गुरुवार, 30 जून 2016

सुशील सिद्धार्थ का व्यंग्य "बीमारी, तीमारदारी,दुनियादारी का दर्शन"

आदमी तीमारदारी से तब तौबा करता है जब तीमारदारी खुद एक बीमारी बन जाती है।आदमी दुनियादार है तो बीमारी का आनंद और ज़्यादा।तीन चीज़ें आपके सुकून को जुनून में बदल  सकती हैं, बीमारी तीमारदारी दुनियादारी।दुनिया वालों का प्यार सबसे ज़्यादा तब उमड़ता है जब आप बिस्तर की चौहद्दी में सीमित हों।तब देखिए लोगों का सामान्य ज्ञान, मेडिकल साइंस पर उनकी पकड़,हरिओम से लेकर अनुलोम विलोम तक उनकी पहुँच, भांति भांति की पैथियों पर उनके शोध प्रबंध, संयम और परहेज पर उनका आध्यात्मिक अनुसंधान।जो साधारण सा जुकाम हो जाने पर रूमाल से नाक तक नहीं पोछ पाते वे आपकी रिपोर्टों को ऐसी गंभीरता से पढ़ते हैं कि एम्स वाले चरण चूमने लगें।ऐसी लंबी सांस भरेंगे निकालेंगे कि बच्चे वसीयत के लिए वकील को फोन करने लगें। पढते हैं प्रतिष्ठित व्यंग्यकार सुशील सिद्धार्थ के व्यंग्य "बीमारी, तीमारदारी,दुनियादारी का दर्शन" को।
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सुशील सिद्धार्थ

सुशील सिद्धार्थ

बीमारियां जीवन दर्शन के वृक्ष की शाखाएं हैं।किसी भी शाखा में लटक जाइए किसी न किसी ज्ञान में अटक जाएंगे।बीमार शब्द ही अद्भुत है।अस्वस्थ कहने से हाय हाय के कैनवास पर मुर्दनी,बदहाली,तबाही का वैसा चित्र नहीं खिंचता जैसा बीमार कहते ही लपक उठता है।इसलिए बीमार आदमी कुछ ख़ास होता है।कई बार ख़ास दिखने के लिए कुछ समझदार लोग ख़ुशी ख़ुशी बीमार से बने रहते हैं।उर्दू कविता का तो आधा काम बीमारी से ही चलता है।बीमारेमुहब्बत की हाय हाय न हो शायरी में सन्नाटा खिंच जाए।दर्द मरीज आह दवा मसीहा इलाज बिस्तर कमजोरी  मौत क़फ़न क़ब्र जैसे लफ़्ज़ न हों तो शायरी लगभग गूंगी हो जाए।एक ज़माने में लखनऊ की नफ़ासत का साज़ बीमारी के दम से ही बजता था।जब कोई पूछता था कि हुज़ूर के दुश्मनों की तबीयत नासाज़ तो नहीं है।ख़ैर।ऐसे ही किसी बीमारियाना मूड में मिर्ज़ा ग़ालिब ने कहा था कि पड़िए गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार।ग़ालिब का क्या है।वे तो कुछ भी कह देते थे।वे कह सकते थे कि मेरे मरने के बाद मेरे घर से  जाने कैसी तस्वीरें और चंद हसीनों के ख़त निकले।हम और आप यह ख़तरा उठा सकते हैं क्या।मोबाइल से एक शाकाहारी मैसेज निकल आए तो घर से निकलने की आदर्श स्थिति आ जाएगी।लेकिन इतने बड़े शायर ने कहा है तो कुछ वज़न होगा ज़रूर। बीमार और तीमारदार का चोली दामन का साथ वे भी मानते हैं जो चोली की चेतना और दामन की दयालुता से अब तक नावाकिफ हैं। यह ग़ौरतलब है कि ग़ालिब ने तीमारदार से तौबा क्यों की थी।उनका तो वे जाने मगर कुछ तजुर्बेकार लोगों से बातचीत कर मैंने जो ज्ञान हासिल किया वह प्रस्तुत है।
