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बुधवार, 17 मई 2023

लालूजी और नीतीशजी के राज में फंसीं बिहार की जनता: - सुशील कुमार भारद्वाज

 बिहार की जनता उपलब्धि का भागीदार है या उपहास का? - यह अब पूर्ण रूप से विचारणीय हो गया है। कभी लोग आर्यभट्ट और पतंजलि के बहाने अपना पीठ थपथपाते नजर आते हैं तो कभी गांधीजी और जेपी के बहाने क्रांति के जनक के रूप में गौरवान्वित होते रहते हैं। कभी ज्ञान की भूमि बताकर गौतम बुद्ध और महावीर जैन के साथ साथ गुरू गोविन्द सिंह को जपते रहते हैं। बिहार का तो खैर नाम भी बौद्ध विहारों की ही वजह से है।

बुद्ध स्मृति पार्क 


अगर इतिहास इतना ही बुद्धिजीवियों से पटा है तो आधुनिक बिहार को बर्बाद किसने किया? लगभग 33 वर्षों से तो बिहार में लालूजी और नीतीशजी का ही एकछत्र राज रहा है। और दोनों के दोनों जेपी के अनुयायी हैं। छात्र आंदोलन की उपज हैं। पटना विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं। और सबसे बड़ी बात कि दोनों ही अवर्ण या जातिवाद की राजनीति करने में अव्वल हैं। बाबजूद इसके बिहार पिछड़ा है आखिर क्यों? आखिर बुद्धिजीवियों / विद्वानों की यह भूमि अंधविश्वासियों की भूमि क्यों और कैसे बन गई? कैसे कोई शहर में एक बाहरी आदमी आता है और लाखों लोग उनके आगे शरणागत हो जाते हैं?

यदि बिहार की सम्पूर्ण आबादी को आंकड़ों के नजरिए से देखने की कोशिश की जाय तो लगभग 75% आबादी 33 साल से कम उम्र की है। अर्थात बिहार की 75 प्रतिशत जनता का जन्म लालूजी और नीतीशजी के शासन काल में हुआ है। तब तो सवाल जायज है न कि इन दोनों महान राजनेताओं ने राज्य में कैसी शिक्षा व्यवस्था को लागू किया कि शिक्षित लोग भी अंधविश्वासी हो गए? जबकि जाति आधारित गणना के दौरान भी सरकार ने माना कि अब बिहार में निरक्षरों की संख्या नगण्य है।

पटना म्यूजियम 


इसमें राजनेताओं को दोषी माना जाय या जनता को? जो जातिवाद के नंगा नाच को देख समझ कर भी मजा ले रही है। आजादी के इतने वर्षों के बीत जाने, तकनीक के युग में भी पिछले इतिहास में उलझी हुई है? आखिर कैसे होगा बिहार का कल्याण?

रविवार, 19 फ़रवरी 2023

नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षा

 




नीतीश कुमार खुश हैं कि सलमान खुर्शीद ने उनकी वकालत कांग्रेस में करने की बात कही है। यदि किस्मत में लिखा होगा तो वे अगले प्रधानमंत्री भारत के बन भी सकते हैं। लेकिन आश्चर्य है कि उन्होंने इस महत्वकांक्षा की पूर्ति के जदयू का राजद में विलय का रास्ता क्यों चुना? वे सीधे -सीधे कांग्रेस में भी तो मर्ज कर सकते हैं पार्टी को! क्या सिर्फ कुर्सी की निरंतरता बनाए रखने के लिए यह रास्ता चुना? कांग्रेस ने एक बार पीवी नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री बनाया और दो बार मनमोहन सिंह को। लेकिन तब गांधी परिवार की स्थिति कुछ और थी। परंतु अब जब राहुल गांधी मिशन की तरह "भारत जोड़ो यात्रा" को पूर्ण कर चुके हैं। एक अलग पहचान बनाने में सफलता हासिल की  है तब यहां से पीछे मुड़ने की उम्मीद है? यदि यह मौका चुक गये तो गांधी परिवार भविष्य में राहुल या प्रियंका के लिए कुछ सोच पाएंगे इसकी उम्मीद कम है। इस दृष्टिकोण से तो यह सहज नहीं लगता है कि कांग्रेस खुर्शीद की बात मानेगी।  और नीतीश कुमार का व्यक्तित्व लालूजी जैसा तो कम से कम है नहीं जो केंद्र की सत्ता को हिलाने की ताकत रखते हों। और इस बात की उम्मीद कम ही है कि नीतीश कुमार महज एक मंत्रालय के लिए केंद्र की राजनीति में जाएं। हां, संभव है कि उप-प्रधानमंत्री की कुर्सी मिल जाय। या आगामी सत्र में उप-राष्ट्रपति या राष्ट्रपति की कुर्सी मिल जाय। या राज्यपाल की कुर्सी चाहें तो कभी भी मिल सकती है।


