निराशा के अंधकारमय वातावरण में जो चमकती हुई चीज नजर आती है उसमें लोगों का विश्वास जमता है। उसमें वे एक रहनुमा का अक्स देखते हैं। इसी सहारे उसे एक तय वक्त देते हैं लेकिन जब वह उस उम्मीद पर खड़ा नहीं उतरता है तो वे उसे क्षमा करने की स्थिति में भी खुद को नहीं पाते हैं। आश्चर्य जैसी कोई बात यहाँ नजर नहीं आती। क्रांति की चाह सबकी होती है क्योंकि बदलाव हर कोई चाहता है पर कोई रहनुमा नहीं बनना चाहता है क्योंकि हर इंसान बीबी -बच्चा वाला है। घर-परिवार की समस्याओं से उसे फुर्सत कहाँ है जो वह देश -समाज की बात सोच सके। उसके पास फुर्सत है तो सिर्फ किसी को गरिया लेने का। देश- दुनिया में सबको भ्रष्ट और सबसे अनैतिक करार देने की क्षमता है। वह घूसखोरी के खिलाफ सौ पेज का भाषण उड़ेल सकता है लेकिन जरूरत पड़ने पर सबसे पहले लेन-देन कर मामले को शांतिपूर्वक निपटाने का भरसक प्रयास करेगा। विफलता की स्थिति में ही शायद वह क्रांतिकारी के रूप में नजर आए वर्ना उनके पास सफाई के सौ अफसाने जरूर होंगें। मूढ़ जनता तब भी थी आज भी है। फुर्सत है किसके पास कि कोई किसी के फटे में टाँग अड़ाए। कहा गया है न कि जिनके घर खुद शीशे के हों वो दूसरों ......। दरअसल में बात वही है। यहां बेदाग है कौन? जिस तरह भगवान बुद्ध ने अपने बेटे के मृत्यु के दुख से दुखी बुढिया को कहा था कि यदि तुम एक मुट्ठी सरसों ला दो तो मैं तुम्हारे संतान को जिंदा कर दूँगा बशर्तें उस घर में आज तक किसी की मृत्यु नहीं हुई ह़ो। बुढ़ी अम्मा अपने संतान की खातिर किस किस दरवाजे नहीं गई? लेकिन अंत में निराशा के सिवाय मिला क्या? और बुद्ध को भी वह कोई दोष नहीं दे पाई । कहीं न कहीं वही स्थिति हमारी भी है। कोई भी इंसान न तो परिपूर्ण है न पूर्ण परिपक्व और न ही दोष रहित। इंसानी खामियां उसे भी कहीं न कहीं किसी मोड़ पर समझौता करने को मजबूर कर देती हैं। लेकिन जिन्हें हम भगवान मान लेते हैं उनसे हम गलती होने की अपेक्षा ही कहाँ रखते हैं? और शेष काम के लिए तो आलोचक दिन -रात मौके की ताक में तो आँखें बिछाये बैठे ही रहते हैं। फिर विवश होकर सोचना ही पड़ता है कि आखिर गलती किसकी है? इतनी अपेक्षाओं को पालने को किसने कहा था? किससे पूछकर हमने दूसरे पर इतना विश्वास कर लिया? किस भरोसे हमने दूसरे के कंधे पर अपनी उम्मीदें लाद दी? क्या यह न्यायसंगत था? फिर बाबेला किस बात का? यदि जो गलती खुद की है तो भुगतो। दूसरे को गरियाने से क्या मिलने वाला है सिवाय अपने अंदर की गंदगी से बाहरी समाज और वातावरण को गंदा करने के?
शनिवार, 13 मई 2017
गलती किसकी (आलेख): सुशील कुमार भारद्वाज
निराशा के अंधकारमय वातावरण में जो चमकती हुई चीज नजर आती है उसमें लोगों का विश्वास जमता है। उसमें वे एक रहनुमा का अक्स देखते हैं। इसी सहारे उसे एक तय वक्त देते हैं लेकिन जब वह उस उम्मीद पर खड़ा नहीं उतरता है तो वे उसे क्षमा करने की स्थिति में भी खुद को नहीं पाते हैं। आश्चर्य जैसी कोई बात यहाँ नजर नहीं आती। क्रांति की चाह सबकी होती है क्योंकि बदलाव हर कोई चाहता है पर कोई रहनुमा नहीं बनना चाहता है क्योंकि हर इंसान बीबी -बच्चा वाला है। घर-परिवार की समस्याओं से उसे फुर्सत कहाँ है जो वह देश -समाज की बात सोच सके। उसके पास फुर्सत है तो सिर्फ किसी को गरिया लेने का। देश- दुनिया में सबको भ्रष्ट और सबसे अनैतिक करार देने की क्षमता है। वह घूसखोरी के खिलाफ सौ पेज का भाषण उड़ेल सकता है लेकिन जरूरत पड़ने पर सबसे पहले लेन-देन कर मामले को शांतिपूर्वक निपटाने का भरसक प्रयास करेगा। विफलता की स्थिति में ही शायद वह क्रांतिकारी के रूप में नजर आए वर्ना उनके पास सफाई के सौ अफसाने जरूर होंगें। मूढ़ जनता तब भी थी आज भी है। फुर्सत है किसके पास कि कोई किसी के फटे में टाँग अड़ाए। कहा गया है न कि जिनके घर खुद शीशे के हों वो दूसरों ......। दरअसल में बात वही है। यहां बेदाग है कौन? जिस तरह भगवान बुद्ध ने अपने बेटे के मृत्यु के दुख से दुखी बुढिया को कहा था कि यदि तुम एक मुट्ठी सरसों ला दो तो मैं तुम्हारे संतान को जिंदा कर दूँगा बशर्तें उस घर में आज तक किसी की मृत्यु नहीं हुई ह़ो। बुढ़ी अम्मा अपने संतान की खातिर किस किस दरवाजे नहीं गई? लेकिन अंत में निराशा के सिवाय मिला क्या? और बुद्ध को भी वह कोई दोष नहीं दे पाई । कहीं न कहीं वही स्थिति हमारी भी है। कोई भी इंसान न तो परिपूर्ण है न पूर्ण परिपक्व और न ही दोष रहित। इंसानी खामियां उसे भी कहीं न कहीं किसी मोड़ पर समझौता करने को मजबूर कर देती हैं। लेकिन जिन्हें हम भगवान मान लेते हैं उनसे हम गलती होने की अपेक्षा ही कहाँ रखते हैं? और शेष काम के लिए तो आलोचक दिन -रात मौके की ताक में तो आँखें बिछाये बैठे ही रहते हैं। फिर विवश होकर सोचना ही पड़ता है कि आखिर गलती किसकी है? इतनी अपेक्षाओं को पालने को किसने कहा था? किससे पूछकर हमने दूसरे पर इतना विश्वास कर लिया? किस भरोसे हमने दूसरे के कंधे पर अपनी उम्मीदें लाद दी? क्या यह न्यायसंगत था? फिर बाबेला किस बात का? यदि जो गलती खुद की है तो भुगतो। दूसरे को गरियाने से क्या मिलने वाला है सिवाय अपने अंदर की गंदगी से बाहरी समाज और वातावरण को गंदा करने के?
धंधा है चलता ही रहेगा ः सुशील कुमार भारद्वाज
लगातार जारी है और जारी ही रहेगा। ऐसा भी नहीं है कि यह पहली बार हुआ है। भूतकाल में भी लोगों ने इनके जलवे देखे हैं लेकिन वो क्या कहते हैं न कि थेथरई इतनी जल्दी छुटती नहीं। चोरी करके भी सीनाज़ोरी करके गर्व से आगे बढ़ते जाते हैं। आखिर उनका दोष भी कहाँ है? दोषी तो शायद वे हैं जो सबकुछ जानकर भी उनके अंधभक्त हैं। उनके छिछाले में भी उनके अद्भूत कारनामें और हिम्मत देखते हैं। उनके जयकारे में ही सारी शक्ति उड़ेल देते हैं। दुःख में भी चूँ करने की हिम्मत नहीं कर पाते। इसलिए नहीं कि उन्हें बोलना नहीं आता बल्कि इसलिए कि उन्हें अपने थूके को ही चाटना पड़ेगा। चाहे ऐंठन कितनी ही क्यों न पड़ जाए वे हिलेंगें नहीं और जो कहीं हिल गये तो समझ लो कि उनको कोई नया आका मिल गया। वह संरक्षित और सुरक्षित महसूस कर रहा है। फिर तो वह विभीषण की तरह अपने पुराने घर में भी आग लगाने से नहीं चुकेगा। आखिर राजनीतिक दांवपेच सीख कर ही तो वे यहाँ तक पहुँचे हैं। आखिरकार क्योंकर उनसे कोई ईमानदारी की आस लगाये बैठा है। अब तो ईमानदारी की आस लगाना ही बेईमानी है। अभी भी शक है तो मारते रहो अंधेरे में तीर। निशाने पे गया तो भी वाह वाह चूक गया तो भी वाह वाह। अपना क्या है? हम तो कह देंगें - राम राम भाई राम राम।
बुधवार, 3 मई 2017
कथाकार योगेंद्र आहूजा की पाँच मिनट और अन्य कहानियाँ पर रोहिणी अग्रवाल की संक्षिप्त टिप्पणी
कथाकार योगेंद्र आहूजा की पाँच मिनट और अन्य कहानियाँ पर रोहिणी अग्रवाल की टिप्पणी
योगेंद्र आहूजा मूलत: कहानीकार हैं, लेकिन उनकी हर कहानी अपने गर्भ में औपन्यासिक जीवन की समग्रता और संश्लिष्टता छिपाए हुए है। चूंकि वे मौन के सर्जक कलाकार हैं, और शब्दों के किफायती प्रयोक्ता, उनकी कहानियां संदर्भों-संकेतों से अटी पड़ी हैं। कहानियों में घटनाएं हैं, लेकिन विवरण न के बराबर। उन घटनाओं के भीतर छुपे राजनीतिक षड़यंत्रों, सांस्कृतिक संदर्भों, आर्थिक नीतियों और अंतरराष्ट्रीय प्रभावों को एक-दूसरे की संगति में गुने बिना लेखक के मूल आशय को समझना कठिन हो जाता है। चूंकि उनकी कहानियां उद्बोधन का स्थूल और दंभपूर्ण 'सृजनात्मक पाखंड' नहीं रचतीं, संवाद के सहारे अपने और परिवेश के भीतर की थाह लेकर साझा रणनीति बनाने की दुर्धर्ष लड़ाई लड़ती हैं, इसलिए पाठक को उनकी कहानियों में यहां-वहां बिखरे संकेतों को ब्यौरों में, ब्यौरों को युगीन विडंबनाओं के आर्तनाद में, और आर्तनाद को सृजन की सूक्ष्म अर्थव्यंजनाओं में तब्दील करते हुए खुद ही अपने आस्वाद तंत्र को विस्तृत और गहन करना पड़ता है।
उदाहरण के लिए कहानी 'एक्यूरेट पैथोलॉजी' में निरुपित पहली ही घटना को लिया जा सकता है जो पात्र, वातावरण और ब्यौरों के साथ घुलमिल कर समय की सीमा के आर पार व्यवस्थागत विघटन और मानवीय शोषण की एक-सी कहानी रचने लगती है।
कौतूहल को जगाना और उत्तरोतर उसी के सहारे त्रासदी की चरम अवस्था में संघर्ष के बीज बो आना योगेंद्र आहूजा की कथा-शिल्प की खासियत है। कहानी की शुरुआत वे गनपत नाई के बारे में एक स्टेटमेंट से करते हैं - ''आख़िरी दाढ़ी उसने पच्चीस साल पहले उसी दिन बनाई थी, उस साल के आखरी दिन जब . . .।'' लेकिन नहीं, पाठक के प्राण कंठ तक अटका कर वे जानबूझकर वहां से रफूचक्कर हो जाते हैं। न, दरअसल वही बने रहते हैं - शब्दकार नहीं, कैमरामैन की तरह। बस, कैमरे का फोकस बदल देते हैं। गनपत के निर्णय से नहीं, उम्रदराज गनपत के अनुभवों से अब वे बावस्ता हैं जो दूर से ही दमन और उत्पीड़न की आहट तो लेना जानता है, उससे जूझना नहीं, और इस प्रक्रिया में अपनी ही जड़ता में वह एक के बाद एक घटनाओं के जरिए वक्त को विकरालतर होते देखने को बाध्य है। पाठक थोड़ी सी राहत भरी सांस लेकर गनपत के अनुभवों में डूबने की तैयारी करता ही है कि योगेंद्र आहूजा कैमरे का एंगिल पहली स्टेटमेंट के छूटे अंतिम शब्द पर केंद्रित कर देते हैं - ''जब . . . झंडापुर चौराहे पर . . . दो आदमी मार दिए उन्होंने, एक कोई हाशमी साहब, एक रामबहादुर . . ।''
