भगवान बुद्ध के जीवन को जितनी बार और जिस आयाम से
देखा जाता है वह उतनी ही बार एक नए स्वरूप में उभरकर सामने आता है. जीवन के बहुत
सारे गूढ़ रहस्य समय के साथ अलग-अलग रूपों में प्रकट होते हैं. शायद यही वजह है कि
सदियों बीत जाने के बाबजूद लोगों का लगाव बुद्ध के प्रति घटने की बजाय बढ़ते ही जा रहा
है. फिर भी बहुत सारे सवाल शेष रह जाते हैं जिनके लिए हमारा मन बेचैन रहता है. आइए
ढूढने की कोशिश करते हैं उन कुछ सवालों के जबाबों को कवि राजकिशोर
राजन की कविता-संग्रह –“कुशीनारा से गुजरते”
की कुछ कविताओं में.

एक उदास मित्र के लिये
वह
लट्टू नचाते बच्चों को देखता
तो
बन जाता लट्टू ही
दोपहर
की धूप में
हरे-भरे
पेड़ों को देखता
तो
समा जाता उनके हरापन में
गुलमोहर, अमलतास
जब लद जाते फूलों से
वह
भुला जाता सुध-बुध
उसकी
देह बढ़ जाती आगे
पर
मन उन पेड़ों को फिर-फिर निहारता
और
जुड़ा जाता
किसी
बूढ़े को देखता ठहाका लगाते
और
शामिल हो जाता ठहाके में
उसे
प्यार था पृथ्वी से
मन
मोर उसका नाचता आकाश देख कर
और
जैसे-जैसे गाढ़ा होता गया
उसका
संसार से प्रेम
वह
होता गया उदास
इसकी
असारता सोचते
भाईयो
! इन दिनों
वह
जब भी सड़क पर दिखता है
पहले
की तरह
दुआ-सलाम
नहीं होता
बस, हाथ
हिला गुजर जाता है
उसके
मुख पर हँसी आती है
पर, पीली
धूप की तरह ।
गोपा
आपने
ही रखा था सिद्धार्थ के वस्त्र
शिरस्राण
और पदत्राण
महायात्रा
के लिये
आपको
नींद कैसे आती !
आपने
ही जाना सिद्धार्थ की पीड़ा
संसार
से मोहमुक्त हो
सत्य
को जानने का
उनका
संकल्प
आपने
ही कहा था चन्ना से
कि
जाओ कंतक का साज कसकर
पुचकारो, मनाओ
प्यार से
कि
सिद्धार्थ के उस अतिप्रिय अश्व को
अपने
ही प्रिय को छोड़ आना होगा
राज्य
से बाहर
आपको
कैसे पता नहीं होगा
सिद्धार्थ
के अंतद्वंद,
हाहाकार को
जो
उन्हें मोमबत्ती की तरह
गलाये
जा रही थी
और
आपको निरंतर
जलाये
जा रही थी
हाँ, उस रात
आपने
दारूण
अभिनय ही किया होगा
सीने
से फूटते चीत्कार को
करवट
बदलते सहा होगा
बड़ी
मुश्किल से पलकें मूँदकर
दुख
को बहने से रोका होगा
विदा
की वेला में
इस
तरह विदा करना कि
एक
बूँद अश्रु न गिरे
यशोधरा
!
यह
आपने कैसे किया होगा
आपने
रखा सिद्धार्थ का मान
मानिनी
थीं आप
एक
दिन किया था सिद्धार्थ को विदा
एक
दिन बुद्ध ने किया
आपको
संसार से विदा
अपने
अग्रज कवि की कविता में
वियोगिनी
के रूप में देखा था आपको
जहाँ
आपकीर् आत्त पुकार सुन
हृदय
से उठता था तुमुल कोलाहल कि
सखि
! वे मुझसे कह कर जाते
तब
मैं बार-बार कोसता था सिद्धार्थ को
दुखी
होता रहा
आपके
दुख को अनुभव कर
अब
मैं आपकी कथा
सुनाना
चाहता अपने अग्रज कवि को
पर
न आप हैं
न
मेरे अग्रज कवि सशरीर
इस
दुखमय संसार में ।
तृष्णा और बुद्ध
घनीभूत
पीड़ा में थे सिद्धार्थ
उत्तर
सदैव से
क्यों
युद्ध?