वैसे आने वाला वक्त बताएगा कि नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षा का अंत किस पद पर जाकर होगा और कब होगा एवं इसके लिए उन्हें कौन कौन सी कुर्बानी देनी होगी?


#बिहार_की_राजनीति #बिहार

मंगलवार, 24 जनवरी 2023

जननायक का जन्मदिन: प्रेमकुमार मणि

 जननायक का जन्मदिन 


प्रेमकुमार मणि 



बिहार में 24 जनवरी की तारीख राजनीतिक गलियारों में खूब चहल -पहल वाली होती है। यह दिन बिहार के समाजवादी नेता दिवंगत कर्पूरी ठाकुर ( 1924 - 1988 ) का जन्मदिन है।  वह समाजवादी पार्टी और विचारों  के नेता थे, और जब थे, तब वर्चस्वप्राप्त सामंती सामाजिक समूहों के आँखों की किरकिरी बने होते थे।  किन्तु कुछ तो है कि उनका जन्मदिन एकाध छोड़ लगभग  सभी दलों के नेता किसी न किसी रूप में मनाते हैं।  भारतीय जनता पार्टी तक के लोग भी,  जिनका सामान्यतया उनसे आजीवन विरोध रहा।  1979 में उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए जनता पार्टी के जनसंघी धड़े (भाजपा का पूर्व रूप ) और कांग्रेस में एकता हो गई थी। लेकिन आज इन दोनों पार्टियों के नेता भी उनका वंदन -अभिनंदन करते हैं। 


कर्पूरी ठाकुर अनेक मामलों में अजूबे थे। उनका जन्म सामाजिक रूप से एक अत्यंत पिछड़े परिवार में हुआ था। पिता गोकुल ठाकुर पारम्परिक जाति- व्यवस्था में नाई थे, जिनका पेशा हजामत बनाना और बड़े लोगों की सेवा करना होता था।  ऐसे ही परिवार में 1920 के दशक में उनका जन्म हुआ।  वह जमाना राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन का था।  समाज करवट ले रहा था। शायद करवट का ही असर था कि उन्हें स्कूल जाना नसीब हुआ था।  कहते हैं जब उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की, तब उनके पिता उन्हें साथ ले कर गाँव के  एक सामंत के घर गए। बेटे की सफलता से उल्लसित पिता ने  बतलाया  कि बेटा मैट्रिक पास कर गया है और आगे पढ़ना चाहता है। सामंत अपने दालान पर लकड़ी के कुंदे की तरह लेटा हुआ था। हिला और किशोर कर्पूरी को एक नजर देखा। बोला - ' अच्छा तूने मैट्रिक पास किया है ? आओ मेरे पैर दबाओ।'  यह  बिहार का सामंतवादी समाज था, जो जातिवाद के दलदल में भी बुरी तरह धंसा था।  हजार तरह की रूढ़ियाँ और उतने ही तरह के पाखंड। शोषण का अंतहीन सिलसिला। 


