रविवार, 23 अप्रैल 2017

फिल्म निर्माण में बाधा बनती बिहार के सिनेमाघर पर विनोद अनुपम की एक टिप्पणी

फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम का कॉलम हर हफ्ता दैनिक प्रभात खबर में पढ़ने को मिलता है। इस बार अनुपम जी ने अपने आलेख में बिहार में सिनेमाघर की दयनीय होती स्थिति में बिहारी फिल्म निर्माण की बाधाओं को उकेरने की कोशिश की है जिससे आप भी पढ़ें।

 सिनेमाघर बनाएं,तभी बनेंगे सिनेमा

आज जबकि सलमान और शाहरुख की फिल्मों के लिए दूसरे हफ्ते में प्रवेश करना बडी बात मानी जाती है,’अनारकली ऑफ आरा’ जैसी फिल्म का कुछ शहरों के कुछ सिनेमाघरों में पांचवे हफ्ते में प्रवेश करना चकित करता है।उल्लेखनीय है कि बिहार की पृष्ठभूमि पर बिहारी सितारों और तकनीशियनों के साथ बनी यह फिल्म बिहार से पहले हफ्ते में ही बाहर हो गई थी। पहले हफ्ते के आंकडों के अनुसार भी मुम्बई में बॉक्स ऑफिस पर इस फिल्म ने लगभग 44 लाख की कमाई की,जबकि बिहार में कुल जमा 4 लाख। वास्तव में ऐसी बात नहीं कि जो फिल्म जुहू(मुम्बई),गुडगांव और जामनगर में पांचवे हफ्ते में भी देखी जा रही है,वह बिहार ने देखनी नहीं चाही,सच यह है कि सिनेमा देखने के लिए चाहिए सिनेमाघर,और बिहार के कई जिलों में सिनेमाघर हैं ही नहीं।
बिहार में 80 के दशक तक 450 से अधिक सिनेमाघर थे,आज इसकी संख्या घटकर 200 के करीब रह गई है। पटना में कभी समय था जब मोना,एलफिंस्टन, रिजेन्ट, रुपक, चाणक्य, वीणा, अप्सरा, वैशाली, पर्ल जैसे लगभग शहर के सभी कोनों में सिनेमाघर थे। इसके अलावे दानापुर, खगौल और पटना सिटी में कई सिनेमाघर थे। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इनकी क्षमता अमूमन 300 से ऊपर की होती थी। आज सिनेमाघर ही नहीं घटे,मोना और रिजेन्ट की तरह जो बचे हैं,उनकी क्षमता आधे से भी कम रह गई है। इन्हीं सिनेमाघरों को ‘दंगल’ का दवाब झेलना पडता है, ‘अनारकली’ के लिए भी गुंजाइश निकालनी पडती है, और भोजपुरी फिल्मों के लिए भी। ऐसे में किसी फिल्म को वे चाहकर भी लगाए नहीं रह सकते, क्योंकि अगली फिल्म को जगह चाहिए होती है।
सिंगल थिएटर सभी जगह बंद हुए हैं,लेकिन वहां उसकी भरपाई मल्टीप्लेक्स ने कर दी है,जबकि बिहार में सिनेमाघर बंद तो हुए,नए नहीं खुले। जाहिर है व्यवसाय के नाम पर सिनेमा में बिहार की भागीदारी एक प्रतिशत से भी कम होती चली गई। ऐसे में बिहार में सिनेमा के विकास के चाहे जितने सपने पाल लें,उन्हें तब तक साकार नहीं किया जा सकता, जब तक हम दर्शक बनाने की व्यवस्था नहीं करें,दर्शक तब बनेंगे जब सिनेमाघर बनेंगे। जाहिर है कोई क्यों ‘अनारकली’,’मिथिला मखान’ या ‘गुटरू गुटरगूं’ परिकल्पित करे,जबकि व्यवसाय के लिए उसे मुम्बई,जामनगर और गुडगांव का ही मुंह जोहना पडे।

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