पाठक सन्न! तो यह गनपत की नहीं, प्रख्यात रंगकर्मी सफदर हाशमी की हत्या की कहानी है? वह अपने से ही सवाल पूछता है खूब आशंकित होकर। संशय की ठोस वजह भी है उसके पास। अभी.अभी लेखक के कैमरे की आंख से उसने एक बेहद भयावह लेकिन कलात्मक चित्र देखा था। 31 दिसंबर की ठिठुरती रात के घने अंधेरे में अपने सैलून में असहाय सा अकेला खड़ा है गनपत। लाइट नहीं है, इसलिए अंधेरे की काली परतों को चीरने के लिए धुंआती ढिबरी जल रही है। प्रकाश की लौ कितनी मद्धम और कंपकपाती क्यों न हो, वह अंधेरे के शाप में बिंधे अक्स को धुंधला धुंधला उजागर कर ही देती है। फिर यह ढिबरी तो सैलून में जल रही है जहां ग्राहक और हज्जाम दोनों की सुविधा के लिए हर दीवार पर कई कई कोणों में आईने टंगे हैं। आईने ढिबरी के कांपते उजाले को प्रतिबिंबित कर-कर के उजाले की एक श्रृंखला बना देते हैं। साथ ही गनपत की असहायता को भी कई गुना बढ़ा देते हैं। इसी के साथ अनायास फोकस में आता है झंडापुर के नुक्कड़ नाटक से लौटे गनपत के तरुण पुत्र रोशनलाल का दहशत भरा चेहरा। दहशत मौत का स्मरण कराती है, मौत का पर्याय नहीं होती। दहशतजदा आदमी भी शायद यह सत्य नहीं जानता। जानता है कैमरा जो सैंकड़ों ढिबरियों के आवर्धित प्रकाश में हृदय के अंतस्तल में दबी-ढकी परतों के चेहरे को भी उघाड़ लाता है। कैमरा देखता है, खौफ के बावजूद ''बेइंसाफी और क्रूरता के विरुद्ध उसके हृदय में जो प्रतिवाद जन्मा था, जीवन का प्रथम प्रतिवाद, पहला इंकार, पहला विशाल गुस्सा और अपार घृणा, उसे उसने हृदय में ही रखने का फैसला किया, उस दिन तक के लिए, जब . . .।''
एक बार फिर 'जब'। यानी फिर रस में व्यवधान! लेकिन अब पाठक ने झल्लाना छोड़ दिया है। वह उमग कर योगेंद्र आहूजा के खेल में शामिल हो गया है। शायद बचपन की स्मृतियों को ताजा करके घुटन भरे माहौल में 'टीलो' खेलने का शौक चर्रा आया हो। वह समझ गया है, लेखक उसे भरमाने के लिए इशारे करके गोटी को कहीं छुपा आता है और खुद इत्मीनान से टहलता हुआ कहीं दूर निकल जाता है, मानो पिछली बात से कोई वास्ता नहीं।
पाठक जानता है, लेखक की इत्मीनान भरी अगली यात्रा में ही उसे टीलो की अगली गोटी मिलेगी। इसलिए अपनी अंतश्चेतना को दो भागों में विभाजित कर वह नेपथ्य और रंगमंच दोनों जगह पर बनी रहने वाली सक्रियता को देखने नहीं, गुनने लगता है। टीलो खेल को जीतने का एक ही मूलमंत्र है - अंतर्सूत्रों पर गहरी पकड़।
योगेंद्र आहूजा चूंकि औपन्यासिक संवेदना के कथाकार हैं, इसलिए कहानी में अनेक अंतर्कथाओं और चरित्रों को बुनते हुए युग की विडंबनाओं को नहीं, विडंबनाओं को बनाने वाली परिघटनाओं, मानसिकताओं और प्रक्रियाओं को थहा लेना चाहते हैं। यही वजह है कि उनकी कहानियों में समय एकरैखिक गति से आगे नहीं बढ़ता, तमाम नियमों और अनुशासन की धज्जियां उड़ाते हुए अपनी वर्तुलाकार गति में कभी बदलाव के अंधेरों को लिए आता है, कभी बदलाव से पहले की दमघोंटू सर्जक चुप्पी' की अनिवार्यता को। 'पांच मिनट' कहानी में उनकी यह तकनीक अपने चरम उत्कर्ष पर है।
रोहिणी अग्रवाल के फेसबुक वॉल से साभार।
योगेंद्र आहूजा मूलत: कहानीकार हैं, लेकिन उनकी हर कहानी अपने गर्भ में औपन्यासिक जीवन की समग्रता और संश्लिष्टता छिपाए हुए है। चूंकि वे मौन के सर्जक कलाकार हैं, और शब्दों के किफायती प्रयोक्ता, उनकी कहानियां संदर्भों-संकेतों से अटी पड़ी हैं। कहानियों में घटनाएं हैं, लेकिन विवरण न के बराबर। उन घटनाओं के भीतर छुपे राजनीतिक षड़यंत्रों, सांस्कृतिक संदर्भों, आर्थिक नीतियों और अंतरराष्ट्रीय प्रभावों को एक-दूसरे की संगति में गुने बिना लेखक के मूल आशय को समझना कठिन हो जाता है। चूंकि उनकी कहानियां उद्बोधन का स्थूल और दंभपूर्ण 'सृजनात्मक पाखंड' नहीं रचतीं, संवाद के सहारे अपने और परिवेश के भीतर की थाह लेकर साझा रणनीति बनाने की दुर्धर्ष लड़ाई लड़ती हैं, इसलिए पाठक को उनकी कहानियों में यहां-वहां बिखरे संकेतों को ब्यौरों में, ब्यौरों को युगीन विडंबनाओं के आर्तनाद में, और आर्तनाद को सृजन की सूक्ष्म अर्थव्यंजनाओं में तब्दील करते हुए खुद ही अपने आस्वाद तंत्र को विस्तृत और गहन करना पड़ता है।
उदाहरण के लिए कहानी 'एक्यूरेट पैथोलॉजी' में निरुपित पहली ही घटना को लिया जा सकता है जो पात्र, वातावरण और ब्यौरों के साथ घुलमिल कर समय की सीमा के आर पार व्यवस्थागत विघटन और मानवीय शोषण की एक-सी कहानी रचने लगती है।
कौतूहल को जगाना और उत्तरोतर उसी के सहारे त्रासदी की चरम अवस्था में संघर्ष के बीज बो आना योगेंद्र आहूजा की कथा-शिल्प की खासियत है। कहानी की शुरुआत वे गनपत नाई के बारे में एक स्टेटमेंट से करते हैं - ''आख़िरी दाढ़ी उसने पच्चीस साल पहले उसी दिन बनाई थी, उस साल के आखरी दिन जब . . .।'' लेकिन नहीं, पाठक के प्राण कंठ तक अटका कर वे जानबूझकर वहां से रफूचक्कर हो जाते हैं। न, दरअसल वही बने रहते हैं - शब्दकार नहीं, कैमरामैन की तरह। बस, कैमरे का फोकस बदल देते हैं। गनपत के निर्णय से नहीं, उम्रदराज गनपत के अनुभवों से अब वे बावस्ता हैं जो दूर से ही दमन और उत्पीड़न की आहट तो लेना जानता है, उससे जूझना नहीं, और इस प्रक्रिया में अपनी ही जड़ता में वह एक के बाद एक घटनाओं के जरिए वक्त को विकरालतर होते देखने को बाध्य है। पाठक थोड़ी सी राहत भरी सांस लेकर गनपत के अनुभवों में डूबने की तैयारी करता ही है कि योगेंद्र आहूजा कैमरे का एंगिल पहली स्टेटमेंट के छूटे अंतिम शब्द पर केंद्रित कर देते हैं - ''जब . . . झंडापुर चौराहे पर . . . दो आदमी मार दिए उन्होंने, एक कोई हाशमी साहब, एक रामबहादुर . . ।''
पाठक सन्न! तो यह गनपत की नहीं, प्रख्यात रंगकर्मी सफदर हाशमी की हत्या की कहानी है? वह अपने से ही सवाल पूछता है खूब आशंकित होकर। संशय की ठोस वजह भी है उसके पास। अभी.अभी लेखक के कैमरे की आंख से उसने एक बेहद भयावह लेकिन कलात्मक चित्र देखा था। 31 दिसंबर की ठिठुरती रात के घने अंधेरे में अपने सैलून में असहाय सा अकेला खड़ा है गनपत। लाइट नहीं है, इसलिए अंधेरे की काली परतों को चीरने के लिए धुंआती ढिबरी जल रही है। प्रकाश की लौ कितनी मद्धम और कंपकपाती क्यों न हो, वह अंधेरे के शाप में बिंधे अक्स को धुंधला धुंधला उजागर कर ही देती है। फिर यह ढिबरी तो सैलून में जल रही है जहां ग्राहक और हज्जाम दोनों की सुविधा के लिए हर दीवार पर कई कई कोणों में आईने टंगे हैं। आईने ढिबरी के कांपते उजाले को प्रतिबिंबित कर-कर के उजाले की एक श्रृंखला बना देते हैं। साथ ही गनपत की असहायता को भी कई गुना बढ़ा देते हैं। इसी के साथ अनायास फोकस में आता है झंडापुर के नुक्कड़ नाटक से लौटे गनपत के तरुण पुत्र रोशनलाल का दहशत भरा चेहरा। दहशत मौत का स्मरण कराती है, मौत का पर्याय नहीं होती। दहशतजदा आदमी भी शायद यह सत्य नहीं जानता। जानता है कैमरा जो सैंकड़ों ढिबरियों के आवर्धित प्रकाश में हृदय के अंतस्तल में दबी-ढकी परतों के चेहरे को भी उघाड़ लाता है। कैमरा देखता है, खौफ के बावजूद ''बेइंसाफी और क्रूरता के विरुद्ध उसके हृदय में जो प्रतिवाद जन्मा था, जीवन का प्रथम प्रतिवाद, पहला इंकार, पहला विशाल गुस्सा और अपार घृणा, उसे उसने हृदय में ही रखने का फैसला किया, उस दिन तक के लिए, जब . . .।''
एक बार फिर 'जब'। यानी फिर रस में व्यवधान! लेकिन अब पाठक ने झल्लाना छोड़ दिया है। वह उमग कर योगेंद्र आहूजा के खेल में शामिल हो गया है। शायद बचपन की स्मृतियों को ताजा करके घुटन भरे माहौल में 'टीलो' खेलने का शौक चर्रा आया हो। वह समझ गया है, लेखक उसे भरमाने के लिए इशारे करके गोटी को कहीं छुपा आता है और खुद इत्मीनान से टहलता हुआ कहीं दूर निकल जाता है, मानो पिछली बात से कोई वास्ता नहीं।
पाठक जानता है, लेखक की इत्मीनान भरी अगली यात्रा में ही उसे टीलो की अगली गोटी मिलेगी। इसलिए अपनी अंतश्चेतना को दो भागों में विभाजित कर वह नेपथ्य और रंगमंच दोनों जगह पर बनी रहने वाली सक्रियता को देखने नहीं, गुनने लगता है। टीलो खेल को जीतने का एक ही मूलमंत्र है - अंतर्सूत्रों पर गहरी पकड़।
