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सोमवार, 8 मई 2023

भारतीय राजनीति में शिक्षा का अभाव: सुशील कुमार भारद्वाज

 भारतीय राजनीति की शुचिता को बचाए रखने की जरूरत है। लोकतंत्र की खामियों से बचने की जरूरत है। जरूरत है भविष्य को सुधारने की। आज जब ज्ञान -विज्ञान का क्षेत्र काफी विस्तृत हो चुका है। शिक्षा की सुलभता जन-जन तक हो गई है। तब भी कोई अनपढ़ और अनगढ़ आदमी हमारा नेता बन जाता है। हमारा मंत्री बनकर मार्गदर्शन करने लगता है। प्रशासनिक पदाधिकारी तक को संबोधित करने लगता है। तो इससे बढ़कर शर्मनाक बात क्या हो सकती है?


कहा जाता है कि भारतीय चुनाव आयोग बहुत ही शक्तिशाली संस्था है। निष्पक्ष कार्य करती है। अनेक सुधार कार्य किये। अपराधियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए प्रयासरत है। ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि आखिर चुनाव आयोग क्यों नहीं प्रत्याशियों के शैक्षणिक योग्यता पर भी प्रश्न चिह्न लगा रही है? दिन रात पीआईएल की झड़ी लगाने वाले क्यों नहीं प्रत्याशियों के लिए भी शैक्षणिक मानक तय करने में अपनी सक्रिय भूमिका निभाने की कोशिश करते हैं?


कितनी अजीब बात है कि बिहार में जाति आधारित गणना में भी निरक्षर शब्द लिखने से मना किया गया। निरक्षर की बजाय पूर्व प्राथमिक शिक्षा शब्द का प्रयोग किया गया इस तर्क के साथ कि निरक्षर शब्द कलंक समान है। आज के आधुनिक तकनीक वाले युग में सब कोई पढ़ा-लिखा है। जबकि दूसरी ओर आठवीं या नौवीं पास इंसान बिहार में उप-मुख्यमंत्री या मुख्यमंत्री तक बन जाता है उन्हें रत्ती भर भी शर्म नहीं आती है। शायद बेशर्म वे प्रशासनिक पदाधिकारी भी हैं जो उनकी जी हुजूरी में लगे रहते हैं। यदि शासक ही सबकुछ है और उसके तर्क़ -कुर्तक से ही राज्य चलना है तो चार पैर वाला जानवर कुत्ता -गधा क्या बुरा है? उसे भी चुनाव लड़ने और जीतने का मौका मिलना चाहिए।


यूं तो मेरी बुद्धि सीमित है, फिर भी 1947 ई के दौर को भी याद करते हैं तो सभी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पढ़े-लिखे ही थे। शायद सभी मंत्री भी काफी पढ़े लिखे थे। लेकिन अफसोस कि आजादी के 75 वर्षों के बाद, जब शिक्षा का काफी विस्तार हो चुका है, बिहार जैसे राज्य में जातिवाद का ऐसा जहर घुला हुआ है कि कम पढ़े लिखे लोग को अपना शासक चुनकर भी लोग गौरवान्वित हो रहे हैं। पता नहीं वह दिन कब आएगा जब बिहार में शिक्षा की पूजा होगी?


#भारतीयराजनीति, #शिक्षा

रविवार, 7 मई 2023

भारतीय राजनीति में महिला: सुशील कुमार भारद्वाज

 एक समय था भारतीय राजनीति में जब महिलाओं का दमदार प्रदर्शन दिखता था। लोग इन्हें भारतीय राजनीति की त्रिदेवियां भी कहते थे। तमिलनाडु में जयललिता का जो जलवा था, वही उत्तर प्रदेश में मायावती का था। बंगाल की शेरनी तो ममता बनर्जी है ही। दक्षिण में राजनीति अब भी है। महिलाएं भी हैं। लेकिन जयललिता की जगह अब भी खाली ही है। मायावती तो अपनी नीतियों की वजह से ही सिमटे सिमटे अप्रासंगिक सी हो गई है। अब तो लगता है कि भारतीय राजनीति में एक मात्र शेरनी ममता बनर्जी ही बचीं हैं जो किसी को भी ताल ठोककर कभी भी चुनौती देने की हिम्मत रखती है। लेकिन वो भी अब उम्र के ढ़लान पर ही हैं।

ऐसा नहीं है कि भारतीय दलों में महिलाओं की कमी है या टिकट नहीं मिल रहा है या महिलाएं खुलकर राजनीति नहीं कर रही हैं। सब कुछ हो रहा है लेकिन अफसोस कि कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं हो रहा है। कोई ऐसा चेहरा नहीं दिख रहा है जिससे भविष्य में उम्मीद की जा सके। 

