पूंजीवादी व्यवस्था की कड़वी सच्चाई है नरेन्द्र कुमार की नीलामघर
-सुशील कुमार भारद्वाज
नरेंद्र
कुमार का प्रथम एवं सद्यः प्रकाशित कविता संग्रह ‘नीलामघर’ वर्तमान समय से रूबरू कराती
कविताओं का एक संग्रह है. कवि ने परिवेशगत जीवन में व्याप्त पूंजीवादी
व्यवस्था की कड़वी सच्चाइयों को कलमबद्ध करने की कोशिश की है. चाहे बात राजनीतिक सुविधा की हो, चाहे बात सामाजिक और
राजनीतिक जीवन में फैले भ्रष्टाचार की हो, चाहे मानवीय संवेदना
की, चाहे प्राकृतिक दृष्टिकोण की, चाहे
बात धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा की हो, कवि ने अपनी सीमा
का भरपूर प्रयोग करने की कोशिश की है. कवि स्वीकार भी करता है
कि वर्त्तमान समय की अराजकता के लिए सिर्फ दूसरे ही लोग दोषी नहीं हैं बल्कि इसमें
हम सब की भी सामूहिक सहभागिता है. भ्रष्टाचार का जो विद्रूप चेहरा
सामने नज़र आ रहा है उसके लिए हम सब भी उतने ही जिम्मेवार हैं, जितना काली करतूतों में आकंठ डूबा इन्सान.
संग्रह
में प्रस्तुत सभी कविताएं गौरतलब हैं.
संग्रह की पहली और शीर्षक कविता ‘नीलामघर’
ही मनुष्य की दम तोड़ती मनुष्यता की एहसास कराती है. यह कविता उस नीलामी प्रथा की याद दिलाती है जहाँ इन्सान एक बाजारू वस्तु की
तरह बिक रहा है. एक तरफ क्रिकेट की दुनिया है, जहाँ लोग लाखों-करोड़ों रूपये में शौक से बिक कर किसी
का गुलाम बनते हैं, वहीं दूसरी ओर चमड़ी से भी दमड़ी निकाल लेने
की कीमत पर भूख से बिलबिलाते लोग बिकने को तैयार हैं. दोनों जगह
लोग पेट की क्षुधा मिटाने के लिए ही बिक रहे हैं. बस फर्क सिर्फ
इतना है कि कोई शौक से बिक रहा है और कोई बिकने के लिए मजबूर किया जा रहा है.
‘ग्लेडिएटर’ कविता को भी इस कड़ी में जोड़कर देखा जा सकता
है, जहाँ आर्थिक रूप से सम्पन्न एक मनुष्य अपने युद्धोन्मादी
सनक में अपने मनोरंजन के लिए दूसरे मनुष्य को बहुत ही बेबाकी और बेफिक्री से मौत के
घाट उतरते देख खुश होता है. उसे हार-जीत
की चिंता है लेकिन खत्म होते इंसानियत की नहीं. और आश्चर्य भी
कम नहीं कि बदहाली में जी रहे परिवार को संभाल लेने के भ्रम में युवा भी चंद रुपयों
की खातिर अपनी जवानी को दांव पर लगाने से नहीं चुकते हैं.
संत्रास
के विभिन्न स्वरूपों के बीच भी कवि वैसे युवाओं को अपने परिवेश में ढूढ़ ही लेता है
जो जिन्दगी की जिम्मेवारियों और दुश्वारियों के बीच अपने लिए पलायन का रास्ता ढूंढ
लेता है. क्षणिक सुख के लिए ही सही लेकिन वे
‘डीजे की धुन’ पर बेफिक्री में इतना नशाग्रस्त
हो जाते हैं कि वे अपनी सारी मूलभूत समस्याओं को भूल जाते हैं. वे भूल जाते हैं कि वे बेरोजगार हैं. फसल बर्बाद हो गया
है. पिता के फटे जूते की कौन कहे? माँ की
पैबंद लगी साड़ी की भी सुध उसे नहीं रहती है. सरकार ऐसे ही युवाओं
को तो तलाशती रहती है जो अपनी मूलभूत समस्याओं को भूल कर सिर्फ उनके इशारे पर नाचते
रहे. होश में आने के बाद यही युवा तो सवाल पूछेंगें. व्यवस्था पर सवाल उठाएंगें. लेकिन तब तक इतना विलंब हो
चुका होगा कि इस अराजक माहौल के लिए खुद को दोषी मानते हुए कहेंगें कि इस परिस्थिति
में ‘मेरा भी हाथ’ तो है. और फिर शांत हो जाएंगी उनकी आवाजें. उनका आवेग और उनका
क्रोध. उनके सोचने की दिशा बदल चुकी होगी. तब वे सिर्फ पूछेंगें कि ‘तुम्हारा ईश्वर’ कैसा है जो भ्रष्टाचारियों को भी खुले हाथ से आशीर्वाद देता है? सत्य की कब्र पर पनपते असत्य को भी खाद-पानी देकर पुष्पित-पल्लवित होने देता है. और ‘आशंकित
मन’ से पूछेगा कि आखिर भ्रष्टाचारी कैसी तीर्थयात्रा पर जाते
हैं? कैसी नदी में डुबकी लगाते हैं कि हर बार वे आकंठ भ्रष्टाचार
की दलदल में धंस कर ख़ुशी से किल्लोल करते रहते हैं? और
‘ये लोग’ वही लोग हैं, जिन्हें
अपने कुकृत्य का ज्ञान है. उन्हें पता है कि अपराध के लिए सामाजिक
और क़ानूनी रूप से दंड विधान तय है और उसी दंड से बचने की खातिर एक अपराध के बाद एक
और जघन्य अपराध को अंजाम दे देते हैं.
