मंगलवार, 12 दिसंबर 2023

हिंदी कथा-आलोचना पर एक जरूरी किताब:- प्रेमकुमार मणि

 हिंदी कथा-आलोचना पर  एक जरूरी किताब 


प्रेमकुमार मणि 


 पिछले तीन रोज मेरे साथ एक किताब बनी रही, जिसे मैं रुक-रुक कर पढता रहा. मेरे शहर पटना में सर्दी बढ़ गई है और ऐसे में  लगातार देर तक सक्रिय रहना मेरे लिए मुश्किल होता है. इसलिए रुक-रुक कर पढ़ना मेरी मजबूरी भी थी. लेकिन इस धीमी रफ़्तार से पढ़ने का एक लाभ भी है. कुछ वैसा ही  जैसा चबा-चबा कर भोजन करने से होता है. 

 

किताब है  ' उपन्यास और देस,' जिसके लेखक हैं वीरेंद्र यादव. अभी पिछले महीने दो रोज हमलोग दिल्ली में एक साहित्यिक जलसे में साथ थे. वहाँ भी उपरांत बैठकी में दुनिया भर की खूब बातें हुई थीं. मौजूदा कामकाजी संसार में बातें करने वाले लोग तेजी से कम हो रहे हैं. दरअसल यह हमारी सभ्यता की समस्या है. इसी अनुपात में हमारा पढ़ना भी कम हो रहा है. लोग इतने लक्ष्यप्रिय होते जा रहे हैं कि लाभ रहित कामों से परहेज करते हैं. शुभ-लाभ की मौजूदा सभ्यता में पुरानी दुनिया की कई अलाभकारी चीजें फालतू मान ली गई हैं. कोई चीज है तो उसका मूल्य होना चाहिए. मुझे एहसास होता है उपन्यास विधा भी इस सोच का शिकार हो गई है. दुनिया भर की जुबानों की बात नहीं कह सकता, लेकिन हिंदी में उपन्यासों की स्थिति उदास करने वाली है. उपन्यासकार भी इस विधा को ठीक से समझ नहीं रहे हैं. उन्नीसवीं सदी में दुनिया भर के आधुनिक जुबानों में उपन्यास एक खास कारण से आए थे. वह साहित्यिक विकासवाद की खास मंजिल तय कर रहे थे. सामंतवाद अवसान पर था. नया सामाजिक ढांचा आकार लेने केलिए आकुल था. संस्थागत धर्म हस्तक्षेप करने की स्थिति में नहीं थे और लोकतंत्र अभी शैशव-काल में था. काव्य विधा को अभी कविता के कलेवर में आना था. ऐसे में उपन्यास ने सामाजिक संवाद और विमर्श की एक पृष्ठभूमि तैयार की थी. उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में उपन्यास साहित्य का केंद्र बना रहा. इसके अनेक कारण थे,जिन पर विस्तार से विमर्श होना अभी शेष है. 


यह किताब हमें कायदे से इसी समस्या पर सोचने केलिए उत्साहित करती है. अपने कलेवर में यह आलोचना पुस्तक है, जिस में  हिंदी उपन्यासों पर विमर्श किया गया है. इस विषय पर सोचने और काम करने वालों केलिए यह एक जरूरी किताब बन जाती है. हिंदी भाषी समाज में बहुतेरे लेखकों को भी साहित्य के समकालीन सरोकारों का अभिज्ञान नहीं है. वे आज भी देहाती दुनिया, गोदान या फिर मैला आँचल की प्रतिलिपि तैयार करना चाहते हैं. उपन्यास या साहित्य पूरी दुनिया में नए सरोकारों से जुड़ रहा है और रूप व विषय दोनों स्तरों पर निरंतर नवीन बना रहना चाहता है. इस किताब में ही लेखक रूसी लेखक स्वेतलाना अलेक्सेविच की एक उक्ति उद्धृत करते हैं,जिस में वह कहती हैं  -' यदि मैं उन्नीसवीं सदी में लिख रही होती तो टॉलस्टॉय या चेखब की तरह फिक्शन ही लिखती, लेकिन आज के समय को लिखने केलिए विशुद्ध कथा विधा अपर्याप्त है. लोगों को समझने में कथा विधा विफल रही है,' ( पृष्ठ 191 ) यह प्रसंग अरुंधति राय के उपन्यास पर विमर्श के दौरान आया है. जाहिर है अरुंधति फिक्शन के तय दायरे को तोड़ती भी हैं क्योंकि  यथार्थ के समग्र उद्घाटन के लिए  फिक्शन के पारम्परिक व्याकरण को तोडना  जरूरी था. 


' उपन्यास और देस ' चार अध्यायों में विभक्त कुल जमा बाईस लेखों का संकलन है. पहला अध्याय है 'उपन्यास और देस ' जिसमें रेणु के मैला आँचल, शिवपूजन सहाय के देहाती दुनिया, नागार्जुन के बलचनमा, अखिलेश के निर्वासन, पंकज विष्ट के लेकिन दरवाजा और गिरिराज किशोर के पहला गिरमिटिया जैसे कुल तेरह उपन्यासों पर आलोचकीय विमर्श है. इसमें ' मैला आँचल ' पर केंद्रित लेख मुझे बहुत खास लगा. यह इसलिए भी कि वीरेंद्र मूलतः मार्क्सवादी आलोचक हैं और मार्क्सवादी आलोचकों ने मैला आँचल और उसके लेखक फणीश्वरनाथ रेणु को एक तरह से मार्क्सवादी दुनिया का कुजात लेखक घोषित किया हुआ था. रेणु समाजवादी राजनीति से भी सक्रिय तौर पर जुड़े हुए थे. शीतयुद्ध दौर में स्तालिनवादी मार्क्सवादी प्रवृत्तियों में एक खास तरह का कठमुल्लापन विकसित हुआ था, जिस के शिकार उस दौर के ज्यादातर शीर्ष मार्क्सवादी आलोचक थे. जार्ज लूकाच जैसे विलक्षण आलोचक भी इससे मुक्त नहीं थे. हिंदी मार्क्सवादी आलोचकों का कठमुल्ला न होना ही अस्वाभाविक होता. वह इसके लिए तैयार बैठे थे. यही कारण था  रेणु के साहित्यिक विवेक को समझने में उस दौर की ' प्रगतिशील आलोचना ' विफल रही थी. ऐसे में वीरेंद्र द्वारा उदार नजरिये से 'मैला आँचल ' का पाठ प्रस्तुत करना अपने आप में प्रगतिशील आलोचना की भी समीक्षा बन जाती है. 


अपने इस उदार दृष्टिकोण को वीरेंद्र पूरी किताब में बनाए रहते हैं और यही उनकी विशिष्टता है. किताब में संकलित कुछ लेख निश्चित ही पत्रिकाओं और मित्र लेखकों की मांग ( आग्रह ) पर लिखे प्रतीत होते हैं और इन लेखों को यदि इस संकलन से अलग रखा जाता तो यह अधिक मूल्यवान  होता, बावजूद इसके कोई पाठक इस किताब के महत्वपूर्ण लेखों को अपने पाठकीय विवेक से अलगा सकता है. अरुंधति राय के उपन्यास ' दि मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैपीनेस ' की गंभीर समीक्षा, ' उपन्यास दृष्टि और उपन्यास ', ' कथा आलोचना और रामविलास शर्मा ' तथा ' प्रेमचंद पर नामवर सिंह ' शीर्षक लेख इस पुस्तक को खास और पठनीय बनाते हैं. मेरी दृष्टि में कोई किताब इसलिए महत्वपूर्ण होती है कि वह पाठक को नए विमर्श केलिए उत्साहित करती है  और उसमें समझ के नए गवाक्ष विकसित करती है. इस नजरिए से यह किताब पठनीय प्रतीत हुई है. यह हमें आलोचना के एक अनछुए -अनजाने देस में ले जाने की कोशिश करती हैं.


हिंदी आलोचना में रामविलास शर्मा एक ऐसा नाम है,जिन से टकराए बिना आप शायद नहीं रह सकते. उन्होंने यथेष्ट काम भी किया है. निराला और प्रेमचंद पर उनका आलोचना कार्य ऐसा है जिसके कारण हिंदी कविता और  कथा विधा में उन्हें नजरअंदाज कर आप आगे नहीं बढ़ सकते. वीरेंद्र जी ने ' कथा -आलोचना और रामविलास शर्मा ' शीर्षक अपने विस्तृत लेख में विस्तार पूर्वक शर्माजी के अंतर्विरोधों और उनके दृष्टिकोण की पड़ताल की है. रामविलास जी का बांग्ला भाषा पर अधिकार था, निराला की तरह. लेकिन अपने कविगुरु निराला की ही तरह वह बांग्ला साहित्य की चेतना से असम्पृक्त रहने के अभिलाषी थे. बांग्ला नवजागरण की परंपरा से हिंदी साहित्य चेतना को हरसंभव अलग-थलग रखने की कोशिश भी उन्होंने की. इसलिए ही वह रवीन्द्र पर चुप और शरत पर आक्रामक दीखते हैं. शरत के उपन्यासलेखन के चार मुख्य पड़ाव हैं. देवदास, चरित्रहीन, पथेरदाबी और शेषप्रश्न. स्वयं शरत देवदास को चरित्रहीन से और पथेरदाबी को शेषप्रश्न से ख़ारिज करते हैं. रवीन्द्रनाथ का 'गोरा' और शरत का शेषप्रश्न बांग्ला नवजागरण का दर्पण है. लेकिन रामविलास शर्मा को वर्ग-संघर्ष की चिंता है,जिसे शरत-साहित्य से कोई सहयोग नहीं मिलता दिखाई देता. ऐसे में वह उन्हें प्रेमचंद की उस किसान चेतना से ध्वस्त कर देते हैं जिस के बीच से वर्ग-संघर्ष उझकता दिखाई पड़ जाता है. अपने इन्ही औजारों से वह बांग्ला नवजागरण के समान्तर एक हिंदी नवजागरण का भी जैसा-तैसा ठाट तैयार कर देते हैं और सावरकर प्रणीत 1857 के तथाकथित स्वतंत्रता संग्राम को कुछ आगे बढ़ कर फ़्रांसिसी राज्यक्रांति जैसा दर्जा दे डालते हैं. वीरेंद्र अपने इस लेख में रामविलास जी के अंतर्विरोधों को रेखांकित करते हुए उनकी सीमा रेखा बताते हैं. इस लेख को कोई पाठक पूरा पढ़ कर ही इसका आनंद ले सकता है. 

लोग जानते हैं कि रामविलास जी ने अज्ञेय और जैनेन्द्र के साथ समाजवादी तबियत के यशपाल, रांगेय राघव, राहुल सांकृत्यायन , रेणु, मुक्तिबोध सरीखे लेखकों को ख़ारिज किया है. इसकी लम्बी और दिलचस्प पृष्ठभूमि है. समाजवादी लेखकों की जगह उन्होंने वृंदावनलाल वर्मा और अमृतलाल नागर जैसे उपन्यासकारों और कविता में मुक्तिबोध की जगह केदारनाथ अग्रवाल जैसे कवियों को महत्वपूर्ण माना. आश्चर्य तो यह है कि जिस लोकचेतना को साहित्य में मूर्त करने केलिए वह वृंदावनलाल वर्मा और अमृतलाल नागर या फिर कुछ दूसरे कथाकारों की प्रशंसा करते हैं, उसी लोकचेतना को अंगीकार करने केलिए रेणु की आलोचना करते हैं. इन सब तथ्यों को उदाहरण के साथ रख कर वीरेंद्र ने जिस तरह रामविलास जी की कथा-आलोचना को बेनकाब किया है वह निश्चय ही उल्लेखनीय है. विशेषता यह है कि रामविलास जी की मेधा के प्रति उन्होंने हर जगह संभव सम्मान बनाये रखा है. लेकिन वह कोई कुहेलिका भी नहीं गढ़ते. इस लेख के समापन में वह लिखते हैं- ' अमृतलाल नागर और वृन्दावनलाल वर्मा के प्रति रामविलास शर्मा की अतिरिक्त सहृदयता और मैत्री-भाव तथा राहुल, यशपाल, और रांगेय राघव के प्रति शत्रुता की सीमा तक आलोचकीय कठोरता उन्हें राग-द्वेष से मुक्त आलोचकों की पांत में नहीं खड़ा करती. राहुल व राघव के मुकाबले शिवसागर मिश्र व हिमांशु श्रीवास्तव का महिमामंडन उस संकीर्णतावादी दृष्टि का हिंदी कुसंस्करण है, जिसका इस्तेमाल कर स्टालिन काल में रूस के संस्कृति मंत्री ज़्दानोव ने लेखकों की बड़ी जमात को कुजात घोषित कर दण्डित किया था. " (पृष्ठ 291 ) 

कहना न होगा, वीरेंद्र यादव ने मार्क्सवादी अतिवाद को सूक्ष्मता से समझने की कोशिश की है और हिंदी कथा-आलोचना के अवरोधों से हमें परिचित कराया है. हम उम्मीद करेंगे वीरेंद्र जी अपनी आलोचना दृष्टि को इसी तरह निरंतर परिमार्जित करते रहेंगे. प्रकृति और प्रज्ञा के स्तर पर हर चीज निरन्तर परिवर्तित होती रहती है. रूढ़ि अथवा गतिरोध केवल विकार पैदा कर सकता है. मार्क्सवाद के साथ भी यही हुआ. रूढ़िवादी मार्क्सवादियों ने उसे बोल्शेविक दौर में रोक रखने की कोशिश की. नतीजा हुआ वहाँ विकार पैदा हुआ, जिस से पूरी विचारधारा पर ही संकट आ गया. हिंदी आलोचना में इसी रूढ़ि ने प्रगतिशील चेतना को विनष्ट अथवा दिग्भ्रमित किया. दलित और स्त्री-विमर्श प्रगतिशील चेतना के ही विषय थे. इनकी अलग से जरुरत इसलिए महसूस हुई कि कुछ लोग प्रगतिशील चेतना पर कुंडली मार कर बैठ गए और फतवे जारी करने लगे. आज दलित और स्त्री विमर्श को भी नए दृषिकोण से देखने की जरूरत है.  कठमुल्लापन कहीं भी विकसित हो सकता है,यदि सतत परिमार्जन न हुआ तो. 

