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गुरुवार, 10 अगस्त 2023

एक फिल्म जो हर भारतीय को देखनी चाहिए - ओह माय गॉड -2. :- अजित राय

 एक फिल्म जो हर भारतीय को देखनी चाहिए - ओह माय गॉड -2.  

अजित राय 



आंकड़े बताते हैं कि हममें से अधिकतर लोगों ने अपनी किशोरावस्था में हस्थमैथुन जरूर किया होगा और डा प्रकाश कोठारी सहित अनेक सेक्स वैज्ञानिकों का मानना है कि यह न तो कोई अपराध है न बीमारी वल्कि यह एक स्वाभाविक क्रिया है और वयस्क होने पर कई बार तो इसे स्वस्थ जीवन के लिए जरूरी भी माना गया है।  सेक्स शिक्षा के अभाव में मैंने खुद हस्तमैथुन के कारण महीनों डिप्रेशन के बाद पटना के नामी फिजिशियन डा शिव नारायण सिंह से परामर्श लिया था। दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग में मनोवैज्ञानिक के रूप में काम करते हुए स्कूलों में मेरे पास सैकड़ों किशोर छात्र अपनी इसी तरह की समस्या लेकर आते थे। 

अमित राय ने बड़े तार्किक और दिलचस्प सिनेमाई कौशल के साथ अपनी नई फिल्म ' ओह माय गॉड -2 ' में यह सवाल उठाया है कि हमारे स्कूली पाठ्यक्रम में सेक्स एजुकेशन जरूरी क्यों है? उज्जैन के महाकाल मंदिर का पुजारी और शिवभक्त कांति मुद्गल ( पंकज त्रिपाठी) जिला अदालत में अपने बच्चे का अभिभावक होने के नाते खुद पर, स्कूल पर और अज्ञानता फैलाने वाली सेक्स की दुकान चलाने वाले लोगों पर मुकदमा कर देता है। उसका बेटा दोस्तों के बहकावे में आकर हस्तमैथुन की आदत का शिकार हो जाता है। स्कूल के बाथरूम में हस्तमैथुन करने के कारण उसे स्कूल से निकाल दिया गया है और वह डिप्रेशन में आत्महत्या करने की कोशिश करता है। उसका पिता अपने बच्चे को बचाने और सामान्य बनाने की लाख कोशिश करता है पर कुछ नही होता। अपने भक्त का मार्गदर्शन करने, मदद करने साक्षात भगवान शिव ( अक्षय कुमार) आते हैं। सेंसर बोर्ड के दबाव में इस चरित्र को शिव के गण में बदल दिया गया है जिसके कहने पर वह कोर्ट में केस करता है।इंटरवल के बाद की पूरी फिल्म इस मुकदमे की सुनवाई पर आधारित है। आश्चर्य है कि इसे सेंसर बोर्ड ने ' ए ' ( वयस्क) सर्टिफिकेट और+ 18 रेटिंग क्यों दी जबकि पूरी फिल्म में न तो कोई सेक्स सीन है न अश्लील संवाद, कोई चुंबन आलिंगन तक नहीं है। भारत जैसे देशों के लिए यह इतनी जरूरी और शिक्षाप्रद फिल्म है कि इसे देशभर के स्कूल कालेजों में दिखाया जाना चाहिए। इस फिल्म में कहीं कोई उपदेश या बड़बोलापन या डायलॉग बाजी नहीं है। सबकुछ सिनेमाई व्याकरण में  और मनोरंजन की शैली में कहा गया है। यहां यह भी याद दिलाना जरूरी है कि इसी साल 76 वें कान फिल्म समारोह में मोली मैनिंग वाकर की ब्रिटिश फिल्म ' हाऊ टू हैव सेक्स ' को अन सर्टेन रिगार्ड खंड में बेस्ट फीचर फिल्म का पुरस्कार मिला था।