योगेंद्र आहूजा चूंकि औपन्यासिक संवेदना के कथाकार हैं, इसलिए कहानी में अनेक अंतर्कथाओं और चरित्रों को बुनते हुए युग की विडंबनाओं को नहीं, विडंबनाओं को बनाने वाली परिघटनाओं, मानसिकताओं और प्रक्रियाओं को थहा लेना चाहते हैं। यही वजह है कि उनकी कहानियों में समय एकरैखिक गति से आगे नहीं बढ़ता, तमाम नियमों और अनुशासन की धज्जियां उड़ाते हुए अपनी वर्तुलाकार गति में कभी बदलाव के अंधेरों को लिए आता है, कभी बदलाव से पहले की दमघोंटू सर्जक चुप्पी' की अनिवार्यता को। 'पांच मिनट' कहानी में उनकी यह तकनीक अपने चरम उत्कर्ष पर है।
रोहिणी अग्रवाल के फेसबुक वॉल से साभार।
रविवार, 23 अप्रैल 2017
फिल्म निर्माण में बाधा बनती बिहार के सिनेमाघर पर विनोद अनुपम की एक टिप्पणी
फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम का कॉलम हर हफ्ता दैनिक प्रभात खबर में पढ़ने को मिलता है। इस बार अनुपम जी ने अपने आलेख में बिहार में सिनेमाघर की दयनीय होती स्थिति में बिहारी फिल्म निर्माण की बाधाओं को उकेरने की कोशिश की है जिससे आप भी पढ़ें।
सिनेमाघर बनाएं,तभी बनेंगे सिनेमा
आज जबकि सलमान और शाहरुख की फिल्मों के लिए दूसरे हफ्ते में प्रवेश करना बडी बात मानी जाती है,’अनारकली ऑफ आरा’ जैसी फिल्म का कुछ शहरों के कुछ सिनेमाघरों में पांचवे हफ्ते में प्रवेश करना चकित करता है।उल्लेखनीय है कि बिहार की पृष्ठभूमि पर बिहारी सितारों और तकनीशियनों के साथ बनी यह फिल्म बिहार से पहले हफ्ते में ही बाहर हो गई थी। पहले हफ्ते के आंकडों के अनुसार भी मुम्बई में बॉक्स ऑफिस पर इस फिल्म ने लगभग 44 लाख की कमाई की,जबकि बिहार में कुल जमा 4 लाख। वास्तव में ऐसी बात नहीं कि जो फिल्म जुहू(मुम्बई),गुडगांव और जामनगर में पांचवे हफ्ते में भी देखी जा रही है,वह बिहार ने देखनी नहीं चाही,सच यह है कि सिनेमा देखने के लिए चाहिए सिनेमाघर,और बिहार के कई जिलों में सिनेमाघर हैं ही नहीं।
बिहार में 80 के दशक तक 450 से अधिक सिनेमाघर थे,आज इसकी संख्या घटकर 200 के करीब रह गई है। पटना में कभी समय था जब मोना,एलफिंस्टन, रिजेन्ट, रुपक, चाणक्य, वीणा, अप्सरा, वैशाली, पर्ल जैसे लगभग शहर के सभी कोनों में सिनेमाघर थे। इसके अलावे दानापुर, खगौल और पटना सिटी में कई सिनेमाघर थे। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इनकी क्षमता अमूमन 300 से ऊपर की होती थी। आज सिनेमाघर ही नहीं घटे,मोना और रिजेन्ट की तरह जो बचे हैं,उनकी क्षमता आधे से भी कम रह गई है। इन्हीं सिनेमाघरों को ‘दंगल’ का दवाब झेलना पडता है, ‘अनारकली’ के लिए भी गुंजाइश निकालनी पडती है, और भोजपुरी फिल्मों के लिए भी। ऐसे में किसी फिल्म को वे चाहकर भी लगाए नहीं रह सकते, क्योंकि अगली फिल्म को जगह चाहिए होती है।
सिंगल थिएटर सभी जगह बंद हुए हैं,लेकिन वहां उसकी भरपाई मल्टीप्लेक्स ने कर दी है,जबकि बिहार में सिनेमाघर बंद तो हुए,नए नहीं खुले। जाहिर है व्यवसाय के नाम पर सिनेमा में बिहार की भागीदारी एक प्रतिशत से भी कम होती चली गई। ऐसे में बिहार में सिनेमा के विकास के चाहे जितने सपने पाल लें,उन्हें तब तक साकार नहीं किया जा सकता, जब तक हम दर्शक बनाने की व्यवस्था नहीं करें,दर्शक तब बनेंगे जब सिनेमाघर बनेंगे। जाहिर है कोई क्यों ‘अनारकली’,’मिथिला मखान’ या ‘गुटरू गुटरगूं’ परिकल्पित करे,जबकि व्यवसाय के लिए उसे मुम्बई,जामनगर और गुडगांव का ही मुंह जोहना पडे।
सिनेमाघर बनाएं,तभी बनेंगे सिनेमा
आज जबकि सलमान और शाहरुख की फिल्मों के लिए दूसरे हफ्ते में प्रवेश करना बडी बात मानी जाती है,’अनारकली ऑफ आरा’ जैसी फिल्म का कुछ शहरों के कुछ सिनेमाघरों में पांचवे हफ्ते में प्रवेश करना चकित करता है।उल्लेखनीय है कि बिहार की पृष्ठभूमि पर बिहारी सितारों और तकनीशियनों के साथ बनी यह फिल्म बिहार से पहले हफ्ते में ही बाहर हो गई थी। पहले हफ्ते के आंकडों के अनुसार भी मुम्बई में बॉक्स ऑफिस पर इस फिल्म ने लगभग 44 लाख की कमाई की,जबकि बिहार में कुल जमा 4 लाख। वास्तव में ऐसी बात नहीं कि जो फिल्म जुहू(मुम्बई),गुडगांव और जामनगर में पांचवे हफ्ते में भी देखी जा रही है,वह बिहार ने देखनी नहीं चाही,सच यह है कि सिनेमा देखने के लिए चाहिए सिनेमाघर,और बिहार के कई जिलों में सिनेमाघर हैं ही नहीं।
बिहार में 80 के दशक तक 450 से अधिक सिनेमाघर थे,आज इसकी संख्या घटकर 200 के करीब रह गई है। पटना में कभी समय था जब मोना,एलफिंस्टन, रिजेन्ट, रुपक, चाणक्य, वीणा, अप्सरा, वैशाली, पर्ल जैसे लगभग शहर के सभी कोनों में सिनेमाघर थे। इसके अलावे दानापुर, खगौल और पटना सिटी में कई सिनेमाघर थे। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इनकी क्षमता अमूमन 300 से ऊपर की होती थी। आज सिनेमाघर ही नहीं घटे,मोना और रिजेन्ट की तरह जो बचे हैं,उनकी क्षमता आधे से भी कम रह गई है। इन्हीं सिनेमाघरों को ‘दंगल’ का दवाब झेलना पडता है, ‘अनारकली’ के लिए भी गुंजाइश निकालनी पडती है, और भोजपुरी फिल्मों के लिए भी। ऐसे में किसी फिल्म को वे चाहकर भी लगाए नहीं रह सकते, क्योंकि अगली फिल्म को जगह चाहिए होती है।
सिंगल थिएटर सभी जगह बंद हुए हैं,लेकिन वहां उसकी भरपाई मल्टीप्लेक्स ने कर दी है,जबकि बिहार में सिनेमाघर बंद तो हुए,नए नहीं खुले। जाहिर है व्यवसाय के नाम पर सिनेमा में बिहार की भागीदारी एक प्रतिशत से भी कम होती चली गई। ऐसे में बिहार में सिनेमा के विकास के चाहे जितने सपने पाल लें,उन्हें तब तक साकार नहीं किया जा सकता, जब तक हम दर्शक बनाने की व्यवस्था नहीं करें,दर्शक तब बनेंगे जब सिनेमाघर बनेंगे। जाहिर है कोई क्यों ‘अनारकली’,’मिथिला मखान’ या ‘गुटरू गुटरगूं’ परिकल्पित करे,जबकि व्यवसाय के लिए उसे मुम्बई,जामनगर और गुडगांव का ही मुंह जोहना पडे।
मंगलवार, 18 अप्रैल 2017
जैनेंद्र कुमार के साहित्य में स्त्री और भारतीय संस्कृति "त्यागपत्र" के संदर्भ में (समीक्षा)
हिन्दी उपन्यास में मनोविश्लेषणात्मक परंपरा के प्रवर्तक जैनेंद्र कुमार का स्थान प्रेमचंदोत्तर उपन्यासकारों में बहुत ही महत्वपूर्ण है।जैनेन्द्रजी का कथा-साहित्य भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का संवाहक रहा है । उन्होंने अपनी संस्कृति और परंपरा के परिप्रेक्ष्य में ही भारतीय मानस की पहचान की है । उन्होंने अपने उपन्यासों एवं कहानियों में अनेक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं जैसे- ईश्वर, आस्तिकता-नास्तिकता, बुद्धि-भावना, अंतःप्रेरणा -तर्क, हिंसा-अहिंसा, प्रेम और वासना, पति और पत्नी, सतीत्व, शरीर की पवित्रता, पाप-पुण्य, समर्पण आदि ।
जैनेंद्र स्वातंत्रयोत्तर भारत में भौतिकता की चमक दमक, परिवार के बिखराव, धन लोलुपता, विवाहेतर संबंधों को देखते हुए ऐसे मुद्दों को उठा रहे थे। जैनेंद्र ने अपने जीते जी देश की राजनीतिक, सामाजिक संरचना में कई रंग और बदलाव महसूस किए। अपने समय व समाज को समझने की उनकी जो दृष्टि थी, उसके अनुकूल उन्होंने पात्र रचे। समाज पर टिप्पणी की, विश्लेषण किया। जैनेंद्र के रचना संसार में नायिकाएँ लेखक से कई बार विद्रोह कर देती हैं, वे जैनेंद्र के स्वप्नों और मंतव्यों से अलग डगर पकड़ने लगती हैं। उनकी स्त्रियों की सीमाएँ हो सकती हैं, यह भी कि वे वैसी स्वतंत्र नहीं जो स्वयं निर्णय लें और उसके सुख दुख झेलें। दरअसल वे घटनाओं की शिकार हैं और 'प्रतिक्रिया' व्यक्त करती हैं। महत्वपूर्ण यह है कि इस प्रक्रिया में वे निश्चित रूप से अपने समय को पीछे छोड़ती हैं। जिस स्त्री ने परंपरा से विद्रोह किया उसी ने ठोकर खाने के बावजूद नई राह बनाई। परंपरा को जैनेंद्र की स्त्रियों ने तोड़ा, नई राह आधुनिक स्त्री विमर्श बना रहा है।
जैनेन्द्र ने प्रेमचन्द के सामाजिक यथार्थ को नहीं अपनाया, लेकिन वे प्रेमचन्द के विलोम नहीं बल्कि पूरक थे। प्रेमचन्द और जैनेन्द्र को साथ-साथ रखकर ही जीवन और इतिहास को उसकी समग्रता के साथ समझा जा सकता है। जैनेन्द्र ने भाषा के स्तर पर काफी मेहनत की। जैनेंद्र के उपन्यासों में दार्शनिक और आध्यात्मिक तत्वों के समावेशन से दूरूहता आई है परंतु ये सारे तत्व जहाँ-जहाँ भी उपन्यासों में समाविष्ट हुए हैं, वहाँ वे पात्रों के अंतर का सृजन प्रतीत होते हैं। जैनेंद्र के पात्र बाह्य वातावरण और परिस्थितियों से कम प्रभावित लगते हैं जबकि अंतर्मुखी गतियों से ज्यादा संचालित। पात्रों की अल्पता के कारण भी जैनेंद्र के उपन्यासों में वैयक्तिक तत्वों की प्रधानता रही है।
