रविवार, 7 मई 2023

भारतीय राजनीति में महिला: सुशील कुमार भारद्वाज

 एक समय था भारतीय राजनीति में जब महिलाओं का दमदार प्रदर्शन दिखता था। लोग इन्हें भारतीय राजनीति की त्रिदेवियां भी कहते थे। तमिलनाडु में जयललिता का जो जलवा था, वही उत्तर प्रदेश में मायावती का था। बंगाल की शेरनी तो ममता बनर्जी है ही। दक्षिण में राजनीति अब भी है। महिलाएं भी हैं। लेकिन जयललिता की जगह अब भी खाली ही है। मायावती तो अपनी नीतियों की वजह से ही सिमटे सिमटे अप्रासंगिक सी हो गई है। अब तो लगता है कि भारतीय राजनीति में एक मात्र शेरनी ममता बनर्जी ही बचीं हैं जो किसी को भी ताल ठोककर कभी भी चुनौती देने की हिम्मत रखती है। लेकिन वो भी अब उम्र के ढ़लान पर ही हैं।

ऐसा नहीं है कि भारतीय दलों में महिलाओं की कमी है या टिकट नहीं मिल रहा है या महिलाएं खुलकर राजनीति नहीं कर रही हैं। सब कुछ हो रहा है लेकिन अफसोस कि कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं हो रहा है। कोई ऐसा चेहरा नहीं दिख रहा है जिससे भविष्य में उम्मीद की जा सके। 

कुछ लोग प्रियंका गांधी का उदाहरण प्रस्तुत कर सकते हैं लेकिन मेरी नज़र में उनकी उपलब्धि गांधी परिवार में जन्म लेने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। उससे तो कई गुणा बेहतर सोनिया गांधी हैं जिन्होंने नब्बे के दशक के उत्तरार्द्ध में लंगड़ाते कांग्रेस को न सिर्फ अपने दम पर संभाला बल्कि लगातार दो बार भारत को प्रधानमंत्री भी दिया। और आज भी कांग्रेस में जो कुछ भी शेष है उसमें भी सोनिया गांधी का ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष योगदान है।

आखिर भारतीय राजनीति से महिलाओं का दबदबा कम क्यों होता जा रहा है? यह एक विचारणीय प्रश्न है और इस पर विचार किया जाना चाहिए।


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