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सोमवार, 21 मार्च 2016

ये भोजपुरी वाले अभी तक चोली –लहंगा में ही अटके हुए हैं:संजय मिश्रा









-सुशील कुमार भारद्वाज


बिहार में वर्ष 2016 की शुरूआत फिल्मों के नजरिए से अच्छी मानी जा सकती है. एक महीने के भीतर राजधानी पटना में तीन फिल्म फेस्टिवल आयोजित किए गए और तीनों ही अपने अपने कारणों से अलग स्वरूप में दिखे. पहला पटना फिल्म फेस्टिवल पूर्णतः कला संस्कृति एवं युवा विभाग के तत्वावधान में आयोजित किया गया, जहां एक सप्ताह तक मोना और एलिफिन्स्टन में 28 चुनिन्दा एवं भारतीय पैनोरमा की फ़िल्में दिखाई गई साथ ही साथ फिल्मकारों से साक्षात् बातचीत भी हुए. वहीं मनोवेद फिल्म फेस्टिवल का आयोजन पहली बार पटना संग्रहालय के कर्पूरी ठाकुर सभागार में निजीतौर पर डॉ विनय कुमार के निजी प्रयास से विजय मेमोरियल ट्रस्ट के बैनर तले आयोजित हुआ जिसमें भाषा व क्षेत्रीय विविधता के कारण दर्शकों से दूर सार्थक फिल्मों (खासतौर से मानसिक स्वास्थ्य व अन्य)को आमजन तक लाने की कोशिश की गई. जबकि अधिवेशन भवन में  ग्रामीण स्नेह फाउंडेशन के तत्वावधान में आयोजित “बिहार; एक विरासत कला एवं फिल्म महोत्सव 2016” का आयोजन सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों के सहयोग से किया गया. इस फेस्टिवल की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि यह पूर्णरूप से बिहार की सभ्यता- संस्कृति एव कला –फिल्म पर केंद्रित थी. सचिवालय परिसर में स्थित अधिवेशन भवन में मुंबई –दिल्ली आदि शहरों में रहकर फ़िल्मी दुनियां में परचम फहराने वाले बिहार के बेटे –बेटियों का ही जमावड़ा नहीं लगा बल्कि कुछ राष्ट्रीय स्तर के नेताओं, नौकरशाहों एवं बुद्धिजीवियों के मिलन का भी यह साक्षी बना. जहां पूरे परिसर को मिथिला की कलाकृतियों से सजाने की कोशिश की गई वहीं बिहारी पहचान को बिखेरती एक से बढ़कर एक नक्काशी के नमूनों, कपड़ों आदि की दुकानें भी सजाई गई. 
साथ ही राज्य के नौवों प्रमंडल से प्रतियोगिता के आधार पर चुनकर आए प्रतिभागियों के कलाओं का प्रदर्शन एवं पुरस्कार वितरण भी किया गया. और इन सब से हटकर जो सबसे खास बात रही वह थी बिहारी फिल्मकारों द्वारा बिहार से जुड़ी फ़िल्मी समस्याओं पर खुलकर बोलना एवं कला –संस्कृति मंत्री शिव चन्द्र राम द्वारा आश्वासनों की झड़ी लगा देना.
17 मार्च से 20 मार्च तक आयोजित इस चार दिवसीय कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र के दौरान फिल्मकार शत्रुघ्न सिन्हा, शेखर सुमन, नीतू चंद्रा, नितिन चंद्रा, अविनाश दास, चंद्र प्रकाश द्विवेदी, अजय ब्रह्मात्मज, शारदा सिन्हा आदि लोग उपस्थित थे जिन्होंने बिहार की सभ्यता संस्कृति के इतिहास, वर्तमान एवं संभावनाओं पर जमकर बातें कहीं. बिहारी सभ्यता-संस्कृति के गुणगान के बीच शत्रुघ्न सिन्हा ने बिहार, बिहारी के अलावे अपने नए किताब “खामोश..” की भी चर्चा की. सुबह के सत्र में जहां “गूंजा” फिल्म दिखाई गई वहीं बाद के सत्र में “मिथिला मखान” फिल्म का प्रदर्शन हुआ.
18 मार्च को प्रकाश झा की फिल्म “सुनहरी दास्तान” के बाद बातचीत के दौरान चाणक्य धारावाहिक से जुड़ी कहानियों को सुनाते हुए चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने कहा –“बिहार की पहचान इसके विचारों में है. क्रांति करने की शक्ति में है. बिहारी मतलब अड़ियल, अपनी बातों पर अड़े रहने वाला. यही इसका सकारात्मक पक्ष भी है और नकारात्मक भी.” दर्शकों के बीच से एक सवाल उछला कि क्यों नहीं सिनेमा को भी स्कूली पाठ्यक्रम में जोड़ा जाए ताकि माता –पिता बच्चों की बातों को समझ उन्हें कुछ हद तक छूट दे सकें जिसके जबाब में उन्होंने फ़िल्म एवं टेलिविज़न क्षेत्र में कार्यरत कलाकारों के वास्तविक संघर्ष की बात बताते हुए कहा कि इस क्षेत्र में हर तरीके के त्याग की जरूरत होती है और कोई भी इंसान व्यक्तिगत प्रतिभाओं के बदौलत ही इसमें टिक सकता है.चक दे इण्डिया से सुर्ख़ियों में आई वैशाली की शिल्पा शुक्ला ने भी इसी सत्र में अपने फ़िल्मी सफर और 18 वर्ष की उम्र में पाकिस्तान जाने और अपने परवरिश की बात बताई. साथ ही बिहार केंद्रित फिल्म बनाने की बात भी कही.