इनके सभी उपन्यासों में प्रमुख पुरुष पात्र सशक्त क्रांति के समर्थक हैं। बाह्य स्वभाव, रुचि और व्यवहार में एक प्रकार की कोमलता और भीरुता की भावना होकर भी ये अपने अंतर में महान विध्वंसक होते हैं। उनका यह विध्वंसकारी व्यक्तित्व नारी की प्रेमविषयक अस्वीकृतियों की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप निर्मित होता है। इसी कारण जब वे किसी नारी का थोड़ा भी आश्रय, सहानुभूति या प्रेम पाते हैं, तब टूटकर गिर पड़ते हैं और तभी उनका बाह्य स्वभाव कोमल हो जाता है। जैनेंद्र के नारी पात्र प्रायः उपन्यास में प्रधानता लिए हुए होते हैं। उपन्यासकार ने अपने नारी पात्रों के चरित्र-चित्रण में सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक दृष्टि का परिचय दिया है। स्त्री के विविध रूपों, उसकी क्षमताओं और प्रतिक्रियाओं का विश्वसनीय अंकन किया है। 'सुनीता', 'त्यागपत्र' तथा 'सुखदा' आदि उपन्यासों में ऐसे अनेक अवसर आए हैं, जब उनके नारी चरित्र भीषण मानसिक संघर्ष की स्थिति से गुज़रे हैं। नारी और पुरुष की अपूर्णता तथा अंतर्निर्भरता की भावना इस संघर्ष का मूल आधार है। वह अपने प्रति पुरुष के आकर्षण को समझती है, समर्पण के लिए प्रस्तुत रहती है और पूरक भावना की इस क्षमता से आल्हादित होती है, परंतु कभी-कभी जब वह पुरुष में इस आकर्षण मोह का अभाव देखती है, तब क्षुब्ध होती है, व्यथित होती है। इसी प्रकार से जब पुरुष से कठोरता की अपेक्षा के समय विनम्रता पाती है, तब यह भी उसे असह्य हो जाता है।
गांधीवादी चिंतक, मनोवैज्ञानिक कथा साहित्य के सूत्रधार, साहित्यकार जैनेन्द्र को उनके विशिष्ट दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक साहित्य के लिये भी जाना जाता है। हिन्दू रहस्यवाद, जैन दर्शन से प्रभावित जैनेन्द्र का सम्पूर्ण साहित्य सृजन प्रक्रिया की विलक्षणता और सुनियोजित संश्लिष्टता का अनन्यतम उदाहरण है। जैनेन्द्र के बारे में अज्ञेय ने कहा था आज के हिन्दी के आख्यानकारों और विशेषतय: कहानीकारों में सबसे अधिक टेक्निकल जैनेन्द्र हैं। तकनीक उनकी प्रत्येक कहानी की और सभी उपन्यासों की आधारशिला है। स्त्री विमर्श के प्रबल हिमायती जैनेन्द्र ने कहानी के अंदर प्रेम को संभव किया।
कहानी खेल से उनके लेखन का सिलसिला जो प्रारंभ हुआ तो 24 साल की उम्र तक उपन्यास परख आ गया। उपन्यास 'परख' से सन् 1929 में पहचान बनी। 'सुनीता' का प्रकाशन 1935 में हुआ। 'त्यागपत्र' 1937 में और 'कल्याणी' 1939 में प्रकाशित हुए। 1929 में पहला कहानी-संग्रह 'फांसी' छपा। इसके बाद 1930 में 'वातायन', 1933 में 'नीलम देश की राजकन्या', 1934 में 'एक रात', 1935 में 'दो चिड़ियां' और 1942 में 'पाजेब' का प्रकाशन हुआ। सन् 1929 में ‘परख’ से आरंभ कर सन् 1985 में ‘दशार्क’ के लेखन तक उनका रचनाकाल विस्तृत है। इस समयावधि में जैनेन्द्र ने कुल तेरह उपन्यास लिखे जिनमें से अधिकतर उपन्यासों का कथ्य स्त्री संबंधी है। लेखक ने अपने कुछ उपन्यासों के शीर्षक भी कथा की मुख्य चरित्र रही स्त्रियों के नाम पर ही दिए हैं। जैसे - ‘सुनीता’, ‘कल्याणी’, ‘सुखदा’।
समय और हम, साहित्य का श्रेय और प्रेय, प्रश्न और प्रश्न, सोच-विचार, राष्ट्र और राज्य, काम पे्रम और परिवार, अकाल पुरुष गांधी आदि निबंध जैनेन्द्र की दार्शनिकता और नितांत मौलिक पदस्थापनाओं के कारण जाने पहचाने गए। अपने अधिकांश साहित्य का लेखन डिक्टेशन से कराने वाले जैनेन्द्र के लेखन पर महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर का अत्यधिक प्रभाव था। जिसके प्रत्यक्ष उदाहरण उनके उपन्यास सुनीता और सुखदा हैं जो टैगोर के उपन्यास- घरे बाहरे से प्रेरित हैं। परख और सुनीता को पढ उपन्यासकार मुंशी प्रेमचन्द ने एक बार कहा था जैनेन्द्र में गोर्की और शरतचन्द्र चटर्जी दोनों एक साथ देखने को मिलते हैं। बहरहाल बांग्ला साहित्यकार शरतचन्द्र के उपन्यासों की ही तरह उनके तकरीबन सभी उपन्यासों में स्त्री चरित्र पूरी दृढता के साथ नजर आते हैं। त्याग-पत्र की मृणाल और सुनीता का केन्द्रीय चरित्र सुनीता उपन्यास में अपनी मौजूदगी का अहसास प्रखरता से कराता है। हालांकि उनके स्त्री चरित्र आत्मा की ट्रेजेडी और आत्म प्रपीढन से ग्रसित नजर आते हैं।
जैनेंद्र की आरंभिक तीनों रचनाओं परख (1929), त्यागपत्र (1937) व सुनीता (1935) के केंद्र में स्त्री है। प्रायः प्रेम करती स्त्रियाँ। प्रेम करती ये स्त्रियाँ विचारशील और कर्मठ हैं। अपने पारिवारिक, सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करती ये वे स्त्रियाँ हैं, जिन्होंने पारिवारिक मर्यादा, परंपरा, नियमों की पाखंडी तस्वीर को तोड़ा और जीतने हारने, संघर्ष करने के लिए परंपरागत औरत के चोले से बाहर निकल आईं। जैनेंद्र की साहित्यिक चेतना 'त्यागपत्र' में चरमोत्कर्ष पर है। मृणाल के चरित्र, संघर्ष और त्रासदी ने उसके व्यक्तित्व को अद्भुत ऊँचाई प्रदान की है। 'त्यागपत्र' में आधुनिक हिंदी गद्य साहित्य का सशक्त स्त्री विमर्श सिर्फ स्त्रियाँ ही कर सकती हैं, यदि ऐसी कोई बाध्यता न हो तो प्रेमचंद और जैनेंद्र की कुछ रचनाएँ आधुनिक स्त्री विमर्श के समकक्ष ठहरती है।
इन स्त्रियों ने कर्तव्य निर्वाह करते हुए जिस प्रकार नैतिकता, मर्यादा का विश्लेषण किया, जिस तरह सामाजिक संरचना में रचे बसे पाखंड को तार तार किया वह भविष्य की अधिकारसंपन्न स्त्री के लिए रास्ता बनाता है। जैनेंद्र की इन स्त्रियों ने कहीं स्वेच्छा से अपना जीवन नहीं चुना है। अक्सर यही हुआ कि उनके मन की जो बात थी, मन में ही उसका दम घुट गया। लेकिन परिस्थितियों का सामना करने में इनके वजूद की जद्दोजहद प्रकट होती है। नियति की शिकार होने के बाद भी इन स्त्रियों ने अपने लिए रास्ते जरूर बनाए या कम से कम रूढ़ रास्तों से ऐतराज दिखाया।
मृणाल हिंदी साहित्य की पहली आधुनिक स्त्री है जो नैतिकता की परंपरागत मान्यता को सिरे से खारिज करती है। वह न सिर्फ अपने स्त्रीत्व व अस्मिता के प्रति सजग है बल्कि खुद को तिल तिल जला कर भी वह नया रास्ता अख्तियार करती है। सच है कि जलना उसके जैसी स्त्रियों के नसीब में होता है, पर वह घर में इज्जत बचाते दम नहीं तोड़ती। मृणाल ने घर छोड़ा, बाहर निकली और हाशिए के लोगों के बीच पहुँच गई। यहीं उसका व्यक्तित्व नए आयाम पाता है। उसके पास समाज व लोगों को समझने के लिए तार्किक बुद्धि है जो कथित सभ्य समाज के ढोंगों का पर्दाफाश करती है। जिंदगी के आखिरी मुकाम पर वह शराबी, जुआरी, भिखारियों, वेश्याओं जैसे कथित दुर्जनों के बीच है। मृणाल इनके बीच भी इनकी ऊपरी परत खरोंच कर इनसानियत पा जाती है। मृणाल समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों की सच्ची सहृदयता का सम्मान करती है। तभी वह कहती है 'वहाँ छल असंभव है जो छल कि शिष्ट समाज में जरूरी ही है।' मनुष्य हो तो भीतर एक मनुष्य होना होगा। कलई वाला सदाचार यहाँ खुल कर उघड़ रहता है। यहाँ खरा कंचन ही टिक सकता है। क्योंकि उसे जरूरत नहीं कि वह कहे 'मैं पीतल नहीं हूँ'। दरअसल मृणाल सभ्य समाज के सदाचार की ही शिकार थी। किसी से प्रेम कर बैठना ही मृणाल का कदाचार था। उसका पालन पोषण तो इसलिए हो रहा था कि वह एक अच्छी आर्य स्त्री बने। जबरदस्ती दूसरे से विवाह के बाद जब वह दांपत्य की नींव सच्चाई पर रखना चाहती है तो पति की नजर में दुराचारी हो जाती है। सच्चाई का बोझ पति की मर्दानगी के लिए कहर है। पछाँह का घी खाया मर्द उसकी बेंत से धुनाई करता है। साथ ही यह धौंस भी देता है कि 'बहू बेटियों की चलन की रीति नीति हुआ करती है।' '...अपना कुल शील चला जाता है, वह न निभा तो फिर क्या रह गया'। इस कुल शील का मतलब यही था कि पति की हर जायज नाजायज इच्छा को शिरोधार्य किया जाए। कुल शील की ओखल में स्त्री के सिर पर दनादन मूसल बरसते रहें और वह सहती रहे। पति ने दुश्चरित्रता का आरोप लगा कर मृणाल को छोड़ दिया तो उसका कोई सहारा नहीं। मायके में उसकी जगह तभी तक थी जब तक पति का घर था। घर आने की शर्त ही थी कि 'वहाँ अपनी गृहस्थी अच्छी तरह सँभालना और पति को सुखी रखना' पर मृणाल से तो गृहस्थी ही बिखर गई थी अब नैहर में ठौर कहाँ? स्त्री को मिलने वाले आशीर्वादों का बोझ कैसा होता है, इसको जैनेंद्र ने समझा है।
'पतिव्रता रहने पूतों फलने, बड़भागिन होने आदि के आशीर्वाद उन्होंने ऐसे प्रणत भाव से दिए कि मानो उसके नीचे वह गड़ कर भी मर जाए तो धन्य हो जाए' पर मृणाल विद्रोहिणी निकली उसने 'अन्य' होना स्वीकार न किया। वह कहती है 'क्यों पतिव्रता को यह चाहिए कि पति उसे नहीं चाहता तब भी अपना बोझ डाल दे? मुझे देखना भी नहीं चाहते, यह जान कर मैंने उनकी आँखों के आगे से हट जाना स्वीकार कर लिया।' मृणाल ने अलग रहना स्वीकार किया और पति ने उसे शहर के बाहरी हिस्से की एक कोठरी में पटक दिया। आत्महत्या का विकल्प मृणाल के सामने कभी नहीं था। वह मरने को अधर्म मानती है। उसे जीना था, भले मर कर ही सही। रोटी चलाने में मृणाल की मदद एक निहायत ही मामूली आदमी करता है। यह आदमी मृणाल के रूप यौवन पर आसक्त है। मृणाल इसे समझती है फिर भी वह सहारा देने के लिए उसकी कृतज्ञ है। शीघ्र ही मृणाल परिश्रम से अपनी जीविका अर्जित करने लगती है। उसके गर्भ धारण करते ही दूसरा आदमी उसे छोड़ कर भाग जाता है। मृणाल स्वयं यही चाहती थी कि वह अपने परिवार में लौट जाए। क्योंकि वह समझती थी कि उसके साथ सोने के कारण वह उसे बदजात और बाजारू औरत ही समझेगा। दुख और अपमान की पीड़ा मृणाल को इस मनःस्थिति में पहुँचा देती है कि वह अपने दर्द से ही दवा हासिल करती है : 'मेरा मन पक्का होता रहे कि कोई मुझे कुचले, तो भी मैं कुचली न जाऊँ और इतनी जीवित रहूँ कि उसके पाप के बोझ भी ले लूँ और सबके लिए क्षमा की प्रार्थना करूँ।'