नरेंद्र
कुमार अपने परिवेश में व्याप्त राजनीतिक आबोहवा को भी बखूबी पहचानते हैं. यूँ कह लीजिए कि हर जन्मजात इंसान
की तरह उनमें भी राजनीतिक कीड़ा कहीं-न-कहीं
कुलबुलाता है, जो उन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था पर तंज कसने को
मजबूर करता है. यह सर्वविदित है कि आज लोकतंत्र किस विद्रूपता
का शिकार हो गया है? इसके प्रतीकों का प्रयोग आज किस प्रकार स्वार्थसिद्धि
के लिए किया जा रहा है? राजनेताओं की कथनी और करनी में कितना
बड़ा फासला आ गया है? ‘कुछ हिस्सा’, ‘सच-सच बताना’, ‘स्लोगन’, ‘राजनीति’
आदि कविताएं राजनीति के भावार्थ को ही विविध रूप में स्पष्ट करती है.
‘क्रांति’ जहां प्रभावकारी मीडिया में छूटते सत्य
की व्यथा है तो ‘हमारा प्रजातंत्र’ वैसे
आमजन की व्यथा है जो शासकों को सत्ता सौंपकर खुद को ठगा-सा महसूस
करते हैं. ‘कुत्ते-एक’ और ‘कुत्ते-दो’ में बिम्ब का प्रयोग करते हुए प्रचलित राजनीतिक हथकंडे पर ही तंज कसने की कोशिश
की गई है. कवि मीडिया में क्रूर मजाक बनते ‘वृक्षारोपण’ का भी बखूबी चित्रांकन करते हैं जहाँ बेचारे
पत्ते झुलस रहे हैं और अखबारों में नेताजी के चेहरे चमक रहे हैं. यूं कह लीजिए प्रकृति की कब्र पर नेताओं के चेहरे चमक रहे हैं. ‘बावनदास की वापसी’ समाजवाद और पूंजीवाद के जंग पर एक
राजनीतिक टिप्पणी ही है. इतना ही नहीं ‘जयंती’ श्रद्धा से परे राजनीतिक स्वार्थ में क्रियाकलाप
करते लोगों का चित्रांकन है, जो यांत्रिक रुप से उसमें शरीक होते
हैं और सुविधा के अनुसार सुविधा की राजनीति के लिए कभी किसी की जयंती मनाते हैं,
तो कभी भूल जाते हैं. कभी किसी को आमंत्रित कर
लेते हैं, किसी को उपेक्षित कर देते हैं. यूं कह लीजिए कि कवि ने मौजूदा राजनीतिक व्यवहार को अभिव्यक्ति देने की कोशिश
की है. ‘घेरे के भीतर’ कविता सवाल है उनके
दावों पर कि आखिर देश सशक्त हाथों में कैसे हैं जब नेता को अपनों के बीच रहने के लिए
ही सुरक्षा की जुगाड़ करनी पड़ती है?