ऐसे ही समाज में कर्पूरी ठाकुर ने आँखें खोली।  वह उस बिहार से थे, जहाँ 1930 के दशक में जयप्रकाश नारायण की पहल पर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी बनी थी,  जहाँ  स्वामी सहजानंद ने  किसान आंदोलन को खड़ा किया था। कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हो गया था।  त्रिवेणी सभा के नेतृत्व में पिछड़े किसानों, मजदूरों, दस्तकारों ने सामाजिक परिवर्तन की नई मुहिम शुरू की थी।  कर्पूरी ठाकुर चुपचाप समाजवादी आंदोलन और पार्टी से जुड़े और जल्दी ही उनके बीच अपनी पहचान बना ली। 1952 में जब पहला आमचुनाव हुआ, तब वह समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ कर बिहार विधानसभा में पहुंचे। उसके बाद वह लगातार धारासभाओं में बने रहे।  बिहार के एक बार उपमुख्यमंत्री और दो बार मुख्यमंत्री बने। जब सरकार से बाहर रहे तब प्रतिपक्ष के पर्याय बने रहे। 


लेकिन क्या यही उनकी विशेषता है, जिनके लिए आज उनकी चर्चा होती है ? शायद नहीं।  सच्चाई यह है कि वह सरकार में बहुत कम समय के लिए रहे।पहली दफा 22  दिसम्बर 1970  से 30  जून 1971  तक और दूसरी दफा 24 जून 1977 से 30 जून 1979 तक।  दोनों बार मिला कर उनका कार्यकाल ढाई साल का होता है।  इसके अलावे 1967_68 में दस महीनों के लिए उपमुख्यमंत्री भी रहे। यही उनके हुकूमत की अवधि थी।  इस अल्पकाल में ही बिहार के सामाजिक -राजनीतिक जीवन को उन्होंने जिस तरह प्रभावित किया उसकी चर्चा आज तक होती है।


बिहार में केवल एक बार शिक्षा का लोकतंत्रीकरण हुआ और वह कर्पूरी ठाकुर  ने किया।  पढाई में अंग्रेजी की अनिवार्यता को ख़त्म कर के उसे किसान मजदूरों के बच्चों के लिए सुगम बना दिया, जो अंग्रेजी के कारण अटक जाते थे और जिनकी पढाई बाधित  हो जाती थी।  जिंदगी भर नॉन मैट्रिक बने रहने की पीड़ा वह झेलते रहते थे।  अंग्रेजी के बिना भी बहुत अंशों तक पढाई की जा सकती है।  इसे उन्होंने  रेखांकित किया। दलित -पिछड़े तबकों और स्त्रियों  में इससे शिक्षा में आकर्षण बढ़ा। उनका दूसरा काम स्कूलों में टूशन फीस को समाप्त करना था। इससे स्कूलों में बच्चों का ड्रॉपआउट कमजोर हुआ।  शिक्षा सुधार का  यह एक क्रांतिकारी कदम था। 1977 में उन्होंने मुंगेरीलाल आयोग की सिफारिशों को स्वीकार कर सरकारी नौकरियों में पिछड़े तबकों के लिए छब्बीस फीसद आरक्षण सुनिश्चित किया। कार्यपालिका के जनतंत्रीकरण का उत्तर भारत में यह पहला प्रयास था। इसके साथ सभी स्तरों पर भूमिसुधार कानूनों को लागू कर बिहारी समाज के सामंतवादी ढाँचे की चूलें हिला दी।  इन सब के लिए बिहार के सामंतों ने कर्पूरी ठाकुर को कभी मुआफ नहीं किया। सामंती ताकतों से तिरस्कार और विरोध का जो तेवर कर्पूरी ठाकुर को झेलना पड़ा, वैसा किसी कम्युनिस्ट नेता को भी नसीब नहीं हुआ।  1980 के आरम्भ में मध्य बिहार के ग्रामीण इलाके  जब नक्सलवाद से प्रभावित हुए तब सामंतों ने पटना जिले के बिक्रम में एक सशस्त्र जुलूस निकाला; जिसमें मुख्य नारा था - ' नक्सलवाद कहाँ से आई, कर्पूरी की माई बिआई .' सामंतों का आकलन बहुत हद तक सही था।  गरीबों को उठ कर अपनी आवाज बुलंद करने का साहस कर्पूरी ठाकुर ने ही दिया था।  वही उनके टारगेट थे।