----------------------------------

उपन्यास और देस 

वीरेन्द्र यादव 

सेतु प्रकाशन ,दिल्ली 

पृष्ठ 327




गुरुवार, 10 अगस्त 2023

एक फिल्म जो हर भारतीय को देखनी चाहिए - ओह माय गॉड -2. :- अजित राय

 एक फिल्म जो हर भारतीय को देखनी चाहिए - ओह माय गॉड -2.  

अजित राय 



आंकड़े बताते हैं कि हममें से अधिकतर लोगों ने अपनी किशोरावस्था में हस्थमैथुन जरूर किया होगा और डा प्रकाश कोठारी सहित अनेक सेक्स वैज्ञानिकों का मानना है कि यह न तो कोई अपराध है न बीमारी वल्कि यह एक स्वाभाविक क्रिया है और वयस्क होने पर कई बार तो इसे स्वस्थ जीवन के लिए जरूरी भी माना गया है।  सेक्स शिक्षा के अभाव में मैंने खुद हस्तमैथुन के कारण महीनों डिप्रेशन के बाद पटना के नामी फिजिशियन डा शिव नारायण सिंह से परामर्श लिया था। दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग में मनोवैज्ञानिक के रूप में काम करते हुए स्कूलों में मेरे पास सैकड़ों किशोर छात्र अपनी इसी तरह की समस्या लेकर आते थे। 

अमित राय ने बड़े तार्किक और दिलचस्प सिनेमाई कौशल के साथ अपनी नई फिल्म ' ओह माय गॉड -2 ' में यह सवाल उठाया है कि हमारे स्कूली पाठ्यक्रम में सेक्स एजुकेशन जरूरी क्यों है? उज्जैन के महाकाल मंदिर का पुजारी और शिवभक्त कांति मुद्गल ( पंकज त्रिपाठी) जिला अदालत में अपने बच्चे का अभिभावक होने के नाते खुद पर, स्कूल पर और अज्ञानता फैलाने वाली सेक्स की दुकान चलाने वाले लोगों पर मुकदमा कर देता है। उसका बेटा दोस्तों के बहकावे में आकर हस्तमैथुन की आदत का शिकार हो जाता है। स्कूल के बाथरूम में हस्तमैथुन करने के कारण उसे स्कूल से निकाल दिया गया है और वह डिप्रेशन में आत्महत्या करने की कोशिश करता है। उसका पिता अपने बच्चे को बचाने और सामान्य बनाने की लाख कोशिश करता है पर कुछ नही होता। अपने भक्त का मार्गदर्शन करने, मदद करने साक्षात भगवान शिव ( अक्षय कुमार) आते हैं। सेंसर बोर्ड के दबाव में इस चरित्र को शिव के गण में बदल दिया गया है जिसके कहने पर वह कोर्ट में केस करता है।इंटरवल के बाद की पूरी फिल्म इस मुकदमे की सुनवाई पर आधारित है। आश्चर्य है कि इसे सेंसर बोर्ड ने ' ए ' ( वयस्क) सर्टिफिकेट और+ 18 रेटिंग क्यों दी जबकि पूरी फिल्म में न तो कोई सेक्स सीन है न अश्लील संवाद, कोई चुंबन आलिंगन तक नहीं है। भारत जैसे देशों के लिए यह इतनी जरूरी और शिक्षाप्रद फिल्म है कि इसे देशभर के स्कूल कालेजों में दिखाया जाना चाहिए। इस फिल्म में कहीं कोई उपदेश या बड़बोलापन या डायलॉग बाजी नहीं है। सबकुछ सिनेमाई व्याकरण में  और मनोरंजन की शैली में कहा गया है। यहां यह भी याद दिलाना जरूरी है कि इसी साल 76 वें कान फिल्म समारोह में मोली मैनिंग वाकर की ब्रिटिश फिल्म ' हाऊ टू हैव सेक्स ' को अन सर्टेन रिगार्ड खंड में बेस्ट फीचर फिल्म का पुरस्कार मिला था।

            अमित राय की फिल्म ' ओह माय गॉड -2' कल ( शुक्रवार 11 अगस्त) से सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है। जिन लोगों ने अमित राय की पिछली फिल्में ( रोड टु संगम, आई पाड) देखी है, उन्हें पता है कि वे एक जीनियस डायरेक्टर- राइटर हैं।भीड़ के दृश्यों से अपना फोकस निकाल लेने में उनकी मास्टरी है। सांसारिक जीवन में मनुष्य के आपसी रिश्तों के मेलोड्रामा और उसके तनावों का सिनेमाई व्याकरण उन्हें आता है जिसके अभाव में अधिकांश मुंबईया फिल्में पटरी से उतर जाती है। इस फिल्म की पटकथा भी उन्होंने ही लिखी है जो इतनी कसी हुई हैं कि दर्शकों को एक बार भी मोबाईल फोन देखने का मौका नहीं देती। 

दूसरी खास बात यह है कि अभिनेता जितनी बात संवाद बोलकर नहीं बताते उससे अधिक अपने हाव भाव से अभिव्यक्त करते हैं। दुनिया भर के लोगों को मुंबईया फिल्मों से शिकायत ही यहीं रहती है कि यहां अभिनेता लगातार बोलते ही रहते हैं और कैमरा नब्बे प्रतिशत केवल उनके चेहरे के क्लोज शाट लेने में लगा रहता है। अमित राय ने इन दोनों बातों से बचते हुए फिल्म में एक आकर्षक माहौल और लोकेल रचा है। उन्होंने अक्षय कुमार जैसे टाइप्ड अभिनेता से बहुत उम्दा काम करवा लिया है लेकिन यह फिल्म तो पंकज त्रिपाठी की है। उनका अभिनय दमदार तो हैं ही, बेमिसाल भी है। उनके चेहरे की मासूमियत और मौन की अभिव्यक्तियां कमाल की है।वे एक क्षण में जादू करना जानते हैं। ऐसे दिग्गज अभिनेता जब किसी सुपर स्टार के साथ काम करते हैं तो इसके कई खतरे होते हैं। पंकज त्रिपाठी ने उन सारे खतरों से खुद को बचाते हुए अक्षय कुमार के साथ अच्छी केमिस्ट्री बनाई है।                     अमित राय ने छोटी-छोटी भूमिकाओं भी अपने कलाकारों से उम्दा काम करवा लिया है चाहे उज्जैन के महाकाल मंदिर के पुजारी बने गोविन्द नामदेव हैं या डाक्टर बने बृजेन्द्र काला या केमिस्ट के रोल में पराग छापेकर हों या स्कूल के मालिक बने अरुण गोविल। चेहरे पर नकाब चढ़ाए वेश्या की भूमिका में आर्या शर्मा (लंदन के लेखक तेजेन्द्र शर्मा की बेटी) ने केवल आंखों के एक्सप्रेशन से कोर्ट में पूरी बात कह दी है। वे आमिर खान के साथ लाल सिंह चड्ढा में भी ऐसा ही उम्दा काम कर चुकी हैं।कल सनी देओल के साथ उनकी दूसरी फिल्म गदर 2 भी रिलीज हो रही है। सेशन जज की भूमिका पवन मल्होत्रा ने निभाई है जिन्होंने जगह जगह अपने इंप्रोवाइजेशन से पटकथा में अच्छा प्रभाव जोड़ा है। वकील की भूमिका में यामी गौतम है। इसके अलावे भी कई अभिनेता अपनी छोटी छोटी भूमिकाओं में जंचे है। संवादों में मालवा की भाषा का स्पर्श हैं जिससे हास्य और करूणा का रस सृजित होता है। 

'ओह माय गॉड -2 ' का पूरा माहौल हमारे गांवों कस्बों का है। उज्ज्यनी नगरी तो प्रतीक मात्र है।सेंसर बोर्ड के कुल चौबीस कट और अड़ियल रवैए के बावजूद फिल्म पर इसका कोई असर नहीं दिखाई देता और फिल्म अपनी बात कह जाती है। यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि यह वहीं सेंसर बोर्ड है जो ' आदिपुरुष को बिना रूके पास कर देता है और ओह माय गॉड को यूए के बदले ए ( वयस्क) और+18 साल रेटिंग सर्टिफिकेट देता है जबकि कई मुस्लिम देशों में फिल्म को केवल एक कट के साथ और+12 साल रेटिंग के साथ रिलीज किया जा रहा है।





अजीत राय के फेसबुक पेज से साभार 

बुधवार, 26 जुलाई 2023

पूंजीवादी व्यवस्था की कड़वी सच्चाई है नरेन्द्र कुमार की नीलामघर -सुशील कुमार भारद्वाज

 पूंजीवादी व्यवस्था की कड़वी सच्चाई है नरेन्द्र कुमार की नीलामघर

-सुशील कुमार भारद्वाज

 

नरेंद्र कुमार का प्रथम एवं सद्यः प्रकाशित कविता संग्रहनीलामघरवर्तमान समय से रूबरू कराती कविताओं का एक संग्रह है. कवि ने परिवेशगत जीवन में व्याप्त पूंजीवादी व्यवस्था की कड़वी सच्चाइयों को कलमबद्ध करने की कोशिश की है. चाहे बात राजनीतिक सुविधा की हो, चाहे बात सामाजिक और राजनीतिक जीवन में फैले भ्रष्टाचार की हो, चाहे मानवीय संवेदना की, चाहे प्राकृतिक दृष्टिकोण की, चाहे बात धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा की हो, कवि ने अपनी सीमा का भरपूर प्रयोग करने की कोशिश की है. कवि स्वीकार भी करता है कि वर्त्तमान समय की अराजकता के लिए सिर्फ दूसरे ही लोग दोषी नहीं हैं बल्कि इसमें हम सब की भी सामूहिक सहभागिता है. भ्रष्टाचार का जो विद्रूप चेहरा सामने नज़र आ रहा है उसके लिए हम सब भी उतने ही जिम्मेवार हैं, जितना काली करतूतों में आकंठ डूबा इन्सान.

संग्रह में प्रस्तुत सभी कविताएं गौरतलब हैं. संग्रह की पहली और शीर्षक कवितानीलामघरही मनुष्य की दम तोड़ती मनुष्यता की एहसास कराती है. यह कविता उस नीलामी प्रथा की याद दिलाती है जहाँ इन्सान एक बाजारू वस्तु की तरह बिक रहा है. एक तरफ क्रिकेट की दुनिया है, जहाँ लोग लाखों-करोड़ों रूपये में शौक से बिक कर किसी का गुलाम बनते हैं, वहीं दूसरी ओर चमड़ी से भी दमड़ी निकाल लेने की कीमत पर भूख से बिलबिलाते लोग बिकने को तैयार हैं. दोनों जगह लोग पेट की क्षुधा मिटाने के लिए ही बिक रहे हैं. बस फर्क सिर्फ इतना है कि कोई शौक से बिक रहा है और कोई बिकने के लिए मजबूर किया जा रहा है.




ग्लेडिएटरकविता को भी इस कड़ी में जोड़कर देखा जा सकता है, जहाँ आर्थिक रूप से सम्पन्न एक मनुष्य अपने युद्धोन्मादी सनक में अपने मनोरंजन के लिए दूसरे मनुष्य को बहुत ही बेबाकी और बेफिक्री से मौत के घाट उतरते देख खुश होता है. उसे हार-जीत की चिंता है लेकिन खत्म होते इंसानियत की नहीं. और आश्चर्य भी कम नहीं कि बदहाली में जी रहे परिवार को संभाल लेने के भ्रम में युवा भी चंद रुपयों की खातिर अपनी जवानी को दांव पर लगाने से नहीं चुकते हैं.

संत्रास के विभिन्न स्वरूपों के बीच भी कवि वैसे युवाओं को अपने परिवेश में ढूढ़ ही लेता है जो जिन्दगी की जिम्मेवारियों और दुश्वारियों के बीच अपने लिए पलायन का रास्ता ढूंढ लेता है. क्षणिक सुख के लिए ही सही लेकिन वेडीजे की धुनपर बेफिक्री में इतना नशाग्रस्त हो जाते हैं कि वे अपनी सारी मूलभूत समस्याओं को भूल जाते हैं. वे भूल जाते हैं कि वे बेरोजगार हैं. फसल बर्बाद हो गया है. पिता के फटे जूते की कौन कहे? माँ की पैबंद लगी साड़ी की भी सुध उसे नहीं रहती है. सरकार ऐसे ही युवाओं को तो तलाशती रहती है जो अपनी मूलभूत समस्याओं को भूल कर सिर्फ उनके इशारे पर नाचते रहे. होश में आने के बाद यही युवा तो सवाल पूछेंगें. व्यवस्था पर सवाल उठाएंगें. लेकिन तब तक इतना विलंब हो चुका होगा कि इस अराजक माहौल के लिए खुद को दोषी मानते हुए कहेंगें कि इस परिस्थिति मेंमेरा भी हाथतो है. और फिर शांत हो जाएंगी उनकी आवाजें. उनका आवेग और उनका क्रोध. उनके सोचने की दिशा बदल चुकी होगी. तब वे सिर्फ पूछेंगें कितुम्हारा ईश्वरकैसा है जो भ्रष्टाचारियों को भी खुले हाथ से आशीर्वाद देता है? सत्य की कब्र पर पनपते असत्य को भी खाद-पानी देकर पुष्पित-पल्लवित होने देता है. औरआशंकित मनसे पूछेगा कि आखिर भ्रष्टाचारी कैसी तीर्थयात्रा पर जाते हैं? कैसी नदी में डुबकी लगाते हैं कि हर बार वे आकंठ भ्रष्टाचार की दलदल में धंस कर ख़ुशी से किल्लोल करते रहते हैं? औरये लोगवही लोग हैं, जिन्हें अपने कुकृत्य का ज्ञान है. उन्हें पता है कि अपराध के लिए सामाजिक और क़ानूनी रूप से दंड विधान तय है और उसी दंड से बचने की खातिर एक अपराध के बाद एक और जघन्य अपराध को अंजाम दे देते हैं.

