोग उपस्थित थे जिन्होंने बिहार की सभ्यता संस्कृति के इतिहास, वर्तमान एवं संभावनाओं पर जमकर बातें कहीं. बिहारी सभ्यता-संस्कृति के गुणगान के बीच शत्रुघ्न सिन्हा ने बिहार, बिहारी के अलावे अपने नए किताब “खामोश..” की भी चर्चा की. सुबह के सत्र में जहां “गूंजा” फिल्म दिखाई गई वहीं बाद के सत्र में “मिथिला मखान” फिल्म का प्रदर्शन हुआ.
18 मार्च को प्रकाश झा की फिल्म “सुनहरी दास्तान” के बाद बातचीत के दौरान चाणक्य धारावाहिक से जुड़ी कहानियों को सुनाते हुए चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने कहा –“बिहार की पहचान इसके विचारों में है. क्रांति करने की शक्ति में है. बिहारी मतलब अड़ियल, अपनी बातों पर अड़े रहने वाला. यही इसका सकारात्मक पक्ष भी है और नकारात्मक भी.” दर्शकों के बीच से एक सवाल उछला कि क्यों नहीं सिनेमा को भी स्कूली पाठ्यक्रम में जोड़ा जाए ताकि माता –पिता बच्चों की बातों को समझ उन्हें कुछ हद तक छूट दे सकें जिसके जबाब में उन्होंने फ़िल्म एवं टेलिविज़न क्षेत्र में कार्यरत कलाकारों के वास्तविक संघर्ष की बात बताते हुए कहा कि इस क्षेत्र में हर तरीके के त्याग की जरूरत होती है और कोई भी इंसान व्यक्तिगत प्रतिभाओं के बदौलत ही इसमें टिक सकता है.चक दे इण्डिया से सुर्ख़ियों में आई वैशाली की शिल्पा शुक्ला ने भी इसी सत्र में अपने फ़िल्मी सफर और 18 वर्ष की उम्र में पाकिस्तान जाने और अपने परवरिश की बात बताई. साथ ही बिहार केंद्रित फिल्म बनाने की बात भी कही.