जो
कारण, वह तो मात्र आवरण
मूल
में तृष्णा का खेल
जिसकी
अग्नि सदा प्रज्ज्वलित
होते
रहे भष्म
नगर, ग्राम
सनी
रही सदा, रक्त से पृथ्वी
और
मनुष्य है तो तृष्णा भी
उसकी
लीला अनंत
जैसे
असीम व्योम है तो चाँद भी
नदी
है तो जल भी
पृथ्वी, तो
वनस्पतियाँ भी
धूप, तो
छाँव भी
पुण्य, तो पाप
भी
सत्य, तो
असत्य भी
एक
के बिना, दूसरे को ठौर नहीं
पथ
एक ही शेष
हम
रहें ऐसे, जैसे हम हों ही नहीं
न
आसक्ति न विरक्ति
न
राग रहे न द्वेष
तृष्णा
का न बचे अवशेष ।
उत्पलवर्णा
जैसे
तुम्हारा नाम
उसी
तरह तुम, उत्पलवर्णा
जहाँ
पड़ते तुम्हारे पैर
कीच
ही कीच वहाँ
कहीं
बित्ता भर सूखी धरती नहीं
जहाँ
तुम रखती पैर
शायद
इसीलिए, तुम्हें घृणा थी संसार से
छि:
थू: किया था तुमने
और
आखिरकार
वरण
किया वह पथ
जहाँ
अर्थ और कामलिप्सा का जोर
नहीं
दिखाई देता
ओर-छोर
किया
गृहत्याग
मुँह
फेरा पापकर्म में लिप्त पति से
पर
हाय रे स्त्री भाग्य !
फिर
करना पड़ा विवाह
अवलंबन
के लिये
पर
वह पति भी निकला वही
तुम्हारी
ही पुत्री बन गई
उसकी
भोग्या
हाय
! रे उत्पलवर्णा
कोमलांगी, कंचनलता,
कमलनयन तुम
पर
ऑंखों में तुम्हारी
सदैव, दुख की
कोसी नदी
तुम्हें
तो यही लगा होगा
कि
फट जाती धरती
और
समा जाती तुम
तुमने
सोचा होगा सैकड़ों बार
आखिर
कौन-सा किया पापकर्म तुमने
कि
ऐसा जीवन मिला
तुम्हें
सम्मुख पाता तो कहता
तुम
वास्तव में थी उत्पल
बन
कर भिक्खुनी
आज
भी खिली हो
धम्म
के सरोवर में
हे
उत्पलवर्णा !
तुम्हें
तो होगा ज्ञात
जिन्हें
हम मानते अघटन
वे
घटनामात्र
जिसे
समझते दुख हम
वह
हमारा अज्ञान
और
ज्ञान से भी
जन्म
लेता अभिमान
अब
उस अभिमान का
किसे
है ज्ञान ?
(नोट :- बुद्ध के शिष्य मौद्गल्यायन के आग्रह पर भिक्खुनी उत्पलवर्णा ने अपनी जीवन
गाथा सुनाई थी।)
प्रथम बार
कहा
आपने
न
मेरे, न जाओ किसी अन्य की शरण में
जाओ
अपने शरण में
वहीं
होगा, तुम्हारा उद्धार
अपने
सोचो, अपने समझो
अपने
जागो, अपने विचारो
तभी
उतरोगे पार
इस
संसार में नहीं कर सकता
कोई, किसी
दूसरे का उद्धार
नहीं
तो सभी ने दी सीख
कि
स्वयं को कर विस्मृत
लीन
हो जाओ परमसत्ता के साथ
या
शरणागत बन
आओ
मेरे पास
आपने
कहा
कहाँ-कहाँ
भटकोगे तुम
कब
से भटक रहे हो तुम
कहीं
नहीं जाना
जिसे
पाना, वह तुम्हारे पास
मान
दिया मानव को
खड़ा
किया उसे पृथ्वी पर
आपने
प्रथम बार ।
स्वप्न
पृथ्वी
बनी थी शयनासन
शिरोधार्य
सुमेरू
वामहस्त
था जा टिका महासमुद्र में
दक्षिणहस्त
मरूस्थल में
हो
रहे थे युगलचरण
समुद्रजल
से प्रक्षालित
नाभि
से निकल क्षीरिका घास
बढ़
रहा था
क्षीप्रता
से आकाश
खिला
था कमल
रथ
के पहिए के आकार का
दसों
दिशाओं से उड़ते
नयनाभिराम
दृश्य रचते
रंग-बिरंगे
पक्षी दल
उड़-उड़
आ रहे थे सम्मोहित
उसी
ओर
स्वप्न
महान संबोधि का
सत्य
हुआ
प्रमाणित
हुआ यह भी
कि
स्वप्न मात्र होता नहीं स्वप्न
क्रांति, निर्माण,
परिवर्तन जन्म लेते उसी की कोख से।
कवि
आपकी एक-एक मुद्रा
आपकी छवि कविता
आपकी बोली
आपकी ठिठोली
आपकी हँसी
आपकी अनथक यात्रा
यहाँ तक कि सुस्ताना, कविता
आपके नयन जब निहारते
जब नि:शब्द रोम-रोम से श्रवण करते आप
जब आप विचारते
हे कवि!