आदमी तीमारदारी से तब तौबा करता है जब तीमारदारी खुद एक बीमारी बन जाती है।आदमी दुनियादार है तो बीमारी का आनंद और ज़्यादा।तीन चीज़ें आपके सुकून को जुनून में बदल  सकती हैं, बीमारी तीमारदारी दुनियादारी।दुनिया वालों का प्यार सबसे ज़्यादा तब उमड़ता है जब आप बिस्तर की चौहद्दी में सीमित हों।तब देखिए लोगों का सामान्य ज्ञान, मेडिकल साइंस पर उनकी पकड़,हरिओम से लेकर अनुलोम विलोम तक उनकी पहुँच, भांति भांति की पैथियों पर उनके शोध प्रबंध, संयम और परहेज पर उनका आध्यात्मिक अनुसंधान।जो साधारण सा जुकाम हो जाने पर रूमाल से नाक तक नहीं पोछ पाते वे आपकी रिपोर्टों को ऐसी गंभीरता से पढ़ते हैं कि एम्स वाले चरण चूमने लगें।ऐसी लंबी सांस भरेंगे निकालेंगे कि बच्चे वसीयत के लिए वकील को फोन करने लगें।फिर तमाम मनन के बाद एक बहुत महत्वपूर्ण बात कहेंगे कि भाई साहब हम क्या कहें।जो डॉक्टर कहे वही करिएगा।जैसे बीमार तय किए बैठा है कि जब तक ये नहीं कहेंगे तब तक डॉक्टर की बात नहीं माननी।जो आठ बजे सुबह उठकर किसी तरह दांत मांजकर दफ्तर भाग लेते हैं वे अनुशासन की मूर्ति बन जाएंगे।ऐसा है सुबह पांच बजे बिस्तर छोड़ दिया करिए।एक गिलास पानी पिया और निकल गए टहलने।भाभी जी रोज यह कहती होंगी मगर आप सुनते नहीं।भाभी जी की बात माना करिए।मैंने आपसे कई बार कहा है।इसके बाद आनेवाली चाय के साथ समोसा या पकौड़ी न आए तो भाभीजी की महानता कैसे प्रमाणित हो।वे समोसा खा रहे,आप लार घूंट रहे हैं और उनकी भाभी यानी आपकी पत्नी के प्रवचन उमड़ रहे।क्या कहूँ भाई साब,मान ही लेते तो आज यह हालत क्यों होती।मैं इतनी केयर करती हूँ कि...।उसके बाद जाने कैसे कैसे संस्मरण।भावुकता की चाय में डुबो कर उपदेश के बिस्कुट खाते रहिए।
कोई बहुत गंभीर मामला न हो तो बुखार आदि मामलों में गिरफ्तार पति को देखकर पत्नी उत्साह से भर उठती है।ऐसा है ,अपना यह मोबाईल मुझे दो।कुछ दिन अपना माइंड फ्री रखो।तुमने बहुत नरक काट रखा है।दिन्न भर।ये न्यूज, वो मैसेज, ये फोन वो चैट।ये बधाई वो वाहवा।कित्ती फुरसत है लोगों को।अभी बीमार हो इसलिए कुछ नहीं कह रही।मुझे सब मालूम है वहाँ क्या होता है।कहीं उल्टा सीधा चैट हो गया तो।अभी बीमार हो इसलिए...।मुझसे बात करने की फुरसत नहीं।और?नहीं आज मटर पनीर नहीं बनेगा।डॉक्टर ने मना किया है।किसी बात पर तुम्हारा कंट्रोल नहीं।अभी बीमार हो इसलिए...।तीमारदारी में लगी पत्नी से अगर कह दिया कि उन्ने शांति रखने के लिए भी कहा है तो फिर भुगतिए।देखभाल अच्छी लगती है मगर इतनी हो कि देखने भालने पर पाबंदी लग जाए तो रूह फ़ना होने लगती है।
तीमारदारी में आशंकाओं की ख़ासी भूमिका है।वैसे समकालीन चिकित्सा जगत का बहुत सारा चमत्कार आशंका नामक गुफा में छिपा है।वैधानिक चेतावनी यह है कि अलीबाबा और चालीस चोर की कहानी से इस गुफा का कोई संबंध नहीं है।यह जांचों की गुफा है।खुल जा जांच जांच।आप, तीमारदार और डॉक्टर।कुछ क्षणों में डॉक्टर आपको कब्जे में ले लेगा।आपके तीमारदार से कुछ कहेगा।कहने के समय आपको चेम्बर से बाहर बिठाया जा सकता है।फिर तीमारदारी और दुनियादारी की सलाहें शुरू।