      बावजूद इन सब के  उन्होंने कभी किसी से बैर भाव नहीं पाला। वह जो कर रहे थे, न्याय के लिए कर रहे थे, नफरत फ़ैलाने के लिए नहीं।  एकबार उनके मुख्यमंत्री रहते सामंतों ने उनके पिता की पिटाई की।  कलक्टर ने पिटाई करने वालों के खिलाफ कड़ा रुख लिया। कर्पूरी ठाकुर ने कलक्टर को उन्हें यह कहते  हुए छोड़ देने के लिए कहा कि मेरे पिता की तरह बहुत से गरीबों की रोज पिटाई हो रही है।  जब सब की पिटाई बंद हो जाएगी मेरे पिता की भी  पिटाई नहीं होगी।  समस्या के व्यक्तिगत नहीं, सामाजिक निदान में उनका विश्वास था। इसलिए कि वह सच्चे समाजवादी थे। उनमें जिम्मेदारी का बोध और संवेदनशीलता अद्भुत थी। उनके मुख्यमंत्री रहते पुलिस थाने में एक सफाई मजदूर ठकैता डोम की पिटाई से मौत हो गई। कर्पूरी ठाकुर ने खुद पूरे मामले की तहकीकात की। ठकैता डोम को उन्होंने अपना बेटा कहा। उसे स्वयं मुखाग्नि दी। ऐसा ही उन्होंने भोजपुर के पियनिया में किया, जब एक गरीब की दो बेटियों रामवती और कुमुद के साथ बड़े लोगों ने बलात्कार किया। घटनास्थल पर जाकर बलात्कार का शिकार हुई लड़कियों को उन्होंने बेटी कहा और उनकी देखभाल की व्यवस्था की। ऐसे मामलों में कभी-कभार पुलिस बाद में जाती थी, कर्पूरी जी पहले जाते थे।  गरीबों से उन्होंने खुद को आत्मसात कर लिया था।सादगी और ईमानदारी का जो आदर्श उन्होंने रखा, वह किंवदंती बन चुकी है। 


जिस मात्रा में उन्हें बड़े लोगों का तिरस्कार मिला, उसी मात्रा में उन्हें दलित -पिछड़े समाज का प्यार भी मिला। गरीब -गुरबे अच्छी तरह समझते थे कि कर्पूरीठाकुर को इतनी जिल्लत आखिर किसके लिए झेलनी पड़ रही हैं। उनका अपने लिए कोई स्वार्थ नहीं था। पूरे जीवन विधायक -सांसद, मुख्यमंत्री जैसे पदों पर बने रह कर भी उन्होंने कहीं अपना ठिकाना नहीं बनाया।  तमिलनाडु के नेता कामराज जब मरे थे, तब उनके संदूक से दो जोड़ी कपडे और सौ रूपए मिले थे। लगभग यही स्थिति कर्पूरी जी की थी। जैसे आए थे, वैसे ही गए।  यही कारण है कि जैसे -जैसे समय बीत रहा है और लोग तरह -तरह के राजनेताओं को देख रहे हैं, कर्पूरी ठाकुर एक बड़े हीरो की तरह उभर रहे हैं। वंचित तबकों को राजनीतिक धारा से जोड़ने के लिए उन्होंने अपना जीवन न्योछावर कर दिया था।  इसी तबके ने उन्हें जननायक कहा। वह सच्चे मायने में जननायक थे।

