रविवार, 2 अप्रैल 2017

नरेंद्र कुमार की कुछ कविताएं


युवा कवि नरेंद्र अपनी रचनाओं में मानवता और संवेदना को समेटने की कोशिश करते हैं। दर्द चाहे अपने अतीत का हो या विस्थापन का, वह कहीं- न-कहीं परिलक्षित हो ही जाता है। पढ़ते हैं नरेंद्र कुमार की कुछ कविताओं को।


1. भूख और शोक
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जी बाबू !
यह जय भारत बैंड है

अगर हमारा संगीत
आपको उत्साहित कर देता है
उमंग से भर दे रहा है
तो सुनिए...

यह हम सबका भूख और
शोक है
जो आपको ठुमके लगाने को
बाध्य कर दे रहा है
समझे कि नहीं...

जान लीजिए बाबू
जैसे ही हम
अपने भूख और शोक से
उबर लेंगे
हम विस्मृत हो जायेंगे

पर एक जीवन होगा
हमारे भी पास
थोड़ा-बहुत हम भी थिरक लेंगे
जो आप नहीं देख पाएंगे ... ...

2. लुका–छिपी
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बिटिया ...
घर से निकलती है
घूम-घाम
वापस आ
पिता की आँखों में
ढूंढती है कुछ...

पिता भी लौटे हैं अभी
बिटिया को अपनी ओर
गौर से ताकते देख
चौंकते नहीं
बस, हौले–से मुस्कुरा देते हैं
हाँ..!
शुरू में चौंके थे जरूर

उन्होंने भी
महसूस किया है इधर ...
कि बिटिया की आँखों ने
देखना अधिक,
बोलना कुछ कम कर दिया है

3. सफ़र में
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सफ़र में
गुमसुम बैठी वह
क्या सोच रही है ?
बीतते समय का सच !
या कुछ निज़ी ...

बीच-बीच में
सेलफोन पर
बतियाती...
अपने होने को
बयां कर रही है
विस्तार से... ...

4. अबकी मेले में देखा
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अबकी मेले में देखा
कई औरतें
नंगी हुई जाती थीं
दुनिया के सामने
चेहरे पर बेहयाई पोते..!

परदा गिरते ही पर
भागती थीं आप–से–आप
हांए-हांए बिलखते
नवजातों को चिमटाए
एक झटके में ही छाती खोलतीं
उनकी धुकधुकी को
खुद में समेट
फिर-फिर
बिसूरकर रोती !

अबकी मेले में देखा..!

5. अपना शहर
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मेन रोड पर
दिखती नहीं अब
चाय की दुकानें
दोस्तों के ठहाके
अखबार पढतीं
अलसाई आँखें

मूक और शिष्ट-से
खङे हैं कतारों में
जगमगाते रेस्तरां
मॉल और मल्टीप्लेक्स

कहाँ बचा है जीवन ?
कहाँ गए वे लोग ?
पूछने पर वह भौंचक
आँख फाड़े..!
शायद नया है शहर में
या है कोई अपना-सा
जिसे मैं ढूंढ रहा इस घड़ी
बेचैन..!

बेज़वाब..!
वह तेजी से आती
सिटी बस में लटक लेता है
और मैं भी...
गुम होता जा रहा हूँ
भीड़ में कहीं



 नाम - नरेन्द्र कुमार,
जन्म - 06.06.1980
शिक्षा - एम0ए0 (हिन्दी)
प्रकाशन - विभिन्न पत्रिकाओं एवं दैनिकों में कुछ रचनाएं प्रकाशित।
सम्प्रति - सरकारी सेवा
सम्पर्क :
मो0 - 9334834308
ई-मेल – narendrapatna@gmail.com
   

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