ऐसा है,डॉक्टर कोई उल्लू तो है नहीं।जितनी जांचें कही है उतनी करा लो।ठीक है हल्की खांसी है मगर फेफड़ों की लीवर की पूरी जांच करा लीजिए।दिल भी जंचा डालिए।अरे अरे।चच्च चच्च।ऐसा न कहिए।डॉक्टर कोई उल्लू तो है नहीं।खांसी का दिल से क्या घुटने से भी ताल्लुक है।हमारे पड़ोस के तिरवेदी जी खांसते थे तो घुटने कांपने लगते थे।घुटने बदलवाए तब खांसी में आराम आया।डॉक्टर कोई....।चंचल भाई के दांतों में दर्द उठता था तो छींकें आने लगती थीं।दांतों का नया सेट लगवा लिया बस नाक सही हो गई।शरीर का हर पुर्जा एक दूसरे से कनेक्ट है कि नहीं।डॉक्टर कोई...।
जब इस तरह कोई घिर जाता है तब उसका सोया दार्शनिक अंगड़ाई ले उठता है।तब वह बीमारी की डाल पर झूला झूलने लगता है।डॉक्टर पींगे बढ़ाने लगते हैं।कई बार कुछ लोग  बीमारी को लोकगीत उपन्यास महाकाव्य की तरह लिखने लगते हैं।हर मिलने जुलने वाले को व्याधिदान (बतर्ज गोदान) नामक महाकाव्य या उपन्यास के अंश सुनाने लगते हैं।कोई भूल से कह भर दे कि अब नाखून का दर्द कैसा है।प्रेरणा मिल गई।रचना पाठ शुरू।किसी भी किस्सागो से बड़े किस्सागो।बीच में टोका कि नाराज, यार या तो कोई बात पूछो मती या फिर पूरी बात सुनो।मैं तो मर मर के किसी तरह बता रहा हूं और तुम कानून छांट रहे हो।मतलब ,वियोगी होगा पहला कवि अंतिम सत्य नहीं है।हो सकता है कोई बीमार आदमी ही पहला कवि हो गया हो।आजकल की बहुतेरी कविताओं को देखकर बीमारी और कविता के रिश्ते पर बड़ी बहस निकाली जा सकती है।ख़ैर,धीरे धीरे यह रचना हर परिचित को कंठस्थ हो जाती है।इस तरह बीमारी के कई संस्करण और पाठ तैयार हो जाते हैं।
दर्शन का दूसरा चरण है पीड़ा से प्यार।कुछ लोग बीमारी को महबूबा बना लेते हैं।आप सब कुछ कहिए उनकी प्यारी बीमारी को कुछ न कहिए।कह के तो देखिए, कि साब यह कौन सी बीमारी है।एहतियात रखें तो जल्द दूर हो जाएगी।वे नाराज़ हो जाएंगे।जानते भी हैं कुछ कि जो मुंह में आया कह गए।इस बीमारी की महिमा शास्त्र में गाई गई है।क्या बात करते हैं आप भी।उनका बस चले तो प्रसिद्ध श्लोक का रूपांतरण इस तरह कर डालें।यदा यदा हि बुखारस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानम  जुकामस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।यानी यह बीमारी महान।इससे बीमार मैं महान।
दर्शन का तीसरा चरण दुनियादारी से जुड़ा है।लोग गणित लगाकर डायरी मेंटेन करते हैं।अरे जाइए साब।इनको क्या।जब मैं भर्ती था तब देखने आनेवालों की लाइन लगी रहे।डॉक्टर ससुर एक दूसरे से फुसफुसाएं कि बेट्टा, यह है बीमारी।इसे कहते हैं बीमार होना।कुछ आनेवाले तो तैयार कि साहब हमारा भी एक बेड बाबूजी के पास लगा दो।डॉक्टर जाने कैसे हाथ पांव जोड़ कर सबको मना करें।बात करते हो।हमारे सामने उड़ा न करो।
इसलिए साहिब,बीमारी तीमारदारी और दुनियादारी का महान दर्शन आसान नहीं।इसे कोई बीमार मनीषी ही समझ सकता है।
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