रविवार, 8 जनवरी 2023

जाति आधारित जनगणना की मुसीबतें : प्रेमकुमार मणि

 जाति आधारित जनगणना की मुसीबतें 


प्रेमकुमार मणि 


बिहार में जातिवार जनगणना की प्रक्रिया आज से आरम्भ हो गई है और जिस तरह से इसका प्रचार किया जा रहा है, उससे मैं बेहद क्षुब्ध हूँ। राजद और जदयू इसे इस तरह रख रहा है, मानो यह कोई उपलब्धि हो। इस विषय पर मैं पहले से कहता रहा हूँ कि जाति आधारित वर्ग के आधार पर चूकि कई तरह के आरक्षण और सुविधाएं मुहैय्या की जा रही हैं, इसलिए सरकार को इसकी जानकारी रखनी चाहिए। इस आधार पर जनगणना को मैं आवश्यक भी मानता हूँ। लेकिन यह भी मानता हूँ कि यह अत्यंत गोपनीय स्तर पर हो। डाक्टर बीमार व्यक्ति का परीक्षण करवाता है,लेकिन उसकी रिपोर्ट को गोपनीय मानता है। वह डाक्टर के समझने केलिए है, न कि प्रचार केलिए। लेकिन बिहार सरकार उसका प्रचार कर रही है, मानो यह उसकी कोई कार्य- योजना और उपलब्धि  हो। 


जाति को लेकर समाज और राजनीति में लम्बे समय से अध्ययन चल रहा है। दुनिया भर में हर देश - समाज की कुछ खास तौर की बुनावट होती है। उसका अध्ययन अपेक्षित होता  है। भारत में जाति और इसकी प्रथा-परिपाटी को लेकर लम्बे समय से अध्ययन- चिंतन चल रहा है। एक दौर था, जब गांधी जैसे व्यक्ति की इस विषय पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर से भिड़ंत हुई और गांधी ने इसे विश्व संस्कृति को भारत की अनुपम भेंट के रूप में चिह्नित किया। रवीन्द्रनाथ का कहना था कि इसी जातिप्रथा के कारण भारत गुलाम हुआ है और आधुनिक समाज में इसका वजूद नहीं होना चाहिए। जब आम्बेडकर ने इसे लेकर नया विमर्श खड़ा किया और अपने ' अनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट ' शीर्षक वृहद् आलेख में इसकी धज्जियाँ उड़ाईं, तब गांधी इस विषय पर सतर्क हुए। जाति का जोर जन्म पर होता है और एक खास अवस्था में आकर यह वर्ण  पर टिक जाता है। वर्ण अर्थात् रंग। जब जोर रंग अथवा नस्ल पर होता है तब वह वर्ण बनने लगता है। जाति बुनियादी चीज है,जो पेशेगत समूह के रूप में एक जड़ वर्ग का रूप ले लेता है। वर्ण एक व्यवस्था है, जो समाज विकास के एक खास चरण में कुछ लोगों द्वारा गढ़ा गया और जिसे सामाजिक स्मृतिकारों में से एक मनु ने संहिताबद्ध किया। मनु की खासियत या कमजोरी यह थी कि उसने पेशा चुनने का अधिकार व्यक्ति की जगह समाज को दिया और अनुलोम तथा प्रतिलोम विवाहों से उत्पन्न कथित वर्णसंकर समूहों को इस आधार पर विभाजित किया कि पुरुष और ब्राह्मण वर्चस्व को बल मिले। इससे भारतीय समाज में एक रूढ़ि  विकसित हुई, गतिहीननता आई। स्वाभाविक सामाजिक गतिशीलता के लिए आवश्यक होता है कि जाति और वर्ण की कड़ियाँ कमजोर हों। व्यक्ति जब पेशा बदलना चाहे तब उस पर सामाजिक दबाव नहीं हो। एक ही पेशे में जमे रहने से ऊब और गतिहीनता की संभावना अधिक हो जाती है। मनु ने उसे अधिक स्थिर करने की कोशिश की और पाबंदी लगाईं। हालांकि यह केवल मनु की परिकल्पना नहीं रही होगी। समाज पर प्रभावशाली रहे लोगों की समवेत चाहना रही होगी। मनु ने तो इसे संहिताबद्ध किया था। इससे भारतीय समाज में कुछ  जातियों का वर्चस्व मजबूत हुआ और एक सामाजिक साम्राज्यवाद की स्थिति विकसित हुई। इसे ही ब्राह्मणवाद कहा जाता है; क्योंकि मनु की संहिता से ब्राह्मणों की स्थिति समाज में मजबूत हुई थी। आज से पचास साल पहले मैंने ' मनुस्मृति : एक प्रतिक्रिया ' पुस्तक लिखते हुए इस पाखण्ड को समझने की कोशिश की थी। 