            अमित राय की फिल्म ' ओह माय गॉड -2' कल ( शुक्रवार 11 अगस्त) से सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है। जिन लोगों ने अमित राय की पिछली फिल्में ( रोड टु संगम, आई पाड) देखी है, उन्हें पता है कि वे एक जीनियस डायरेक्टर- राइटर हैं।भीड़ के दृश्यों से अपना फोकस निकाल लेने में उनकी मास्टरी है। सांसारिक जीवन में मनुष्य के आपसी रिश्तों के मेलोड्रामा और उसके तनावों का सिनेमाई व्याकरण उन्हें आता है जिसके अभाव में अधिकांश मुंबईया फिल्में पटरी से उतर जाती है। इस फिल्म की पटकथा भी उन्होंने ही लिखी है जो इतनी कसी हुई हैं कि दर्शकों को एक बार भी मोबाईल फोन देखने का मौका नहीं देती। 

दूसरी खास बात यह है कि अभिनेता जितनी बात संवाद बोलकर नहीं बताते उससे अधिक अपने हाव भाव से अभिव्यक्त करते हैं। दुनिया भर के लोगों को मुंबईया फिल्मों से शिकायत ही यहीं रहती है कि यहां अभिनेता लगातार बोलते ही रहते हैं और कैमरा नब्बे प्रतिशत केवल उनके चेहरे के क्लोज शाट लेने में लगा रहता है। अमित राय ने इन दोनों बातों से बचते हुए फिल्म में एक आकर्षक माहौल और लोकेल रचा है। उन्होंने अक्षय कुमार जैसे टाइप्ड अभिनेता से बहुत उम्दा काम करवा लिया है लेकिन यह फिल्म तो पंकज त्रिपाठी की है। उनका अभिनय दमदार तो हैं ही, बेमिसाल भी है। उनके चेहरे की मासूमियत और मौन की अभिव्यक्तियां कमाल की है।वे एक क्षण में जादू करना जानते हैं। ऐसे दिग्गज अभिनेता जब किसी सुपर स्टार के साथ काम करते हैं तो इसके कई खतरे होते हैं। पंकज त्रिपाठी ने उन सारे खतरों से खुद को बचाते हुए अक्षय कुमार के साथ अच्छी केमिस्ट्री बनाई है।                     अमित राय ने छोटी-छोटी भूमिकाओं भी अपने कलाकारों से उम्दा काम करवा लिया है चाहे उज्जैन के महाकाल मंदिर के पुजारी बने गोविन्द नामदेव हैं या डाक्टर बने बृजेन्द्र काला या केमिस्ट के रोल में पराग छापेकर हों या स्कूल के मालिक बने अरुण गोविल। चेहरे पर नकाब चढ़ाए वेश्या की भूमिका में आर्या शर्मा (लंदन के लेखक तेजेन्द्र शर्मा की बेटी) ने केवल आंखों के एक्सप्रेशन से कोर्ट में पूरी बात कह दी है। वे आमिर खान के साथ लाल सिंह चड्ढा में भी ऐसा ही उम्दा काम कर चुकी हैं।कल सनी देओल के साथ उनकी दूसरी फिल्म गदर 2 भी रिलीज हो रही है। सेशन जज की भूमिका पवन मल्होत्रा ने निभाई है जिन्होंने जगह जगह अपने इंप्रोवाइजेशन से पटकथा में अच्छा प्रभाव जोड़ा है। वकील की भूमिका में यामी गौतम है। इसके अलावे भी कई अभिनेता अपनी छोटी छोटी भूमिकाओं में जंचे है। संवादों में मालवा की भाषा का स्पर्श हैं जिससे हास्य और करूणा का रस सृजित होता है। 

'ओह माय गॉड -2 ' का पूरा माहौल हमारे गांवों कस्बों का है। उज्ज्यनी नगरी तो प्रतीक मात्र है।सेंसर बोर्ड के कुल चौबीस कट और अड़ियल रवैए के बावजूद फिल्म पर इसका कोई असर नहीं दिखाई देता और फिल्म अपनी बात कह जाती है। यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि यह वहीं सेंसर बोर्ड है जो ' आदिपुरुष को बिना रूके पास कर देता है और ओह माय गॉड को यूए के बदले ए ( वयस्क) और+18 साल रेटिंग सर्टिफिकेट देता है जबकि कई मुस्लिम देशों में फिल्म को केवल एक कट के साथ और+12 साल रेटिंग के साथ रिलीज किया जा रहा है।