कुछ लोग प्रियंका गांधी का उदाहरण प्रस्तुत कर सकते हैं लेकिन मेरी नज़र में उनकी उपलब्धि गांधी परिवार में जन्म लेने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। उससे तो कई गुणा बेहतर सोनिया गांधी हैं जिन्होंने नब्बे के दशक के उत्तरार्द्ध में लंगड़ाते कांग्रेस को न सिर्फ अपने दम पर संभाला बल्कि लगातार दो बार भारत को प्रधानमंत्री भी दिया। और आज भी कांग्रेस में जो कुछ भी शेष है उसमें भी सोनिया गांधी का ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष योगदान है।

आखिर भारतीय राजनीति से महिलाओं का दबदबा कम क्यों होता जा रहा है? यह एक विचारणीय प्रश्न है और इस पर विचार किया जाना चाहिए।


#राजनीति #भारतीय_राजनीति #महिला

बुधवार, 4 जनवरी 2023

राहुल और मोदी के बहस में उलझी भारतीय राजनीति

 सर्द मौसम में जब सब घर में दुबके रहने की जुगत में हैं तो राजनीति कुछ हद तक उबाल खाकर गर्माहट पैदा कर रही है। बिहार में तो यूं भी खरमास यानि कि मकरसंक्रांति के बाद उलट-पुलट की परंपरा रही है। अब इस वर्ष परंपरा बरकरार रहेगी या कुछ नया होगा ये तो भविष्य के गर्भ में है। फिलवक्त बिहार में जातिय जनगणना की शुरूआत हो चुकी है। लेकिन इस बार दिल्ली में भी सर्दी के मौसम में राहुल गांधी अपने व्यवहार से गर्माहट पैदा किये हुए हैं। यूं तो टेलीविजन चैनलों पर कपड़ों के प्रचार में ही "सर्दी में भी गर्मी" श्लोगन को प्रचारित -प्रसारित किया जा रहा है बाबजूद इसके राहुल गांधी के टी-शर्ट पर छिड़ी बहस अंत होने का नाम ही नहीं ले रही है।

क्या यह भारतीय राजनीति के लिए भी विचारणीय नहीं है कि हमलोग राष्ट्रीय अथवा क्षेत्रीय मुद्दों/ समस्याओं पर चर्चा करने की बजाय किसी के पहनावे और रहन-सहन में ही उलझकर रह गये हैं? ऐसा नहीं है कि इस तरीके की बहसें पहले नहीं हुई है, लेकिन सच यह है कि वह प्रतीकात्मक कार्य होता था यथा- टोपी या पगड़ी, हरा रंग या केसरिया रंग। कपड़े के ऊपर या नीचे जनेऊ धारण करना, आदि।

अब किसी ने टी-शर्ट पहन ली तो उसकी शक्ति का बखान करना। उसे तपस्वी बताना, उसकी शक्ति का जागरण आदि बेतुकी बातें करना, समय की बर्बादी ही है। यदि बहस ही करनी है तो गौर करनी चाहिए कि लगभग एक दशक की एंटीइन्कम्बेंसी फैक्टर के नाव पर सवार होकर कौन राजनीतिक बैतरणी पार उतरने की कूबत रखता है? राष्ट्रीय पार्टी सत्ता के केंद्र में बनी रहेगी या क्षेत्रीय पार्टियां नेतृत्व करने को तैयार बैठी है? साठ वर्षीय युवा नेता ही देश का नेतृत्व करने के लिए अंतिम विकल्प हैं कि कुछ तीस-पैंतीस वर्षीय युवा नेता भी अचानक परिदृश्य में नजर आ सकते हैं? जब जिंदगी में तकनीक का इतना दखल बढ़ गया है कि जिंदगी ही डिजिटल हो गई है तो शेष चीजें के प्रति संकुचित नजरिया कितना उचित है? माना कि भारत में लोगों की क्रयशक्ति इतनी बढ़ गई है कि हर महंगाई को मात देने पर आमादा है, लेकिन विचारणीय है कि इतनी कुर्बानी के बाद भी क्या देश सही रास्ते पर चल रही है? एक सामान्य आमजन अपने आप को इस माहौल में सहज सुरक्षित जीवनयापन की स्थिति में पाता है? ढ़ेरों ऐसी समस्याएं हैं जिन पर बहस किया जाना शेष है फिर राहुल या मोदी के बहस में क्या उलझना? इन्हें तो विचार करना चाहिए कि यदि राहुल गांधी में ही विकल्प दिखता है तो उनके राजनीतिक हथियार को तेज करें, उन्हें हर मोर्चे पर मोदी से बीस दिखाने की कोशिश करें न कि कपड़ा और दाढ़ी के ही महिमा मंडन में उलझे रहें। यदि मोदी इस बार भी सत्ता में काबिज होने में सफल रहे तो यकीनन एक इतिहास लिखा जाएगा कि एक से एक दिग्गज नेता भारतीय राजनीति में सक्रिय हैं लेकिन किन्हीं में उन्हें रोक पाने की कूबत नहीं।

- सुशील कुमार भारद्वाज