“बिहार में फिल्म की चुनौतियां” सत्र में मनोज वाजपेयी ने भोजपुरी फिल्मकारों को बिहारी संस्कृति को देशभर में बदनाम करने और सरकारी स्तर पर मिलने वाले असहयोग के लिए खूब बोले. जिनमें उनका साथ दिया नितिन चंद्रा, शिल्पा शुक्ला, और आर एन दास ने. जबकि अविनाश दास सिर्फ अपनी मोडरेटर की ही भूमिका में ही रहे. बाद में राज्यसभा सदस्य पवन वर्मा एवं चिल्ड्रेन फिल्म सोसाइटी के सीओ श्रवण कुमार ने भी अपनी बातें रखी. शाम के सत्र में “गंगा मैया तोहे पियरी चढैइबो” का प्रदर्शन हुआ.
19 मार्च को “मिर्च मसाला” और “मांझी द माउंटेन मैन” जैसी फिल्मों को बनाने वाले केतन मेहता ने बताया कि जब वे बिहार में शूटिंग के लिए तैयारी कर रहे थे तो किस तरह लोगों ने बिहार के नाम पर डराया था – अपहरण हो जाने तक की बातें कहीं. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है. अब यह सब भ्रम दूर हो गया. बेहतर लोकेशन हैं, लोगों का प्यार और सहयोग है. जो दिक्कते आई वे दूसरी जगहों पर भी आती हैं. यहां कई कहानियां हैं जिन्हें फिल्माने की जरूरत है. “नयना जागीन” फिल्म प्रदर्शन के बाद “पर्दे पर कैसा दिखता है बिहार” में चर्चित अभिनेता संजय मिश्रा, अखिलेन्द्र मिश्रा, ऋचा सिंह, शिल्पा शुक्ला आदि ने फिर से भोजपुरी कलाकारों को निशाने पर लिया. चंद्रकांता में क्रूर सिंह की भूमिका निभाने वाले अखिलेन्द्र मिश्रा ने कहा – “बिहार को जाने बिना बिहार पर फ़िल्में बनाई जा रही है. बिहार की कहानियां दिखाई जा रही है लेकिन उसमें बिहार कहीं दिखता नहीं.” आँखों देखी और मसान जैसी फिल्मों के लिए पुरस्कृत संजय मिश्रा ने कहा –“ये भोजपुरी वाले अभी तक चोली –लहंगा में ही अटके हुए हैं. पूरी संस्कृति का सत्यानाश कर दिया है.” आगे उन्होंने कहा कि यदि सरकार सहूलियतें दें तो वे मुफ्त में यहां की फिल्मों में काम करने के लिए तैयार हैं. शिल्पा शुक्ला ने कहा –“यहां बहुत ही सुन्दर गांव हैं. अच्छी शूटिंग की जा सकती है.” मिसेज यूनिवर्स साउथ एशिया ऋचा सिंह ने भी सहूलियत मिलने पर काम करने की बातें कहीं. शाम के सत्र में “तीसरी कसम” फिल्म का प्रदर्शन हुआ.
20 मार्च को अखिलेन्द्र मिश्रा ने जहां बातचीत में बिहार की संस्कृति को नुकसान पहुँचने वाले पर अंकुश लगाने और बेहतरीन फिल्मों के निर्माण के लिए सबके सहयोग की बात कही वहीं संजय मिश्रा, अविनाश दास, प्रवीण कुमार, विनीत कुमार, शिल्पा शुक्ला, संजय झा, केतन मेहता, रेखा झा आदि ने भी सकारात्मक सहयोग एवं माहौल की बातें दुहराई जबकि सिने स्टार और लोकसभा के सदस्य मनोज तिवारी ने आयोजक गंगा कुमार और स्नेहा राउट्रे को धन्यवाद देते हुए कहा कि यदि वे उनके पास फिल्म निर्माण का कोई प्रस्ताव लेकर आएंगें तो वे आर्थिक मदद करने को तैयार हैं.
सभी प्रतिभागियों एवं सम्मानितों को पुरस्कार देने के बाद समापन समारोह में कला संस्कृति मंत्री शिवचंद्र राम ने जब अपना जोशीला भाषण देते हुए शत्रुघ्न सिन्हा, सोनाक्षी सिन्हा से भोजपुरी कलाकार निरहुआ और खेसारी लाल का गुणगान करने लगे. मंत्री जी अपने जिस अंदाज में बोल रहे थे उससे लोगों की आशाएं बढ़ गई लेकिन आश्वासनों की झड़ी में कुछ भी नया नहीं मिला. अपने भाषण में राजगीर में फिल्म सिटी बनने और राज्य में फिल्म नीति बनने की बातें बताई. जहां उन्होंने शीघ्र ही पटना में फिल्म सेंसर बोर्ड के शाखा के खुलने की बात बताई वहीं बिहारी सभ्यता संस्कृति पर केंद्रित और पचहत्तर प्रतिशत बिहारी कलाकारों के साथ फिल्म बनाने वालों को पचास प्रतिशत राज्य से अनुदान देने की बात कही, जो कि पटना फिल्म फेस्टिवल के उद्घाटन समारोह में भी कही गई थी.
फिल्म “मांझी : द माउंटेन मैन” के प्रदर्शन के बाद समारोह का समापन इस घोषणा के साथ हुआ कि फिर हमलोग 14 नवम्बर 2016 को चिल्ड्रेन फिल्म सोसाइटी की ओर से आयोजित बाल फिल्म समारोह में और ग्रामीण स्नेह फाउंडेशन के तहत आगामी जनवरी –फरवरी 2017 में मिलेंगें .
इस तरह कलाकारों के एक दूसरे पर आरोप- प्रत्यारोप और मांगों के बीच बिहारी सभ्यता-संस्कृति पर बहस चारों दिन चलती रही. संभावनाओं के साथ सहयोग से काम करने के वादे होते रहे. और अंत में सरकार की ओर से आश्वासनों की झड़ी लगा दी गई. जिसके साथ ही महीने भर से चला आ रहा फिल्म समारोहों का दौर थम गया.