नरेंद्र कुमार अपने परिवेश में व्याप्त राजनीतिक आबोहवा को भी बखूबी पहचानते हैं. यूँ कह लीजिए कि हर जन्मजात इंसान की तरह उनमें भी राजनीतिक कीड़ा कहीं--कहीं कुलबुलाता है, जो उन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था पर तंज कसने को मजबूर करता है. यह सर्वविदित है कि आज लोकतंत्र किस विद्रूपता का शिकार हो गया है? इसके प्रतीकों का प्रयोग आज किस प्रकार स्वार्थसिद्धि के लिए किया जा रहा है? राजनेताओं की कथनी और करनी में कितना बड़ा फासला आ गया है? ‘कुछ हिस्सा’, ‘सच-सच बताना’, ‘स्लोगन’, ‘राजनीतिआदि कविताएं राजनीति के भावार्थ को ही विविध रूप में स्पष्ट करती है. ‘क्रांतिजहां प्रभावकारी मीडिया में छूटते सत्य की व्यथा है तोहमारा प्रजातंत्रवैसे आमजन की व्यथा है जो शासकों को सत्ता सौंपकर खुद को ठगा-सा महसूस करते हैं. ‘कुत्ते-एकऔरकुत्ते-दोमें बिम्ब का प्रयोग करते हुए प्रचलित राजनीतिक हथकंडे पर ही तंज कसने की कोशिश की गई है. कवि मीडिया में क्रूर मजाक बनतेवृक्षारोपणका भी बखूबी चित्रांकन करते हैं जहाँ बेचारे पत्ते झुलस रहे हैं और अखबारों में नेताजी के चेहरे चमक रहे हैं. यूं कह लीजिए प्रकृति की कब्र पर नेताओं के चेहरे चमक रहे हैं. ‘बावनदास की वापसीसमाजवाद और पूंजीवाद के जंग पर एक राजनीतिक टिप्पणी ही है. इतना ही नहींजयंतीश्रद्धा से परे राजनीतिक स्वार्थ में क्रियाकलाप करते लोगों का चित्रांकन है, जो यांत्रिक रुप से उसमें शरीक होते हैं और सुविधा के अनुसार सुविधा की राजनीति के लिए कभी किसी की जयंती मनाते हैं, तो कभी भूल जाते हैं. कभी किसी को आमंत्रित कर लेते हैं, किसी को उपेक्षित कर देते हैं. यूं कह लीजिए कि कवि ने मौजूदा राजनीतिक व्यवहार को अभिव्यक्ति देने की कोशिश की है. ‘घेरे के भीतरकविता सवाल है उनके दावों पर कि आखिर देश सशक्त हाथों में कैसे हैं जब नेता को अपनों के बीच रहने के लिए ही सुरक्षा की जुगाड़ करनी पड़ती है?

कवि अपनी कविताओं में मानवीय द्वंद्व को भी जगह देता है. ‘मैं चाहता हूं कि’,‘जिंदगी’,‘याद’,‘लुकाछिपीआदि कविता रिश्तों में खोती गर्माहट को एक ताजगी देने की कोशिश करती है. ‘इंतजारवृद्धाश्रम में पड़े उन इंसानों की अंतहीन व्यथा है जिनके बच्चे पढ़-लिख कर विदेशों में रुपए तो खूब कमा रहे हैं, जिंदगी भी शायद अपने मजे से जी रहे हैं. लेकिन वे पूंजीवाद की मायावी दुनियां में अपने रिश्तों को ही भूल गए हैं. अपनी जिम्मेदारियों को भूल गए हैं और भूल गए हैं अपने माता-पिता को.

भूख और शोक’, ‘रमुआ की थालीदो जून की रोटी की खातिर तरसते वैसे लोगों की व्यथा है जो दूसरों को अपने गम पर भी हँसने का मौका देते हैं. ‘शान्ति का शोकअभिव्यक्ति है बदलते समय की, जो जीवन की एकरसता से त्रस्त होकर मनुष्य शांति से अशांति की ओर और अशांति से शांति की ओर बारबार आवागमन का जद्दोजहद करता है. ‘शब्द और जीवन’, ‘टायर’, ‘कैलेंडर’, ‘भ्रम’, ‘बीहड़’, ‘तर्पणआदि कविताओं में कवि ने बिंब का बखूबी इस्तेमाल किया है. जीवन के विभिन्न दर्द को पकड़ने के लिए जहां कई बार शब्द भी अपना अर्थ खोजने लगते हैं. ‘अबकी मेले में देखा’, ‘उस पार’, ‘एक रात’, ‘सफर मेंकविता पूंजीवाद की भेंट चढ़ चुकी जिन्दगी की एक सच्चाई है, जहां दिखावे की छटपटाहट है, खुद से भागने की कोशिश है. यांत्रिक जीवनशैली में मनुष्यता, सामाजिकता और रिश्तों की गर्माहट खो चुकी ठंडापन है तोतू-तू, मैं मैंमें अहम प्रदर्शन करता जीवन का सौन्दर्य है. ‘तुम्हारा शहरऔरअपना शहरमें कवि जीवन की समरसता और सामाजिकता को तलाशने की कोशिश करता है. वह असहजता महसूस करता है खुशहाली की कब्र पर पनप रहे खोखली अजनबीयत और यांत्रिकता पर. क्षुधा शांति के लिए शिकार से शिकारी बनने की प्रक्रिया हैभूख’. ‘उन्मुक्तस्वतंत्रता की अभिलाषा और भय का मिश्रित रूप है. ‘सड़ांधसमाज में फैली अराजकता पर प्रहार है, जहां हर मामले को दबाने की कोशिश होती है, लेकिन कभी सच जानने की कोशिश नहीं की जाती है.

विकास के रास्तेचलकर प्रकृति पर विजय पाने की कोशिश में विनाश के किनारे पहुंच चुकी है व्यवस्था. ‘सड़क पर : कुछ दृश्यमें कवि कहना चाहते हैं कि सत्ता सम्पन्न लोग ही नियमों को हर जगह तार-तार करते हैं. दुर्बल में इतनी शक्ति कहां जो वह ऐसी हिमाकत कर सके?

प्रतिदानहमारी व्यवस्था पर चोट करती कविता है, जहां श्रेष्ठ को कमतर की सेवा में प्रस्तुत कर उनकी प्रगति को ही बाधित कर दिया जाता है. ‘नई पहचानव्यवस्था पर ही चोट करती है जहां लाशों पर भी राजनीति की जाती है. मरने वाले को भी पता नहीं होता कि उनकी लाशों की गिनती आतंकियों में होगी या आमजनों में? ‘स्कूल: एक दृश्यभी व्यवस्था पर ही एक तंज है जहां आपस में बातचीत के क्रम में परिश्रम के महत्व को बखाना जा रहा है जबकि वे लोग खुद अपने कर्तव्य से विमुख हैं.

अमरत्वपरजीवी जिस तरह पौधों की वृद्धि-गति को रोक देते हैं, वैसे ही निजी हित के लिए परजीवी इंसान भी अपने स्वार्थ में किसी की जिंदगी को बर्बाद कर देते हैं. ‘सेंसेक्स और मांशीर्षक काफी कुछ कहती है. एक तरफ बाजार है, धन की आवाजाही है तो दूसरी तरफ मां की भावना है. रिश्ता है, लेकिन बाजार के आगे मानवीय रिश्ता दम तोड़ते नजर आता है. ‘दुख की शुरुआततो अलगाव से ही होती है लेकिन मनुष्य सोचता है कि बंटवारे के बाद सुखी रहेंगे. विकास करेंगे. लेकिन वह भूल जाता है कि विभाजन ही दुख की शुरुआत है. ‘हमारा हिस्साखुद से अलगाव, टूटन से छलकते दर्द को बयां करता है. ‘वह मारा गयाचोट है उस व्यवस्था पर जहां क्रांति का बिगुल फूंकने वाले कई बार असमय शिकारियों के शिकार बन जाते हैं और गढ ली जाती है विभिन्न प्रकार की कहानियां विभिन्न स्तरों पर. लिख दी जाती है यश-अपयश की कथाएँ.  ‘विकास का पहियाटिप्पणी है आधुनिकता के रथ पर सवार पूंजीवाद पर, जहां विकास के पथ पर चलते हुए खेलते हैं प्रकृति के नियमों से और भूल जाते हैं मूल्य उन प्रकृति के अनमोल अमूल्य तत्वों को. और जब सबकुछ समाप्त होने लगता है तो उन्हें अनमोल अमूल्य तत्वों के लिए मुंह मांगी कीमत चुकाने के लिए विवश कर दिया जाता है. ‘सिस्टमअस्पताल की बदहाली पर लिखी गई कविता है, जहां लोग आते तो हैं बहुत ही उम्मीद से. अपनों को फिर से जिन्दगी दिला पाने की उम्मीद में, लेकिन वहां मिलती है केवल निराशा. और आंसुओं के सिवा कुछ भी हाथ नहीं लगता यही सबसे बड़ा सरकारी व्यवस्था का सच है.

दाग अच्छे हैंएक टीवी विज्ञापन का पंच लाइन है जो कीचड़, धूल को मनुष्यता और जीवन की वास्तविकता के रूप में रेखांकित करता है लेकिन कवि ने इसे तंज के रूप में इंगित करने की कोशिश की है कि किस तरह भ्रष्टाचार के गर्त में धंसे लोग नैतिकता के सारे पैमाने को तोड़कर जश्न मना रहे हैं. दागदार होना जैसे कलंक नहीं, गर्व का विषय हो. ‘जयकाराधर्म की आड़ में हिंसा को विविध रूप में प्रोत्साहित किया जा रहा है. इस कविता में भी बिंब का बखूबी प्रयोग किया गया है, जैसे सफेद कपोत शांति के लिए, तलवार हिंसा के लिए, काले में असत्य/ भ्रष्टाचार के लिए, सूरज सत्य के लिए और पाक साफ के लिए. संग्रह की अंतिम कविता हैकिसान’. इसमें भी कवि ने प्रकृतिवादी दृष्टिकोण अपनाया है. प्रकृति को रौंदकर विकास की सड़क बनाई जा रही है. किसान बना इंसान मार्केटिंग का गुर सीख गया है. वह लोगों को सपना दिखा-दिखाकर खेतिहर जमीन को बेचना सीख गया है. पूंजीवाद इस कदर हावी है कि सस्ती चीजों के महंगे हो जाने का डर दिखाकर भी किसी तरह खेत से मुक्ति पाना चाहता है.

नीलामघर कविता संग्रह से गुजरने के बाद युवा आलोचक उमाशंकर सिंह परमार की बातों पर सहमति बनती है किनरेंद्र कुमार की भाषा तनाव की भाषा है. उनकी कविताओं में व्यक्ति द्वारा भोगी गई परिवेशगत यातनाओं का यथार्थ अनुभव है. एक ऐसा अनुभव जो तनाव को जन्म देता है, जिसमें बेचैनी है, आक्रोश है, कुछ-कुछ रीतिगत शिल्प की टूटन है. आदर्श के नजरिए से देखे जाने पर यहाँ मूल्यों की टूटन भी है. उदार लोकतंत्र में पूंजीवादी शक्तियां बहुत कुछ तोड़ रही हैं. कवि टूटन को सजग ढंग से देख रहा है, समझ रहा है और जिस जमीन पर खड़ा है उस जमीन की धसकन से उपजा यथार्थ तनाव को जन्म दे रहा है.”

 

पुस्तक:- नीलामघर

कवि:- नरेन्द्र कुमार

पृष्ठ:- 80

मूल्य:- 120/-

प्रकाशन:- द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन, गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश

सम्पर्क:- 8210229414

Email: - sushilkumarbhardwaj8@gmail.com

जीवन का जीवंत आख्यान लिखने वाले लेखक हैं संतोष दीक्षित -सुशील कुमार भारद्वाज

 

जीवन का जीवंत आख्यान लिखने वाले लेखक हैं संतोष दीक्षित

-सुशील कुमार भारद्वाज

      




बिहार में साहित्य की धरती सदैव उर्वर बनी रही है. अक्सर किसी न किसी आन्दोलन का आगाज होते रहा है. और इसी निरंतरता को बरकरार रखते हुए सदी के अंतिम दशक में अपनी कथा-यात्रा शुरू करने वाले जिन युवा कथाकारों ने बिना किसी शोर–शराबे के राष्ट्रीय फलक पर अपनी उपस्थिति दर्ज करने की कोशिश की है, उनमें से संतोष दीक्षित एक महत्वपूर्ण नाम है. संतोष दीक्षित का जन्म बिहार के भागलपुर जिला स्थित लालूचक में 8 दिसम्बर

1958 ई० को हुआ. इनका शिक्षा-दीक्षा भागलपुर, पटना और रांची में हुआ है.