कवि
अपनी कविताओं में मानवीय द्वंद्व को भी जगह देता है. ‘मैं चाहता हूं कि’,‘जिंदगी’,‘याद’,‘लुकाछिपी’ आदि कविता रिश्तों
में खोती गर्माहट को एक ताजगी देने की कोशिश करती है. ‘इंतजार’
वृद्धाश्रम में पड़े उन इंसानों की अंतहीन व्यथा है जिनके बच्चे पढ़-लिख कर विदेशों में रुपए तो खूब कमा रहे हैं, जिंदगी
भी शायद अपने मजे से जी रहे हैं. लेकिन वे पूंजीवाद की मायावी
दुनियां में अपने रिश्तों को ही भूल गए हैं. अपनी जिम्मेदारियों
को भूल गए हैं और भूल गए हैं अपने माता-पिता को.
‘भूख और शोक’, ‘रमुआ की थाली’ दो
जून की रोटी की खातिर तरसते वैसे लोगों की व्यथा है जो दूसरों को अपने गम पर भी हँसने
का मौका देते हैं. ‘शान्ति का शोक’ अभिव्यक्ति
है बदलते समय की, जो जीवन की एकरसता से त्रस्त होकर मनुष्य शांति
से अशांति की ओर और अशांति से शांति की ओर बार–बार आवागमन का
जद्दोजहद करता है. ‘शब्द और जीवन’, ‘टायर’,
‘कैलेंडर’, ‘भ्रम’, ‘बीहड़’,
‘तर्पण’ आदि कविताओं में कवि ने बिंब का बखूबी
इस्तेमाल किया है. जीवन के विभिन्न दर्द को पकड़ने के लिए जहां
कई बार शब्द भी अपना अर्थ खोजने लगते हैं. ‘अबकी मेले में देखा’,
‘उस पार’, ‘एक रात’, ‘सफर
में’ कविता पूंजीवाद की भेंट चढ़ चुकी जिन्दगी की एक सच्चाई है,
जहां दिखावे की छटपटाहट है, खुद से भागने की कोशिश
है. यांत्रिक जीवन–शैली में मनुष्यता,
सामाजिकता और रिश्तों की गर्माहट खो चुकी ठंडापन है तो ‘तू-तू, मैं मैं” में अहम प्रदर्शन करता जीवन का सौन्दर्य है. ‘तुम्हारा
शहर’ और ‘अपना शहर’ में कवि जीवन की समरसता और सामाजिकता को तलाशने की कोशिश करता है. वह असहजता महसूस करता है खुशहाली की कब्र पर पनप रहे खोखली अजनबीयत और यांत्रिकता
पर. क्षुधा शांति के लिए शिकार से शिकारी बनने की प्रक्रिया है
‘भूख’. ‘उन्मुक्त’ स्वतंत्रता
की अभिलाषा और भय का मिश्रित रूप है. ‘सड़ांध’ समाज में फैली अराजकता पर प्रहार है, जहां हर मामले को
दबाने की कोशिश होती है, लेकिन कभी सच जानने की कोशिश नहीं की
जाती है.
‘विकास के रास्ते’ चलकर प्रकृति पर विजय पाने की कोशिश
में विनाश के किनारे पहुंच चुकी है व्यवस्था. ‘सड़क पर
: कुछ दृश्य’ में कवि कहना चाहते हैं कि सत्ता
सम्पन्न लोग ही नियमों को हर जगह तार-तार करते हैं. दुर्बल में इतनी शक्ति कहां जो वह ऐसी हिमाकत कर सके?
‘प्रतिदान’ हमारी व्यवस्था पर चोट करती कविता है,
जहां श्रेष्ठ को कमतर की सेवा में प्रस्तुत कर उनकी प्रगति को ही बाधित
कर दिया जाता है. ‘नई पहचान’ व्यवस्था पर
ही चोट करती है जहां लाशों पर भी राजनीति की जाती है. मरने वाले
को भी पता नहीं होता कि उनकी लाशों की गिनती आतंकियों में होगी या आमजनों में?
‘स्कूल: एक दृश्य’ भी व्यवस्था
पर ही एक तंज है जहां आपस में बातचीत के क्रम में परिश्रम के महत्व को बखाना जा रहा
है जबकि वे लोग खुद अपने कर्तव्य से विमुख हैं.
‘अमरत्व’ परजीवी जिस तरह पौधों की वृद्धि-गति को रोक देते हैं, वैसे ही निजी हित के लिए परजीवी
इंसान भी अपने स्वार्थ में किसी की जिंदगी को बर्बाद कर देते हैं. ‘सेंसेक्स और मां’ शीर्षक काफी कुछ कहती है. एक तरफ बाजार है, धन की आवाजाही है तो दूसरी तरफ मां
की भावना है. रिश्ता है, लेकिन बाजार के
आगे मानवीय रिश्ता दम तोड़ते नजर आता है. ‘दुख की शुरुआत’
तो अलगाव से ही होती है लेकिन मनुष्य सोचता है कि बंटवारे के बाद सुखी
रहेंगे. विकास करेंगे. लेकिन वह भूल जाता
है कि विभाजन ही दुख की शुरुआत है. ‘हमारा हिस्सा’ खुद से अलगाव, टूटन से छलकते दर्द को बयां करता है.
