नीतीश कुमार खुश हैं कि सलमान खुर्शीद ने उनकी वकालत कांग्रेस में करने की बात कही है। यदि किस्मत में लिखा होगा तो वे अगले प्रधानमंत्री भारत के बन भी सकते हैं। लेकिन आश्चर्य है कि उन्होंने इस महत्वकांक्षा की पूर्ति के जदयू का राजद में विलय का रास्ता क्यों चुना? वे सीधे -सीधे कांग्रेस में भी तो मर्ज कर सकते हैं पार्टी को! क्या सिर्फ कुर्सी की निरंतरता बनाए रखने के लिए यह रास्ता चुना? कांग्रेस ने एक बार पीवी नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री बनाया और दो बार मनमोहन सिंह को। लेकिन तब गांधी परिवार की स्थिति कुछ और थी। परंतु अब जब राहुल गांधी मिशन की तरह "भारत जोड़ो यात्रा" को पूर्ण कर चुके हैं। एक अलग पहचान बनाने में सफलता हासिल की है तब यहां से पीछे मुड़ने की उम्मीद है? यदि यह मौका चुक गये तो गांधी परिवार भविष्य में राहुल या प्रियंका के लिए कुछ सोच पाएंगे इसकी उम्मीद कम है। इस दृष्टिकोण से तो यह सहज नहीं लगता है कि कांग्रेस खुर्शीद की बात मानेगी। और नीतीश कुमार का व्यक्तित्व लालूजी जैसा तो कम से कम है नहीं जो केंद्र की सत्ता को हिलाने की ताकत रखते हों। और इस बात की उम्मीद कम ही है कि नीतीश कुमार महज एक मंत्रालय के लिए केंद्र की राजनीति में जाएं। हां, संभव है कि उप-प्रधानमंत्री की कुर्सी मिल जाय। या आगामी सत्र में उप-राष्ट्रपति या राष्ट्रपति की कुर्सी मिल जाय। या राज्यपाल की कुर्सी चाहें तो कभी भी मिल सकती है।
वैसे आने वाला वक्त बताएगा कि नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षा का अंत किस पद पर जाकर होगा और कब होगा एवं इसके लिए उन्हें कौन कौन सी कुर्बानी देनी होगी?
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