दूसरे शब्दों में कहें तो जब ये होश सँभालने की स्थिति में थे तब देश महत्वपूर्ण बदलाव के दौर से गुजर रहा था जिसे इन्हें करीब से महसूसने का मौका मिला होगा. एक तरफ देश में आपातकाल की स्थिति थी तो दूसरी ओर जेपी के नेतृत्व में छात्र आन्दोलन अपने चरम की ओर थी. और जब ये साहित्य जगत में प्रवेश कर रहे थे उस समय देश-दुनियां की ही आबोहवा बदल रही थी. अन्तराष्ट्रीय स्तर पर शक्तिशाली सोवियत संघ अपने बिखराब को करीब से देख रहा था तो अमेरिका विश्व का नेतृत्व करने के लिए एक अलग रूप में ढल रहा था. समाजवाद का नारा कमजोर हो रहा था और पूंजीवाद एक नई सुबह के स्वागत में खड़ी हो रही थी. भारत में भी राजनीतिक अस्थिरता छाई हुई थी. एक तरफ मंडल-कमंडल का नारा गूंज रहा था तो दूसरी ओर बाबरी मस्जिद के बहाने जय श्रीराम का नारा लग रहा था. इन सबके अलावे भारत में विनिवेश के द्वार खोले जा रहे थे. और सबसे बड़ी बात कि दुनिया भूमंडलीकरण के दौर में प्रवेश कर रही थी. जिसका सीधा असर हमारे जीवनशैली पर ही नहीं पड़ा बल्कि भारतीय संस्कृति पर भी पड़ा. परिवार बिखरने लगे, रिश्ते बिखरने लगे और सिसकने को मजबूर हो गई इंसानियत. पूंजीवाद का ऐसा खौफनाक स्वरूप रिश्तों के गर्माहट में दरार डालने लगी कि सबकुछ चरमराने लगा. आदर्श और नैतिकता की बात जीवन में प्रवेश करते विवध स्तर की भ्रष्टाचार के सामने नत-मस्तक होने लगी. तो लेखक की सम्वेदना उबाल खाकर उन्हेँ लिखने के लिए प्रेरित करने लगी.

मिलान कुंदेरा, सलमान रूश्दी, हरिशंकर परसाई, शरद जोशी और रविंद्रनाथ त्यागी का कुछ ऐसा प्रभाव इनके उपर पड़ा कि ये व्यंग्य लिखने लगे. हालांकि व्यंग्य की समझ इन्हें अपने पिता से विरासत में ही मिली. लेकिन कुछ समय बाद इन्हें एहसास हुआ कि व्यंग्य महज एक शैली है, अपनी बातों को सही-सही रखने के लिए कहानी ही वह विधा है जहाँ वे संतुष्टि हासिल कर सकते हैं. फिर एक बदलाव आया और कलम कहानी को तरासने लगी. कहानी के पात्र कुछ इस कदर सिर पर सवार होते कि पूरी कहानी उनसे लिखवा कर ही दम लेते.

संतोष दीक्षित जितनी सहजता से लोगों से हँसते-बोलते हुए मिलते हैं उसी सामान्य प्रक्रिया से साहित्य को भी रचते हैं. बिना किसी रणनीति के. बिना किसी दबाब के बेधड़क निरन्तर लिखते रहते हैं. बिल्कुल ही अलमस्त हो ठीक वैसे ही साहित्य कर्म में रमे रहते हैं जैसे कोई मजदूर मालिकों के दबाब में रोजमर्रा के अपने काम निबटाये चलता है. कभी धूप में पसीना बहाते हुए, कभी पुरवा के झोंकों के साथ मस्ती भरे गीत गाते हुए. तो कभी फुर्सत के लम्हों में बीड़ी-तम्बाकू का लुत्फ़ उठाते हुए. रोजमर्रा की सामान्य जिन्दगी जीते हुए, घर-परिवार की दैनिक जिम्मेवारियों का सहजता से निर्वहन करते हुए, पशुपालन विभाग में लगभग तीन दशक तक एक डॉक्टर की नौकरी करते हुए, जितने लोगों से इनका साबका हुआ. उन सबसे अर्जित अनुभव को इन्होंने कहीं-न-कहीं अपने कथा साहित्य में किसी न किसी रूप में पिरोने की कोशिश की है. 

इनकी कहानियों में सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर संघर्षशील पात्र बहुतेरे बिखरे मिलेंगें. रिश्तों की कतरन में उलझें पात्र सर्वत्र बिखरे मिलेंगें जो आपको स्वयं से सवाल करने को मजबूर कर देंगें. बुलडोजर और दीमक, आखेट (1997), शहर में लछमिनिया (2001), ललस (2004), ईश्वर का जासूस (2008), एवं धूप में सीधी सड़क (2014), में ऐसी कहानियां आपको पढ़ने को मिलेंगी. मुर्गियाचक में ईद, आखेट, घर का सबसे गन्दा आदमी, शहर में लछमिनिया, ललस, चैत के पत्ते, तस्वीर, ईश्वर का जासूस, काल-कथा इत्यादि कुछ प्रमुख कहानियां न सिर्फ काफी चर्चित हुई बल्कि उर्दू, पंजाबी एवं गुजराती भाषा में अनुवादित भी हुई है. कहानी के अलावे केलिडोस्कोप, घर-बदर, बगलगीर, एवं बैल की आँख, उपन्यास काफी चर्चित हैं. 

सेवानिवृति के बाद इनका पढना-लिखना ही अधिक हो रहा है. लिखना इनके लिए खुद को क्रियाशील रखने की एक कोशिश है. इसे इससे ही समझा जा सकता है कि इनका पहला उपन्यास “केलिडोस्कोप” वर्ष 2010 में प्रकाशित हुआ जबकि पिछले तीन वर्षों में घर-बदर (2020), बगलगीर (2022) और नवीनतम उपन्यास “बैल की आँख” आ चुकी है. इनके चारों उपन्यास का विषय अलग-अलग है.

केलिडोस्कोप कथा रस में डूबा हुआ बिहार के एक कस्बानुमा गाँव में पले–बढ़े एक सामान्य से नौजवान सन्तु उर्फ़ सत्येन्द्र दूबे का जिंदगीनामा है. जहाँ प्रवासी लोगों के विस्थापन के दर्द को उकेरने की कोशिश की गई है. इसमें न सिर्फ प्रवासियों के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं भावनात्मक संघर्ष को रेखांकित करने की कोशिश की गई है बल्कि पूंजीवाद के प्रभाव में विलुप्त होते पुराने भारत को बचाए रखने की कशमकश को भी दिखाने की कोशिश की गई है.

जबकि ‘घर-बदर’ एक निम्न मध्यवर्गीय व्यक्ति कुन्दू, जो कि रेलवे में साधारण-सी एक नौकरी करता है, के एक घर बना लेने के संघर्ष को रेखांकित करता है. एक घर का सपना देखने के लिए उसे क्या कुछ कीमत चुकानी पड़ सकती है? यह आम आदमी के सदैव आम बने रहने की अभिश्प्त्ता है या यों कहें कि उसके बस रह सकने के निरंतर संघर्ष का जीवंत बयान बन जाती है. इस अभिशप्त संघर्ष के कारणों की पड़ताल ही उपन्यास का मुख्य लक्ष्य है.

तो ‘बगलगीर’ के बहाने उपन्यासकार विद्रूप होते समय और समाज के दारुण यथार्थ को रेखांकित करने की कोशिश की है. एक ही जगह प्रेमभाव से मिलजुल कर रहने वाले किकि और अशफ़ाक हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता का जहर घुलते ही सौहार्द की बातों को भूल जाते हैं. लोग अजीब किस्म के तनाव और अविश्वास के साथ जीने को अभिशप्त हो जाते हैं. मौका पाते ही उपन्यासकार जीवन के विविध रूपों में फैलते भ्रष्टाचार, तानाशाह, और अवसरवादी प्रवृति पर भी टिप्पणी करने से नहीं चुकते हैं.

जबकि नवीनतम उपन्यास ‘बैल की आँख’ पटना के पास एक गाँव की पृष्ठभूमि को आधार बनाकर रची गई है. ग्रामीण सामाजिक संरचना, सामाजिक मनोवृति और उसी में संतुष्ट रहने तथा उससे प्रतिकार की अवस्था को एक साथ कथा में समाहित किया गया है. जातीय व्यस्था में झूठे अभिमान के साथ जीने की वजह से किस प्रकार मानवीय प्रेम एवं सौहार्द की पौध सूख जाती है. निजी हितलाभ और भविष्य की आकांक्षाएं और बदलती परिस्थितियां समय के साथ खंडित करती चलती है. दूसरे शब्दों में कहें तो उपन्यासकार ने सम्पूर्ण पारिवेशिक बदलाव को एक ग्रामीण पशु चिकित्सक के रूप में देखने की कोशिश की है.

बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान से सम्मानित संतोष दीक्षित अपने कहानी –उपन्यास को जिस किस्सागोई शैली में बेहद इत्मिनान से एक लम्बे कालखंड और लम्बी जीवन-कथा को बड़े ही सरस और रोचक अंदाज में गंभीर से गंभीर बात को भी सहजता से प्रस्तुत करते हैं वह काबिलेगौर है. पात्र एवं परिवेश के अनुकूल जिस भाषा–शैली और शब्दों व कहावतों का उपयुक्त चयन करते हैं वह इनके साहित्य को सहज, रोचक व जीवंत बना देता है.   

बुधवार, 7 जून 2023

शवयात्रा (कहानी) : ओमप्रकाश वाल्मीकि



शवयात्रा (कहानी)

ओमप्रकाश  वाल्मीकि  

ओमप्रकाश वाल्मीकि 


चमारों के गाँव में बल्हारों का एक परिवार था, जो जोहड़ के पार रहता था। चमारों और बल्हारों के बीच एक सीमा रेखा की तरह था जोहड़। बरसात के दिनों में जब जोहड़ पानी से भर जाता था तब बल्हारों का संपर्क गाँव से एकदम कट जाता था। बाक़ी समय में पानी कम हो जाने से किसी तरह वे पार करके गाँव पहुँचते थे। यानी बल्हारों के गाँव तक जाने का कोई रास्ता नहीं था। रास्ता बनाने की ज़रूरत कभी किसी ने महसूस ही नहीं की थी। 


जब किसी चमार को उनकी ज़रूरत पड़ती, तो जोहड़ के किनारे खड़े होकर आवाज़ लगा देता। जोहड़ इतना बड़ा भी नहीं था, कि बल्हारों तक आवाज़ ही न पहुँचे। आवाज़ सुनकर वे बाहर आ जाते थे। 


परिवार में सिर्फ़ दो जन ही रह गए थे—सुरजा, जिसकी उम्र ढल चुकी थी; और उसकी बेटी संतों, जो शादी के तीसरे साल में ही विधवा होकर मायके लौट आई थी। सुरजा की घरवाली को मरे भी तीन साल हो गए थे। घर-बाहर की तमाम ज़िम्मेदारियाँ संतों ने सँभाल रखी थी। सुरजा वैसे भी काफ़ी कमज़ोर हो चला था। उसे सूझता भी कम था। लेकिन फिर भी गाँव के छोटे-मोटे काम वह कर ही देता था। 


सुरजा का एक बेटा भी था, जो दस-बारह साल की उम्र में ही घर छोड़कर भाग गया था। कुछ साल इधर-उधर भटकने के बाद उसे रेलवे में नौकरी मिल गई थी। इस नौकरी ने ही उसे पढ़ने-लिखने की ओर आकर्षित किया था। इसी तरह उसने हाईस्कूल करके तकनीकी प्रशिक्षण लिया और रेलवे में ही फिटर हो गया था। नाम था कल्लू, जो अब कल्लन हो गया था। 


जब संतों की शादी हुई थी, सारा ख़र्च कल्लन ने ही उठाया था। सुरजा के पास तो फूटी कौड़ी भी नहीं थी। कल्लन की शादी भी रेलवे कॉलोनी में ही हो गई थी। उसके ससुर भी रेलवे में ही थे। उसे पढ़ी-लिखी पत्नी मिली थी, जिसके कारण उसके रहने-सहन में फ़र्क़ आ गया था। उसके जीवन का ढर्रा ही बदल गया था। 


गाँव वह यदाकदा ही आता था। लेकिन जब भी वह गाँव आता, चमार उसे अजीब-सी नज़रों से देखते थे। कल्लू से कल्लन हो जाने को वे स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। उनकी दृष्टि में वह अभी भी बल्हार ही था, समाज-व्यवस्था में सबसे नीचे यानी अछूतों में भी अछूत। 


गाँव में वह अपने आपको अकेला महसूस करता था। परिवार के बाहर एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं था, जिससे वह दो घड़ी बतिया सको गाँव के पढ़े-लिखे लोग भी उससे कटे-कटे रहते थे। आख़िर वह था तो बल्हार ही, जोहड़ पार रहनेवाला। गाँव वाले उसे कल्लू बल्हार ही कहकर बुलाते थे। उसे यह संबोधन अच्छा नहीं लगता था। नश्तर की तरह उसे बाँधकर हीन भावना से भर देता था। 


इस बार वह काफ़ी दिन बाद गाँव आया था। उसने आते ही सुरजा से कहा, “बापू, मेरे साथ दिल्ली चलो। सरकारी मकान में सब एक साथ रह लेंगे। 


“ना बेट्टे, इब आख़री बख़त में यो गाँव क्यूँ छुड़वावे... पुरखों ने यहाँ आक्के किसी जमान्ने में डेरा डाल्ला था। यहीं मर-खप्प गए, इसी माट्टी में। इस जोहड़ की लैंग पे रहके जिनगी काट दी। इब कहाँ जांगे,” सुरजा ने आँखें मिचमिचाकर अपने मन की बात कही थी, जैसे अतीत में वह कुछ ढूँढ़ रहा था। 


कल्लन ने संतों की ओर देखा। वह तो चाहती थी, इस जहालत से छुटकारा मिले। लेकिन बापू की बात काटने का उसमें न कभी पहले हौसला था, न अब है, बस चुपचाप बैठकर पैरे के अंगूठे से मिट्टी कुरेदने लगी थी। जैसे उसका सोच उसे कहीं बहुत दूर ले जा रहा था, जहाँ दूर-दूर तक भी कोई किनारा दिखाई नहीं पड़ता था। कल्लन ने ज़ोर देकर कहा, “बापू, यहाँ न तो इज़्ज़त है, ना रोटी, चमारों की नज़र में भी हम सिर्फ़ बल्हार हैं... यहाँ तुम्हारी वजह से आना पड़ता है... मेरे बच्चे यहाँ आना नहीं चाहते... उन्हें यहाँ अच्छा ही नहीं लगता...” 