इतनी उदारता निर्वेयक्तिक सोच से ही आ सकती है। मृणाल ने अपने कष्टों को भी साक्षी भाव से देखा तभी अहं का विर्सजन कर पाई। दूसरे मर्द के छोड़ कर जाने के बाद, प्रसूति के लिए मृणाल जब मिशनरी अस्पताल पहुँचती है तो वहाँ उसे धर्म परिवर्तन का प्रलोभन मिलता है किंतु वह धर्म परिवर्तन को राजी नहीं होती है। गौरतलब है कि धर्म परिवर्तन से इनकार वह इसलिए नहीं करती कि हिंदू धर्म में उसकी गहरी आस्था है। ऐसा वह इसलिए करती है कि वह स्त्री है और उसकी स्थिति के लिए किसी भी धर्म में कोई रियायत नहीं है।
जैनेंद्र के स्त्री पात्रों में एक और समानता है वे सभी, रिश्तों की बुनियाद सच्चाई पर रखना चाहती हैं। अपने तथा दूसरे के प्रति ईमानदार रहने की आकांक्षी हैं। परख की कट्टो, त्यागपत्र की मृणाल, सुनीता की सुनीता, मुक्तिबोध की नीना और दर्शार्क की वेश्यावृति करने वाली रंजना, ये सभी अपने कार्य के प्रति जिम्मेदार हैं और सीधा जवाब देती हैं। जैनेंद्र के यहाँ स्त्री प्रेम को स्वीकारती है, पर वह यथासंभव विवाह संस्था के संरक्षण का प्रयास करती है। जैनेंद्र की कहानी 'जाह्नवी' में स्त्री प्रेमी की प्रतीक्षा में हर दिन कौओं को रोटी खिलाती है। जाह्नवी रोटी खाते कौओं से मनुहार करती है कि वे उसके सारे अंग चाहे नोच खा लें पर दो आँखों को छोड़ दें। ये आँखें पियु का इंतजार कर रही हैं। इसी लड़की 'जाह्नवी' का जब विवाह तय हो जाता है तो वह भावी पति को पत्र लिख अपने प्रेमी के बारे में बताती है। वह साफ साफ कहती है कि जीवनसंगिनी बनने में वह असमर्थ है। हाँ अनुगता बन कर वह कर्तव्य निर्वहन भली भाँति कर सकती है। संयोग से जाह्नवी की इस सच्चाई का सम्मान होता है। पर त्यागपत्र में मृणाल की सच्चाई ही उसकी मुसीबतों का कारण बन जाती है। मुसीबतों को न्यौता तो मृणाल खुद देती है प्रेम करके। इस प्रेम को यह सिला मिलता है कि उसे 'कुलबोरन' कहा जाता है।
मृणाल भाई के संरक्षण व भाभी के अनुशासन में बड़ी होती है। भाभी के लिए वह दायित्व है। मृणाल को सुगृहणी बना कर ससुराल भेजना भाभी की जिम्मेदारी है। यहाँ दो स्त्रियों के मध्य निकटता न होकर अनुशासन की औपचारिक दूरी है। घर में मृणाल मात्रा अपने भतीजे प्रमोद के साथ नैसर्गिक रूप से रहती है।
युवा होती लड़कियों की तरह वह खुद से, आकाश से, बादल से, तारों से, हवा से प्रेम करती है। इन्हीं प्रेमों के बीच प्रेम मूर्त हो गया तो बगिया की तरह लहलह हो जाती है। यही प्रेम मृणाल को हुआ है जिसकी वजह से वह चिड़िया बन जाना चाहती है। चिड़िया नन्हीं है पर स्वतंत्र है, उड़ सकती है। मृणाल उड़ने से पहले ही पकड़ ली गई और सजा मुकर्रर हो गई।
ससुराल से लौट कर मृणाल बुझी बुझी है। प्रमोद उससे कुछ सुनना चाहता है जो वह सुनता है, उसके बाल मन को भेदने के लिए पर्याप्त है 'तुम सब लोगों के लिए मैं पराई हूँ। तेरी माँ ने मुझे धक्का देकर पराया बना दिया है। पर मुझे जहाँ भेज दिया है प्रमोद मेरा मन वहाँ का नहीं है।'
मृणाल यहाँ स्पष्टतया कहती है कि उसे धक्का देकर खदेड़ा गया है। वह अवांछित वस्तु है। इसका उसे एहसास है। मायके में उसे सुनना पड़ा 'आइंदा इस तरह बिना फूफा की मर्जी से चली आएगी तो वह उन्हें अपने घर में आश्रय न देंगे।' मृणाल आश्रिता और सामान बन कर रह गई है। वह प्रमोद से खुद को 'फूफा की चीज' कहती है।
'त्यागपत्र' की रचना 1937 में हुई थी। उस समय के भारत में महिला सशक्तिकरण व महिला साक्षरता दर का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। मृणाल इतनी बहादुर नहीं थी कि घर छोड़ कर, प्रेमी के साथ निकल जाती। उसने बेमेल विवाह में भरसक सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया था, पर पति के व्यवहार ने उसे तोड़ दिया। ऐसा नहीं था कि मृणाल प्रतिरोध नहीं करती। पति के ठहरे गर्भ को गिराने की कोशिश, विरोध था। मृणाल के गर्भ पर सिर्फ मृणाल का अधिकार था। इसके विपरीत मृणाल दूसरे आदमी (कोयले वाले) से ठहरे गर्भ को जन्म देती है। क्योंकि 'इस पाप को ढो रही हूँ' कहने के बावजूद वह कोयले वाले की कृतज्ञ है। आसनाई के लिए ही सही पर उसने मृणाल को घर परिवार छोड़ कर सहारा दिया था। मृणाल युवा है और अपनी दैहिक जरूरतों को छिपाती नहीं। वह कहती है 'तन दे सकूँगी शायद वह अनिवार्य हो।' तन की जरूरत के बारे में इतने कुंठामुक्त तरीके से तब कितनी औरतें बोल रही थीं? मृणाल देह को पारस्परिक आवश्यकता मान रही है पर वह देह का सौदा करने के सख्त खिलाफ है। यह उसका ऊँचा वसूल है। अन्यथा दर दर की ठोकर से उसे कुछ राहत अवश्य मिली होती। मृणाल की यौवन की उमंगें बेरहमी से कुचली गई थीं। फिर भी मृणाल अपनी आंतरिक गरिमा व स्वाभिमान से समझौता नहीं करती। जैनेंद्र स्त्री की क्षमता का विस्तार घर से बाहर भी चाहते हैं।
इन नारी पात्रों ने समाज और संस्कृति की बलिवेदी पर अपना आत्मबलिदान किया है । जैनेन्द्रजी ने न तो इनका आदर्शवादी समाधान दिया और न ही मार्क्सवादियों की तरह क्रांति का आह्वान किया, बल्कि बुद्धिजीवी वर्ग पर ही यह प्रश्न अनुत्तरित छोड़ दिया । उनके ये नारी पात्र आत्म-बलिदान करते हुए पाठकीय संवेदना को जाग्रत करने में सफल हो गए हैं । यहाँ जैनेन्द्रजी ने सटीक चित्रण कर सांस्कृतिक परिष्करण को हमारे समक्ष एक आवश्यकता के रूप में प्रस्तुत कर दिया । इन स्त्रियों की पीड़ा सामाजिक विषमता जनित होते हुए भी उन्होंने समाज की महत्ता को स्वीकार किया । मृणाल कहती है- “ मैं समाज को तोड़ना फोड़ना नहीं चाहती । समाज टूटा कि फिर हम किसके भीतर बनेंगे या किसके भीतर बिगड़ेंगे?” अपनी ओर से नितांत निरपराध होते हुए भी वेदना और कवकलता में इन नारियों का घुलना पाठकीय संवेदना को जाग्रत करने और सहानुभूति प्राप्त करने में सफल रहा है । इससे समाज और संस्कृति की विसंगतियों को जैनेन्द्रजी ने उजागर करके भी इनके महत्त्व को नकारा नहीं ।
जैनेन्द्र कुमार स्त्री को ‘सर्वस्व’ रूप में स्वीकार करते हैं। यह रूप अपनाते ही 'स्त्री’ पूरे विश्व का मूलाधार बन जाती है। उनका मानना है –‘स्त्री ही व्यक्ति को बनाती है, घर को, कुटुम्ब को बनाती है। फिर उन्हें बिगाड़ती भी वही है। हर्ष भी वही और विमर्श भी। ठहराव भी और उजाड़ भी। दूध भी और खून भी। रोटी भी और स्कीमें भी। और फिर आपकी मरम्मत और श्रेष्ठता भी सब कुछ स्त्री ही बनाती है। धर्म स्त्री पर टिका है, सभ्यता स्त्री पर निर्भर है और फ़ैशन की जड़ भी वही है। एक शब्द में कहो ,...दुनिया स्त्री पर टिकी है।
त्यागपत्र में मृणाल एक प्रबल चरित्र के रूप में उभरती है। वह अत्यंत उदार व आदर्शवादी चरित्र के रूप में उभरती है जो स्वयं के जीवन में अपार कष्ट पाकर भी सदा दूसरों के लिए केवल सुख की ही आकांक्षा रखती है। उसके मन में अपनी परिस्थितियों के लिए ज़िम्मेदार लोगों के लिए कोई कटुता नहीं और न ही वह किसी को दोषी मानती है। मृणाल अपने जीवन में जिससे भी जुड़ना चाहती है या जुड़ी वह केवल सत्य और पूरी निष्ठा के साथ, फिर उस पर अपना सर्वस्व न्योछावर करना चाहा। समाज की नजरों में वह एक बाज़ारू औरत है किन्तु तन देकर धन की उम्मीद करना वह बेमानी समझती है। जीवन में मिली ठोकरों की प्रतिक्रिया वह केवल मौन आत्मसंघर्ष के रूप में व्यक्त करती है। अपने संघर्षमय जीवन में सामाजिक नियमों का वह सदा तिरस्कार करती है। मृणाल जैसा स्त्री चरित्र तथाकथित सभ्य समाज की ‘सभ्यता’ पर सवालिया निशान लगाता है, समाज के भीतर दोहरा स्वरूप लेकर विचरण करते लोगों को बेनक़ाब करता है और विवश करता है बुद्धिजीवी वर्ग को सामाजिक नियम-कानून, नैतिकता, आदर्श की परिभाषाओं पर पुनर्विचार करने के लिए।