“बिहार में फिल्म की चुनौतियां” सत्र में मनोज वाजपेयी ने भोजपुरी फिल्मकारों को बिहारी संस्कृति को देशभर में बदनाम करने और सरकारी स्तर पर मिलने वाले असहयोग के लिए खूब बोले. जिनमें उनका साथ दिया नितिन चंद्रा, शिल्पा शुक्ला, और आर एन दास ने. जबकि अविनाश दास सिर्फ अपनी मोडरेटर की ही भूमिका में ही रहे. बाद में राज्यसभा सदस्य पवन वर्मा एवं चिल्ड्रेन फिल्म सोसाइटी के सीओ श्रवण कुमार ने भी अपनी बातें रखी. शाम के सत्र में “गंगा मैया तोहे पियरी चढैइबो” का प्रदर्शन हुआ.
19 मार्च को “मिर्च मसाला” और “मांझी द माउंटेन मैन” जैसी फिल्मों को बनाने वाले केतन मेहता ने बताया कि जब वे बिहार में शूटिंग के लिए तैयारी कर रहे थे तो किस तरह लोगों ने बिहार के नाम पर डराया था – अपहरण हो जाने तक की बातें कहीं. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है. अब यह सब भ्रम दूर हो गया. बेहतर लोकेशन हैं, लोगों का प्यार और सहयोग है. जो दिक्कते आई वे दूसरी जगहों पर भी आती हैं. यहां कई कहानियां हैं जिन्हें फिल्माने की जरूरत है. “नयना जागीन” फिल्म प्रदर्शन के बाद “पर्दे पर कैसा दिखता है बिहार” में चर्चित अभिनेता संजय मिश्रा, अखिलेन्द्र मिश्रा, ऋचा सिंह, शिल्पा शुक्ला आदि ने फिर से भोजपुरी कलाकारों को निशाने पर लिया. चंद्रकांता में क्रूर सिंह की भूमिका निभाने वाले अखिलेन्द्र मिश्रा ने कहा – “बिहार को जाने बिना बिहार पर फ़िल्में बनाई जा रही है. बिहार की कहानियां दिखाई जा रही है लेकिन उसमें बिहार कहीं दिखता नहीं.” आँखों देखी और मसान जैसी फिल्मों के लिए पुरस्कृत संजय मिश्रा ने कहा –“ये भोजपुरी वाले अभी तक चोली –लहंगा में ही अटके हुए हैं. पूरी संस्कृति का सत्यानाश कर दिया है.” आगे उन्होंने कहा कि यदि सरकार सहूलियतें दें तो वे मुफ्त में यहां की फिल्मों में काम करने के लिए तैयार हैं. शिल्पा शुक्ला ने कहा –“यहां बहुत ही सुन्दर गांव हैं. अच्छी शूटिंग की जा सकती है.” मिसेज यूनिवर्स साउथ एशिया ऋचा सिंह ने भी सहूलियत मिलने पर काम करने की बातें कहीं. शाम के सत्र में “तीसरी कसम” फिल्म का प्रदर्शन हुआ.