उसकी बात बीच में ही काटकर सुरजा बोला, “तो बेट्टे, हियाँ मत आया कर... म्हारी तो कट जागी इसी तरह। बस, संतों की फ़िकर है। यो अकेल्ली रह जागी... यो टूटा-फूटा घर भी शायद अगली बारिश ना देख पावे। तुझे जो म्हारी चिंता है, तो तू इस घर कू पक्का बणवादे...” सुरजा के मन में यह बात कई बार आई थी। लेकिन कह नहीं पाया था। आज मौक़ा पाकर कह दिया। 


“बापू, मेरे पास जो दो-चार पैसे हैं, उन्हें यहाँ लगाकर क्या होगा। आपके बाद मैं तो यहाँ रहूँगा नहीं... संतों मेरे साथ दिल्ली चली जाएगी,” कल्लन ने साफ़-साफ़ कह दिया। 


सुनते ही सुरजा भड़क गया। उसके मुँह से गालियाँ फूटने लगीं। चिल्लाकर बोला, “तू! मेरे मरने का इंतिज़ार भी क्यूँ करै है... इसे आज ही ले जा। और हाँ, अपणे पैसों की धौंस मुझे ना दिखा... अपने धौरे रख... जहाँ इतनी कटगी है, आगे बी कट ही जागी। 


उन दोनों के बीच जैसे अचानक संवाद सूत्र बिखर गए थे। ख़ामोशी उनके इर्द-गिर्द फैल गई थी। 


सुबह होते ही कल्लन दिल्ली चला गया था। पैसों का बंदोबस्त करके वह हफ़्ते भर में लौट आया था। साथ में पत्नी सरोज और दल साल की बेटी सलोनी भी आई थी। बेटे को वे उसकी ननिहाल में छोड़कर आ गए थे। कल्लन ने आते ही बापू से कहा, “किसी मिस्तरी से बात करो। कल ईंटों का ट्रक आ जाएगा। 


सुनते ही सुरजा की आँखों में चमक आ गई थी। उसे कल्लन की बात पर विश्वास ही नहीं हुआ था। लेकिन कल्लन ने उसे विश्वास दिला दिया था। वह उसी वक़्त मिस्तरी की तलाश में निकल पड़ा था। 


गाँव में ज़ियादातर मकान सूरतराम ठेकेदार ने बनाए थे। सुरजा उसी के पास पहुँचा, “ठेकेदारजी, म्हारा भी एक मकान बणा दो। 


सूरतराम ने पहले तो सूरजा को ऊपर से नीचे तक देखा। तन पर ढंग का कपड़ा नहीं और चला है पक्का मकान बनवाने। सूरतराम जल्दी में था। उसे कहीं जाना था। उसने हँसकर सुरजा को टाल दिया, “आज तो टेम ना है, फिर बात करेंगे। 


सुरजा ने हार नहीं मानी। सुबह ही वह मुँहअँधेरे निकल पड़ा था। पास के गाँव में साबिर मिस्तरी था। पुराना कारीगर। सुरजा ने उसे अपने आने का मक़सद बताया। साबिर मान गया था, “ठीक है, मैं कल आके देख लूँगा। अपना मेहनताना पेशगी लूँगा। 


ठीक है मिस्तरीजी। कल आ जाओ... जोहड़ पे ही म्हारा घर है,” सुरजा अपनी ख़ुशी छिपा नहीं पा रहा था। लौटते समय उसके पाँव ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे। कमज़ोर शरीर में भी जैसे स्फूर्ति भर गई थी। 


जब तक वह लौटकर घर पहुँचा, ईंटें आ चुकी थीं। लाल-लाल ईंटों को देखकर सुरजा अपनी थकावट भूल गया था। वह उल्लास से भर उठा था। उसने ऐसी ख़ुशी इससे पहले कभी महसूस ही नहीं की थी। 


जोहड़ पार ईंटे उतरती देखना गाँव के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था। पूरे गाँव में जैसे भूचाल आ गया था। गाँव के कई लोग जोहड़ के किनारे खड़े थे। 


रामजीलाल कीर्तन सभा का प्रधान था। रविदास जयंती पर रात-भर कीर्तन चलता था। भीड़ में वह भी खड़ा था। जब उससे रहा नहीं गया तो चिल्लाकर बोला, “अबे ओ! सुरजा... यो इन्टे कोण लाया है? 


सुरजा ने उत्साहित होकर कहा, “अजी बस, म्हारा कल्लण पक्का घर बणवा रिया है। 


रामजीलाल की आँखें फटी की फटी रह गईं। अपने भीतर उठते ईर्ष्या-द्वेष को दबाकर उसने कहा, “यो तो चोखी बात है सुरजा... पर पक्का मकान बणवाने से पहले परधानजी से तो पूछ लिया था या नहीं? 


रामजीलाल की बात तीर की तरह सुरजा के सीने में उतर गई। उसे लगा, जैसे कोई सूदखोर साहूकार सामने खड़ा धमकी दे रहा है। ग़ुस्से पर काबू पाने का असफल प्रयास करते हुए सुरजा ग़ुर्राया, “परधान से क्या पूछणा...? 


“फेर भी पूछ तो लेणा चाहिए था,” कहकर रामजीलाल तो चला गया लेकिन सुरजा को संशय में डाल गया था। 


रामजीलाल सीधा प्रधान के पहुँचा। जोहड़ पार के हालात नमक-मिर्च लगाकर उसने प्रधान बलराम सिंह के सामने रखे। बलराम सिंह ने उस वक़्त कोई प्रतिक्रिया ज़ाहिर नहीं की। सिर्फ़ सिर हिलाकर मूँछों पर हाथ फेरता रहा। प्रधान भी घाघ था। वह रामजीलाल की फ़ितरत से वाक़िफ़ था। उसके चले जाने के बाद वह कुछ ग़मगीन-सा हो गया था। सुरजा बल्हार पक्का मकान बनवा रहा है, यह बात उसे बैचेन करने के लिए काफ़ी थी। वैसे भी सुरजा गाँव के लिए अब उतना उपयोगी नहीं था। 


यह ख़बर पूरे गाँव में फैल गई थी, जोहड़ पार बल्हारों का पक्का मकान बन रहा है। रेलवे की कमाई है, ईंटों का ट्रक आ गया है। सीमेंट, रेत, बजरी, सरिये आ रहे हैं। बात फैलते-फैलते इतनी फैल कि मकान नहीं गाँव की छाती पर हवेली बनेगी। खिड़की-दरवाज़ों के लिए सागौन की लकड़ी आ रही है, सुना है रंगीन संगमरमर के टाइल भी आ रहे हैं। जितने मुँह उतनी बातें। 


अगले दिन सुबह ही प्रधान का आदमी आ धमका था जोहड़ के किनारे। सुरजा को मन मार के उसके साथ जाना पड़ा। 


सुरजा को देखते ही बलराम सिंह चीखा, “अंटी में चार पैसे आ गए तो अपनी औक़ात भूल गया। बल्हारों को यहाँ इसलिए नहीं बसाया था कि हमारी छाती पर हवेली खड़ी करेंगे... वह ज़मीन जिस पर तुम रहते हो, हमारे बाप-दादों की है। जिस हाल में हो... रहते रहो... किसी को एतिराज़ नहीं होगा। सिर उठा के खड़ा होने की कोशिश करोगे तो गाँव से बाहर कर देंगे। 


बलराम सिंह का एक-एक शब्द बुझे तीर की तरह सुरजा के जिस्म को छलनी छलनी कर गया था। सुरजा की आँखों के सामने ज़िंदगी के खट्टे-मीठे दिन नाचने लगे। जैसे कल ही की बात हो। क्या नहीं किया सुरजा ने इस गाँव के लिए, और बलराम चुनाव के दिनों में एक-एक वोट के लिए कैसे मिन्नतें करता था, तब सुरजा बल्हार नहीं, सुरजा ताऊ हो जाता था। सुरजा ने एक सर्द साँस छोड़ी। बिना कोई जवाब दिए वापस चल दिया। बलराम सिंह ने आवाज़ देकर रोकना चाहा। लेकिन वह रुका नहीं। बलराम सिंह की चींख़ अब गालियों में बदल गई, जो बाहर तक सुनाई पड़ रही थी। 


घर पहुँचते ही सुरजा ने कल्लन से कहा, “तू सच कहवे था कल्लू... यो गाँव रहणे लायक़ ना है।” उसकी लंबी मूँछे ग़ुस्से में फड़फड़ा रही थीं। आँखों के कोर भीगे हुए थे। 


“बापू, अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा... ये ईंटें तो कोई भी ख़रीद लेगा, ये मकान बनने नहीं देंगे,” कल्लन ने सुरजा को समझाने की कोशिश की। लेकिन सुरजा ने भी ज़िद पकड़ ली थी, वह झुकेगा नहीं। जो होगा देखा जाएगा। उसने मन ही मन दोहराया। 


“ना, बेट्टे, मकान तो ईब बणके रहवेगा... जान दे दूँगा, पर यो गाँव छोड़के ना जाऊँगा,” सुरजा ने गहरे आत्मविश्वास से कहा। 


कल्लन अजीब-सी दुविधा में फँस गया था। भावावेश में आकर वह ईंटें तो ले आया था, पर गाँव के हालात देखकर उसे डर लग रहा था। कहीं कोई बवेला न उठ खड़ा हो। पत्नी सरोज और बेटी सलोनी साथ आ गए थे। लेकिन सलोनी को यहाँ आते ही बुख़ार हो गया था। सरोज के पास जो दो-चार गोलियाँ थीं, वे दे दी थीं सलोनी को। लेकिन बुख़ार कम नहीं हुआ था। सरोज का मन घबरा रहा था। वह लगातार कल्लन से जाने की जिद कर रही थी, “बेकार यहाँ मकान पर पैसा लगा रहे हो। संतों हमारे संग रहेगी। बापू को समझाओ।” लेकिन कल्लन सुरजा को समझाने में असमर्थ था। उसने सरोज से कहा, “अब, आख़िरी बखत में बापू का जी दुखाना क्या ठीक होगा?” सरोज चुप हो गई थी। 


सुरजा ने रात-भर जागकर ईंटों की रखवाली की थी। एक पल के लिए भी आँखें नहीं झपकी थीं सुबह होते ही वह साबिर मिस्तरी को बुलाने चल दिया था। सुरजा को डर था, कहीं कोई उसे उलटी-सीधी पट्टी न पढ़ा दे, उसे अब किसी पर भी विश्वास नहीं था। 


सलोनी का बुख़ार कम नहीं हो रहा था। सरोज ने कल्लन से किसी डॉक्टर को बुलाने के लिए कहा। गाँव-भर में सिर्फ़ एक डॉक्टर था। कल्लन उसे ही बुलाने के लिए चल दिया। 


कल्लन को देखते ही डॉक्टर ने मना कर दिया। सामान्य पूछताछ करके कुछ गोलियाँ पुड़िया में बाँधकर दे दी। कल्लन ने बहुत मिन्नतें कीं, “डॉक्टर साहब, एक बार चल के तो देख लो?” डॉक्टर टस से मस नहीं हुआ। कल्लन ने कहा, “मरीज़ को यहीं आपके क्लीनिक में लेकर आ जाता हूँ। 


“नहीं... यहाँ मत लाना... कल से मेरी दुकान ही बंद हो जाएगी। यह मत भूलो तुम बल्हार हो,” डॉक्टर ने साफ़-साफ़ चेतावनी दी, “ये दवा उसे खिला दो, ठीक हो जाएगी। 


कल्लन निराश लौट आया था। डॉक्टर ने जो गोलियाँ दी थीं, वे भी असरहीन थीं। बुख़ार से बदन तप रहा था। तेज़ बुख़ार के कारण वह लगातार बड़बड़ा रही थी। संतों उसकी सेवा-टहल में लगी थी। एक मिनट के लिए भी वहाँ से नहीं हटी थी। सरोज की चिंता बढ़ रही थी। उसके मन में तरह-तरह की शंकाएँ उठ रही थीं। 


सुरजा सुबह का गया दोपहर बाद लौटा था। थका-हारा, हताशा उसे इस हाल में देखकर कल्लन ने पूछा “क्या हुआ बापू?” सुरजा ने निढाल स्वर में कहा, 'होणा क्या था? मिस्तरी कहीं दूर रिश्तेदारी में गया है। दस-पंद्रह दिन बाद आवेगा... बेट्टे! मुझे ना लगे इब वो आवेगा।” सुरजा ने अपने मन की हताशा ज़ाहिर की। 


