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सोमवार, 9 दिसंबर 2019

मुस्लिमों के लिए बुद्धिजीवियों का नकली प्रेम

यह भी किसी क्रूर सच्चाई से कम नहीं है कि भारत के अधिकांश राजनीतिक दल और तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग #मुस्लिम शब्द सुनते ही इतने दरियादिल हो जाते हैं कि लगता है कि सहानुभूति में वे अपना सर्वस्व न्योछावर कर देंगें। लेकिन उनके दिल में कश्मीरी पंडितों के साथ हुए व्यवहार या फिर 1984 के सिख दंगे के पीड़ितों के लिए कोई दर्द नहीं झलकता है। जबकि उन्हें या तो सबकी बात करनी चाहिए या किसी की भी बात नहीं करनी चाहिए।
कितने आश्चर्य की बात है कि तत्कालीन जम्मू कश्मीर में पाक के साथ दोहरी नागरिकता का खेल वर्षों से चलता रहा लेकिन कभी उनके लिए आवाज उठाने की फुर्सत किसी को नहीं मिली। चीन बार-बार जम्मू कश्मीर के लिए नत्थी करके वीजा जारी करता रहा लेकिन प्रकांड विद्वान सब कान में तेल डालकर सोते रहे।
जिस देश में स्वजातीय और स्वधर्मियों के लिए कभी मदद के लिए आगे नहीं आए वे आज धर्मनिरपेक्षता का राग अलाप रहे हैं। भाई, अपना घर (घर व्यापक संदर्भ में) सँभाल लीजिए बाद बाँकी तो संविधान संशोधन कभी भी कर सकते हैं। ये तो आपके हाथ का खिलौना है। इतना शोर मचाने से आप किसी का भला नहीं कर रहे हैं बल्कि अपनी राजनीतिक बुद्धि या कुंठा को उजागर कर रहे हैं। आपलोगों की विचारधारा ने भारत को नियतिवादी बनाकर छोड़ दिया है। कम से कम अब तो इसे प्रगति के पथ पर बढ़ने दीजिए। फिर आपलोगों ने #असहिष्णुता का कितना गंदा खेल खेला उसे सम्पूर्ण विश्व ने देखा। आखिर आपने आजादी के बाद कैसे भारत (धर्मनिरपेक्ष माहौल) को तैयार किया कि मुस्लिम आज तक भयभीत हैं? क्या किसी को साल-दो-साल में डर लग सकता है? कदापि नहीं। जिस देश में मुस्लिम राष्ट्रपति की कुर्सी तक बड़ी सहजता के साथ पहुँचे उस देश में यदि कोई उप-राष्ट्रपति तक असहजता और असहिष्णुता की बात करें। तो ऐसे देश में आखिर कोई मुस्लिम शरण लेने क्यों आएगा? यकीनन वो आतंकवाद और आईएसआई का एजेंट बनकर अशांति फैलाने के ख्याल से ही आएगा। तो क्या आप इन आतंकवादियों और मानवता के दुश्मनों को प्रश्रय देकर देश को ही नहीं बल्कि अपनी पीढ़ी को ही बर्बाद करना चाहते हैं?
यदि आप सच में मुस्लिम के हिमायती हैं तो देश में रह रहे मुस्लिमों के पक्ष में काम करें। उनके शिक्षा और जीवनशैली में सुधार करें। सच्चर कमेटी की बताई कमियों को दूर करने की कोशिश करें जो आपकी धर्मनिरपेक्ष सरकार द्वारा छोड़ी गई सौगात है।
★★★★★★★★★★★★★
सुशील कुमार भारद्वाज

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019

आज के दौर में रावण वध

दशहरा के अंतिम बेला में अब रावण-वध होगा। अजी, रावण का वध क्या होगा? उसे तो जलाया जाएगा और लोग खुश होंगें कि रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले में लगे पटाखों की गूँज दूर तक जाएगी और एक अलग माहौल बनेगा।




ये सिर्फ पटना में होता है ऐसी बात नहीं है। अब तो ये छोटे -छोटे गाँवों में भी आयोजित होने लगा है, शहरों और महानगरों की कौन पूछता है?