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सोमवार, 14 मार्च 2016

समाज में बढ़ते विचलन, विखंडन के बीच सार्थक फिल्मों की बहुत जरूरत है: मोहन अगाशे

सुशील कुमार भारद्वाज
यूं तो फिल्म और समाज का रिश्ता जगजाहिर है लेकिन जब बात सीधे फिल्म और आपके मन की हो तो बातें खास हो जाती हैं क्योंकि फिल्मों का सीधा असर आपके मन –मस्तिष्क पर पड़ता है. और जब रंगमंच एवं सिनेमा के प्रख्यात अभिनेता एवं मनोचिकित्सक डॉ मोहन अगाशे इस चर्चा में शरीक होते हुए सवाल करते हैं कि तन की सुंदरता के लिए तो जगह जगह जिम खोले जा रहे हैं लेकिन मन की सुंदरता के लिए क्या किया जा रहा है? तो चौंकना लाजिमी है. लेकिन वे आगे कहते हैं कि मन को ठीक रखने के लिए साईंको जिम खोलने की जरूरत है. सायको जिम का यह काम पुराने ज़माने में हमारे संस्कार करते थे, परिवार के बूढ़े बुजुर्ग करते थे, लेकिन आज इन सब की जिम्मेवारियां टेलीविजन, मीडिया और इन्टरनेट के सहारे रह गई हैं, जो कि संतुलित और पौष्टिक भोजन के बजाय वैसे जंक फ़ूड दे रहे हैं जो हमारे तन के साथ साथ मन को भी बुरी तरह से प्रभावित कर रहे हैं.
जी हां, डॉ मोहन अगाशे यह बात पटना स्थित पटना म्यूजियम के कर्पूरी ठाकुर सभागार में विजय मेमोरियल ट्रस्ट के तत्वाधान में आयोजित “मनोवेद फिल्म फेस्टिवल” में राजधानी के सम्मानित साहित्यकार, फ़िल्मकार, राजनेता एवं नौकरशाह के अलावे बुद्धिजीवी दर्शकों के बीच में कह रहे थे.
पहली बार आयोजित मनोवेद फिल्म फेस्टिवल के स्वागत भाषण में कार्यक्रम के आयोजक डॉ विनय कुमार ने कहा कि इस नई पहल का उद्देश्य फिल्मों के भीड़ में से सार्थक, सोद्देश्य एवं प्रश्नाकुल करती फिल्मों को आमजन तक पहुँचाना है. वैसी अंतर्राष्ट्रीय एवं भारतीय फिल्मों को प्रदर्शित करने की कोशिश होगी जो भौगौलिक एवं भाषाई कारणों से हम तक पहुंच नहीं पातीं हैं और जो खासतौर पर मनुष्य और समाज के स्वास्थ्य / मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विषयों को संबोधित करती हो.
कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए पद्मश्री उषा किरण खान ने कहा कि ऐसी फिल्मो का प्रदर्शन साल में एक बार नहीं बल्कि चार बार हो तथा जनजागरूकता वाले ऐसे कार्यक्रमों की चर्चा भी खूब होनी चाहिए ताकि लोग अपने तन के साथ साथ मन का भी ध्यान रख सकें .
समारोह में प्रदर्शित पहली फिल्म अस्तु थी, जो कि इल्जाइमर्स डिमेंशिया रोग से ग्रसित सेवानिवृत बुजुर्ग चक्रपाणी शास्त्री एवं उनके परिवार की कहानी है. ऐसी स्थिति में पति –पत्नी एवं बड़े होते बच्चों वाले परिवार की क्या स्थिति होती है? साथ ही कहानी बताती है कि जब शास्त्री बाजार में कुछ पल के लिए अकेला होने की स्थिति में गाड़ी से बाहर आ हाथी वाले महावत के साथ पीछे –पीछे चले जाते हैं तो उनका दिन कैसे गुजरता है जबकि दोनों ही एक दूसरे की भाषा समझने में असमर्थ हैं. दिखाई गई दूसरी फिल्म ‘जिंदगी जिंदाबाद’ भारतीय महानगर में एड्स के जटिल यथार्थ एवं जागरूकता पर केंद्रित फिल्म है , जिसमें जीवन के मूलभूत संघर्ष एवं मानवीय रिश्तों के दरारों में पनपे यौन सम्बंध, भटकता बचपन, ब्लड ट्रांसफ्यूजन आदि को उकेरने के साथ साथ मन में एड्स के प्रति बैठी विभिन्न भ्रांतियों को भी तोड़ने की कोशिश की गई है.
संवाद सत्र के दौरान फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम के साथ बातचीत में मोहन अगाशे ने कहा कि समाज में बढ़ते विचलन, विखंडन के बीच  सार्थक फिल्मों की बहुत जरूरत है. आगे उन्होंने कहा कि हमलोग तो कहकर नाटक करते हैं लेकिन यहां लोग जीवन में बिना कहे ही दिन रात नाटक करते रहते हैं, सुबह से शाम तक में अपनी भूमिकाएं बदलते रहते हैं. हमलोगों ने अपनी जिंदगी को बहुत सारी जिम्मेवारियों को मोबाइल जैसी तकनीकों के सहारे छोड़ रखा है जिससे बचने की जरूरत है.

मनोवेद फिल्म फेस्टिवल की यह पहल खुशगवार मौसम में न सिर्फ दर्शकों को समेटने में सफल रही बल्कि अपने उद्देश्यपूर्ति में भी आगे रही.