“क्यों, बापू, हम तो उसकी मेहनत का पैसा उसे पेशगी दे रहे थे, फिर भी वह मुकर गया,” कल्लन ने तअज्जुब ज़ाहिर किया। 


“गाँव के ही किसी ने उसे रोका होगा... साबिर ऐसा आदमी ना है... वह भी इनसे डर गिया दिक्खे,” सुरजा ने गहरे अवसाद में डूबकर कहा। दोनों गहरी चिंता में डूब गए थे। 


“सलोनी का जी कैसा है?” सुरजा ने पूछा। 


उसकी तबीअत ज़ियादा ही बिगड़ गई है। अस्तपाल ले जाना पड़ेगा, कल्लन ने चिंता व्यक्त की। 


'किसी झाड़-फूँकवाले कू बुलाऊँ...” कहीं कुछ ओपरा ना हो?” सुरजा ने मन की शंका जताई। 


“नहीं, बापू... मैं कल सुबह ही उसे लेकर शहर जाऊँगा। बस, आज की रात ठीक-ठाक कट जाए,” कल्लन के स्वर में गहरी पीड़ा भरी हुई थी। सुरजा ने उसे ढाढ़स बँधाया। 


पूरी रात जागते हुए कटी थी। सलोनी की तबीअत बहुत ज़ियादा बिगड़ गई थी। सुबह होते ही कल्लन ने सलोनी को पीठ पर लादा। उसके इर्द-गिर्द ठीक से कपड़ा लपेटा। सरोज साथ थी। वे धूप चढ़ने से पहले शहर पहुँच जाना चाहते थे। 


शहर गाँव से लगभग आठ-दस किलोमीटर दूर था। आने-जाने का कोई साधन नहीं था। कल्लन ने गाँव के संपन्न चमारों से बैलगाड़ी माँगी थी, लेकिन बल्हारों को वे गाड़ी देने को तैयार नहीं थे। 


पीठ पर लादकर सलोनी को ले चलना कठिन हो रहा था। वह बार-बार पीठ से नीचे की ओर लुढ़क रही थी। कल्लन की पत्नी सहारा देते हुए उसके पीछे-पीछे चल रही थी। वे जल्दी से जल्दी शहर पहुँचना चाहते थे। लेकिन रास्ता काटे नहीं कट रहा था। 


जैसे-जैसे धूप चढ़ रही थी, सलोनी का जिस्म निढाल हो रहा था। उसकी साँसे धीमी पड़ गई थीं। शहर लगभग आधा किलोमीटर दूर रह गया था। अचानक कल्लन को लगा जैसे सलोनी का भार कुछ बढ़ गया है। बुख़ार से तपता जिस्म ठंडा पड़ गया था। उसने सरोज से कहा, “देखो तो सलोनी ठीक तो है। 


सलोनी के शरीर में कोई स्पंदन ही नहीं था। सरोज दहाड़ मारकर चीख़ पड़ी थी, “मेरी बेटी को क्या हो गया... देखो तो यह हिल क्यों नहीं रही।” उसने रोते हुए कहा। 


कल्लन ने सलोनी को पीठ से उतारकर सड़क के किनारे लिटा दिया था। वह हताश ठगा सा खड़ा था। उसके अंतस में एक हड़कंप सी मच गई थी। दस वर्ष की जीती-जागती सलोनी उसके हाथों में ही मुर्दा जिस्म में बदल गई थी। सब कुछ आँखों के सामने घटा था। वे ज़ोर-ज़ोर से चीख़कर रो रहे थे। रास्ता सुनसान था। उनकी चीख़ें सुनने वाला भी कोई दूर-दूर तक नहीं था। वे काफ़ी देर इसी तरह बैठे रोते रहे। उन्हें सूझ ही नहीं रहा था—क्या करें। सड़क किनारे कच्चे रास्ते पर सलोनी के शव को लिए वे तड़प रहे थे। काफ़ी देर बाद एक व्यक्ति शहर की ओर से आता दिखाई पड़ा। उन्हें उम्मीद की एक झलक दिखाई दी। शायद आनेवाला उनकी कोई मदद करे। 


राहगीर क्षण-भर उनके पास रुका। लेकिन बिना कुछ कहे, आगे बढ़ गया। शायद उसने उन्हें पहचान लिया था। उसी गाँव का था। कल्लन को लगा इंसान की 'ज़ात' ही सब कुछ है। 


आख़िर वे उठे और बेटी का शव कंधों पर रखकर गाँव की ओर लौट चले। कंधों पर जितना बोझ था, उससे कहीं ज़ियादा बोझ उनके भीतर समाया हुआ था। सलोनी के बचपन की किलकारियाँ रह-रहकर उनकी स्मृतियों में कुलाँचे भर रही थीं। भारी मन से वे सलोनी का शव उठाए गाँव की ओर बढ़ रहे थे। रास्ता जैसे ख़त्म ही नहीं हो रहा था। जितना समय शहर के पास पहुँचने में लगा था, उससे ज़ियादा गाँव पहुँचने में लग रहा था। सरोज का हाल बहुत ही चिंताजनक था। वह सिर्फ़ घिसट रही थी। टूट तो कल्लन भी गया था लेकिन किसी तरह स्वयं को सँभाले हुए था। सरोज अधमरी-सी हो गई थी। उससे चला नहीं जा रहा था। 


सुरजा ने उन्हें दूर से ही देख लिया था। पहचाना तो उन्हें पास आने पर ही। लेकिन दूर से आती आकृतियों को देखकर उसने अंदाज़ा लगा लिया था। वे जिस तरह सलोनी को ला रहे थे, देखकर उसका माथा ठनका। वह घर से निकलकर सड़क तक आ गया था। सलोनी का शव देखकर वह स्वयं को नहीं सँभाल पा रहा था। वह तड़प उठा था। ज़मीन पर दोहत्थड़ मार-मारकर वह रोने लगा था। कल्लन की आँखों से भी बेतहाशा आँसू बह रहे थे। उनका रोना-धोना सुनकर संतों भी आ गई थी। उन्हें ढाढ़स बंधानेवाला कोई नहीं था। 


शहर से लौटने में उन्हें वैसे ही समय ज़ियादा हो गया था। किसी को बुलाने के लिए भी समय नहीं था। रात-भर इंतिज़ार करने की स्थिति में नहीं थे। कल्लन चाहता था कि शाम होने से पहले ही दाह-संस्कार हो जाए। सलोनी के शव को देखकर सरोज बार-बार बेहोश हो रही थी। 


समस्या थी लकड़ियों की। दाह-संस्कार के लिए लकड़ियाँ उनके पास नहीं थीं। सुरजा और संतों लकड़ियों का इंतिज़ाम करने के लिए निकल पड़े थे। उन्होंने चमारों के दरवाज़ों पर जाकर गुहार लगाई थी। लेकिन कोई भी मदद करने को तैयार नहीं था। घंटा-भर भटकने के बाद भी वे इतनी लकड़ी नहीं जुटा पाए थे कि ठीक से दाह-संस्कार हो सके। घर में उपले थे। संतों ने कहा, “लकड़ियों की जगह उपले ही ले जाओ। 


चमारों का शमशान गाँव के निकट था। लेकिन उसमें बल्हारों को अपने मुर्दे फूँकने की इजाज़त नहीं थी। कल्लन की माँ के समय भी ऐसी ही समस्या आई थी। चमारों ने साफ़ मना कर दिया था। गाँव से बाहर तीन-चार किलोमीटर दूर ले जाकर फूँकना पड़ा था। इतनी दूर सलोनी के शव को ले जाना... लकड़ी, उपले भी ले जाने थे। सुरजा और कल्लन के अलावा कोई नहीं था, जो इस कार्य में हाथ बँटा सकता था। 


बल्हारों के मुर्दे को हाथ लगाने या शवयात्रा में शामिल होने गाँव का कोई भी व्यक्ति नहीं आया था। 'ज़ात' उनका रास्ता रोक रही थी। कल्लन ने काफ़ी कोशिश की थी। वह रविदास मंडल, डॉक्टर अम्बेडकर युवक सभा के लोगों से जाकर मिला था। लेकिन कोई भी साथ आने को तैयार नहीं था। किसी न किसी बहाने वे सब कन्नी काट गए थे। 


रेलवे कॉलोनी में 'अंबेडकर जयंती के भाषण उसे याद आने लगे थे। उसने उन तमाम विचारों को झटक दिया था। गहरी वितृष्णा उसके भीतर उठ रही थी। उसे लगा, वे तमाम भाषण खोखले और बेहद बनावटी थे। 


कल्तन ने सुरजा से कहा, “बापू! और देर मत करो...” उन दोनों ने कपड़े में लिपटे सलोनी के शव को उठा लिया था। स्त्रियों के शमशान जाने का रिवाज बल्हारों में नहीं था। लेकिन संतों और सरोज के लिए इस रिवाज को तोड़ देने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा था। संतों ने लकड़ियों का गट्ठर सिर पर रखकर हाथ में आग और हाँडी उठा लिए थे। पीछे-पीछे सरोज उपलों भरा टोकरा लिए चल पड़ी थी। 


इस शवयात्रा को देखने के लिए चमारिनें अपनी छतों पर चढ़ गई थीं। उनकी आँखों के कोर भीगे हुए थे। लेकिन बेबस थीं, अपने-अपने दायरे में क़ैद। बल्हार तो आख़िर बल्हार ही थे। अपने ही नहीं, उन्हें तो दूसरों के मुर्दे भी ढोने की आदत थी... 


चमारों का गाँव और उसमें एक बल्हार परिवार।

रविवार, 28 मई 2023

नये संसद भवन का उद्घाटन हिन्दू राष्ट्र बनने की पहली कोशिश: सुशील कुमार भारद्वाज

 नये #संसद_भवन के उद्घाटन से पहले बहुत सारे विवादित बयान आये। और आगे भी आते रहेंगे। लेकिन मैं कुछ चीजों के बारे में सोचता रहा। पहली बात #सेंगोल की। आखिर तमिलनाडु से जुड़े इस प्रतीक का इतने वर्षों बाद प्रासंगिक होने की वजह क्या है? सर्वप्रथम तो ये सत्ता-हस्तांतरण से जुड़ी है और धर्म से भी जुड़ी है। 1947 ई में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को भी यह प्रतीक चिह्न दिया गया था परन्तु उन्होंने इसे म्यूजियम का हिस्सा बनाकर छोड़ दिया कारण उस समय जो कुछ भी रही हो। लेकिन मोदीजी ने इसे सदन में उचित स्थान दिया। जब चुनाव की बात होगी तब मालूम पड़ेगा कि वोट किसे मिले? लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि मोदीजी ने तमिलनाडु के वोटरों को अपने पक्ष में करने की एक पहल की है और उसमें भी तब, जब 2026 में लोकसभा क्षेत्र के लिए परिसीमन होना शेष है। क्योंकि इस नये परिसीमन में तमिलनाडु को सबसे अधिक सीटों के नुकसान होने की संभावना है।


नया संसद भवन 


दूसरी बात कि 28 मई को ही उद्घाटन की तिथि क्यों निर्धारित की गई? जबकि मोदीजी ने प्रधानमंत्री के रूप में पहली बार 26 मई 2014 और दूसरी बार 30 मई 2019 को शपथग्रहण लिया। 

काफी विचार के बाद याद आया कि 28 मई 1964 ई को ही नई दिल्ली में नेहरू जी अंतिम संस्कार किया गया था। क्या यह माना जाय कि पुरानी संसद भवन और पुराने भारत को नेहरू जी के अंतिम संस्कार से जोड़ते हुए प्रतीकात्मक रूप में एक युग के समापन की घोषणा हो गई है? साथ ही साथ धर्मनिरपेक्ष युग भी अपने प्रस्थान की ओर है?

और सबसे मज़ेदार बात है कि 28 मई 1883 ई को विनायक दामोदर सावरकर का भी जन्म हुआ था जिन्होंने हिन्दुत्व का हिन्दी राष्ट्रवादी दर्शन तैयार किया था। क्या यह माना जा सकता है कि नये संसद भवन के उद्घाटन के साथ ही धर्म खासकर हिन्दू राष्ट्र के पथ पर भारत की शांतिपूर्ण यात्रा शुरू हो गई है? या यह सबकुछ महज एक संयोग है?

