शनिवार, 2 जुलाई 2016

पंखुरी सिंहा की कविता-संग्रह "रक्तिम संधियाँ" की समीक्षा

   पंखुरी सिन्हा नीरस पुरातनता को ढोए चलनेवाली कवयित्री नहीं हैं। उनकी तहक़ीक़ात इस बात में है कि जो समस्याएँ अवधियों-अवधियों से चली आ रही हैं, उनका रचनात्मक निदान कहीं दिखाई क्यों नहीं देता। ख़ास तौर से स्त्री विषयक समस्याएँ उन्हें कुछ अधिक भावनात्मक बना देती हैं। एक स्त्री होने के कारण पंखुरी सिन्हा का ऐसा सोचना जायज़ भी हो जाता है : 'जिन तकलीफ़ों की रिपोर्ट लिखाई हमने/क्या हुआ उनका।' या उनका यह कहना भी जायज़ है कि 'हम रेतेंगे गला तुम्हारा/तुम माँगो सुरक्षा।' ऐसे ही कितने-कितने सवाल पंखुरी सिन्हा की कविताओं में छिपे हुए हैं। और उनके प्रश्नों को झेल पाना आज की व्यवस्था के लिए क़तई संभव नहीं है। इसलिए कि व्यवस्था आज की ज़रूर है, परन्तु है वही पुरातन, जिनके पास हमारे प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं होता। समीक्षक शहंशाह आलम के शब्दों में पढते हैं पंखुरी सिंहा की कविता-संग्रह "रक्तिम संधियाँ" की समीक्षा।


    'रक्तिम सन्धियाँ' यानी एक स्त्री के रक्तिम समय की कविताएँ
     ● शहंशाह आलम

जिस तरह कवि का काम है अपने समय को सुनना, उसी तरह कविता का काम है मनुष्य-प्रजाति को उसके समय को सुनाना। इसलिए कि कवि और कविता का जो समय होता है, वह शोकाकुल कभी नहीं होता। यही वजह है कि कोई कवि जब अपनी कविता अपने मंजे हुए और सधे हुए हाथ से लिखता है तो कविता सिर्फ़ कविता नहीं रह जाती बल्कि मनुष्य का अपना स्वर बन जाती है, एक ऐसा स्वर, जिसमें मनुष्य का भूत, वर्तमान, भविष्य सब सुनाई देने लगता है, एकदम विलक्षण, जिसमें कमज़ोर प्रार्थनाएँ नहीं होतीं बल्कि उस स्वर में मनुष्य की पवित्रता, मनुष्य का उल्लास, मनुष्य का क्रोध सब संगठित दिखाई देता है। मुझे यही सबकुछ पंखुरी सिन्हा की कविताओं में दिखाई देता रहा है। पंखुरी सिन्हा की यही पवित्रता, यही विलक्षणता, यही संगतियुक्तता उनकी सद्य: प्रकाशित कविता-पुस्तक 'रक्तिम सन्धियाँ' की लगभग सारी ही कविताओं में आप भी देख सकते हैं। पंखुरी सिन्हा अपनी कविता 'अनहद' में कहती हैं : 'कुछ नहीं कहा गया अभी तो/ अभी बहुत कुछ कहा जाएगा।' यहाँ 'अभी बहुत कुछ कहा जाएगा' जैसी पंक्ति उन जनसामान्य लोगों के बारे में है, जिनके बारे में अभी विपुल रूप में कहा जाना शेष है।
पंखुरी सिन्हा