‘वह मारा गया’ चोट है उस व्यवस्था पर जहां क्रांति
का बिगुल फूंकने वाले कई बार असमय शिकारियों के शिकार बन जाते हैं और गढ ली जाती है
विभिन्न प्रकार की कहानियां विभिन्न स्तरों पर. लिख दी जाती है
यश-अपयश की कथाएँ.
‘विकास का पहिया’ टिप्पणी है आधुनिकता के
रथ पर सवार पूंजीवाद पर, जहां विकास के पथ पर चलते हुए खेलते
हैं प्रकृति के नियमों से और भूल जाते हैं मूल्य उन प्रकृति के अनमोल अमूल्य तत्वों
को. और जब सबकुछ समाप्त होने लगता है तो उन्हें अनमोल अमूल्य
तत्वों के लिए मुंह मांगी कीमत चुकाने के लिए विवश कर दिया जाता है. ‘सिस्टम’ अस्पताल की बदहाली पर लिखी गई कविता है,
जहां लोग आते तो हैं बहुत ही उम्मीद से. अपनों
को फिर से जिन्दगी दिला पाने की उम्मीद में, लेकिन वहां मिलती
है केवल निराशा. और आंसुओं के सिवा कुछ भी हाथ नहीं लगता यही
सबसे बड़ा सरकारी व्यवस्था का सच है.
‘दाग अच्छे हैं’ एक टीवी विज्ञापन का पंच लाइन है जो कीचड़,
धूल को मनुष्यता और जीवन की वास्तविकता के रूप में रेखांकित करता है
लेकिन कवि ने इसे तंज के रूप में इंगित करने की कोशिश की है कि किस तरह भ्रष्टाचार
के गर्त में धंसे लोग नैतिकता के सारे पैमाने को तोड़कर जश्न मना रहे हैं. दागदार होना जैसे कलंक नहीं, गर्व का विषय हो.
‘जयकारा’ धर्म की आड़ में हिंसा को विविध रूप में
प्रोत्साहित किया जा रहा है. इस कविता में भी बिंब का बखूबी प्रयोग
किया गया है, जैसे सफेद कपोत शांति के लिए, तलवार हिंसा के लिए, काले में असत्य/ भ्रष्टाचार के लिए, सूरज सत्य के लिए और पाक साफ के लिए.
संग्रह की अंतिम कविता है ‘किसान’. इसमें भी कवि ने प्रकृतिवादी दृष्टिकोण अपनाया है. प्रकृति
को रौंदकर विकास की सड़क बनाई जा रही है. किसान बना इंसान मार्केटिंग
का गुर सीख गया है. वह लोगों को सपना दिखा-दिखाकर खेतिहर जमीन को बेचना सीख गया है. पूंजीवाद इस
कदर हावी है कि सस्ती चीजों के महंगे हो जाने का डर दिखाकर भी किसी तरह खेत से मुक्ति
पाना चाहता है.
नीलामघर
कविता संग्रह से गुजरने के बाद युवा आलोचक उमाशंकर सिंह परमार की बातों पर सहमति बनती
है कि “नरेंद्र कुमार की भाषा तनाव की भाषा
है. उनकी कविताओं में व्यक्ति द्वारा भोगी गई परिवेशगत यातनाओं
का यथार्थ अनुभव है. एक ऐसा अनुभव जो तनाव को जन्म देता है,
जिसमें बेचैनी है, आक्रोश है, कुछ-कुछ रीतिगत शिल्प की टूटन है. आदर्श के नजरिए से देखे जाने पर यहाँ मूल्यों की टूटन भी है. उदार लोकतंत्र में पूंजीवादी शक्तियां बहुत कुछ तोड़ रही हैं. कवि टूटन को सजग ढंग से देख रहा है, समझ रहा है और जिस
जमीन पर खड़ा है उस जमीन की धसकन से उपजा यथार्थ तनाव को जन्म दे रहा है.”
पुस्तक:- नीलामघर
कवि:- नरेन्द्र कुमार
पृष्ठ:- 80
मूल्य:- 120/-
प्रकाशन:-
द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन, गाजियाबाद
(उत्तर प्रदेश)
सम्पर्क:- 8210229414
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