शुक्रवार, 4 मार्च 2016

पटना फिल्म फेस्टिवल 2016 : एक नई पहल (सुशील कुमार भारद्वाज)

  


जब प्रकृति ऋतुओं के राजा वसंत के स्वागत में खड़ी थी, पेड़-पौधे अपने पुराने पत्तों को छोड़ नए रूप में धरती पर नयनाभिराम हरितिमा की एक अलख जगाने के लिए मचल रही थी, उसी पल बिहार के पावन धरती पर उत्साह –उमंग का एक महोत्सव चल रहा था. नए वर्ष में लिखेंगें नई कहानी के तर्ज पर वसंत ऋतु के गुनगुने धूप-छांव में राजनीतिक एवं गैर- राजनीतिक शोरशराबे से कहीं दूर, जीवन के विविध कलाओं से पूर्ण क्लासिकल फिल्मों का प्रदर्शन पटना में चल रहा था. पटना फिल्म महोत्सव (पटना फिल्म फेस्टिवल) का आयोजन कला संस्कृति एवं युवा विभाग की ओर से पहली बार किया गया. जिसके उद्घाटन सत्र में राज्य के सबसे युवा उप –मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव अपने सम्बोधन में कह रहे थे कि बिहार के सकारात्मक पहलुओं पर काम किया जाय. नकारात्मक छवि को प्रस्तुत कर राज्य पर बदनुमा दाग देने की बजाय बिहार के कला संस्कृति में निखार लाने की कोशिश की जाय. उन्होंने फिल्मकारों को आश्वासन भी दिया कि बिहार में बिहारी कलाकारों के साथ मिलजुल कर बिहारी सभ्यता संस्कृति पर काम करने वालों को वे अपनी तरफ हर संभव मदद देंगें.  कला संस्कृति एवं युवा विभाग के मंत्री शिवचंद्र राम ने भी अपनी बात रखते हुए सरकार के स्तर पर विविध सुविधा मुहैया कराने की बात कही. जबकि विभाग के प्रधान सचिव विवेक कुमार सिंह ने अपने संबोधन में खुशखबरी दी कि फिल्म सिटी के निर्माण के लिए 20 एकड़ जमीन का अधिग्रहण राजगीर में कर लिया गया है. फिल्म नीति भी बनकर तैयार है जिसके एक दो महीने में सार्वजनिक हो जाने की सम्भावना है. गाँधी मैदान स्थित श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में आयोजित इस उद्घाटन समारोह के साक्षी बने फिल्म निर्देशक नितिन कक्कड़, अभिनेत्री दिव्या दत्ता, कुमुद मिश्र, शेखर सुमन, कला, संस्कृति विभाग के प्रधान सचिव विवेक कुमार सिंह, विभाग के निदेशक सत्यप्रकाश मिश्र, और केन्द्रीय फिल्म महोत्सव निदेशालय के निदेशक सी सेंथिल राजन एवं अन्य गणमान्य लोग. मोना सिनेमा में उद्घाटन फिल्म राम सिंह चार्ली के प्रदर्शन के पूर्व आगंतुकों ने स्थानीय कलाकारों द्वारा प्रस्तुत बिहार गीत एवं बिहार गौरव गीत का आनंद लिया.
ज्ञात हो कि पटना की धरती पर फिल्म समारोह का यह सिलसिला हाल के वर्षों में वर्ष 2006 से चल रहा है. काफी उत्साह–उमंग के साथ शुरू हुए पहले फिल्म महोत्सव में बिहार के फ़िल्मकार प्रकाश झा समेत बॉलीवुड के कई सितारे शरीक हुए थे. जिसकी चर्चा काफी दिनों तक चली थी. 11- 18 फरवरी 2006, फरवरी 2007, और 5-12 अप्रैल 2008 के बाद फिल्म महोत्सव का यह सिलसिला बंद हो गया था. पिछले वर्ष 2015 में एक निजी प्रयास से चार दिवसीय अन्तराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का आयोजन किया गया था. और इस बार कला, संस्कृति एवं युवा विभाग ने खुद अपनी रूचि दिखलाई.
लेकिन लंबे अरसे बाद शुरू हुए इस फिल्म समारोह की सबसे अच्छी बात यह रही कि भारतीय पैनोरमा की आठ भाषाओं की स्तरीय (राष्ट्रीय) एवं क्लासिकल फिल्मों को देखने के लिए किसी को न तो रुपए खर्च करने पड़े न ही किसी को पास का इंतज़ार. दर्शक सिर्फ अपने एक पहचान पत्र के सहारे पटना के गाँधी मैदान स्थित मोना एवं एलिफिस्टन सिनेमा में पहुँच, पहले आओ पहले पाओं की तर्ज पर 19  फरवरी से 25 फरवरी तक साठ के दशक से अब तक बनी 28 चुनिन्दा सामाजिक फिल्मों का आनंद सुबह दस बजे से चार शो में लेते रहे. इनमें 14 फ़िल्में हिन्दी, पांच बांग्ला, भोजपुरी, मराठी और अंग्रेजी की दो –दो और संस्कृत, मलयालम एवं कोंकणी की एक –एक थी. समारोह की शुरुआत मोना सिनेमा हॉल में रामसिंह चार्ली से हुई तो समापन बजरंगी भाईजान के प्रदर्शन के साथ. दिखाई गई अन्य फीचर एवं ड्कुमेंटरी फिल्मों में ‘द कौफिन मेकर, दो बीघा जमीन, चाइनीज