20 मार्च को अखिलेन्द्र मिश्रा ने जहां बातचीत में बिहार की संस्कृति को नुकसान पहुँचने वाले पर अंकुश लगाने और बेहतरीन फिल्मों के निर्माण के लिए सबके सहयोग की बात कही वहीं संजय मिश्रा, अविनाश दास, प्रवीण कुमार, विनीत कुमार, शिल्पा शुक्ला, संजय झा, केतन मेहता, रेखा झा आदि ने भी सकारात्मक सहयोग एवं माहौल की बातें दुहराई जबकि सिने स्टार और लोकसभा के सदस्य मनोज तिवारी ने आयोजक गंगा कुमार और स्नेहा राउट्रे को धन्यवाद देते हुए कहा कि यदि वे उनके पास फिल्म निर्माण का कोई प्रस्ताव लेकर आएंगें तो वे आर्थिक मदद करने को तैयार हैं.
सभी प्रतिभागियों एवं सम्मानितों को पुरस्कार देने के बाद समापन समारोह में कला संस्कृति मंत्री शिवचंद्र राम ने जब अपना जोशीला भाषण देते हुए शत्रुघ्न सिन्हा, सोनाक्षी सिन्हा से भोजपुरी कलाकार निरहुआ और खेसारी लाल का गुणगान करने लगे. मंत्री जी अपने जिस अंदाज में बोल रहे थे उससे लोगों की आशाएं बढ़ गई लेकिन आश्वासनों की झड़ी में कुछ भी नया नहीं मिला. अपने भाषण में राजगीर में फिल्म सिटी बनने और राज्य में फिल्म नीति बनने की बातें बताई. जहां उन्होंने शीघ्र ही पटना में फिल्म सेंसर बोर्ड के शाखा के खुलने की बात बताई वहीं बिहारी सभ्यता संस्कृति पर केंद्रित और पचहत्तर प्रतिशत बिहारी कलाकारों के साथ फिल्म बनाने वालों को पचास प्रतिशत राज्य से अनुदान देने की बात कही, जो कि पटना फिल्म फेस्टिवल के उद्घाटन समारोह में भी कही गई थी.
फिल्म “मांझी : द माउंटेन मैन” के प्रदर्शन के बाद समारोह का समापन इस घोषणा के साथ हुआ कि फिर हमलोग 14 नवम्बर 2016 को चिल्ड्रेन फिल्म सोसाइटी की ओर से आयोजित बाल फिल्म समारोह में और ग्रामीण स्नेह फाउंडेशन के तहत आगामी जनवरी –फरवरी 2017 में मिलेंगें .
इस तरह कलाकारों के एक दूसरे पर आरोप- प्रत्यारोप और मांगों के बीच बिहारी सभ्यता-संस्कृति पर बहस चारों दिन चलती रही. संभावनाओं के साथ सहयोग से काम करने के वादे होते रहे. और अंत में सरकार की ओर से आश्वासनों की झड़ी लगा दी गई. जिसके साथ ही महीने भर से चला आ रहा फिल्म समारोहों का दौर थम गया.