वर्तमान संदर्भों में यह स्त्री चरित्र अधिक पारंपरिक और कम आधुनिक नज़र आती हैं। जिस युग में जैनेन्द्र उपन्यासों की रचना प्रारम्भ करते हैं अर्थात् 20वीं शताब्दी का दूसरा-तीसरा दशक, यह काल भी परम्परा और आधुनिकता के संघर्ष का समय है। कट्टो, सुनीता और मृणाल पारम्परिक इन अर्थों में हैं कि वे जानती हैं कि तत्कालीन सामाजिक संरचना के तहत वे कर्तव्यों से बंधी हैं। उनके यह कर्तव्य उनके परिवार के प्रति हैं। जैनेन्द्र के यहाँ परिवार और विवाह संस्कार परम्पराओं से जुड़ा है। अतः इनका निर्वाह करने वाली स्त्री पारम्परिक ही होगी। इन स्त्रियों में परिवार या विवाह संस्था को तोड़ने की इच्छा नहीं है क्योंकि इनसे कटकर या बाहर निकलकर ‘जीवन’ गर्त की ओर बढ़ता चला जाएगा। मृणाल के दुखद अंत के माध्यम से जैनेन्द्र यही संकेत देना चाहते हैं क्योंकि जैनेन्द्र स्त्री की स्वतंत्र सत्ता के पक्षधर नहीं हैं। ‘त्यागपत्र’ में प्रमोद के माध्यम से वे कहलवाते हैं- ‘विवाह की ग्रंथि दो के बीच की ग्रंथि नहीं है वह समाज के बीच की भी है। चाहने से वह क्या टूटती है। विवाह भावुकता का प्रश्न नहीं है, व्यवस्था का प्रश्न है।.. वह गांठ है जो बंधी कि खुल नहीं सकती। टूटे तो टूट भले ही जाए लेकिन टूटना कब किसका श्रेयस्कर है?’ पारम्परिक यह स्त्रियाँ इन अर्थों में भी हैं कि इन्हें अधिकारसंपन्नता प्राप्त नहीं है जो कि तत्कालीन समय का भी प्रभाव है। अधिकार पाने हेतु यहाँ स्त्री लड़ती नहीं किन्तु स्त्री हेतु समाज के द्वारा बनाये गए नियमों व वर्जनाओं का पालन भी नहीं करती। स्वायत्तता की दरकार इन्हें नहीं है, पति के साथ होते हुए आर्थिक आत्मनिर्भरता की आवश्यकता भी इन्हें नहीं है क्योंकि जैनेन्द्र स्त्री को पुरुष की सहभागी के रूप में देखते हैं, प्रतिद्वंद्वी के रूप में नहीं। जैनेन्द्र कुमार का मत है- ‘स्त्री पुरुष के पौरुष स्पर्धा में न पड़े बल्कि उसे उसी रूप में धारण करके कृतार्थता का अनुभव करे। आज का कैरियिस्ट शब्द सतीत्व के अर्थ स्पष्ट करता है। कैरिज़्म में पुरुष से होड़ है। सतीत्व में पुरुष से योग और सहयोग से है|’ आज के आधुनिक संदर्भों में ऐसी मान्यताओं को इन स्त्री चरित्रों की सीमाओं के रूप में भी देखा जा सकता है। किन्तु जैसा कि कहा जा चुका है कि जैनेन्द्र कुमार का समय परम्परा व आधुनिकता के संघर्ष का समय रहा है और ऐसे समय में जैनेन्द्र परस्पर विरोध एवं प्रतियोगिता की अपेक्षा सामंजस्य का मार्ग चुनते हैं। उनके भीतर न जड़ परम्पराओं को ढोते रहने का आग्रह है और न ही आधुनिकता के नाम पर अपना सब कुछ ताक पर रख देने का चलन है। जैनेन्द्र के साहित्य का मूल तत्व ‘प्रेम’ है। ‘प्रेम’ का उत्कृष्ट रूप जैनेन्द्र ‘स्त्री’ के भीतर पाते हैं। यही कारण है कि परिवार तथा विवाह संस्थान बचाए रखने का दायित्व उन्होंने स्त्रियों के हाथ में दिया। ‘प्रेम’ के अभाव में जैनेन्द्र विवाह और परिवार की नीँव को कमज़ोर व अधूरा मानते हैं। दरअसल जैनेन्द्र ने मानवीय दुनिया की अपेक्षा आत्मिक दुनिया पर ज्यादा लिखा वे यथार्थ की जगह विचारों की बात ज्यादा करते हैं जो उन्हें रूसी साहित्यकार दास्तोएव्सकी के नजदीक रखता है। एक दौर वह था जब उपन्यास, कहानियों में यशपाल और जैनेन्द्र द्वारा नारी के बोल्ड चित्रण से उनकी साडी-जम्पर उतारवाद का प्रवर्तक भी कहा गया तथा उन पर साहित्य में नैतिकता की गिरावट और अश्लीलता के आरोप मढे गए, अपने ऊपर लगे इन आरोपों का जवाब जैनेन्द्र ने अपने निबंधों के जरिए ही दिया। अश्लीलता यदि है तो वस्तु में नहीं व्यक्ति में है, असल में नैतिकता की दुहाई देने वाले लोग वे ही हैं जो सुविधा प्राप्त हैं, वे अपने भोग और आराम को बचाये रखने के लिए नीतिवादिता से अपनी रक्षा में चारों ओर घेरा डालते हैं अंग्रेजी में एक शब्द है कंजरवेटिव नैतिकता की दुहाई ऐसे ही लोग देते हैं।
अपनी जिंदगी में उच्च आदर्शो को ओढने वाले सादगी-करूणा की प्रतिमूर्ति जैनेन्द्र सही मायने में सत्यान्वेषी थे जिनके लिए अपनी आत्मा की आवाज सर्वोपरि थी और जिसका पालन उन्होंने मरते दम तक किया।
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सोमवार, 3 अप्रैल 2017
अविनाश दास ने दिया अनारकली ऑफ आरा के सहयोगियों को धन्यवाद
पत्रकार से फिल्मकार बने अविनाश दास अपनी फिल्म "अनारकली ऑफ आरा" के आने और उसके प्रदर्शन के बाद आज अपने फेसबुक वॉल से फिल्म से जुड़े हर कलाकार को धन्यवाद दे रहे हैं। जितनी अच्छी फिल्म थी उतने ही अच्छे इंसान हैं अविनाश भाई। एक औपचारिक धन्यवाद देकर अविनाश भाई ने बता दिया कि हम मिट्टी के लोग मिट्टी से जुड़े रहना जानते हैं। हम न सफलता पाकर अहम् में डूब जाते हैं न ही असफलता पर रूक जाते हैं बल्कि अपने कर्मों का ईमानदारी पूर्वक वहन करते हुए आगे बढ़ते रहते हैं। अविनाश भाई जीवन में हमेशा सफल होते रहें, एक से बढ़कर एक अच्छी फिल्मों को करते हुए अपना और बिहार का नाम रौशन करते रहें । इन्हीं शुभकामनाओं के साथ पढ़ते हैं उनके शब्दों को।
फिल्म आयी, गयी। बातें हैं, बातें रहेंगी। हमारी तरफ किसी भी आयोजन की शुरुआत मंगलाचरण (Invocation) से होती है और समापन समदाउन (Thanksgiving Song) से होता है।
मैं सबसे पहले स्वरा [Swara Bhasker] का शुक्रिया करता हूं, जो अनारकली को कंसीव करने से लेकर स्क्रिप्ट और बाद की पूरी प्रक्रिया में पूरी तरह इनवाॅल्व रही। काफी ख़ून जलाया और कई बार ज़ख़्मी हुई, बीमार पड़ी।
डायरेक्टर आॅफ फोटोग्राफ़ी अरविंद कन्नाबिरन [Arvind Kannabiran] नहीं होते, तो शायद मैं बहुत असहाय होता। उन्होंने हमेशा मेरा उत्साह बनाये रखा, ढाढ़स देते रहे। सेट पर तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बाद भी मेरे प्रति अपने सम्मान और विश्वास में उन्होंने कोई कमी नहीं आने दी।
एडिटर जबीन मर्चेंट [Jabeen Merchant], जिन्होंने अनारकली को टेबल पर लगभग री-राइट किया। मेरी हर बात को धैर्यपूर्वक सुना और फिल्म की मूल भावना को लेकर स्क्रिप्टिंग के समय से बहुत उत्साहित रहीं।
संगीतकार रोहित शर्मा [Rohit Sharma] इस फिल्म की रीढ़ रहे। बिहार की आत्मा उन्होंने अनारकली के संगीत में उकेरने की कोशिश की और सफल रहे। रोहित जी के बिना अनारकली की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।
असोसिएट डायरेक्टर रवींद्र रंधावा [Ravinder Randhawa] पूरी ख़ामोशी से मेरे हिस्से का विष पीते रहे और पूरी समझदारी से इस फिल्म को बेहतर और बेहतर बनाने में लगे रहे। ख़ास बात ये कि जिस क्लाइमेक्स की चर्चा हो रही है, वह गीत उन्होंने लिखा। वरना मेरे पास तो क्रांतिकारी कवि गोरख पांडे के गीत "गुलमिया अब हम नाही बजइबो, अजदिया हमरा के भावेले" का रेफरेंस था!
प्रोडक्शन डिज़ायनर अश्विनी श्रीवास्तव [Ashwini Shrivastav] ने कम संसाधनों के बावजूद अनारकली की दुनिया को रीयल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
एक नाम, जिसका ज़िक्र करना लाज़िमी है, वह नाम है तुषार सेठ [Tushar Seth] का। वह हमारे फर्स्ट एडी थे। तुषार ने टाइट टाइम-लाइन का हमेशा सबसे ज़्यादा ख़याल रखा। प्रोड्यूसर के दिये गये समय के भीतर हम तुषार की वजह से ही फिल्म बना पाये।
काॅस्ट्यूम डिज़ायनर रूपा चौरसिया [Rupa Chourasia] का डंका तो बज ही रहा है। तो हम भी उनकी जय जय कर लेते हैं।
बाक़ी हमारे कास्टिंग डायरेक्टर जीतेंद्र नाथ जीतू [Jitendra Nath Jeetu], असिस्टेंट डायरेक्टर्स निधि [Pandey Nidhi Singh], अमित [Amit Mishra] और मुहित [Muhitt Agarwaal] ने जो दिन-रात एक किया था, उसे शुक्रिया जैसे औपचारिक शब्दों से नहीं निपटाया जा सकता। पार्टी होगी दोस्तों और ज़रूर होगी।
आख़िर में निर्माता संदीप कपूर [Sandiip Kapur] का धन्यवाद, जिनके बिना अनारकली सिनेमा के पर्दे पर कभी नहीं आ पाती। आज भी परदे के पीछे के सामाजिक अंधेरे में टाॅर्च की रोशनी पर नाचती रहती और सारा दुख अकेली झेलती रहती।
#AnaarkaliOfAarah
फिल्म आयी, गयी। बातें हैं, बातें रहेंगी। हमारी तरफ किसी भी आयोजन की शुरुआत मंगलाचरण (Invocation) से होती है और समापन समदाउन (Thanksgiving Song) से होता है।
मैं सबसे पहले स्वरा [Swara Bhasker] का शुक्रिया करता हूं, जो अनारकली को कंसीव करने से लेकर स्क्रिप्ट और बाद की पूरी प्रक्रिया में पूरी तरह इनवाॅल्व रही। काफी ख़ून जलाया और कई बार ज़ख़्मी हुई, बीमार पड़ी।
डायरेक्टर आॅफ फोटोग्राफ़ी अरविंद कन्नाबिरन [Arvind Kannabiran] नहीं होते, तो शायद मैं बहुत असहाय होता। उन्होंने हमेशा मेरा उत्साह बनाये रखा, ढाढ़स देते रहे। सेट पर तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बाद भी मेरे प्रति अपने सम्मान और विश्वास में उन्होंने कोई कमी नहीं आने दी।
एडिटर जबीन मर्चेंट [Jabeen Merchant], जिन्होंने अनारकली को टेबल पर लगभग री-राइट किया। मेरी हर बात को धैर्यपूर्वक सुना और फिल्म की मूल भावना को लेकर स्क्रिप्टिंग के समय से बहुत उत्साहित रहीं।
संगीतकार रोहित शर्मा [Rohit Sharma] इस फिल्म की रीढ़ रहे। बिहार की आत्मा उन्होंने अनारकली के संगीत में उकेरने की कोशिश की और सफल रहे। रोहित जी के बिना अनारकली की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।
असोसिएट डायरेक्टर रवींद्र रंधावा [Ravinder Randhawa] पूरी ख़ामोशी से मेरे हिस्से का विष पीते रहे और पूरी समझदारी से इस फिल्म को बेहतर और बेहतर बनाने में लगे रहे। ख़ास बात ये कि जिस क्लाइमेक्स की चर्चा हो रही है, वह गीत उन्होंने लिखा। वरना मेरे पास तो क्रांतिकारी कवि गोरख पांडे के गीत "गुलमिया अब हम नाही बजइबो, अजदिया हमरा के भावेले" का रेफरेंस था!