     दरअसल पंखुरी सिन्हा नीरस पुरातनता को ढोए चलनेवाली कवयित्री नहीं हैं। उनकी तहक़ीक़ात इस बात में है कि जो समस्याएँ अवधियों-अवधियों से चली आ रही हैं, उनका रचनात्मक निदान कहीं दिखाई क्यों नहीं देता। ख़ास तौर से स्त्री विषयक समस्याएँ उन्हें कुछ अधिक भावनात्मक बना देती हैं। एक स्त्री होने के कारण पंखुरी सिन्हा का ऐसा सोचना जायज़ भी हो जाता है : 'जिन तकलीफ़ों की रिपोर्ट लिखाई हमने/क्या हुआ उनका।' या उनका यह कहना भी जायज़ है कि 'हम रेतेंगे गला तुम्हारा/तुम माँगो सुरक्षा।' ऐसे ही कितने-कितने सवाल पंखुरी सिन्हा की कविताओं में छिपे हुए हैं। और उनके प्रश्नों को झेल पाना आज की व्यवस्था के लिए क़तई संभव नहीं है। इसलिए कि व्यवस्था आज की ज़रूर है, परन्तु है वही पुरातन, जिनके पास हमारे प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं होता। वहाँ से उत्तर मिलता भी है तो हममें उलटे अचरज भर देता है। आक्रोश भर देता है। बेचैनी भर देता है। तनाव भर देता है : 'अब और सबूत ज़रूरी नहीं/बहुत जघन्य हुआ सबूत का खेल यह।' या 'चुप्पी अधिकारी की/पुलिस अफ़सर की।' या 'अजीब-सी आँखमिचौली/कौन चोर सिपाही कौन।'
शहंशाह आलम

     सच्चाई यही है कि जब हम पंखुरी सिन्हा की कविताओं में प्रवेश करते हैं तो अपने आसपास फैली हुई सड़ांध से घृणा करने की बजाय हम संघर्ष करना ज़्यादा ज़रूरी समझते हैं, इसलिए कि कवयित्री को यह पता है कि एक स्त्री का समय जैसा भी हो, किसी स्त्री को बिना संघर्ष के कुछ भी हासिल नहीं होता है। स्त्री के बाहर-भीतर जितनी सन्धियाँ की जाती हैं वे सारी की सारी सन्धियाँ रक्तिम ही हुआ करती हैं, किसी भी स्त्री के लिए। इसलिए कि स्त्री कोई भी हो, हम उनके बोलने की प्रतीक्षा नहीं करते बल्कि जो बोलता है, पुरुष ही बोलता चला जाता है। स्त्री हमेशा की तरह चुप ही रह जाती है। स्त्री का जो-जो कुछ उपहास से शुरू होता है, पंखुरी सिन्हा की कविताएँ उस-उस का विरोध सलीके से करती दिखाई देती हैं। दरअसल पंखुरी सिन्हा अपने आसपास की जा रहीं सारी की सारी 'रक्तिम सन्धियाँ' अपने चमत्कारिक अनुभव से तोड़ देना चाहती हैं। संग्रह में शामिल उनकी साठ से अधिक कविताओं का पाठ करते हुए ऐसा आपको भी ज़रूर महसूस होगा। इसलिए कि हमारे पूरे जीवन-क्रम को जब असहजता से भरा जा रहा है तो हमारा विरोध सहज कैसे रह सकता है। यही असहजता पंखुरी सिन्हा की कविताओं में आ गई है : नुक्ता बदलकर/या बदलकर बिन्दु का स्थान/जिससे ऐसे बदलें अर्थ/आज्ञाओं के/स्थितियों के/पालन के उनके/कोई एक शब्द/जो कहता किसी बदलाव की बात/ऐसा कुछ नहीं था/उसके ख़त में/सीधी-सी बात थी/कि मशग़ूल था/वह अपनी ज़िंदगी में/लिप्त अपनी प्रेमिका में/लेकिन बात वो नहीं थी/सवाल वो नहीं था/मसला यह था/कि वो कौन लोग थे/जिनका था/मेरी ज़िंदगी पर यूँ क़ब्ज़ा ( 'नुक्ता बदलकर, पृष्ठ : 95 )।
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रक्तिम सन्धियाँ (कविता-संग्रह)
 कवयित्री : पंखुरी सिन्हा
 प्रकाशक : साहित्य भंडार, 50 चाहचंद, इलाहाबाद-211003 (उत्तर प्रदेश)/
मूल्य : 50 ₹


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