शर्म आनी चाहिए उनलोगों को जो सनातन धर्म में जन्म लेकर भी कुछ स्वार्थी तत्वों के बहकावे में आकर खुद को बर्बाद करने में दिन रात लगे हुए हैं। एक विशाल परिवार में सबों को एक समान ही प्रेम मिल जाए कोई जरूरी नहीं। यह एक सामान्य व मानवीय चुक है जो हमारे दैनिक जीवन में अक्सर दिख जाते हैं। इस सनातन धर्म में समय के साथ परिवर्तन हुए, फिर भी कुछ व्यवहारिक बाह्य आडंबर शेष है जो कि हमारे शिक्षित एवं जागरूक बंधुओं के प्रयास से दूर किया जा रहा है। मैं स्वयं कर्मकांडो का विरोधी हूं और सर्वधर्म समभाव की भावना से जीवन व्यतीत करता हूं लेकिन जिस प्रकार से इस धर्म पर हाल के महीने में हमला हुआ है, उससे व्यथित हूं। ऐसा जान पङता है कि सनातन धर्म संकट में है। भारत जैसे देश में ही जब यह अपनों के द्वारा ही अपमानित किया जा रहा है तो शेष की क्या बात की जाए? क्या यह इसकी उदारता नहीं है कि अनेक धर्म इसी से अलग हुए हैं? क्या यह सत्य नहीं है कि आज मौजूद कुछ धर्म हाल के वर्षों की उपज है जिसमें कट्टरता इससे कहीं अधिक और कूट कूट कर भरी है? आप किसी भी धर्म को अपना लें लेकिन कोई भी धर्म आपको मुफ्त की रोटी नहीं दे सकता। आपके दुख दर्द का आपके धर्म से कोई लेना देना नहीं है। धर्म आपको सिर्फ एक रास्ता दिखलाता है। संस्कार सिखलाता है। आप आस्तिक की बजाय नास्तिक ही हो जाऐंगें तो कौन आपका क्या बिगाङ लेगा? सामान्य जीवन में धर्म पर बहुत चर्चा करने की भी तो कोई बजह नहीं? फिर आप क्यों पुरानी बातों व ग्रंथों की बातों में उलझते हैं? ग्रंथ व्यक्ति विशेष द्वारा लिखी गई है जहाँ साहित्यिक सुविधा के अनुसार छूट लेने से इंकार नहीं किया जा सकता है। फिर आज के शिक्षित समाज में इन पोंगा पंथियों की सुनता ही कौन है? आपके धर्म परिवर्तित कर लेने से देश समाज का कुछ घट जाएगा ऐसा भी कुछ नहीं है लेकिन कहा जाता है न कि जो तुम्हें बदल कर प्यार करे वह प्यार नहीं। बस इतना ही कहूंगा विद्वान बनना गुनाह नहीं लेकिन बहकावे में आकर खुद का घर जला लेना जरूर अपराध है। अभी जो अपराध आप खुशी खुशी कर रहे हैं कहीं उसके विनाश होने पर कहीं पछताना न पङे। वैश्वीकरण के इस दौर में कब कौन कैसी राजनीति कर जाए कहना मुश्किल है।
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