प्रोडक्शन डिज़ायनर अश्विनी श्रीवास्तव [Ashwini Shrivastav] ने कम संसाधनों के बावजूद अनारकली की दुनिया को रीयल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
एक नाम, जिसका ज़िक्र करना लाज़िमी है, वह नाम है तुषार सेठ [Tushar Seth] का। वह हमारे फर्स्ट एडी थे। तुषार ने टाइट टाइम-लाइन का हमेशा सबसे ज़्यादा ख़याल रखा। प्रोड्यूसर के दिये गये समय के भीतर हम तुषार की वजह से ही फिल्म बना पाये।
काॅस्ट्यूम डिज़ायनर रूपा चौरसिया [Rupa Chourasia] का डंका तो बज ही रहा है। तो हम भी उनकी जय जय कर लेते हैं।
बाक़ी हमारे कास्टिंग डायरेक्टर जीतेंद्र नाथ जीतू [Jitendra Nath Jeetu], असिस्टेंट डायरेक्टर्स निधि [Pandey Nidhi Singh], अमित [Amit Mishra] और मुहित [Muhitt Agarwaal] ने जो दिन-रात एक किया था, उसे शुक्रिया जैसे औपचारिक शब्दों से नहीं निपटाया जा सकता। पार्टी होगी दोस्तों और ज़रूर होगी।
आख़िर में निर्माता संदीप कपूर [Sandiip Kapur] का धन्यवाद, जिनके बिना अनारकली सिनेमा के पर्दे पर कभी नहीं आ पाती। आज भी परदे के पीछे के सामाजिक अंधेरे में टाॅर्च की रोशनी पर नाचती रहती और सारा दुख अकेली झेलती रहती।
#AnaarkaliOfAarah
अनिरूद्ध सिंहा की गजलें
ग़ज़ल
अनिरुद्ध सिन्हा
पाले हुए जो ज़ख्म जुबां पर उतर गए
रिश्ते तमाम कट गए जज़्बात मर गए
घर की तलाश और मुहब्बत की चाह में
निकले हुए वे लोग न जाने किधर गए
ये और बात है कि हमें कुछ नहीं मिला
जब ज़िन्दगी की खोज में हम चाँद पर गए
साये की तरह रहते थे जो साथ –साथ वो
रस्ते में अब मिले भी तो बचकर गुज़र गए
खुशबू तुम्हारे जिस्म की ये काम कर गई
काँटों पे चल रहे थे अचानक ठहर गए
💐💐💐💐💐
फूल बनकर जो ख़्वाब आता है
बारहा लाजवाब आता है
जब मुहब्बत से लोग मिलते हैं
तब वहाँ इन्क़लाब आता है
फिर भी रौशन जहां नहीं होता
रोज़ ही आफताब आता है
अब कहाँ प्यार के लिफाफे में
कोई लेकर गुलाब आता है
शायरी में मज़ा तभी आता
शेर जब कामयाब आता है
💐💐💐💐💐
कोई किसी की तरफ है कोई किसी की तरफ
वो एक हम हैं जो रहते हैं ज़िन्दगी की तरफ
जरूर उससे कोई दिल का मामला होगा
हमारी सोच भटकती है क्यों उसी की तरफ
ग़मों ने इतनी मुहब्बत से हमको पाला है
कदम उठे न हमारे कभी खुशी की तरफ
वफ़ा का साज उठाए हुए न जाने क्यों
मैं चल रहा हूँ अँधेरी तेरी गली की तरफ
भटक न जाए वो सहरा में दर बदर होकर
बढ़ाए हाथ समुंदर रहा नदी की तरफ
💐💐💐💐💐
वो मेरे दिल तलक आता मगर दाखिल नहीं होता
महज मिलने मिलाने से ही कुछ हासिल नहीं होता
जो हम फिरकापरस्ती को मुहब्बत से मिटा देते
कोई बिस्मिल नहीं होता कोई क़ातिल नहीं होता
ये कैसी बेबसी के दौर में अब जी रहे हैं हम
हमारी फिक्र में शामिल हमारा दिल नहीं होता
अगर सीने में जज़्बों की जो लौ मद्ध्म नहीं होती
किसी को जीत लेना फिर यहाँ मुश्किल नहीं होता
कभी जो ठान लेता है बगावत के लिए कुछ भी
तो लेकर हाथ में खंजर कभी गाफ़िल नहीं होता
💐💐💐💐💐
जब भी उठा है दर्द तेरा मुस्कुरा लिए
कुछ इस तरह से आँख के मोती बचा लिए
जितने चमन के फूल थे घर में सजा लिए
यारों ने खूब अपने मुक़द्दर बना लिए
ज़ख़्मी हुए हैं पाँव इन्हें देखना भी क्या
हमने ही अपनी राह में काँटे बिछा लिए
इतने मिले हैं ज़ख्म ज़माने से दोस्तो
रोने को जी किया तो ज़रा गुनगुना लिए
पहचान अपनी खूब छुपाई है आपने
चेहरे पे अपने और भी चेहरे लगा लिए
💐💐💐💐💐
गुलज़ार पोखर,मुंगेर(बिहार)811201
Email-anirudhsinhamunger@gmail.
Mobile-09430450098
राधेश्याम तिवारी एवं अन्य का पटना में कविता-पाठ (रपट): शहंशाह आलम
राधेश्याम तिवारी एवं अन्य का पटना में कविता-पाठ
शहंशाह आलम
कवयित्री डॉ. भावना शेखर के आवास सी-43, अमरावती अपार्टमेंट, बेली रोड, पटना में 'सृजन संगति' के तत्वावधान में दिल्ली से पधारे कवि राधेश्याम तिवारी का एकल-पाठ तथा पटना के अन्य प्रतिनिधि कवियों के कविता-पाठ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य-अतिथि डॉ. शिवनारायण थे, अध्यक्ष डॉ. श्रीराम तिवारी थे। संचालन ऋषीकेश पाठक ने किया। आतिथ्य डॉ. भावना शेखर जी ने संभाला।
इस अवसर पर दिल्ली से पधारे चर्चित कवि राधेश्याम तिवारी ने अपनी - भाषा में संभव, बिल्ला नम्बर-56, हुसैन जी को नहीं जाना था 'कतर', राजेन्द्र यादव की कुर्सी, छाता, कनस्तर में गंगा, राजघाट में गोडसे, हम लड़ेंगे, दिल्ली में सियार, दिल्ली : उजड़े हुए लोगों का घर, कुत्ते की प्रार्थना, पूँजी का नंगा नाच, तुम कहाँ खड़े हो, तुम्हारे बोलने का मतलब, लोकतंत्र की ऐसी माया, समय के साथ, मुर्दा लोग, नयी सुबह के स्वागत में, फिर किसी ने छेड़ दिया - आदि कविताओं का पाठ किया। राधेश्याम तिवारी जी की कविताओं ने अपने पाठ किए जाने के समय पूरी सहजता से अपनी ताज़गी को बरक़रार रखा और आदमी के कठिन समय को बेहद बारीकी से प्रकट किया। उनकी कविताओं की ख़ासियत यही कि उनकी कविताएँ जितनी सहज दिखाई देती हैं, कविताओं का असर उतना ही गहरा होता है। राधेश्याम जी की कविताएँ समकालीन कविता की दुनिया में लम्बे अरसे तक टिके रहने वाली कविताएँ हैं।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में श्रीराम तिवारी, शिवनारायण, भावना शेखर, रानी श्रीवास्तव, शहंशाह आलम, भागवत शरण झा 'अनिमेष', हरींद्र विद्यार्थी, निविड़ शिवपुत्र, ऋषीकेश पाठक, विजय गुँजन, सुजीत वर्मा, रमेश पाठक, राजकुमार प्रेमी, रवीन्द्र कुमार सिन्हा, हृदय नारायण झा, सरोज तिवारी, बाँके बिहारी आदि कवियों / कवयित्रियों ने अपनी-अपनी प्रतिनिघि कविताओं का पाठ किया।
आए हुए कवियों, कवयित्रियों, श्रोताओं का आभार निविड़ शिवपुत्र ने व्यक्त किया।
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शहंशाह आलम
कवयित्री डॉ. भावना शेखर के आवास सी-43, अमरावती अपार्टमेंट, बेली रोड, पटना में 'सृजन संगति' के तत्वावधान में दिल्ली से पधारे कवि राधेश्याम तिवारी का एकल-पाठ तथा पटना के अन्य प्रतिनिधि कवियों के कविता-पाठ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य-अतिथि डॉ. शिवनारायण थे, अध्यक्ष डॉ. श्रीराम तिवारी थे। संचालन ऋषीकेश पाठक ने किया। आतिथ्य डॉ. भावना शेखर जी ने संभाला।
इस अवसर पर दिल्ली से पधारे चर्चित कवि राधेश्याम तिवारी ने अपनी - भाषा में संभव, बिल्ला नम्बर-56, हुसैन जी को नहीं जाना था 'कतर', राजेन्द्र यादव की कुर्सी, छाता, कनस्तर में गंगा, राजघाट में गोडसे, हम लड़ेंगे, दिल्ली में सियार, दिल्ली : उजड़े हुए लोगों का घर, कुत्ते की प्रार्थना, पूँजी का नंगा नाच, तुम कहाँ खड़े हो, तुम्हारे बोलने का मतलब, लोकतंत्र की ऐसी माया, समय के साथ, मुर्दा लोग, नयी सुबह के स्वागत में, फिर किसी ने छेड़ दिया - आदि कविताओं का पाठ किया। राधेश्याम तिवारी जी की कविताओं ने अपने पाठ किए जाने के समय पूरी सहजता से अपनी ताज़गी को बरक़रार रखा और आदमी के कठिन समय को बेहद बारीकी से प्रकट किया। उनकी कविताओं की ख़ासियत यही कि उनकी कविताएँ जितनी सहज दिखाई देती हैं, कविताओं का असर उतना ही गहरा होता है। राधेश्याम जी की कविताएँ समकालीन कविता की दुनिया में लम्बे अरसे तक टिके रहने वाली कविताएँ हैं।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में श्रीराम तिवारी, शिवनारायण, भावना शेखर, रानी श्रीवास्तव, शहंशाह आलम, भागवत शरण झा 'अनिमेष', हरींद्र विद्यार्थी, निविड़ शिवपुत्र, ऋषीकेश पाठक, विजय गुँजन, सुजीत वर्मा, रमेश पाठक, राजकुमार प्रेमी, रवीन्द्र कुमार सिन्हा, हृदय नारायण झा, सरोज तिवारी, बाँके बिहारी आदि कवियों / कवयित्रियों ने अपनी-अपनी प्रतिनिघि कविताओं का पाठ किया।
आए हुए कवियों, कवयित्रियों, श्रोताओं का आभार निविड़ शिवपुत्र ने व्यक्त किया।
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रविवार, 2 अप्रैल 2017
नरेंद्र कुमार की कुछ कविताएं
युवा कवि नरेंद्र अपनी रचनाओं में मानवता और संवेदना को समेटने की कोशिश करते हैं। दर्द चाहे अपने अतीत का हो या विस्थापन का, वह कहीं- न-कहीं परिलक्षित हो ही जाता है। पढ़ते हैं नरेंद्र कुमार की कुछ कविताओं को।
1. भूख और शोक
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जी बाबू !
यह जय भारत बैंड है
अगर हमारा संगीत
आपको उत्साहित कर देता है
उमंग से भर दे रहा है
तो सुनिए...
यह हम सबका भूख और
शोक है
जो आपको ठुमके लगाने को
बाध्य कर दे रहा है
समझे कि नहीं...
जान लीजिए बाबू
जैसे ही हम
अपने भूख और शोक से
उबर लेंगे
हम विस्मृत हो जायेंगे
पर एक जीवन होगा
हमारे भी पास
थोड़ा-बहुत हम भी थिरक लेंगे
जो आप नहीं देख पाएंगे ... ...
2. लुका–छिपी
-------------------
बिटिया ...
घर से निकलती है
घूम-घाम
वापस आ
पिता की आँखों में
ढूंढती है कुछ...
पिता भी लौटे हैं अभी
बिटिया को अपनी ओर
गौर से ताकते देख
चौंकते नहीं
बस, हौले–से मुस्कुरा देते हैं
हाँ..!
शुरू में चौंके थे जरूर
उन्होंने भी
महसूस किया है इधर ...
कि बिटिया की आँखों ने
देखना अधिक,
बोलना कुछ कम कर दिया है
3. सफ़र में
---------------
सफ़र में
गुमसुम बैठी वह
क्या सोच रही है ?
बीतते समय का सच !
या कुछ निज़ी ...
बीच-बीच में
सेलफोन पर
बतियाती...
अपने होने को
बयां कर रही है
विस्तार से... ...
4. अबकी मेले में देखा
----------------------------
अबकी मेले में देखा
कई औरतें
नंगी हुई जाती थीं
दुनिया के सामने
चेहरे पर बेहयाई पोते..!
परदा गिरते ही पर
भागती थीं आप–से–आप
हांए-हांए बिलखते
नवजातों को चिमटाए
एक झटके में ही छाती खोलतीं
उनकी धुकधुकी को
खुद में समेट
फिर-फिर
बिसूरकर रोती !
अबकी मेले में देखा..!
5. अपना शहर
-------------------
मेन रोड पर
दिखती नहीं अब
चाय की दुकानें
दोस्तों के ठहाके
अखबार पढतीं
अलसाई आँखें
मूक और शिष्ट-से
खङे हैं कतारों में
जगमगाते रेस्तरां
मॉल और मल्टीप्लेक्स
कहाँ बचा है जीवन ?
