जीवन का जीवंत आख्यान लिखने वाले
लेखक हैं संतोष दीक्षित
-सुशील कुमार भारद्वाज
बिहार में साहित्य की धरती सदैव उर्वर बनी रही है. अक्सर किसी न किसी आन्दोलन का आगाज होते रहा है. और इसी निरंतरता को बरकरार रखते हुए सदी के अंतिम दशक में अपनी कथा-यात्रा शुरू करने वाले जिन युवा कथाकारों ने बिना किसी शोर–शराबे के राष्ट्रीय फलक पर अपनी उपस्थिति दर्ज करने की कोशिश की है, उनमें से संतोष दीक्षित एक महत्वपूर्ण नाम है. संतोष दीक्षित का जन्म बिहार के भागलपुर जिला स्थित लालूचक में 8 दिसम्बर
1958 ई० को हुआ. इनका शिक्षा-दीक्षा भागलपुर, पटना और रांची में हुआ है.दूसरे
शब्दों में कहें तो जब ये होश सँभालने की स्थिति में थे तब देश महत्वपूर्ण बदलाव
के दौर से गुजर रहा था जिसे इन्हें करीब से महसूसने का मौका मिला होगा. एक तरफ देश
में आपातकाल की स्थिति थी तो दूसरी ओर जेपी के नेतृत्व में छात्र आन्दोलन अपने चरम
की ओर थी. और जब ये साहित्य जगत में प्रवेश कर रहे थे उस समय देश-दुनियां की ही आबोहवा
बदल रही थी. अन्तराष्ट्रीय स्तर पर शक्तिशाली सोवियत संघ अपने बिखराब को करीब से
देख रहा था तो अमेरिका विश्व का नेतृत्व करने के लिए एक अलग रूप में ढल रहा था.
समाजवाद का नारा कमजोर हो रहा था और पूंजीवाद एक नई सुबह के स्वागत में खड़ी हो रही
थी. भारत में भी राजनीतिक अस्थिरता छाई हुई थी. एक तरफ मंडल-कमंडल का नारा गूंज
रहा था तो दूसरी ओर बाबरी मस्जिद के बहाने जय श्रीराम का नारा लग रहा था. इन सबके
अलावे भारत में विनिवेश के द्वार खोले जा रहे थे. और सबसे बड़ी बात कि दुनिया भूमंडलीकरण
के दौर में प्रवेश कर रही थी. जिसका सीधा असर हमारे जीवनशैली पर ही नहीं पड़ा बल्कि
भारतीय संस्कृति पर भी पड़ा. परिवार बिखरने लगे, रिश्ते बिखरने लगे और सिसकने को
मजबूर हो गई इंसानियत. पूंजीवाद का ऐसा खौफनाक स्वरूप रिश्तों के गर्माहट में दरार
डालने लगी कि सबकुछ चरमराने लगा. आदर्श और नैतिकता की बात जीवन में प्रवेश करते
विवध स्तर की भ्रष्टाचार के सामने नत-मस्तक होने लगी. तो लेखक की सम्वेदना उबाल खाकर
उन्हेँ लिखने के लिए प्रेरित करने लगी.
मिलान
कुंदेरा, सलमान रूश्दी, हरिशंकर परसाई, शरद जोशी और रविंद्रनाथ त्यागी का कुछ ऐसा
प्रभाव इनके उपर पड़ा कि ये व्यंग्य लिखने लगे. हालांकि व्यंग्य की समझ इन्हें अपने
पिता से विरासत में ही मिली. लेकिन कुछ समय बाद इन्हें एहसास हुआ कि व्यंग्य महज
एक शैली है, अपनी बातों को सही-सही रखने के लिए कहानी ही वह विधा है जहाँ वे
संतुष्टि हासिल कर सकते हैं. फिर एक बदलाव आया और कलम कहानी को तरासने लगी. कहानी
के पात्र कुछ इस कदर सिर पर सवार होते कि पूरी कहानी उनसे लिखवा कर ही दम लेते.
संतोष
दीक्षित जितनी सहजता से लोगों से हँसते-बोलते हुए मिलते हैं उसी सामान्य प्रक्रिया
से साहित्य को भी रचते हैं. बिना किसी रणनीति के. बिना किसी दबाब के बेधड़क निरन्तर
लिखते रहते हैं. बिल्कुल ही अलमस्त हो ठीक वैसे ही साहित्य कर्म में रमे रहते हैं
जैसे कोई मजदूर मालिकों के दबाब में रोजमर्रा के अपने काम निबटाये चलता है. कभी
धूप में पसीना बहाते हुए, कभी पुरवा के झोंकों के साथ मस्ती भरे गीत गाते हुए. तो
कभी फुर्सत के लम्हों में बीड़ी-तम्बाकू का लुत्फ़ उठाते हुए. रोजमर्रा की सामान्य
जिन्दगी जीते हुए, घर-परिवार की दैनिक जिम्मेवारियों का सहजता से निर्वहन करते
हुए, पशुपालन विभाग में लगभग तीन दशक तक एक डॉक्टर की नौकरी करते हुए, जितने लोगों
से इनका साबका हुआ. उन सबसे अर्जित अनुभव को इन्होंने कहीं-न-कहीं अपने कथा
साहित्य में किसी न किसी रूप में पिरोने की कोशिश की है.