ब्रिटिश काल में जनगणना जातिआधारित होती थी। और इसके मूल में सांप्रदायिक जनगणना थी। इससे समाज अध्ययन के क्षेत्र में कुछ आंकड़े मिले, लेकिन कुछ मुश्किलें भी आईं। आख़िरी जाति आधारित जनगणना 1931 में हुई। आज़ाद भारत में राष्ट्रनिर्माण के उद्देश्य से इसे स्थगित किया गया। मोटे तौर पर अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य पिछड़ी जातियों को तीन अलग -अलग समूहों में रखा गया और उन्हें वर्ग रूप में अभिहित किया गया। अनुसूचित जातियों का एक वर्ग है। पिछड़ी जातियों का एक वर्ग है -- अन्य पिछड़ा वर्ग। कोशिश यह थी कि सदियों से चले आ रहे जाति आधारित सामाजिक वर्चस्व को ध्वस्त करते हुए एक आधुनिक समाज की रचना हो। एक व्यक्ति एक वोट के अधिकार के फलस्वरूप विधायिका  में तो सभी तबकों की भागीदारी धीरे -धीरे दिखने लगी, किन्तु कार्यपालिका और न्यायपालिका में खास तबकों का वर्चस्व बना रहा। अन्य पिछड़े वर्गों की भागीदारी अफसोसजनक रही थी। इसके लिए ही विशेष अवसर के सिद्धांत के तहत एक समय सीमा तक केलिए आरक्षण की व्यवस्था की गई थी। यह व्यवस्था उद्देश्य पूरा होने तक चलनी ही चाहिए।


लेकिन हमारी मंजिल एक ऐसा जातिविहीन समाज ही है, जिसमें व्यक्ति की गरिमा हो, उसके समूह या जाति की नहीं। यह जाति प्रथा हमारे आधुनिक लोकतान्त्रिक समाज की भावना के विरुद्ध है,अतएव इसे हमें हर हाल में यथाशीघ्र ध्वस्त करना है। उत्पादन के नए संसाधन और पूंजीवादी मान्यताएं जातिप्रथा को ध्वस्त करती हैं ,क्योंकि पारम्परिक पेशों को किसी जाति तक सीमित करने से ये इंकार करती हैं।  पूंजीवादी समाज के  समाजवादी रुझान लेने के पूर्व ही जातिप्रथा निर्मूल हो जाता है। हमारे समाज का सम्यक विकास नहीं हुआ। कायदे से पूंजीवादी समाज भी नहीं बना। लेकिन अधकचरे विकास ने भी जातिप्रथा की जड़ें हिला दी हैं। हमें यह स्वीकार करना होगा कि बहुत हद तक जाति के आधार कमजोर हुए हैं। जातियों के अंतर्गत उपजातियों की व्यवस्था लगभग पूरी तरह ध्वस्त हो गई है। आज से बस सौ साल पहले के समाज को देखें तो हर जाति के भीतर एक आंतरिक वर्णविभाजन था। उदाहरण केलिए  कायस्थ एक जाति है तो श्रीवास्तव कायस्थों का ब्राह्मण था और कर्ण शूद्र। कूर्मियों के बीच अवधिया ब्राह्मण था, तो धानुक शूद्र। हर जाति में ऐसी व्यवस्था थी। आज नहीं है। उसी तरह आज की दिख रही जातिप्रथा भी अन्ततः ध्वस्त होगी।  शिक्षा का विस्तार, रोजगार के नए संसाधन और औरतों की आज़ादी जैसे -जैसे बढ़ेगी जातिप्रथा कमजोर होती जाएगी। उत्पादन के पुराने तरीके बदल रहे हैं, गाँवों का तेजी से शहरीकरण हो रहा है, लड़कियों को रोजगार के अवसर उपलब्ध हो रहे हैं। ये सब जातिप्रथा को ध्वस्त करने के कारक होंगे। समाजवादी चिंतक राममनोहर लोहिया का एक लेख है ' जाति और योनि के दो कठघरे '। इसे तो उन समाजवादियों को पढ़ लेना था,जो समाजवाद की अधिक दुहाई दे रहे हैं । लेकिन वैज्ञानिक समाजवाद की जगह जातिवादी -समाजवाद स्थापित करने की इस मुहीम पर अफ़सोस ही व्यक्त किया जा सकता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। दिमाग से खाली लोग जब हुक्मरान बनते हैं ,तब ऐसा ही होता है।