विस्पर्स, सिनेमावाला, नाचोम-इया- कुम्पसर, पान सिंह तोमर, डैडी ग्रैंड पा एंड माई लेडी, मसान, प्रियमानस, कागज के फूल, आंखों देखी, कामाक्षी, तिनकहों, देवदास, सीक एंड हाइड, उत्ताल, जल, नाटोकेर मोटो, काबुलीवाला, गूंगा पहलवान, अनवर का अजब किस्सा, कत्यार कलजात घुसाली, लिसेन अमाया, मेघे धाकातारा, ऐन, हम बाहुबली, प्रमुख रही. संस्कृत, मराठी, कोंकणी, मलयालम आदि अन्य भाषाओं की फिल्मों के दर्शक अपेक्षाकृत कुछ कम रहे, लेकिन पान सिंह तोमर, दो बीघा जमीन, कागज के फूल, देवदास, बजरंगी भाईजान, आदि फिल्मों को देखने के लिए अपार भीड़ उमर पड़ी. हॉल के अंदर का नज़ारा यह था कि युवा तो युवा लगभग सत्तर की उम्र पार कर चुके दर्शक भी नजर आ रहे थे.
पटना फिल्म फेस्टिवल की सबसे अनोखी बात रही फ्रेजर रोड स्थित बहुद्देशीय सांस्कृतिक परिसर में रोजाना साढ़े बारह बजे से ढाई बजे तक आयोजित फिल्म प्रदर्शनी एवं कार्यशाला. भारतीय नृत्यकला मंदिर की आर्ट गैलरी में 16 फरवरी को फिल्म अभिलेखागार पुणे की ओर से पोस्टर प्रदर्शनी लगाई गई जिसमे 1940 -1980  के बीच की चर्चित फिल्मों औरत, भूमिका, भुवन सोम समेत 74 फिल्मों के पोस्टरों को  शामिल किया गया. दरअसल संवाद कार्यक्रम का उद्देश्य था फ़िल्मकार, रंगकर्मी एवं अन्य फिल्म प्रेमी सीधे रूप में ख्यातिप्राप्त अभिनेता, निर्देशक, निर्माता, छायाकार आदि के अनुभवों को न सिर्फ सुने बल्कि फिल्म निर्माण से जुड़ी जानकारी भी ले सकें. साक्षात् रूप में वे उनसे अपने प्रश्न कर सकें. जहां आमंत्रित नितिन कक्कड़, बुद्धदेव दासगुप्ता, इम्तियाज अली, अभय सिन्हा, मोनालिसा, सिद्धार्थ सिवा, महेश अने, अविनाश दास, पंकज त्रिपाठी, पंकज केशरी जैसे फिल्कारों ने अपने फ़िल्मी सफर एवं अनुभवों को बताया वहीं फिल्मों के बारें में भी विविध पहलुओं एवं तकनीकों की भी जानकारी दी. इम्तियाज अली और नितिन कक्कड़ ने विशेष रूप से फिल्म निर्माण से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें भी बताई. इस कार्यक्रम की सफलता को आप इससे भी आंक सकते हैं कि अधिकांश दिन हॉल में पीछे तक लोग जमे रहे. कुछ फिल्म मर्मज्ञों ने भी अपने प्रश्न जड़ बातचीत को एक नया आयाम दिया. साथ ही साथ सिनेमा के क्षेत्र में अपने जीवन की शुरुआत करने के इच्छुक कुछ लोग सीधे रूप से निर्माता–निर्देशक से मिल अपनी बातें रखीं और संभावनाओं के रास्ते भी तलाशे. और सबसे खास बात ये रही कि अधिकांश आमंत्रित फ़िल्मकार किसी ना किसी रूप में बिहारी ही थे जो अपनी पहचान राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय स्तर पर बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
इस फिल्म समारोह के बहाने न सिर्फ बिहार से जुड़े फिल्मकारों ने अपनी समस्याओं से विभाग को अवगत कराया बल्कि सुविधा मिलने की स्थिति में यहीं फिल्म निर्माण करने की भी बात कही. जहां शेखर सुमन ने उद्घाटन सत्र में ही जेपी (लोकनायक जय प्रकाश नारायण) पर फिल्म बनाने की बात कही वहीं भोजपुरी सिनेमा के निर्माता अभय सिन्हा ने बाबू वीर कुंवर सिंह पर फिल्म बनाने की बात कही. जहां फिल्मकारों ने वर्षों से विभाग में लटकी अपनी मांगों एवं योजनाओं का स्मरण कराया वहीं विभाग की ओर से भी इस क्षेत्र में हो रहे विकास कार्यों से लोगों को अवगत कराया गया. साथ ही बहुत जल्द फिल्म सेंसर बोर्ड की शाखा पटना में भी खुलने की खुशखबरी दी. जिसपर फिल्मकारों ने भी भरपूर सहयोग करने की बात कही.
सिनेमा हॉल में भीड़ तो खूब जुटी लेकिन कुछ लोग यह भी चर्चा करते नज़र आए कि मैथिली, मगही आदि क्षेत्रीय फिल्मों को भी अपने ही जमीन पर थोड़ा सम्मान मिलता तो जुड़े कलाकारों का उत्साह उमंग और बढ़ता. वे अपनी सहभागिता में और योगदान देते. फिर भी विभाग की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम को लोगों ने काफी सराहा.
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शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

