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बुधवार, 17 मई 2023

लालूजी और नीतीशजी के राज में फंसीं बिहार की जनता: - सुशील कुमार भारद्वाज

 बिहार की जनता उपलब्धि का भागीदार है या उपहास का? - यह अब पूर्ण रूप से विचारणीय हो गया है। कभी लोग आर्यभट्ट और पतंजलि के बहाने अपना पीठ थपथपाते नजर आते हैं तो कभी गांधीजी और जेपी के बहाने क्रांति के जनक के रूप में गौरवान्वित होते रहते हैं। कभी ज्ञान की भूमि बताकर गौतम बुद्ध और महावीर जैन के साथ साथ गुरू गोविन्द सिंह को जपते रहते हैं। बिहार का तो खैर नाम भी बौद्ध विहारों की ही वजह से है।

बुद्ध स्मृति पार्क 


अगर इतिहास इतना ही बुद्धिजीवियों से पटा है तो आधुनिक बिहार को बर्बाद किसने किया? लगभग 33 वर्षों से तो बिहार में लालूजी और नीतीशजी का ही एकछत्र राज रहा है। और दोनों के दोनों जेपी के अनुयायी हैं। छात्र आंदोलन की उपज हैं। पटना विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं। और सबसे बड़ी बात कि दोनों ही अवर्ण या जातिवाद की राजनीति करने में अव्वल हैं। बाबजूद इसके बिहार पिछड़ा है आखिर क्यों? आखिर बुद्धिजीवियों / विद्वानों की यह भूमि अंधविश्वासियों की भूमि क्यों और कैसे बन गई? कैसे कोई शहर में एक बाहरी आदमी आता है और लाखों लोग उनके आगे शरणागत हो जाते हैं?

यदि बिहार की सम्पूर्ण आबादी को आंकड़ों के नजरिए से देखने की कोशिश की जाय तो लगभग 75% आबादी 33 साल से कम उम्र की है। अर्थात बिहार की 75 प्रतिशत जनता का जन्म लालूजी और नीतीशजी के शासन काल में हुआ है। तब तो सवाल जायज है न कि इन दोनों महान राजनेताओं ने राज्य में कैसी शिक्षा व्यवस्था को लागू किया कि शिक्षित लोग भी अंधविश्वासी हो गए? जबकि जाति आधारित गणना के दौरान भी सरकार ने माना कि अब बिहार में निरक्षरों की संख्या नगण्य है।

पटना म्यूजियम 


इसमें राजनेताओं को दोषी माना जाय या जनता को? जो जातिवाद के नंगा नाच को देख समझ कर भी मजा ले रही है। आजादी के इतने वर्षों के बीत जाने, तकनीक के युग में भी पिछले इतिहास में उलझी हुई है? आखिर कैसे होगा बिहार का कल्याण?

सोमवार, 8 मई 2023

भारतीय राजनीति में शिक्षा का अभाव: सुशील कुमार भारद्वाज

 भारतीय राजनीति की शुचिता को बचाए रखने की जरूरत है। लोकतंत्र की खामियों से बचने की जरूरत है। जरूरत है भविष्य को सुधारने की। आज जब ज्ञान -विज्ञान का क्षेत्र काफी विस्तृत हो चुका है। शिक्षा की सुलभता जन-जन तक हो गई है। तब भी कोई अनपढ़ और अनगढ़ आदमी हमारा नेता बन जाता है। हमारा मंत्री बनकर मार्गदर्शन करने लगता है। प्रशासनिक पदाधिकारी तक को संबोधित करने लगता है। तो इससे बढ़कर शर्मनाक बात क्या हो सकती है?


कहा जाता है कि भारतीय चुनाव आयोग बहुत ही शक्तिशाली संस्था है। निष्पक्ष कार्य करती है। अनेक सुधार कार्य किये। अपराधियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए प्रयासरत है। ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि आखिर चुनाव आयोग क्यों नहीं प्रत्याशियों के शैक्षणिक योग्यता पर भी प्रश्न चिह्न लगा रही है? दिन रात पीआईएल की झड़ी लगाने वाले क्यों नहीं प्रत्याशियों के लिए भी शैक्षणिक मानक तय करने में अपनी सक्रिय भूमिका निभाने की कोशिश करते हैं?


कितनी अजीब बात है कि बिहार में जाति आधारित गणना में भी निरक्षर शब्द लिखने से मना किया गया। निरक्षर की बजाय पूर्व प्राथमिक शिक्षा शब्द का प्रयोग किया गया इस तर्क के साथ कि निरक्षर शब्द कलंक समान है। आज के आधुनिक तकनीक वाले युग में सब कोई पढ़ा-लिखा है। जबकि दूसरी ओर आठवीं या नौवीं पास इंसान बिहार में उप-मुख्यमंत्री या मुख्यमंत्री तक बन जाता है उन्हें रत्ती भर भी शर्म नहीं आती है। शायद बेशर्म वे प्रशासनिक पदाधिकारी भी हैं जो उनकी जी हुजूरी में लगे रहते हैं। यदि शासक ही सबकुछ है और उसके तर्क़ -कुर्तक से ही राज्य चलना है तो चार पैर वाला जानवर कुत्ता -गधा क्या बुरा है? उसे भी चुनाव लड़ने और जीतने का मौका मिलना चाहिए।


यूं तो मेरी बुद्धि सीमित है, फिर भी 1947 ई के दौर को भी याद करते हैं तो सभी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पढ़े-लिखे ही थे। शायद सभी मंत्री भी काफी पढ़े लिखे थे। लेकिन अफसोस कि आजादी के 75 वर्षों के बाद, जब शिक्षा का काफी विस्तार हो चुका है, बिहार जैसे राज्य में जातिवाद का ऐसा जहर घुला हुआ है कि कम पढ़े लिखे लोग को अपना शासक चुनकर भी लोग गौरवान्वित हो रहे हैं। पता नहीं वह दिन कब आएगा जब बिहार में शिक्षा की पूजा होगी?


#भारतीयराजनीति, #शिक्षा