जातिप्रथा कमजोर हो रही है। इसे जांचने का एक तरीका बताता हूँ। साल भर तक आए विवाह के आमंत्रण पत्रों को इकठ्ठा कीजिए। फिर उनमें चिह्नित कीजिए कि कितने जातिमुक्त विवाह हैं।पांच वर्षों तक यह कीजिए। आप को पता चलेगा कि किस रफ़्तार से  जातिमुक्त विवाह हो रहे हैं। गांव कस्बों तक प्रचलन तेजी पर है। सामान्य जातियों के लोग, जो  स्वयं को ऊँची जाति मानते आए हैं आपस में घुलमिल कर, धीरे -धीरे अब अपर कास्ट बन रहे हैं। दलितों का अलग समूह बन रहा है। अन्य पिछड़े वर्गों का अलग। एक ऐसा दिन भी आएगा जब ये बड़े ढूहे भी ध्वस्त होंगे। विवाहों में अनेक व्यवधान समाप्त हो रहे हैं।उनके तरीके बदल रहे हैं। यदि हमने समान शिक्षा, समान स्वास्थ्य और रोजगार की पुख्ता व्यवस्था की ,तो एक ऐसा  समय आएगा जब जातिव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। 


लेकिन सरकार जो यह नाटक कर रही है, वह न केवल मूर्खतापूर्ण है, बल्कि शरारतपूर्ण भी है। आजकल समाज में एक नया जाति -व्याकुल समाज उभरा है। वह हर जाति का सबसे निकृष्ट तबका है। राजनीति से लेकर समाज के विभिन्न स्तरों पर ये जातिप्रथा को जीवित रखना चाहते हैं। क्योंकि इसी के आधार पर उनकी पूछ संभव है। ऐसे लोग जातिवार जनगणना से अतिरिक्त रूप से उत्साहित हैं। कुछ अधिक संख्या वाली जातियों के शातिर नेताओं को भरोसा है कि जब जाति जनगणना की रिपोर्ट आ जाएगी तब इसे बैनर बना कर कम संख्या वाली जातियों पर रौब जमाएंगे कि हमारी राजनीतिक गुलामी अथवा अधीनता स्वीकार करो। यही कारण है कि वे इसका बिगुल बजा रहे हैं।  

 मेरा आग्रह होगा कि प्रबुद्ध जन इस पर विचार करें और इस दकियानूसी राजनीति के मर्म को समझें। समान शिक्षा, स्वास्थ्य तथा रोजगार गारंटी के मांग को अपनी राजनीति का केन्द्रक बनावें, तभी नया समाज बनेगा। इस जाति आधारित जनगणना से ध्वस्त हो रही जातिप्रथा को केवल बल मिलेगा।



फेसबुक वॉल से साभार।