फिर मिलने के वादे
के साथ समाप्त हो गया 28 वाँ लघुकथा सम्मेलन
सुशील कुमार
भारद्वाज
भागदौड़ भरी जिन्दगीं
में जब लोगों के पास अपने निजी काम के लिए समय का अभाव होता जा रहा है तब लंबी –लंबी
कहानियों एवं उपन्यास रूपी प्रचलित साहित्यों से उनका दूर होते चला जाना लाजिमी ही
लगता है. लेकिन लघुकथा एक ऐसी विधा है जो राह चलते और फेसबुक एवं व्हाट्सअप्प के
माध्यम से भी सामान्य जनों के बीच अपनी पैठ बनाने में सफल है. लघुकथा ऐसी विधा है जिनमें
शक्ति है कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक एवं हास्य –व्यंग्य के साथ धीर –गंभीर बातों
को भी कह गुजरने की. लेकिन इसे दुर्भाग्य
ही कहा जाएगा कि इस फटाफट जिंदगी में आसानी से लोगों के बीच पैठ बनाती यह लघुकथा अभी
भी अपने यथोचित सम्मान से दूर है. जो कहीं ना कहीं झलक ही जाता है.
जी हां, 17 अप्रैल 2016 को जब पटना के
भारतीय नृत्य कला मंदिर के एमपीसीसी सभागार में अखिल भारतीय प्रगतिशील लघुकथा मंच
के तत्वावधान में आयोजित 28
वाँ लघुकथा सम्मेलन के दूसरे सत्र (आलेख पाठ सत्र)
में लघुकथा के विभिन्न बिंदुओं पर चर्चा हो रही थी, तब न सिर्फ इस पर चर्चा हुई कि
लघुकथा क्या है? इसके आवश्यक तत्व क्या हैं? वर्तमान में इसकी स्थिति क्या है? और
इसके लिए भविष्य में क्या संभावनाएं हैं? बल्कि इस पर भी चर्च हुई कि इसे
पाठ्यक्रम में शामिल कराने के लिए क्या किया जाय? और जब विभिन्न कलाओं के लिए सम्मान
सरकारों द्वारा ससमय दिया जा रहा है तो लघुकथा ही उपेक्षित क्यों रहें?
जबकि उद्घाटन सत्र
में बिहार के कला संस्कृति मंत्री श्री शिवचंद्र राम ने अपनी बातों को रखते हुए
कहा कि जब शहर में जब नाटक, नृत्य के केंद्र बने हैं तो साहित्य के केंद्र क्यों
नहीं बनेगें? जबकि मंच पर ही आसीन विधान पार्षद श्री नवल किशोर यादव ने अपने
वक्तव्य में कहा कि मंत्रीजी साहित्य भवन बनाने की बात करते हैं और राजधानी में
पहले से बने हिन्दी भवन पर दूसरे लोगों का कब्ज़ा ऐसा है कि साहित्यकार वहां घुस भी
नहीं सकते.
इन राजनीतिक बयानों
से इतर अखिल भारतीय प्रगतिशील लघुकथा मंच के अध्यक्ष सतीशराज पुष्करणा ने अपने
अध्यक्षीय भाषण में कहा कि जल्द ही दिशा प्रकाशन की ओर से लघुकथा कोश प्रकाशित
होने जा रहा है. साथ ही साथ उन्होंने लघुकथा के इतिहास लिखने की योजना की भी
जानकारी दी. बंगलुरू से आई व्ही ललिताम्बा ने कहानी के बढ़ते दायरे की बात कहीं, तो
मेजर बलबीर सिंह भसीन ने सलाह देते हुए कहा कि लघुकथा में दर्द भी उभरे और अनुशासन
भी बना रहे. जबकि रामदेव प्रसाद ने लघुकथा में संवेदनशीलता, संक्षिप्तता और समाज
सापेक्ष मूल्यों पर बल देने की बात कही. नागपुर से आए डा मिथिलेश अवस्थी ने भाषा
के साथ साथ लघुकथा में शब्द सीमा और अनुशासन पर ध्यान देने की बात कही. जबकि
नागेन्द्र प्रसाद सिंह ने लघुकथा में पुनार्चनावाद की सम्भावना पर अपनी बातों को
रखा.
तीसरे सत्र में जहां
तकनीकी सत्र में रखी गई बातों पर ही डा शंकर प्रसाद, कांता रॉय, पुष्पा जमुआर समेत
अन्य वक्ताओं ने अपने विविध विचार रखे वहीं चौथे सत्र में जीवन के विविध क्षेत्रों
के पृष्ठभूमि में रची गई 34
लघुकथाओं का पाठ किया गया. इन लघुकथाकारों में न
सिर्फ सतीशराज पुष्करणा, वीरेन्द्र कुमार भारद्वाज, सिद्धेश्वर, ध्रुव कुमार, मिथिलेश
अवस्थी, पुष्पा जमुआर, सुशील कुमार भारद्वाज, अनीता राकेश, देवेन्द्र नाथ
साह, कांता रॉय, रेखा रश्मि, पूनम आनंद,
मेहता नागेन्द्र, आलोक भारती भगवान सिंह भास्कर आदि शामिल रहे बल्कि किलकारी के
प्रियांतरा भारती और प्रवीण कुमार समेत अन्य भी रहे. और इन लघुकथा पाठों पर अपने
समीक्षात्मक वक्तव्य दिए प्रतिष्ठित साहित्यकार नागेन्द्र प्रसाद सिंह, अवधेश प्रीत,
एवं संतोष कुमार ने.
सम्मलेन में जहां
फूलों की माला के बदले, फलों की टोकरी देकर अतिथियों का स्वागत किया गया, वहीं देश
के विभिन्न राज्यों से आए अथिति लघुकथाकार डा सच्चिदानंद सिंह साथी, डा मिथिलेश
अवस्थी, डा शरद नारायण खरे, मिथिलेश कुमारी मिश्र, नागेन्द्र प्रसाद सिंह, डा
देवेन्द्र नाथ साह, पुष्पा जमुआर, तथा आलोक भारती को लघुकथा सम्मान से सम्मानित
किया गया, जबकि राघवेन्द्र कुमार कौशल को लघुकथा सम्भावना सम्मान से सम्मानित किया
गया. किलकारी के प्रियांतरा भारती एवं प्रवीण कुमारत को लघुकथा अंकुर सम्मान दिया
गया.
सम्मलेन में सन्नाटा
बोल उठा (डा मिथिलेश कुमारी मिश्र), आस पास कि बातें (डा पुष्प जमुआर), वृक्ष ने
कहा (डा मेहता नागेन्द्र), परदेस का पंछी (बीरेंद्र कुमार भारद्वाज), बंद मुट्ठी
में सूरज (आलोक भारती), और साहित्य प्रहरी (लघुकथा पर केंद्रित पत्रिका –भगवान सिंह
भास्कर) का लोकार्पण भी किया गया. और अगले साल फिर मिलने के वादे के साथ समारोह का
समापन हो गया .
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