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शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

पटना फिल्म फेस्टिवल 2016 में दिखीं आठ भाषाओं की अट्ठाईस फ़िल्में


- सुशील कुमार भारद्वाज

जहां एक तरफ बिहार विधान सभा चुनाव के बाद से राज्य की छवि अप्रत्याशित रूप से राजनीतिक-हत्या, अपहरण, रंगदारी और बलात्कार के कारण धूमिल हों रही है वहीं दूसरी ओर राज्य के सबसे युवा उप –मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव उन फिल्मकारों पर अपनी भड़ास निकाल रहे थे जिन्होंने बिहार के नकारात्मक छवि को अपने फिल्मों के माध्यम से प्रस्तुत किया. इतना ही नहीं, नए वर्ष में लिखेंगें नई कहानी के तर्ज पर राजधानी (पटना) में प्रेममयी वसंत ऋतु के गुनगुने धूप-छांव में राजनीतिक एवं गैर- राजनीतिक शोरशराबे से दूर कला, संस्कृति एवं युवा विभाग की ओर से पहली बार आयोजित सात दिवसीय ‘पटना फिल्म फेस्टिवल’ में उन्होंने आश्वासन भी दिया कि बिहार की धरती पर बिहारी कलाकारों के साथ बिहार केंद्रित विषय पर फिल्म बनाने वालों को वे हर संभव सहायता भी उपलब्ध कराएंगें. गाँधी मैदान स्थित श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में आयोजित इस उद्घाटन समारोह के साक्षी रहे फिल्म फिल्म निर्देशक नितिन कक्कड़ ,अभिनेत्री दिव्या दत्ता, और शेखर सुमन.   
पटना की धरती पर फिल्म समारोह का यह सिलसिला हाल के वर्षों में वर्ष 2006 में काफी उत्साह–उमंग के साथ शुरू हुआ था जिसमें बिहार के फ़िल्मकार प्रकाश झा समेत बॉलीवुड के कई सितारे शरीक हुए थे. जिसकी चर्चा काफी दिनों तक चली थी. 11- 18 फरवरी 2006, फरवरी 2007, 5-12 अप्रैल 2008 के बाद फिल्म महोत्सव का यह सिलसिला बंद हो गया था. पिछले वर्ष 2015 में एक निजी प्रयास से चार दिवसीय अन्तराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का आयोजन किया गया था. और इस बार कला, संस्कृति एवं युवा विभाग ने खुद अपनी रूचि दिखलाई और यह प्रचार- प्रसार किया गया था कि इस बार दर्शक फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन, प्रियंका चोपड़ा, विद्या बालन आदि जैसी महान हस्तियों से मिल सकेंगें. लेकिन समारोह के अंत अंत तक दर्शकों को नितिन कक्कड़, बुद्धदेव दासगुप्ता और इम्तियाज अली जैसे नामचीन निर्देशक से ही संतोष करना पड़ा.
लेकिन लंबे अरसे बाद शुरू हुए इस फिल्म समारोह की सबसे अच्छी बात यह रही कि भारतीय पैनोरमा की आठ भाषाओं की स्तरीय एवं क्लासिकल फिल्मों को देखने के लिए किसी को न तो रुपए खर्च करने पड़े न ही किसी पास का इंतज़ार. दर्शक सिर्फ अपने एक पहचान पत्र के सहारे पटना के गाँधी मैदान स्थित मोना एवं एलिफिस्टन सिनेमा में पहुँच, पहले आओ पहले पाओं की तर्ज पर 19  फरवरी से 25 फरवरी तक साठ के दशक से अब तक बनी 28 चुनिन्दा सामाजिक फिल्मों का आनंद सुबह दस बजे से चार शो में लेते रहे. इनमें 14 फ़िल्में हिन्दी, पांच बांग्ला, भोजपुरी, मराठी और अंग्रेजी की दो –दो और संस्कृत, मलयालम एवं कोंकणी की एक –एक थी. समारोह की शुरुआत मोना सिनेमा हॉल में रामसिंह चार्ली से हुई तो बजरंगी भाईजान के प्रदर्शन के साथ समापन. दिखाई गई अन्य फिल्मों में ‘द कौफिन मेकर, दो बीघा जमीन, चाइनीज विस्पर्स, सिनेमावाला, नाचोम-इया- कुम्पसर, पान सिंह तोमर, डैडी ग्रैंड पा एंड माई लेडी, मसान,