अजीत राय के फेसबुक पेज से साभार 

रविवार, 28 मई 2023

सिर्फ़ एक बंदा काफ़ी है: प्रशांत विप्लवी

 सिर्फ़ एक बंदा काफ़ी है: प्रशांत विप्लवी 

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"सिर्फ़ एक बंदा काफ़ी है" की खूब चर्चा हो रही है। पत्रिकाओं , ब्लॉग्स और प्रसंशकों ने एक बार फिर मनोज वाजपेयी के अभिनय क्षमता की खूब तारीफ़ की है। मैं इस फ़िल्म पर कुछ और भी कहना चाहता हूँ। अपूर्व सिंह कार्की की यह पहली फीचर फ़िल्म है। अपूर्व सिंह कार्की ने चार टी वी सीरीज़ बनाएं हैं जिनमें aspirants ने अच्छी खासी चर्चा बटोरी है। 

इस फ़िल्म के बरक्स जॉली एलएलबी को रखकर देखिए क्योंकि यह भी एक कोर्ट रूम फ़िल्म है। जहां इस फ़िल्म में अरशद वारसी, वोमन ईरानी, सौरभ शुक्ला , संजय मिश्रा, मोहन अगासे , मनोज पहवा , बीजेन्द्र काला जैसे धुरंधर कलाकारोंने अपने अभिनय से एक जादू भर दिया है वहीं अकेले मनोज वाजपेयी ने "सिर्फ़ एक  बंदा काफ़ी है" के टाइटल को जस्टीफाइ कर दिया है। मनोज के अलीगढ़ को देखने के बाद अभी कुछ वर्ष और इंतज़ार करना पड़ेगा जिससे अलीगढ़ के उस  अभूतपूर्व अभिनय के ज़द से बाहर निकला जा सके। लेकिन यह फ़िल्म एक सच्ची घटना और हाई प्रोफाइल केस पर आधारित है इसलिए फ़िल्म मेकिंग के लिहाज़ से दृश्य, भूमिका और घटनाक्रम जॉली एलएलबी से बदल जाते हैं। भारतीय सिनेमा में मनोज वाजपेयी एक हीरा हैं। उनकी चमक बिलकुल अलग दिख जाती है , ख़ासकर ऐसी गंभीर फिल्मों के किरदार को तो वे इतना जीवंत कर देते हैं कि फ़िल्म खत्म होने के बाद तंद्रा टूटती है कि मनोज महज़ एक किरदार थे। इस फ़िल्म में भी सिर्फ़ मनोज थे। और मनोज के चारो ओर जितने भी क़िरदार थे वे अपनी क्षमता से मनोज को और भी प्रॉमिनेंट कर रहे थे। 

यहां गौर करने की बात यह है कि फ़िल्म जिस बाबा के ऊपर बनी है, वे कोई साधारण बाबा नहीं थे। उनके अधिकांश अनुयायियों का अब भी मोहभंग नहीं हुआ है। यह एक समझदार फिल्मकार की सोच है कि बाबा को फ़िल्म का कैमरा जितना कम फेस करवाना पड़े। पूरी फ़िल्म में बाबा सांकेतिक रूप से अपनी उपस्थिति और वर्चस्व का एहसास दिलाते रहे लेकिन बाबा का ना तो इंटेरोगेशन दिखाया गया और ना ही बाबा से कोई ज़िरह हुई। बाबा नॉट गिल्टी के अलावा कोर्ट के सम्मुख या पुलिस के सम्मुख कुछ नहीं बोले। आजकल 3 को 32000 दिखाने की जो राजनैतिक प्रवृति निर्देशकों में पनपी है उनके लिए इस युवा फ़िल्मकार ने चुनौती पेश की है। बाबा के कई कारनामों से सिर्फ़ एक कारनामा उठाकर एक मुकम्मल फ़िल्म बना देना इस फ़िल्मकार की काबिलियत है। प्रतिगामी सोच के फ़िल्मकारों को सिनेमा हॉल की फिल्में मिलती हैं, टैक्स फ्री भी होता है और केंद्र से लेकर राज्य की सरकारें प्रॉपगंडा फ़िल्मों के प्रचार-प्रसार में भिड़ जाते हैं जबकि एक सच्ची घटना पर अपनी बात मज़बूती से रखकर भी ओ टी टी प्लेटफॉर्म का सहारा लेना पड़ता है। फ़िल्म और डाक्यूमेंट्री के लिए इन अनुसंगिक माध्यमों ने बड़ा प्लेटफॉर्म तैयार किया है। इस फ़िल्म के बजट के बारे में मुझे नहीं पता लेकिन उनकी कास्टिंग बहुत बढ़िया है। फ़िल्म में ऐसा कुछ भी नहीं था जिसके विषय में हमें पता नहीं है। इसे हमने पाँच साल तक टी वी और अखबार के जरिये खूब देखा और पढ़ा है। जिसकी जानकारी हमें नहीं थी वो थी कोर्ट सेशन के दौरान की बहस। लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि असली के कोर्ट रूम में ऐसे नाटकीय अंदाज में ही बहस हुई होगी। 