कहाँ गए वे लोग ?
पूछने पर वह भौंचक
आँख फाड़े..!
शायद नया है शहर में
या है कोई अपना-सा
जिसे मैं ढूंढ रहा इस घड़ी
बेचैन..!
बेज़वाब..!
वह तेजी से आती
सिटी बस में लटक लेता है
और मैं भी...
गुम होता जा रहा हूँ
भीड़ में कहीं
नाम - नरेन्द्र कुमार,
जन्म - 06.06.1980
शिक्षा - एम0ए0 (हिन्दी)
प्रकाशन - विभिन्न पत्रिकाओं एवं दैनिकों में कुछ रचनाएं प्रकाशित।
सम्प्रति - सरकारी सेवा
सम्पर्क :
मो0 - 9334834308
ई-मेल – narendrapatna@gmail.com
बिहार में साहित्यकारों का सम्मान या अपमान (रपट): सुशील कुमार भारद्वाज
बिहार में साहित्यकारों का सम्मान या अपमान
सुशील कुमार भारद्वाज
एक अरसे बाद, मंत्रिमंडल सचिवालय (राजभाषा) विभाग के तत्वावधान में आयोजित "राजभाषा हिन्दी-साहित्य समागम" का आयोजन 30 एवं 31 मार्च 2017 को आयोजित किया गया। कार्यक्रम का उदघाटन सूबे के शिक्षा मंत्री श्री अशोक चौधरी ने किया तो विशिष्ठ अतिथि के रूप में राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री श्री मदन मोहन झा, मनोनित विधान षार्षद डॉ रामवचन राय, हिन्दी प्रगति समिति, बिहार के अध्यक्ष श्री सत्यनारायण एवं पटना उच्च न्यायालय के भूतपूर्व न्यायधीश श्री राजेंद्र प्रसाद मौजूद थे।
पहले दिन उद्घाटन के बाद हिन्दी सेवी सम्मान एवं पुरस्कार का वितरण वर्ष 2014-15 के लिए 13 एवं 2016-17 के लिए 17 साहित्यकारों के बीच किया गया। चेक वितरण के बाद "हिन्दी भाषा और नागरी लिपि का मानकीकरण" पर अखिल भारतीय गोष्ठी शुरू हुआ जो दूसरे दिन के पहले सत्र तक जारी रहा। इसके साथ ही हिन्दी पांडुलिपि प्रकाशन अनुदान राशि का वितरण किया गया। जबकि आयोजन का समापन केदारनाथ सिंह, विष्णु नागर, विश्वनाथ तिवारी, आलोक धन्वा, सत्यनारायण, बद्री नारायण, कुमार अम्बुज, दिनेश कुशवाहा, लीलाधर जगुड़ी, नचिकेता, विश्वरंजन, रबींद्र राजहंस और अरूण कमल जैसे प्रख्यात कवियों के बेहतरीन एवं ऐतिहासिक कविता-पाठ के साथ हुआ। इस यादगार पल के साक्षी बने साहित्यकार जाबिर हुसैन के निधि कोष से बने फणीश्वरनाथ रेणु हिन्दी भवन में मौजूद सूबे के वरिष्ठ एवं नये साहित्यकार।
इस सफल आयोजन में कितना साहित्य था और कितनी राजनीति ये तो बहस का एक अलग मुद्दा हो सकता है लेकिन आयोजन में शरीक लोगों ने ही कुछ प्रश्न लगा दिए। सबसे पहले तो राजेंद्र प्रसाद शिखर सम्मान से सम्मानित सूबे के वरिष्ठ साहित्यकार खगेंद्र ठाकुर ने ही मंच से बिगूल फूँक दिया- "जो विभाग सम्मान और पुरस्कार का फर्क नहीं समझता उसका सम्मान क्या लेना?" उनकी आपत्ति आमंत्रण पत्र की छपाई को लेकर भी थी। जबकि हिन्दी पर चर्चा करते -करते कुछ साहित्यकार मंच पर ही मैथिली और भोजपुरी के योगदान पर बुरी तरह उलझ गये जिसे बीचबचाव से समाप्त किया गया। हद तो तब हो गई जब कविता-पाठ के सत्र में मंच-संचालक हिन्दी के प्रोफेसर बलराम तिवारी के हिन्दी कविता और मंचासीन कवि के संदर्भ में टिप्पणी पर कथाकार शेखर ने आपत्ति दर्ज की तो उन्होंने कहा कि यह एक सरकारी कार्यक्रम है और विभाग की ओर से मिले नाम के अतिरिक्त कुछ भी कहना संभव नहीं है।"
जहाँ एक ओर लोगों की नाराजगी राहत वितरण शिविर की तर्ज पर पुरस्कार वितरण पर थी तो कुछ लोग बहस तलब थे कि वर्ष 2015-16 के लिए माँगे गये आवेदन को ही वर्ष 2016-17 घोषित कर हकमारी की गई है। यदि मामला रूपये का नहीं है तो आखिर ये गोलमाल क्यों? घोषित पुरस्कार राशि को दो अथवा अधिक लोगों के बीच बाँट देने की परंपरा कोई नई नहीं है।
वहीं दूसरी ओर, दबी जुबान से यह टिप्पणी करने से भी लोग नहीं कतरा रहे थे कि जाबिर हुसैन साहब के विशेष प्रयास से तैयार भवन को गलत तरीके से सरकार ने न सिर्फ हथिया लिया है बल्कि उन्हें सम्मानित करने की बजाय अपमानित करने के लिए उनके नाम पर हर बार एक मामूली राशि के पुरस्कार की घोषणा भी करती है जिसके स्वीकार करने या न करने संबंधी बातों को कभी मीडिया ने भी उठाना मुनासिब नहीं समझा।
पूरे कार्यक्रम के दरम्यान यह बहस भी मौजूं रही कि सूबे के मुख्यमंत्री उर्दू के कार्यक्रम में न सिर्फ शरीक होते हैं, बल्कि उर्दू के प्रोत्साहन के लिए कई घोषणाएं भी करते हैं लेकिन हिन्दी साहित्यकारों की सरकार की नजर में हैसियत ही इतनी है कि दूर -दराज से आये साहित्यकारों को भी शिक्षा मंत्री एवं रेणु के नाम पर सत्ता भोगने वाले साहित्यकारों के हवाले छोड़ दिया जाता है। शायद यहाँ भी वोट -बैंक हो।
कोई भी साहित्यिक कार्यक्रम बगैर शोर-शराबे के संपंन्न हो जाय और सबके चेहरे की रौनक बरकरार रहे, ये तो शायद ही संभव है लेकिन इस तरीके के कार्यक्रम आगे भी सफलता पूर्वक होते रहें इसी में सबों की भलाई है।
सुशील कुमार भारद्वाज
एक अरसे बाद, मंत्रिमंडल सचिवालय (राजभाषा) विभाग के तत्वावधान में आयोजित "राजभाषा हिन्दी-साहित्य समागम" का आयोजन 30 एवं 31 मार्च 2017 को आयोजित किया गया। कार्यक्रम का उदघाटन सूबे के शिक्षा मंत्री श्री अशोक चौधरी ने किया तो विशिष्ठ अतिथि के रूप में राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री श्री मदन मोहन झा, मनोनित विधान षार्षद डॉ रामवचन राय, हिन्दी प्रगति समिति, बिहार के अध्यक्ष श्री सत्यनारायण एवं पटना उच्च न्यायालय के भूतपूर्व न्यायधीश श्री राजेंद्र प्रसाद मौजूद थे।
पहले दिन उद्घाटन के बाद हिन्दी सेवी सम्मान एवं पुरस्कार का वितरण वर्ष 2014-15 के लिए 13 एवं 2016-17 के लिए 17 साहित्यकारों के बीच किया गया। चेक वितरण के बाद "हिन्दी भाषा और नागरी लिपि का मानकीकरण" पर अखिल भारतीय गोष्ठी शुरू हुआ जो दूसरे दिन के पहले सत्र तक जारी रहा। इसके साथ ही हिन्दी पांडुलिपि प्रकाशन अनुदान राशि का वितरण किया गया। जबकि आयोजन का समापन केदारनाथ सिंह, विष्णु नागर, विश्वनाथ तिवारी, आलोक धन्वा, सत्यनारायण, बद्री नारायण, कुमार अम्बुज, दिनेश कुशवाहा, लीलाधर जगुड़ी, नचिकेता, विश्वरंजन, रबींद्र राजहंस और अरूण कमल जैसे प्रख्यात कवियों के बेहतरीन एवं ऐतिहासिक कविता-पाठ के साथ हुआ। इस यादगार पल के साक्षी बने साहित्यकार जाबिर हुसैन के निधि कोष से बने फणीश्वरनाथ रेणु हिन्दी भवन में मौजूद सूबे के वरिष्ठ एवं नये साहित्यकार।
इस सफल आयोजन में कितना साहित्य था और कितनी राजनीति ये तो बहस का एक अलग मुद्दा हो सकता है लेकिन आयोजन में शरीक लोगों ने ही कुछ प्रश्न लगा दिए। सबसे पहले तो राजेंद्र प्रसाद शिखर सम्मान से सम्मानित सूबे के वरिष्ठ साहित्यकार खगेंद्र ठाकुर ने ही मंच से बिगूल फूँक दिया- "जो विभाग सम्मान और पुरस्कार का फर्क नहीं समझता उसका सम्मान क्या लेना?" उनकी आपत्ति आमंत्रण पत्र की छपाई को लेकर भी थी। जबकि हिन्दी पर चर्चा करते -करते कुछ साहित्यकार मंच पर ही मैथिली और भोजपुरी के योगदान पर बुरी तरह उलझ गये जिसे बीचबचाव से समाप्त किया गया। हद तो तब हो गई जब कविता-पाठ के सत्र में मंच-संचालक हिन्दी के प्रोफेसर बलराम तिवारी के हिन्दी कविता और मंचासीन कवि के संदर्भ में टिप्पणी पर कथाकार शेखर ने आपत्ति दर्ज की तो उन्होंने कहा कि यह एक सरकारी कार्यक्रम है और विभाग की ओर से मिले नाम के अतिरिक्त कुछ भी कहना संभव नहीं है।"
जहाँ एक ओर लोगों की नाराजगी राहत वितरण शिविर की तर्ज पर पुरस्कार वितरण पर थी तो कुछ लोग बहस तलब थे कि वर्ष 2015-16 के लिए माँगे गये आवेदन को ही वर्ष 2016-17 घोषित कर हकमारी की गई है। यदि मामला रूपये का नहीं है तो आखिर ये गोलमाल क्यों? घोषित पुरस्कार राशि को दो अथवा अधिक लोगों के बीच बाँट देने की परंपरा कोई नई नहीं है।
वहीं दूसरी ओर, दबी जुबान से यह टिप्पणी करने से भी लोग नहीं कतरा रहे थे कि जाबिर हुसैन साहब के विशेष प्रयास से तैयार भवन को गलत तरीके से सरकार ने न सिर्फ हथिया लिया है बल्कि उन्हें सम्मानित करने की बजाय अपमानित करने के लिए उनके नाम पर हर बार एक मामूली राशि के पुरस्कार की घोषणा भी करती है जिसके स्वीकार करने या न करने संबंधी बातों को कभी मीडिया ने भी उठाना मुनासिब नहीं समझा।
पूरे कार्यक्रम के दरम्यान यह बहस भी मौजूं रही कि सूबे के मुख्यमंत्री उर्दू के कार्यक्रम में न सिर्फ शरीक होते हैं, बल्कि उर्दू के प्रोत्साहन के लिए कई घोषणाएं भी करते हैं लेकिन हिन्दी साहित्यकारों की सरकार की नजर में हैसियत ही इतनी है कि दूर -दराज से आये साहित्यकारों को भी शिक्षा मंत्री एवं रेणु के नाम पर सत्ता भोगने वाले साहित्यकारों के हवाले छोड़ दिया जाता है। शायद यहाँ भी वोट -बैंक हो।
कोई भी साहित्यिक कार्यक्रम बगैर शोर-शराबे के संपंन्न हो जाय और सबके चेहरे की रौनक बरकरार रहे, ये तो शायद ही संभव है लेकिन इस तरीके के कार्यक्रम आगे भी सफलता पूर्वक होते रहें इसी में सबों की भलाई है।
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