प्रियमानस, कागज के फूल, आंखों देखी, कामाक्षी, तिनकहों, देवदास, सीक एंड हाइड, उत्ताल, जल, नाटोकेर मोटो, काबुलीवाला, गूंगा पहलवान, अनवर का अजब किस्सा, कत्यार कलजात घुसाली, लिसेन अमाया, मेघे धाकातारा, ऐन, हम बाहुबली, प्रमुख रही. संस्कृत, मराठी, कोंकणी, मलयालम आदि अन्य भाषाओं की फिल्मों के दर्शक अपेक्षाकृत कुछ कम रहे, लेकिन पान सिंह तोमर दो बीघा जमीन, कागज के फूल, देवदास, बजरंगी भाईजान, आदि फिल्मों को देखने के लिए अपार भीड़ ही नहीं जुटी बल्कि बजरंगी भाईजान के लिए हंगामा भी हुआ और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए ताबडतोड लाठी चार्ज भी हुआ. हॉल के अंदर का नज़ारा यह था कि युवा तो युवा लगभग सत्तर की उम्र पार कर चुके महिला – पुरुष भी नजर आ रहे थे.
पटना फिल्म फेस्टिवल की सबसे अनोखी बात रही फ्रेजर रोड स्थित बहुद्देशीय सांस्कृतिक परिसर में रोजाना साढ़े बारह बजे से ढाई बजे तक आयोजित फिल्म प्रदर्शनी एवं कार्यशाला. भारतीय नृत्यकला मंदिर की आर्ट गैलरी में 19 फरवरी को फिल्म अभिलेखागार पुणे की ओर से पोस्टर प्रदर्शनी लगाई गई जिसमे 1940 -1980  के बीच की चर्चित फिल्मों औरत, भूमिका, भुवन सोम समेत 74 फिल्मों के पोस्टरों को  शामिल किया गया. दरअसल संवाद कार्यक्रम का उद्देश्य था फ़िल्मकार, रंगकर्मी एवं अन्य फिल्म प्रेमी अभिनेता, निर्देशक, निर्माता, छायाकार आदि के अनुभवों को न सिर्फ सुने बल्कि फिल्म निर्माण से जुड़ी जानकारी ले सकें. साक्षात् रूप में वे उनसे अपने प्रश्न कर सकें. इस कार्यक्रम की सफलता को आप इससे भी आंक सकते हैं कि अधिकांश दिन न सिर्फ हॉल खाली ही रहे बल्कि भीड़ बनकर जुटे कुछ लोगों को छोड़ किसी के पास कोई सार्थक प्रश्न नहीं थे. हां, सिनेमा के क्षेत्र में अपने जीवन की शुरुआत करने के इच्छुक कुछ लोग सीधे रूप से निर्माता–निर्देशक से मिल अपनी बातें रखीं और संभावनाओं के रास्ते भी तलाशे.
इस फिल्म समारोह के बहाने न सिर्फ बिहार से जुड़े फिल्मकारों ने अपनी समस्याओं से विभाग से अवगत कराया बल्कि सुविधा मिलने की स्थिति में यहीं फिल्म निर्माण करने की भी बात कही. जहां फिल्मकारों ने वर्षों से विभाग में लटकी अपनी मांगों एवं योजनाओं का स्मरण कराया वहीं विभाग की ओर से बताया गया कि फिल्मसिटी के निर्माण के लिए राजगीर में 20 एकड़ जमीन अधिग्रहित कर लिया गया है. फिल्म नीति तैयार कर ली गई है जो कि एक दो महीने में सार्वजनिक हों जाएगी वहीं बहुत जल्द फिल्म सेंसर बोर्ड की शाखा पटना में खुलने की भी खुशखबरी दी गई.
सिनेमा हॉल में भीड़ तो खूब जुटी लेकिन इसके सफल आयोजन पर अंगुली भी कम नहीं उठे. जहां आयोजकों में सामंजस्य की कमी की वजह से मीडिया वालों के समक्ष खेद व्यक्त करने के सिवा कुछ नहीं सूझ रहा रहा वहीं कुछ लोग कह रहे थे कि सत्ताधारी दल के आपसी उठापटक की वजह से सरकार की ओर से जिस उदासीनता को बरक़रार रखा गया उसी उदासीनता का परिचय देते हुए बॉलीवुड के श्रेष्ठ कलाकारों ने अपनी अपनी अनुपस्थिति में ही अपनी भलाई समझी. समझदार लोग कहते नज़र आए अनियंत्रित भीड़ तो एक मदारी भी जुटा लेता है लेकिन सरकारी खर्चे का सार्थक सदुपयोग होना भी लाजिमी होता है.



शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

पटना फिल्म फेस्टिवल 2016

पटना फिल्म फेस्टिवल 2016

नए वर्ष में लिखेंगें नई कहानी के तर्ज पर बिहार की राजधानी पटना में राजनीतिक एवं गैर- राजनीतिक शोरशराबे के माहौल से दूर प्रेममयी वसंत ऋतु के धूप-छांव में ‘पटना फिल्म फेस्टिवल’ कला, संस्कृति एवं युवा विभाग के तरफ से पहली बार आयोजित किया गया है. जबकि पटना की धरती पर फिल्म समारोह की शुरुआत विभिन्न विभागों एवं आयोजकों के सहयोग से वर्ष 2006  से अब तक तीन बार हो चुका है. 11- 18 फरवरी 2006, फरवरी 2007, 5-12 अप्रैल 2008 के बाद फिल्मों का यह सिलसिला बंद हो गया था. लंबे अरसे बाद शुरू हुए इस फिल्म समारोह की सबसे अच्छी बात है कि भारतीय पैनोरमा की विभिन्न भाषाओँ की क्लासिकल फिल्मों को देखने के लिए किसी को न रुपए खर्च करने हैं न ही किसी पास का इंतज़ार. महज अपना एक पहचान पत्र लेकर पटना के गाँधी मैदान स्थित मोना एवं एलिफिस्टन सिनेमा में पहुँच, पहले आओ पहले पाओं की तर्ज पर 20 फरवरी से 25 फरवरी तक वर्ष 1956 से अब तक के बने चुनिन्दा सामाजिक फिल्मों का आनंद सुबह दस बजे से चार शो में लें लिया जा सकता है. दिखाई जाने वाली प्रमुख फिल्मों में द कौफिन मेकर, दो बीघा जमीन, चाइनीज विस्पर्स, सिनेमावाला, नाचोम-इया- कुम्पसर, पान सिंह तोमर, डैडी ग्रैंड पा एंड माई लेडी, मसान, प्रियमानस, कागज के फूल, आंखों देखी, कामाक्षी, तिनकहों, देवदास, सीक एंड हाइड, उत्ताल, जल, नाटोकेर मोटो, काबुलीवाला, गूंगा पहलवान, अनवर का अजब किस्सा, कत्यार कलजात घुसाली, लिसेन अमाया, मेघे धाकातारा, ऐन, देसवा, बजरंगी भाईजान, एवं राम सिंह चार्ली है. सबसे अनोखी बात है कि इस फेस्टिवल में सिर्फ फिल्म ही नहीं दिखाए जाएंगें बल्कि रोजाना साढ़े बारह बजे से ढाई बजे तक बहुद्देशीय सांस्कृतिक परिसर, फ्रेजर रोड में प्रदर्शनी एवं कार्यशाला का भी आयोजन किया गया है.

पटना फिल्म फेस्टिवल का उद्घाटन करते तेजस्वी यादव 
समारोह का का उद्घाटन बिहार के उप-मुख्यमंत्री श्री तेजस्वी प्रसाद यादव, कला, संस्कृति मंत्री श्री शिवचंद्र राम, मुख्य सचिव श्री अंजनी कुमार सिंह, संस्कृति एवं युवा विभाग के प्रधान सचिव विवेक कुमार सिंह, समेत शेखर सुमन आदि बालीवुड कलाकारों, एवं गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति में सिनेमा ‘राम सिंह चार्ली’ के प्रदर्शन के साथ श्री कृष्ण मेमोरियल, हाल में आज 19 फरवरी को हुआ. जबकि फेस्टिवल का अंत ‘बजरंगी भाईजान’ के साथ होगा. कहने की जरूरत नहीं कि बिहार स्टेट फिल्म डेवलपमेन्ट एंड फिनांस कार्पोरेशन, फिल्म समारोह निदेशालय, एवं राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय के सहयोग से आयोजित पटना फिल्म फेस्टिवल से न सिर्फ माहौल में बदलाव आएगा बल्कि नए एवं कला से जुड़े लोगों को प्रेरणा एवं बहुत कुछ सिखने को मिलेगा.  
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