सिर्फ़ एक बंदा काफ़ी है: प्रशांत विप्लवी

 सिर्फ़ एक बंदा काफ़ी है: प्रशांत विप्लवी 

=============

"सिर्फ़ एक बंदा काफ़ी है" की खूब चर्चा हो रही है। पत्रिकाओं , ब्लॉग्स और प्रसंशकों ने एक बार फिर मनोज वाजपेयी के अभिनय क्षमता की खूब तारीफ़ की है। मैं इस फ़िल्म पर कुछ और भी कहना चाहता हूँ। अपूर्व सिंह कार्की की यह पहली फीचर फ़िल्म है। अपूर्व सिंह कार्की ने चार टी वी सीरीज़ बनाएं हैं जिनमें aspirants ने अच्छी खासी चर्चा बटोरी है। 

इस फ़िल्म के बरक्स जॉली एलएलबी को रखकर देखिए क्योंकि यह भी एक कोर्ट रूम फ़िल्म है। जहां इस फ़िल्म में अरशद वारसी, वोमन ईरानी, सौरभ शुक्ला , संजय मिश्रा, मोहन अगासे , मनोज पहवा , बीजेन्द्र काला जैसे धुरंधर कलाकारोंने अपने अभिनय से एक जादू भर दिया है वहीं अकेले मनोज वाजपेयी ने "सिर्फ़ एक  बंदा काफ़ी है" के टाइटल को जस्टीफाइ कर दिया है। मनोज के अलीगढ़ को देखने के बाद अभी कुछ वर्ष और इंतज़ार करना पड़ेगा जिससे अलीगढ़ के उस  अभूतपूर्व अभिनय के ज़द से बाहर निकला जा सके। लेकिन यह फ़िल्म एक सच्ची घटना और हाई प्रोफाइल केस पर आधारित है इसलिए फ़िल्म मेकिंग के लिहाज़ से दृश्य, भूमिका और घटनाक्रम जॉली एलएलबी से बदल जाते हैं। भारतीय सिनेमा में मनोज वाजपेयी एक हीरा हैं। उनकी चमक बिलकुल अलग दिख जाती है , ख़ासकर ऐसी गंभीर फिल्मों के किरदार को तो वे इतना जीवंत कर देते हैं कि फ़िल्म खत्म होने के बाद तंद्रा टूटती है कि मनोज महज़ एक किरदार थे। इस फ़िल्म में भी सिर्फ़ मनोज थे। और मनोज के चारो ओर जितने भी क़िरदार थे वे अपनी क्षमता से मनोज को और भी प्रॉमिनेंट कर रहे थे। 

यहां गौर करने की बात यह है कि फ़िल्म जिस बाबा के ऊपर बनी है, वे कोई साधारण बाबा नहीं थे। उनके अधिकांश अनुयायियों का अब भी मोहभंग नहीं हुआ है। यह एक समझदार फिल्मकार की सोच है कि बाबा को फ़िल्म का कैमरा जितना कम फेस करवाना पड़े। पूरी फ़िल्म में बाबा सांकेतिक रूप से अपनी उपस्थिति और वर्चस्व का एहसास दिलाते रहे लेकिन बाबा का ना तो इंटेरोगेशन दिखाया गया और ना ही बाबा से कोई ज़िरह हुई। बाबा नॉट गिल्टी के अलावा कोर्ट के सम्मुख या पुलिस के सम्मुख कुछ नहीं बोले। आजकल 3 को 32000 दिखाने की जो राजनैतिक प्रवृति निर्देशकों में पनपी है उनके लिए इस युवा फ़िल्मकार ने चुनौती पेश की है। बाबा के कई कारनामों से सिर्फ़ एक कारनामा उठाकर एक मुकम्मल फ़िल्म बना देना इस फ़िल्मकार की काबिलियत है। प्रतिगामी सोच के फ़िल्मकारों को सिनेमा हॉल की फिल्में मिलती हैं, टैक्स फ्री भी होता है और केंद्र से लेकर राज्य की सरकारें प्रॉपगंडा फ़िल्मों के प्रचार-प्रसार में भिड़ जाते हैं जबकि एक सच्ची घटना पर अपनी बात मज़बूती से रखकर भी ओ टी टी प्लेटफॉर्म का सहारा लेना पड़ता है। फ़िल्म और डाक्यूमेंट्री के लिए इन अनुसंगिक माध्यमों ने बड़ा प्लेटफॉर्म तैयार किया है। इस फ़िल्म के बजट के बारे में मुझे नहीं पता लेकिन उनकी कास्टिंग बहुत बढ़िया है। फ़िल्म में ऐसा कुछ भी नहीं था जिसके विषय में हमें पता नहीं है। इसे हमने पाँच साल तक टी वी और अखबार के जरिये खूब देखा और पढ़ा है। जिसकी जानकारी हमें नहीं थी वो थी कोर्ट सेशन के दौरान की बहस। लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि असली के कोर्ट रूम में ऐसे नाटकीय अंदाज में ही बहस हुई होगी। 

बाबा की पैरवी में जिन हाई प्रोफाइल वकीलों को बहस करते हुए दिखाया गया है उसकी झलक हमने वोमन ईरानी के रूप में देख चुके हैं। उनसे बेहतर इस तेवर को दिखा पाना मुमकिन भी नहीं था। कुछ पत्रिकाओं में मनोज की तारीफ़ करते हुए उन्हें एक मामूली वकील बताया है क्योंकि भारतीय समाज का मनोविज्ञान यही है कि जीतने वालों को हारने वालों के मुकाबले इतना छोटा दिखा दो कि यह एक असंभव लगने वाला जादू लगे। दरअसल ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के प्रति हमारा यह  दया भाव ही कई बार हमारी ही इच्छाशक्ति को नष्ट करता है। वकील की डिग्री एक ही होती है। जिन्हें हम महिमा मंडित करते हुए हाई प्रोफाइल वकील कहते हैं वे दरअसल बड़े अपराधियों को मुक्ति दिलाने का काम करते हैं। ऐसे वकीलों की भर्त्सना अगर लिखने वाले नहीं करेंगे तो भला कौन करेंगे। खैर , इस फ़िल्म ने जिस तरह से सबकुछ बचाकर न्याय मिल जाने की कहानी को दिखाया है उस पर सवाल भी उठता है। सिर्फ़ बाबा के गुंडों के द्वारा ही अड़चन डालने के दृश्यों को दिखाया गया है। उनके द्वारा गवाहों की हत्याएं दिखाई गई हैं लेकिन एक पीड़िता को समाज और सिस्टम से जो लड़ाई करनी पड़ती है , उसका फ़िल्म में अभाव है। एक रेप विक्टिम नाबालिग लड़की की मनोदशा को अद्रिजा सिन्हा ने जीवंत कर दिया है। कुछ दृश्य बहुत विचलित करते हैं। बाबा के प्रति घृणा तो पनपती है लेकिन घिन पैदा करने से बचा ले जाते हैं फ़िल्मकार। सिनेमा आपकी संवेदना और विवेक को भी नापती है और यही एक संवेदनशील फ़िल्मकार का काम है। नफ़रत फैलाने वाले फ़िल्मकारों के लिए यह फ़िल्म एक सीख की तरह है। 

अंत इस बात से करना चाहता हूँ कि अच्छी फिल्में समाज को धीरे-धीरे बदल सकती है लेकिन बुरी और नफ़रत के लिए बनाई गई फ़िल्मों का असर समाज पर तुरंत होता है। इसलिए अच्छी फ़िल्मों को तरज़ीह मिले इसी बाबत इसकी खूब चर्चा होनी चाहिए। अगर आप फ़िल्मों पर नहीं भी लिखते हैं तब भी ऐसी फ़िल्मों पर अवश्य लिखें, यह एक गंभीर सिनेमा प्रेमी का दायित्व है।

प्रशांत विप्लवी 



बुधवार, 17 मई 2023

लालूजी और नीतीशजी के राज में फंसीं बिहार की जनता: - सुशील कुमार भारद्वाज

 बिहार की जनता उपलब्धि का भागीदार है या उपहास का? - यह अब पूर्ण रूप से विचारणीय हो गया है। कभी लोग आर्यभट्ट और पतंजलि के बहाने अपना पीठ थपथपाते नजर आते हैं तो कभी गांधीजी और जेपी के बहाने क्रांति के जनक के रूप में गौरवान्वित होते रहते हैं। कभी ज्ञान की भूमि बताकर गौतम बुद्ध और महावीर जैन के साथ साथ गुरू गोविन्द सिंह को जपते रहते हैं। बिहार का तो खैर नाम भी बौद्ध विहारों की ही वजह से है।

बुद्ध स्मृति पार्क 


अगर इतिहास इतना ही बुद्धिजीवियों से पटा है तो आधुनिक बिहार को बर्बाद किसने किया? लगभग 33 वर्षों से तो बिहार में लालूजी और नीतीशजी का ही एकछत्र राज रहा है। और दोनों के दोनों जेपी के अनुयायी हैं। छात्र आंदोलन की उपज हैं। पटना विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं। और सबसे बड़ी बात कि दोनों ही अवर्ण या जातिवाद की राजनीति करने में अव्वल हैं। बाबजूद इसके बिहार पिछड़ा है आखिर क्यों? आखिर बुद्धिजीवियों / विद्वानों की यह भूमि अंधविश्वासियों की भूमि क्यों और कैसे बन गई? कैसे कोई शहर में एक बाहरी आदमी आता है और लाखों लोग उनके आगे शरणागत हो जाते हैं?

यदि बिहार की सम्पूर्ण आबादी को आंकड़ों के नजरिए से देखने की कोशिश की जाय तो लगभग 75% आबादी 33 साल से कम उम्र की है। अर्थात बिहार की 75 प्रतिशत जनता का जन्म लालूजी और नीतीशजी के शासन काल में हुआ है। तब तो सवाल जायज है न कि इन दोनों महान राजनेताओं ने राज्य में कैसी शिक्षा व्यवस्था को लागू किया कि शिक्षित लोग भी अंधविश्वासी हो गए? जबकि जाति आधारित गणना के दौरान भी सरकार ने माना कि अब बिहार में निरक्षरों की संख्या नगण्य है।

पटना म्यूजियम 


इसमें राजनेताओं को दोषी माना जाय या जनता को? जो जातिवाद के नंगा नाच को देख समझ कर भी मजा ले रही है। आजादी के इतने वर्षों के बीत जाने, तकनीक के युग में भी पिछले इतिहास में उलझी हुई है? आखिर कैसे होगा बिहार का कल्याण?

सोमवार, 8 मई 2023

भारतीय राजनीति में शिक्षा का अभाव: सुशील कुमार भारद्वाज

 भारतीय राजनीति की शुचिता को बचाए रखने की जरूरत है। लोकतंत्र की खामियों से बचने की जरूरत है। जरूरत है भविष्य को सुधारने की। आज जब ज्ञान -विज्ञान का क्षेत्र काफी विस्तृत हो चुका है। शिक्षा की सुलभता जन-जन तक हो गई है। तब भी कोई अनपढ़ और अनगढ़ आदमी हमारा नेता बन जाता है। हमारा मंत्री बनकर मार्गदर्शन करने लगता है। प्रशासनिक पदाधिकारी तक को संबोधित करने लगता है। तो इससे बढ़कर शर्मनाक बात क्या हो सकती है?


कहा जाता है कि भारतीय चुनाव आयोग बहुत ही शक्तिशाली संस्था है। निष्पक्ष कार्य करती है। अनेक सुधार कार्य किये। अपराधियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए प्रयासरत है। ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि आखिर चुनाव आयोग क्यों नहीं प्रत्याशियों के शैक्षणिक योग्यता पर भी प्रश्न चिह्न लगा रही है? दिन रात पीआईएल की झड़ी लगाने वाले क्यों नहीं प्रत्याशियों के लिए भी शैक्षणिक मानक तय करने में अपनी सक्रिय भूमिका निभाने की कोशिश करते हैं?


कितनी अजीब बात है कि बिहार में जाति आधारित गणना में भी निरक्षर शब्द लिखने से मना किया गया। निरक्षर की बजाय पूर्व प्राथमिक शिक्षा शब्द का प्रयोग किया गया इस तर्क के साथ कि निरक्षर शब्द कलंक समान है। आज के आधुनिक तकनीक वाले युग में सब कोई पढ़ा-लिखा है। जबकि दूसरी ओर आठवीं या नौवीं पास इंसान बिहार में उप-मुख्यमंत्री या मुख्यमंत्री तक बन जाता है उन्हें रत्ती भर भी शर्म नहीं आती है। शायद बेशर्म वे प्रशासनिक पदाधिकारी भी हैं जो उनकी जी हुजूरी में लगे रहते हैं। यदि शासक ही सबकुछ है और उसके तर्क़ -कुर्तक से ही राज्य चलना है तो चार पैर वाला जानवर कुत्ता -गधा क्या बुरा है? उसे भी चुनाव लड़ने और जीतने का मौका मिलना चाहिए।


यूं तो मेरी बुद्धि सीमित है, फिर भी 1947 ई के दौर को भी याद करते हैं तो सभी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पढ़े-लिखे ही थे। शायद सभी मंत्री भी काफी पढ़े लिखे थे। लेकिन अफसोस कि आजादी के 75 वर्षों के बाद, जब शिक्षा का काफी विस्तार हो चुका है, बिहार जैसे राज्य में जातिवाद का ऐसा जहर घुला हुआ है कि कम पढ़े लिखे लोग को अपना शासक चुनकर भी लोग गौरवान्वित हो रहे हैं। पता नहीं वह दिन कब आएगा जब बिहार में शिक्षा की पूजा होगी?