बाबा की पैरवी में जिन हाई प्रोफाइल वकीलों को बहस करते हुए दिखाया गया है उसकी झलक हमने वोमन ईरानी के रूप में देख चुके हैं। उनसे बेहतर इस तेवर को दिखा पाना मुमकिन भी नहीं था। कुछ पत्रिकाओं में मनोज की तारीफ़ करते हुए उन्हें एक मामूली वकील बताया है क्योंकि भारतीय समाज का मनोविज्ञान यही है कि जीतने वालों को हारने वालों के मुकाबले इतना छोटा दिखा दो कि यह एक असंभव लगने वाला जादू लगे। दरअसल ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के प्रति हमारा यह  दया भाव ही कई बार हमारी ही इच्छाशक्ति को नष्ट करता है। वकील की डिग्री एक ही होती है। जिन्हें हम महिमा मंडित करते हुए हाई प्रोफाइल वकील कहते हैं वे दरअसल बड़े अपराधियों को मुक्ति दिलाने का काम करते हैं। ऐसे वकीलों की भर्त्सना अगर लिखने वाले नहीं करेंगे तो भला कौन करेंगे। खैर , इस फ़िल्म ने जिस तरह से सबकुछ बचाकर न्याय मिल जाने की कहानी को दिखाया है उस पर सवाल भी उठता है। सिर्फ़ बाबा के गुंडों के द्वारा ही अड़चन डालने के दृश्यों को दिखाया गया है। उनके द्वारा गवाहों की हत्याएं दिखाई गई हैं लेकिन एक पीड़िता को समाज और सिस्टम से जो लड़ाई करनी पड़ती है , उसका फ़िल्म में अभाव है। एक रेप विक्टिम नाबालिग लड़की की मनोदशा को अद्रिजा सिन्हा ने जीवंत कर दिया है। कुछ दृश्य बहुत विचलित करते हैं। बाबा के प्रति घृणा तो पनपती है लेकिन घिन पैदा करने से बचा ले जाते हैं फ़िल्मकार। सिनेमा आपकी संवेदना और विवेक को भी नापती है और यही एक संवेदनशील फ़िल्मकार का काम है। नफ़रत फैलाने वाले फ़िल्मकारों के लिए यह फ़िल्म एक सीख की तरह है। 

अंत इस बात से करना चाहता हूँ कि अच्छी फिल्में समाज को धीरे-धीरे बदल सकती है लेकिन बुरी और नफ़रत के लिए बनाई गई फ़िल्मों का असर समाज पर तुरंत होता है। इसलिए अच्छी फ़िल्मों को तरज़ीह मिले इसी बाबत इसकी खूब चर्चा होनी चाहिए। अगर आप फ़िल्मों पर नहीं भी लिखते हैं तब भी ऐसी फ़िल्मों पर अवश्य लिखें, यह एक गंभीर सिनेमा प्रेमी का दायित्व है।

प्रशांत विप्लवी