पटना फिल्म फेस्टिवल 2016 में दिखीं आठ भाषाओं की अट्ठाईस फ़िल्में


- सुशील कुमार भारद्वाज

जहां एक तरफ बिहार विधान सभा चुनाव के बाद से राज्य की छवि अप्रत्याशित रूप से राजनीतिक-हत्या, अपहरण, रंगदारी और बलात्कार के कारण धूमिल हों रही है वहीं दूसरी ओर राज्य के सबसे युवा उप –मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव उन फिल्मकारों पर अपनी भड़ास निकाल रहे थे जिन्होंने बिहार के नकारात्मक छवि को अपने फिल्मों के माध्यम से प्रस्तुत किया. इतना ही नहीं, नए वर्ष में लिखेंगें नई कहानी के तर्ज पर राजधानी (पटना) में प्रेममयी वसंत ऋतु के गुनगुने धूप-छांव में राजनीतिक एवं गैर- राजनीतिक शोरशराबे से दूर कला, संस्कृति एवं युवा विभाग की ओर से पहली बार आयोजित सात दिवसीय ‘पटना फिल्म फेस्टिवल’ में उन्होंने आश्वासन भी दिया कि बिहार की धरती पर बिहारी कलाकारों के साथ बिहार केंद्रित विषय पर फिल्म बनाने वालों को वे हर संभव सहायता भी उपलब्ध कराएंगें. गाँधी मैदान स्थित श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में आयोजित इस उद्घाटन समारोह के साक्षी रहे फिल्म फिल्म निर्देशक नितिन कक्कड़ ,अभिनेत्री दिव्या दत्ता, और शेखर सुमन.   
पटना की धरती पर फिल्म समारोह का यह सिलसिला हाल के वर्षों में वर्ष 2006 में काफी उत्साह–उमंग के साथ शुरू हुआ था जिसमें बिहार के फ़िल्मकार प्रकाश झा समेत बॉलीवुड के कई सितारे शरीक हुए थे. जिसकी चर्चा काफी दिनों तक चली थी. 11- 18 फरवरी 2006, फरवरी 2007, 5-12 अप्रैल 2008 के बाद फिल्म महोत्सव का यह सिलसिला बंद हो गया था. पिछले वर्ष 2015 में एक निजी प्रयास से चार दिवसीय अन्तराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का आयोजन किया गया था. और इस बार कला, संस्कृति एवं युवा विभाग ने खुद अपनी रूचि दिखलाई और यह प्रचार- प्रसार किया गया था कि इस बार दर्शक फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन, प्रियंका चोपड़ा, विद्या बालन आदि जैसी महान हस्तियों से मिल सकेंगें. लेकिन समारोह के अंत अंत तक दर्शकों को नितिन कक्कड़, बुद्धदेव दासगुप्ता और इम्तियाज अली जैसे नामचीन निर्देशक से ही संतोष करना पड़ा.
लेकिन लंबे अरसे बाद शुरू हुए इस फिल्म समारोह की सबसे अच्छी बात यह रही कि भारतीय पैनोरमा की आठ भाषाओं की स्तरीय एवं क्लासिकल फिल्मों को देखने के लिए किसी को न तो रुपए खर्च करने पड़े न ही किसी पास का इंतज़ार. दर्शक सिर्फ अपने एक पहचान पत्र के सहारे पटना के गाँधी मैदान स्थित मोना एवं एलिफिस्टन सिनेमा में पहुँच, पहले आओ पहले पाओं की तर्ज पर 19  फरवरी से 25 फरवरी तक साठ के दशक से अब तक बनी 28 चुनिन्दा सामाजिक फिल्मों का आनंद सुबह दस बजे से चार शो में लेते रहे. इनमें 14 फ़िल्में हिन्दी, पांच बांग्ला, भोजपुरी, मराठी और अंग्रेजी की दो –दो और संस्कृत, मलयालम एवं कोंकणी की एक –एक थी. समारोह की शुरुआत मोना सिनेमा हॉल में रामसिंह चार्ली से हुई तो बजरंगी भाईजान के प्रदर्शन के साथ समापन. दिखाई गई अन्य फिल्मों में ‘द कौफिन मेकर, दो बीघा जमीन, चाइनीज विस्पर्स, सिनेमावाला, नाचोम-इया- कुम्पसर, पान सिंह तोमर, डैडी ग्रैंड पा एंड माई लेडी, मसान,

