आज हिन्दुस्तान दैनिक के संपादकीय पन्ना पर कॉर्टून कोना देख कर सोचता रह गया। एक सांसद महोदय चप्पल हाथ में लिए चल रहे हैं और सभ्यता का मानदंड पर्दे के पीछे छुपने में मशगूल। तुर्रा ये कि महोदय के पैर नंगे हैं। तो मतलब कि जनाब ने पैर की बजाय चप्पलों को हाथों की शोभा बना ली। सभ्यता का मानदंड बदल रहा है तो संभव है कल को कुछ और दिख जाय! लेकिन जेहन में एक सवाल कुलाँचे मार रहा कि भाई गिनती किसने की? चप्पल चलाने वाले या खाने वाले गिन रहे थे कि 25 चप्पल खा चुके? मुझे तो एक सिनेमा का एक दृश्य याद आ गया जिसमें एक शराबी खुले चैम्बर के पास 25- 25 बोल रहा था और जब एक सज्जन पूछने आया तो उसे भी उसमें धकेल कर नम्बर 26 कर दिया। खैर, एक दिन पहले खबर आई कि सांसद महोदय की पत्नी अपने पति के बचाव में आई कि पिटने वाला की बदतमीजी थी कि उसने "मोदी जी को मोदी" कह दिया। जबकि सांसद महोदय ने बयान दिया कि शिवसेना प्रमुख ने उन्हें मीडिया से दूर रहने की सलाह दी है। आश्चर्य है न कि खुद मीडिया को आगे बढ़ाने वाले ठाकरे साहब खुद "सामना" के पत्रकारों को बेरोजगार कर रहे हैं जबकि खबरें अच्छी अच्छी आ सकती थीं। खैर, ये सब राजनेताओं की बातें हैं राजनेता ही जानें। राजनेता की बातें सबकी समझ में आ ही जाय तो राजनेता काहे का? अब तो यही उम्मीद कर सकते हैं कि शायद अब संसद ही तय करेगी कि सभ्यता का मानदंड क्या हो? ठीक वैसे ही जैसे पिछले दिनों वित्त मंत्री अरूण जेटली जी ने कहा कि संसद को यह हक है कि वह विचार करे कि सरकारी धन का सदुपयोग कैसे हो? किसे पेंशन दे और किसे न दे? वैसे ही जैसे संसद तय करेगी ओबीसी के श्रेणी में किसे रखा जाय और किसे क्या सुविधा दी जाय? अब अपनी सभ्यता का मानदंड बचा रहे इसके लिए भी यदि संसद पर ही निर्भर रहना पड़े तो शायद जिंदगी की बहुत सारी सहुलियतों की परिभाषाएं ही बदल जाय। खैर लोकतंत्र में भले ही अधिकार जनता के हाथ में हो लेकिन इस्तेमाल तो जनप्रतिनिधि ही न करेंगें। सत्य को स्वीकार करने से गुरेज कैसा?
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