बिहार की जनता उपलब्धि का भागीदार है या उपहास का? - यह अब पूर्ण रूप से विचारणीय हो गया है। कभी लोग आर्यभट्ट और पतंजलि के बहाने अपना पीठ थपथपाते नजर आते हैं तो कभी गांधीजी और जेपी के बहाने क्रांति के जनक के रूप में गौरवान्वित होते रहते हैं। कभी ज्ञान की भूमि बताकर गौतम बुद्ध और महावीर जैन के साथ साथ गुरू गोविन्द सिंह को जपते रहते हैं। बिहार का तो खैर नाम भी बौद्ध विहारों की ही वजह से है।
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| बुद्ध स्मृति पार्क |
अगर इतिहास इतना ही बुद्धिजीवियों से पटा है तो आधुनिक बिहार को बर्बाद किसने किया? लगभग 33 वर्षों से तो बिहार में लालूजी और नीतीशजी का ही एकछत्र राज रहा है। और दोनों के दोनों जेपी के अनुयायी हैं। छात्र आंदोलन की उपज हैं। पटना विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं। और सबसे बड़ी बात कि दोनों ही अवर्ण या जातिवाद की राजनीति करने में अव्वल हैं। बाबजूद इसके बिहार पिछड़ा है आखिर क्यों? आखिर बुद्धिजीवियों / विद्वानों की यह भूमि अंधविश्वासियों की भूमि क्यों और कैसे बन गई? कैसे कोई शहर में एक बाहरी आदमी आता है और लाखों लोग उनके आगे शरणागत हो जाते हैं?
यदि बिहार की सम्पूर्ण आबादी को आंकड़ों के नजरिए से देखने की कोशिश की जाय तो लगभग 75% आबादी 33 साल से कम उम्र की है। अर्थात बिहार की 75 प्रतिशत जनता का जन्म लालूजी और नीतीशजी के शासन काल में हुआ है। तब तो सवाल जायज है न कि इन दोनों महान राजनेताओं ने राज्य में कैसी शिक्षा व्यवस्था को लागू किया कि शिक्षित लोग भी अंधविश्वासी हो गए? जबकि जाति आधारित गणना के दौरान भी सरकार ने माना कि अब बिहार में निरक्षरों की संख्या नगण्य है।
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| पटना म्यूजियम |
इसमें राजनेताओं को दोषी माना जाय या जनता को? जो जातिवाद के नंगा नाच को देख समझ कर भी मजा ले रही है। आजादी के इतने वर्षों के बीत जाने, तकनीक के युग में भी पिछले इतिहास में उलझी हुई है? आखिर कैसे होगा बिहार का कल्याण?


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