प्रियमानस, कागज के फूल, आंखों देखी, कामाक्षी, तिनकहों, देवदास, सीक एंड हाइड, उत्ताल, जल, नाटोकेर मोटो, काबुलीवाला, गूंगा पहलवान, अनवर का अजब किस्सा, कत्यार कलजात घुसाली, लिसेन अमाया, मेघे धाकातारा, ऐन, हम बाहुबली, प्रमुख रही. संस्कृत, मराठी, कोंकणी, मलयालम आदि अन्य भाषाओं की फिल्मों के दर्शक अपेक्षाकृत कुछ कम रहे, लेकिन पान सिंह तोमर दो बीघा जमीन, कागज के फूल, देवदास, बजरंगी भाईजान, आदि फिल्मों को देखने के लिए अपार भीड़ ही नहीं जुटी बल्कि बजरंगी भाईजान के लिए हंगामा भी हुआ और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए ताबडतोड लाठी चार्ज भी हुआ. हॉल के अंदर का नज़ारा यह था कि युवा तो युवा लगभग सत्तर की उम्र पार कर चुके महिला – पुरुष भी नजर आ रहे थे.
पटना फिल्म फेस्टिवल की सबसे अनोखी बात रही फ्रेजर रोड स्थित बहुद्देशीय सांस्कृतिक परिसर में रोजाना साढ़े बारह बजे से ढाई बजे तक आयोजित फिल्म प्रदर्शनी एवं कार्यशाला. भारतीय नृत्यकला मंदिर की आर्ट गैलरी में 19 फरवरी को फिल्म अभिलेखागार पुणे की ओर से पोस्टर प्रदर्शनी लगाई गई जिसमे 1940 -1980  के बीच की चर्चित फिल्मों औरत, भूमिका, भुवन सोम समेत 74 फिल्मों के पोस्टरों को  शामिल किया गया. दरअसल संवाद कार्यक्रम का उद्देश्य था फ़िल्मकार, रंगकर्मी एवं अन्य फिल्म प्रेमी अभिनेता, निर्देशक, निर्माता, छायाकार आदि के अनुभवों को न सिर्फ सुने बल्कि फिल्म निर्माण से जुड़ी जानकारी ले सकें. साक्षात् रूप में वे उनसे अपने प्रश्न कर सकें. इस कार्यक्रम की सफलता को आप इससे भी आंक सकते हैं कि अधिकांश दिन न सिर्फ हॉल खाली ही रहे बल्कि भीड़ बनकर जुटे कुछ लोगों को छोड़ किसी के पास कोई सार्थक प्रश्न नहीं थे. हां, सिनेमा के क्षेत्र में अपने जीवन की शुरुआत करने के इच्छुक कुछ लोग सीधे रूप से निर्माता–निर्देशक से मिल अपनी बातें रखीं और संभावनाओं के रास्ते भी तलाशे.
इस फिल्म समारोह के बहाने न सिर्फ बिहार से जुड़े फिल्मकारों ने अपनी समस्याओं से विभाग से अवगत कराया बल्कि सुविधा मिलने की स्थिति में यहीं फिल्म निर्माण करने की भी बात कही. जहां फिल्मकारों ने वर्षों से विभाग में लटकी अपनी मांगों एवं योजनाओं का स्मरण कराया वहीं विभाग की ओर से बताया गया कि फिल्मसिटी के निर्माण के लिए राजगीर में 20 एकड़ जमीन अधिग्रहित कर लिया गया है. फिल्म नीति तैयार कर ली गई है जो कि एक दो महीने में सार्वजनिक हों जाएगी वहीं बहुत जल्द फिल्म सेंसर बोर्ड की शाखा पटना में खुलने की भी खुशखबरी दी गई.
सिनेमा हॉल में भीड़ तो खूब जुटी लेकिन इसके सफल आयोजन पर अंगुली भी कम नहीं उठे. जहां आयोजकों में सामंजस्य की कमी की वजह से मीडिया वालों के समक्ष खेद व्यक्त करने के सिवा कुछ नहीं सूझ रहा रहा वहीं कुछ लोग कह रहे थे कि सत्ताधारी दल के आपसी उठापटक की वजह से सरकार की ओर से जिस उदासीनता को बरक़रार रखा गया उसी उदासीनता का परिचय देते हुए बॉलीवुड के श्रेष्ठ कलाकारों ने अपनी अपनी अनुपस्थिति में ही अपनी भलाई समझी. समझदार लोग कहते नज़र आए अनियंत्रित भीड़ तो एक मदारी भी जुटा लेता है लेकिन सरकारी खर्चे का सार्थक सदुपयोग होना भी लाजिमी होता है.



शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

पटना फिल्म फेस्टिवल 2016

पटना फिल्म फेस्टिवल 2016

नए वर्ष में लिखेंगें नई कहानी के तर्ज पर बिहार की राजधानी पटना में राजनीतिक एवं गैर- राजनीतिक शोरशराबे के माहौल से दूर प्रेममयी वसंत ऋतु के धूप-छांव में ‘पटना फिल्म फेस्टिवल’ कला, संस्कृति एवं युवा विभाग के तरफ से पहली बार आयोजित किया गया है. जबकि पटना की धरती पर फिल्म समारोह की शुरुआत विभिन्न विभागों एवं आयोजकों के सहयोग से वर्ष 2006  से अब तक तीन बार हो चुका है. 11- 18 फरवरी 2006, फरवरी 2007, 5-12 अप्रैल 2008 के बाद फिल्मों का यह सिलसिला बंद हो गया था. लंबे अरसे बाद शुरू हुए इस फिल्म समारोह की सबसे अच्छी बात है कि भारतीय पैनोरमा की विभिन्न भाषाओँ की क्लासिकल फिल्मों को देखने के लिए किसी को न रुपए खर्च करने हैं न ही किसी पास का इंतज़ार. महज अपना एक पहचान पत्र लेकर पटना के गाँधी मैदान स्थित मोना एवं एलिफिस्टन सिनेमा में पहुँच, पहले आओ पहले पाओं की तर्ज पर 20 फरवरी से 25 फरवरी तक वर्ष 1956 से अब तक के बने चुनिन्दा सामाजिक फिल्मों का आनंद सुबह दस बजे से चार शो में लें लिया जा सकता है. दिखाई जाने वाली प्रमुख फिल्मों में द कौफिन मेकर, दो बीघा जमीन, चाइनीज विस्पर्स, सिनेमावाला, नाचोम-इया- कुम्पसर, पान सिंह तोमर, डैडी ग्रैंड पा एंड माई लेडी, मसान, प्रियमानस, कागज के फूल, आंखों देखी, कामाक्षी, तिनकहों, देवदास, सीक एंड हाइड, उत्ताल, जल, नाटोकेर मोटो, काबुलीवाला, गूंगा पहलवान, अनवर का अजब किस्सा, कत्यार कलजात घुसाली, लिसेन अमाया, मेघे धाकातारा, ऐन, देसवा, बजरंगी भाईजान, एवं राम सिंह चार्ली है. सबसे अनोखी बात है कि इस फेस्टिवल में सिर्फ फिल्म ही नहीं दिखाए जाएंगें बल्कि रोजाना साढ़े बारह बजे से ढाई बजे तक बहुद्देशीय सांस्कृतिक परिसर, फ्रेजर रोड में प्रदर्शनी एवं कार्यशाला का भी आयोजन किया गया है.

पटना फिल्म फेस्टिवल का उद्घाटन करते तेजस्वी यादव 
समारोह का का उद्घाटन बिहार के उप-मुख्यमंत्री श्री तेजस्वी प्रसाद यादव, कला, संस्कृति मंत्री श्री शिवचंद्र राम, मुख्य सचिव श्री अंजनी कुमार सिंह, संस्कृति एवं युवा विभाग के प्रधान सचिव विवेक कुमार सिंह, समेत शेखर सुमन आदि बालीवुड कलाकारों, एवं गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति में सिनेमा ‘राम सिंह चार्ली’ के प्रदर्शन के साथ श्री कृष्ण मेमोरियल, हाल में आज 19 फरवरी को हुआ. जबकि फेस्टिवल का अंत ‘बजरंगी भाईजान’ के साथ होगा. कहने की जरूरत नहीं कि बिहार स्टेट फिल्म डेवलपमेन्ट एंड फिनांस कार्पोरेशन, फिल्म समारोह निदेशालय, एवं राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय के सहयोग से आयोजित पटना फिल्म फेस्टिवल से न सिर्फ माहौल में बदलाव आएगा बल्कि नए एवं कला से जुड़े लोगों को प्रेरणा एवं बहुत कुछ सिखने को मिलेगा.  
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