#भारतीयराजनीति, #शिक्षा

रविवार, 7 मई 2023

भारतीय राजनीति में महिला: सुशील कुमार भारद्वाज

 एक समय था भारतीय राजनीति में जब महिलाओं का दमदार प्रदर्शन दिखता था। लोग इन्हें भारतीय राजनीति की त्रिदेवियां भी कहते थे। तमिलनाडु में जयललिता का जो जलवा था, वही उत्तर प्रदेश में मायावती का था। बंगाल की शेरनी तो ममता बनर्जी है ही। दक्षिण में राजनीति अब भी है। महिलाएं भी हैं। लेकिन जयललिता की जगह अब भी खाली ही है। मायावती तो अपनी नीतियों की वजह से ही सिमटे सिमटे अप्रासंगिक सी हो गई है। अब तो लगता है कि भारतीय राजनीति में एक मात्र शेरनी ममता बनर्जी ही बचीं हैं जो किसी को भी ताल ठोककर कभी भी चुनौती देने की हिम्मत रखती है। लेकिन वो भी अब उम्र के ढ़लान पर ही हैं।

ऐसा नहीं है कि भारतीय दलों में महिलाओं की कमी है या टिकट नहीं मिल रहा है या महिलाएं खुलकर राजनीति नहीं कर रही हैं। सब कुछ हो रहा है लेकिन अफसोस कि कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं हो रहा है। कोई ऐसा चेहरा नहीं दिख रहा है जिससे भविष्य में उम्मीद की जा सके। 

कुछ लोग प्रियंका गांधी का उदाहरण प्रस्तुत कर सकते हैं लेकिन मेरी नज़र में उनकी उपलब्धि गांधी परिवार में जन्म लेने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। उससे तो कई गुणा बेहतर सोनिया गांधी हैं जिन्होंने नब्बे के दशक के उत्तरार्द्ध में लंगड़ाते कांग्रेस को न सिर्फ अपने दम पर संभाला बल्कि लगातार दो बार भारत को प्रधानमंत्री भी दिया। और आज भी कांग्रेस में जो कुछ भी शेष है उसमें भी सोनिया गांधी का ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष योगदान है।

आखिर भारतीय राजनीति से महिलाओं का दबदबा कम क्यों होता जा रहा है? यह एक विचारणीय प्रश्न है और इस पर विचार किया जाना चाहिए।


#राजनीति #भारतीय_राजनीति #महिला

रविवार, 19 फ़रवरी 2023

नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षा

 




नीतीश कुमार खुश हैं कि सलमान खुर्शीद ने उनकी वकालत कांग्रेस में करने की बात कही है। यदि किस्मत में लिखा होगा तो वे अगले प्रधानमंत्री भारत के बन भी सकते हैं। लेकिन आश्चर्य है कि उन्होंने इस महत्वकांक्षा की पूर्ति के जदयू का राजद में विलय का रास्ता क्यों चुना? वे सीधे -सीधे कांग्रेस में भी तो मर्ज कर सकते हैं पार्टी को! क्या सिर्फ कुर्सी की निरंतरता बनाए रखने के लिए यह रास्ता चुना? कांग्रेस ने एक बार पीवी नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री बनाया और दो बार मनमोहन सिंह को। लेकिन तब गांधी परिवार की स्थिति कुछ और थी। परंतु अब जब राहुल गांधी मिशन की तरह "भारत जोड़ो यात्रा" को पूर्ण कर चुके हैं। एक अलग पहचान बनाने में सफलता हासिल की  है तब यहां से पीछे मुड़ने की उम्मीद है? यदि यह मौका चुक गये तो गांधी परिवार भविष्य में राहुल या प्रियंका के लिए कुछ सोच पाएंगे इसकी उम्मीद कम है। इस दृष्टिकोण से तो यह सहज नहीं लगता है कि कांग्रेस खुर्शीद की बात मानेगी।  और नीतीश कुमार का व्यक्तित्व लालूजी जैसा तो कम से कम है नहीं जो केंद्र की सत्ता को हिलाने की ताकत रखते हों। और इस बात की उम्मीद कम ही है कि नीतीश कुमार महज एक मंत्रालय के लिए केंद्र की राजनीति में जाएं। हां, संभव है कि उप-प्रधानमंत्री की कुर्सी मिल जाय। या आगामी सत्र में उप-राष्ट्रपति या राष्ट्रपति की कुर्सी मिल जाय। या राज्यपाल की कुर्सी चाहें तो कभी भी मिल सकती है।


वैसे आने वाला वक्त बताएगा कि नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षा का अंत किस पद पर जाकर होगा और कब होगा एवं इसके लिए उन्हें कौन कौन सी कुर्बानी देनी होगी?


#बिहार_की_राजनीति #बिहार

मंगलवार, 24 जनवरी 2023

जननायक का जन्मदिन: प्रेमकुमार मणि

 जननायक का जन्मदिन 


प्रेमकुमार मणि 



बिहार में 24 जनवरी की तारीख राजनीतिक गलियारों में खूब चहल -पहल वाली होती है। यह दिन बिहार के समाजवादी नेता दिवंगत कर्पूरी ठाकुर ( 1924 - 1988 ) का जन्मदिन है।  वह समाजवादी पार्टी और विचारों  के नेता थे, और जब थे, तब वर्चस्वप्राप्त सामंती सामाजिक समूहों के आँखों की किरकिरी बने होते थे।  किन्तु कुछ तो है कि उनका जन्मदिन एकाध छोड़ लगभग  सभी दलों के नेता किसी न किसी रूप में मनाते हैं।  भारतीय जनता पार्टी तक के लोग भी,  जिनका सामान्यतया उनसे आजीवन विरोध रहा।  1979 में उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए जनता पार्टी के जनसंघी धड़े (भाजपा का पूर्व रूप ) और कांग्रेस में एकता हो गई थी। लेकिन आज इन दोनों पार्टियों के नेता भी उनका वंदन -अभिनंदन करते हैं। 


कर्पूरी ठाकुर अनेक मामलों में अजूबे थे। उनका जन्म सामाजिक रूप से एक अत्यंत पिछड़े परिवार में हुआ था। पिता गोकुल ठाकुर पारम्परिक जाति- व्यवस्था में नाई थे, जिनका पेशा हजामत बनाना और बड़े लोगों की सेवा करना होता था।  ऐसे ही परिवार में 1920 के दशक में उनका जन्म हुआ।  वह जमाना राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन का था।  समाज करवट ले रहा था। शायद करवट का ही असर था कि उन्हें स्कूल जाना नसीब हुआ था।  कहते हैं जब उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की, तब उनके पिता उन्हें साथ ले कर गाँव के  एक सामंत के घर गए। बेटे की सफलता से उल्लसित पिता ने  बतलाया  कि बेटा मैट्रिक पास कर गया है और आगे पढ़ना चाहता है। सामंत अपने दालान पर लकड़ी के कुंदे की तरह लेटा हुआ था। हिला और किशोर कर्पूरी को एक नजर देखा। बोला - ' अच्छा तूने मैट्रिक पास किया है ? आओ मेरे पैर दबाओ।'  यह  बिहार का सामंतवादी समाज था, जो जातिवाद के दलदल में भी बुरी तरह धंसा था।  हजार तरह की रूढ़ियाँ और उतने ही तरह के पाखंड। शोषण का अंतहीन सिलसिला। 


ऐसे ही समाज में कर्पूरी ठाकुर ने आँखें खोली।  वह उस बिहार से थे, जहाँ 1930 के दशक में जयप्रकाश नारायण की पहल पर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी बनी थी,  जहाँ  स्वामी सहजानंद ने  किसान आंदोलन को खड़ा किया था। कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हो गया था।  त्रिवेणी सभा के नेतृत्व में पिछड़े किसानों, मजदूरों, दस्तकारों ने सामाजिक परिवर्तन की नई मुहिम शुरू की थी।  कर्पूरी ठाकुर चुपचाप समाजवादी आंदोलन और पार्टी से जुड़े और जल्दी ही उनके बीच अपनी पहचान बना ली। 1952 में जब पहला आमचुनाव हुआ, तब वह समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ कर बिहार विधानसभा में पहुंचे। उसके बाद वह लगातार धारासभाओं में बने रहे।  बिहार के एक बार उपमुख्यमंत्री और दो बार मुख्यमंत्री बने। जब सरकार से बाहर रहे तब प्रतिपक्ष के पर्याय बने रहे। 


लेकिन क्या यही उनकी विशेषता है, जिनके लिए आज उनकी चर्चा होती है ? शायद नहीं।  सच्चाई यह है कि वह सरकार में बहुत कम समय के लिए रहे।पहली दफा 22  दिसम्बर 1970  से 30  जून 1971  तक और दूसरी दफा 24 जून 1977 से 30 जून 1979 तक।  दोनों बार मिला कर उनका कार्यकाल ढाई साल का होता है।  इसके अलावे 1967_68 में दस महीनों के लिए उपमुख्यमंत्री भी रहे। यही उनके हुकूमत की अवधि थी।  इस अल्पकाल में ही बिहार के सामाजिक -राजनीतिक जीवन को उन्होंने जिस तरह प्रभावित किया उसकी चर्चा आज तक होती है।


बिहार में केवल एक बार शिक्षा का लोकतंत्रीकरण हुआ और वह कर्पूरी ठाकुर  ने किया।  पढाई में अंग्रेजी की अनिवार्यता को ख़त्म कर के उसे किसान मजदूरों के बच्चों के लिए सुगम बना दिया, जो अंग्रेजी के कारण अटक जाते थे और जिनकी पढाई बाधित  हो जाती थी।  जिंदगी भर नॉन मैट्रिक बने रहने की पीड़ा वह झेलते रहते थे।  अंग्रेजी के बिना भी बहुत अंशों तक पढाई की जा सकती है।  इसे उन्होंने  रेखांकित किया। दलित -पिछड़े तबकों और स्त्रियों  में इससे शिक्षा में आकर्षण बढ़ा। उनका दूसरा काम स्कूलों में टूशन फीस को समाप्त करना था। इससे स्कूलों में बच्चों का ड्रॉपआउट कमजोर हुआ।  शिक्षा सुधार का  यह एक क्रांतिकारी कदम था। 1977 में उन्होंने मुंगेरीलाल आयोग की सिफारिशों को स्वीकार कर सरकारी नौकरियों में पिछड़े तबकों के लिए छब्बीस फीसद आरक्षण सुनिश्चित किया। कार्यपालिका के जनतंत्रीकरण का उत्तर भारत में यह पहला प्रयास था। इसके साथ सभी स्तरों पर भूमिसुधार कानूनों को लागू कर बिहारी समाज के सामंतवादी ढाँचे की चूलें हिला दी।  इन सब के लिए बिहार के सामंतों ने कर्पूरी ठाकुर को कभी मुआफ नहीं किया। सामंती ताकतों से तिरस्कार और विरोध का जो तेवर कर्पूरी ठाकुर को झेलना पड़ा, वैसा किसी कम्युनिस्ट नेता को भी नसीब नहीं हुआ।  1980 के आरम्भ में मध्य बिहार के ग्रामीण इलाके  जब नक्सलवाद से प्रभावित हुए तब सामंतों ने पटना जिले के बिक्रम में एक सशस्त्र जुलूस निकाला; जिसमें मुख्य नारा था - ' नक्सलवाद कहाँ से आई, कर्पूरी की माई बिआई .' सामंतों का आकलन बहुत हद तक सही था।  गरीबों को उठ कर अपनी आवाज बुलंद करने का साहस कर्पूरी ठाकुर ने ही दिया था।  वही उनके टारगेट थे।


      बावजूद इन सब के  उन्होंने कभी किसी से बैर भाव नहीं पाला। वह जो कर रहे थे, न्याय के लिए कर रहे थे, नफरत फ़ैलाने के लिए नहीं।  एकबार उनके मुख्यमंत्री रहते सामंतों ने उनके पिता की पिटाई की।  कलक्टर ने पिटाई करने वालों के खिलाफ कड़ा रुख लिया। कर्पूरी ठाकुर ने कलक्टर को उन्हें यह कहते  हुए छोड़ देने के लिए कहा कि मेरे पिता की तरह बहुत से गरीबों की रोज पिटाई हो रही है।  जब सब की पिटाई बंद हो जाएगी मेरे पिता की भी  पिटाई नहीं होगी।  समस्या के व्यक्तिगत नहीं, सामाजिक निदान में उनका विश्वास था। इसलिए कि वह सच्चे समाजवादी थे। उनमें जिम्मेदारी का बोध और संवेदनशीलता अद्भुत थी। उनके मुख्यमंत्री रहते पुलिस थाने में एक सफाई मजदूर ठकैता डोम की पिटाई से मौत हो गई। कर्पूरी ठाकुर ने खुद पूरे मामले की तहकीकात की। ठकैता डोम को उन्होंने अपना बेटा कहा। उसे स्वयं मुखाग्नि दी। ऐसा ही उन्होंने भोजपुर के पियनिया में किया, जब एक गरीब की दो बेटियों रामवती और कुमुद के साथ बड़े लोगों ने बलात्कार किया। घटनास्थल पर जाकर बलात्कार का शिकार हुई लड़कियों को उन्होंने बेटी कहा और उनकी देखभाल की व्यवस्था की। ऐसे मामलों में कभी-कभार पुलिस बाद में जाती थी, कर्पूरी जी पहले जाते थे।  गरीबों से उन्होंने खुद को आत्मसात कर लिया था।सादगी और ईमानदारी का जो आदर्श उन्होंने रखा, वह किंवदंती बन चुकी है। 


जिस मात्रा में उन्हें बड़े लोगों का तिरस्कार मिला, उसी मात्रा में उन्हें दलित -पिछड़े समाज का प्यार भी मिला। गरीब -गुरबे अच्छी तरह समझते थे कि कर्पूरीठाकुर को इतनी जिल्लत आखिर किसके लिए झेलनी पड़ रही हैं। उनका अपने लिए कोई स्वार्थ नहीं था। पूरे जीवन विधायक -सांसद, मुख्यमंत्री जैसे पदों पर बने रह कर भी उन्होंने कहीं अपना ठिकाना नहीं बनाया।  तमिलनाडु के नेता कामराज जब मरे थे, तब उनके संदूक से दो जोड़ी कपडे और सौ रूपए मिले थे। लगभग यही स्थिति कर्पूरी जी की थी। जैसे आए थे, वैसे ही गए।  यही कारण है कि जैसे -जैसे समय बीत रहा है और लोग तरह -तरह के राजनेताओं को देख रहे हैं, कर्पूरी ठाकुर एक बड़े हीरो की तरह उभर रहे हैं। वंचित तबकों को राजनीतिक धारा से जोड़ने के लिए उन्होंने अपना जीवन न्योछावर कर दिया था।  इसी तबके ने उन्हें जननायक कहा। वह सच्चे मायने में जननायक थे।