इनकी
कहानियों में सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर संघर्षशील पात्र
बहुतेरे बिखरे मिलेंगें. रिश्तों की कतरन में उलझें पात्र सर्वत्र बिखरे मिलेंगें
जो आपको स्वयं से सवाल करने को मजबूर कर देंगें. बुलडोजर और दीमक, आखेट (1997), शहर में लछमिनिया (2001), ललस (2004), ईश्वर का जासूस (2008), एवं धूप में सीधी सड़क (2014), में ऐसी कहानियां आपको पढ़ने को
मिलेंगी. मुर्गियाचक में ईद, आखेट, घर का सबसे गन्दा आदमी, शहर में लछमिनिया, ललस,
चैत के पत्ते, तस्वीर, ईश्वर का जासूस, काल-कथा इत्यादि कुछ प्रमुख कहानियां न
सिर्फ काफी चर्चित हुई बल्कि उर्दू, पंजाबी एवं गुजराती भाषा में अनुवादित भी हुई
है. कहानी के अलावे केलिडोस्कोप, घर-बदर, बगलगीर, एवं बैल की आँख, उपन्यास काफी
चर्चित हैं.
सेवानिवृति
के बाद इनका पढना-लिखना ही अधिक हो रहा है. लिखना इनके लिए खुद को क्रियाशील रखने
की एक कोशिश है. इसे इससे ही समझा जा सकता है कि इनका पहला उपन्यास “केलिडोस्कोप”
वर्ष 2010 में प्रकाशित हुआ जबकि
पिछले तीन वर्षों में घर-बदर (2020), बगलगीर (2022) और नवीनतम उपन्यास “बैल
की आँख” आ चुकी है. इनके चारों उपन्यास का विषय अलग-अलग है.
केलिडोस्कोप
कथा
रस में डूबा हुआ बिहार के एक कस्बानुमा गाँव में पले–बढ़े एक सामान्य से नौजवान
सन्तु उर्फ़ सत्येन्द्र दूबे का जिंदगीनामा है. जहाँ प्रवासी लोगों के विस्थापन के
दर्द को उकेरने की कोशिश की गई है. इसमें न सिर्फ प्रवासियों के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं
भावनात्मक संघर्ष को रेखांकित करने की कोशिश की गई है बल्कि पूंजीवाद के प्रभाव
में विलुप्त होते पुराने भारत को बचाए रखने की कशमकश को भी दिखाने की कोशिश की गई
है.
जबकि
‘घर-बदर’ एक निम्न मध्यवर्गीय व्यक्ति कुन्दू, जो कि रेलवे में साधारण-सी एक नौकरी
करता है, के एक घर बना लेने के संघर्ष को रेखांकित करता है. एक घर का सपना देखने
के लिए उसे क्या कुछ कीमत चुकानी पड़ सकती है? यह आम आदमी के सदैव आम बने रहने की
अभिश्प्त्ता है या यों कहें कि उसके बस रह सकने के निरंतर संघर्ष का जीवंत बयान बन
जाती है. इस अभिशप्त संघर्ष के कारणों की पड़ताल ही उपन्यास का मुख्य लक्ष्य है.
तो
‘बगलगीर’ के बहाने उपन्यासकार विद्रूप होते समय और समाज के दारुण यथार्थ को
रेखांकित करने की कोशिश की है. एक ही जगह प्रेमभाव से मिलजुल कर रहने वाले किकि और
अशफ़ाक हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता का जहर घुलते ही सौहार्द की बातों को भूल
जाते हैं. लोग अजीब किस्म के तनाव और अविश्वास के साथ जीने को अभिशप्त हो जाते
हैं. मौका पाते ही उपन्यासकार जीवन के विविध रूपों में फैलते भ्रष्टाचार, तानाशाह,
और अवसरवादी प्रवृति पर भी टिप्पणी करने से नहीं चुकते हैं.
जबकि
नवीनतम उपन्यास ‘बैल की आँख’ पटना के पास एक गाँव की पृष्ठभूमि को आधार बनाकर रची
गई है. ग्रामीण सामाजिक संरचना, सामाजिक मनोवृति और उसी में संतुष्ट रहने तथा उससे
प्रतिकार की अवस्था को एक साथ कथा में समाहित किया गया है. जातीय व्यस्था में झूठे
अभिमान के साथ जीने की वजह से किस प्रकार मानवीय प्रेम एवं सौहार्द की पौध सूख
जाती है. निजी हितलाभ और भविष्य की आकांक्षाएं और बदलती परिस्थितियां समय के साथ
खंडित करती चलती है. दूसरे शब्दों में कहें तो उपन्यासकार ने सम्पूर्ण पारिवेशिक
बदलाव को एक ग्रामीण पशु चिकित्सक के रूप में देखने की कोशिश की है.
बनारसी
प्रसाद भोजपुरी सम्मान से सम्मानित संतोष दीक्षित अपने कहानी –उपन्यास को जिस
किस्सागोई शैली में बेहद इत्मिनान से एक लम्बे कालखंड और लम्बी जीवन-कथा को बड़े ही
सरस और रोचक अंदाज में गंभीर से गंभीर बात को भी सहजता से प्रस्तुत करते हैं वह
काबिलेगौर है. पात्र एवं परिवेश के अनुकूल जिस भाषा–शैली और शब्दों व कहावतों का
उपयुक्त चयन करते हैं वह इनके साहित्य को सहज, रोचक व जीवंत बना देता है.


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