आपके लिए, यह संसार कविता
और संसार के लिए
आप कविता
जिसे तुच्छ माना सबने
उसे गले लगाया आपने
जिन्हें गिराया सबने
उन्हें उठाया आपने
अभाग्य के वन में
सौभाग्य का पुष्प खिलाया आपने
अद्भुत और विरले कवि आप
जिसने लिखी नहीं कविता
पर जिसके जीवन से कल-कल, छल-छल
सरिता की तरह
बहती कविता
ठीक ही कहा था आनंद ने
भले हों आप बुद्ध, गुरू मेरे
पर हैं आप कवि
जिसे निरखते ही
जनमती कविता
सबका दुख, आपका दुख
सबका सुख, आपका सुख
कविता यही तो लेकर
होती है कालयात्री
हे तथागत!
आप स्वयं कविता।
दंगश्री
पृथ्वी
से उपर नहीं
पृथ्वी
पर ही
है
संभावना
मुक्ति, आनंद
की
प्रेय
और श्रेय की
दंगश्री
पर्वत की ओर
उँगली
उठा
बुघ्
ने कहा था
आकाश
को
और
सदा से
आकाश
की ओर टकटकी लगाए
मनुष्य
को कहा
लौटने
को पृथ्वी पर
दंगश्री, दंग है
अब
तक ।
नोट-
दंगश्री एक पर्वत का नाम है ।
सारिपुत्त की
स्वीकारोक्ति
तथागत
! मैंने नहीं देखा विस्तृत नभ को
देखा
पृथ्वी को
और
हो गया पृथ्वी ही
देखा
जल की ओर
और
हो गया जल ही
गुरूवर
! देखा अग्नि को प्रज्जवलित
और
हो गया अग्नि ही
देखा
मंद-मंद बहते वायु को
और
हो गया वायु ही
नहीं
देखा कभी अपनी ओर
द्रष्टा
बन अपनी ही काया को
पृथ्वी
की भाँति
मुझे
ज्ञात, मात्र स्वीकार
प्रवाहमय
मैं जल की भाँति
अनासक्त
भाव से
ग्रहण
किया संसार
शुघ्-अशुघ्, असुंदर-सुंदर
सभी
हो
जाते मुझमें निमग्न
दुर्गंध
हो या सुगंध सबको ले चलता
वायु
समान
तथागत, मैं
हूँ ही नहीं
और
सभी में
मैं
विद्यमान
जैसी
आपकी देशना
जैसा
आपका ज्ञान
सारिपुत्र
की यह स्वीकारोक्ति
एक
न एक दिन हो
हमारी
स्वीकारोक्ति ।
नोट:- सारिपुत्त-बुघ् के प्रमुख शिष्य
राग
अकस्मात्
ही हुआ होगा
कभी
दबे पैर आया होगा
र्[1]ईष्या-द्वेष
घृणा-बैर
आदि के साथ
ज्ीवन
में राग
फिर
न पूछिए !
क्या
हुआ
कुछ
भी नहीं बचा
बेदाग
।
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