सबसे अजीब लगता है कि पर्यावरण को काफी नुकसान पहुँचा करके भी लोग आह्लादित होते हैं। लोग भीड़ में नुकसान सहकर भी मजा लेंतें हैं। और तो और, रावण के रूप में रूपये को जलाकर खुश हो लेते हैं और असली रावण को समाज में जब-तब देखकर घिघी बँध जाती है। जबकि लोगों को उससे प्रेरणा लेनी चाहिए। आत्मबल और आत्मविश्वास को बढ़ाना चाहिए। अपने अंदर और आसपड़ोस में घर जमाये बुराई को फौरन बाहर निकाल देना चाहिए। समाज में मिलने वाले रावण का प्रतिकार और वहिष्कार करना चाहिए।

लेकिन अफसोस कि इस पूँजीवादी युग में हर चीज का सीधा संबंध पूँजी और किसी के पेट से जुड़े रोजी-रोटी से होता है। अच्छा है बुरा है- सोचने की जरूरत ही नहीं है। जबकि पूजा-पाठ पूर्णतः आस्था की बात है। इसे फालतू के बाह्याडंबर से दूर रखना चाहिए नहीं तो आनेवाली पीढ़ी जरूर खुद को इससे दूर करने लगेगी। वैसे भी नये जमाने के लोग पर्व-त्योहार को इवेंट के रूप में सेलिब्रेट करने लगे हैं आस्था की बजाय।

★★★★★★★★★★★★★★★★★★★
सुशील कुमार भारद्वाज

मंगलवार, 30 मई 2017

नियति के जाल में फंसी है सिनीवाली की “अधजली”: सुशील कुमार भारद्वाज

नियति के जाल में फंसी है सिनीवाली की अधजली: सुशील कुमार भारद्वाज
सिनीवाली शर्मा


इन दिनों सिनीवाली शर्मा की कहानी “अधजली” काफी चर्चा में हैं. चर्चा भी वाजिब है क्योंकि ग्रामीण परिवेश में रची गई यह कहानी जितना सम्वेदनशील और मार्मिक है उतना ही विचारणीय भी. सिनीवाली ने अपने कुशल कौशल का प्रदर्शन शब्दों के सटीक प्रयोग से कहानी को सहज, सरल और पठनीय बनाने में किया है. बिम्बों और संकेतों का प्रयोग भी अच्छा किया गया है. कहानी की कसावट और बुनावट भी काफी चुस्त है.
कहानी “अधजली” किसी भी तरह से न तो पाठकों का समय बर्बाद करती है और ना ही सिर्फ कपोल-कल्पित दुनियां की सैर कराती है. यह कहानी यथार्थ की रुखड़ी जमीन पर आर्थिक रूप से बदहाल परिवार में महत्वाकांक्षा-रूपी विषबीज के पनपने, उसके पुष्पित होने और उससे होनेवाली बर्बादी को सलीके से बयां करती है. कहानी फ्लाश्बैक तकनीक में है तो नीम का पेड़ कहानी के शुरू से अंत तक साक्ष्य के रूप में मौजूद है.
कहानी के पात्रों की बात करें तो इसमें मुख्यरूप से तीन मानवीय और एक परिवेशीय पात्र है. और सभी के सभी चार अलग-अलग सामाजिक समस्याओं का प्रतिनिधित्व करते हैं. जितना गुण–दोष मानवीय पात्रों पर दिया जा सकता है उससे रत्ती भर भी कम दोष परिवेश को नहीं दिया जा सकता है. घर जितना एकांत में है उतना ही समाज या लोगों से कटा हुआ. जितनी गरीबी और तंगहाली है उतनी ही बलबती महत्वाकांक्षा. पड़ोसी से तुलना करने की सनक है तो झूठी मान–मर्यादा और प्रतिष्ठा का दंभ. और सबसे बड़ी बात कि गलत को गलत जानते हुए भी गलत नहीं मानने की सोच, क्योंकि कईयों ने ऐसा किया है, बाबजूद यह जानते हुए कि ऐसा करने पर संभावित परेशानियों से इंकार नहीं किया जा सकता है.  
दरअसल में यह कहानी बिहार जैसे पिछड़े इलाके में होने पकरौआ विवाह या जबरिया विवाह या अपहरण विवाह जैसी कुप्रथा पर आधारित है. इस प्रकार के विवाह में लड़की के घरवाले अपनी पसंद के लड़के को विवाह की नियत से जोर-जबर्दस्ती करके ले आते हैं और विवाह करके छोड़ देते हैं. अमूमन धारणा यही रहती है कि लड़केवाले थोड़े बहुत रेर–बहेर और मान–मनौवल के बाद लड़की को अपना ही लेंगें. आखिर धर्मों में भी तो स्त्री के शरीर पर पहला हक उसके पति का ही होता है. मौत के बाद भी अग्नि देने का कर्तव्य पति का ही है तो फिर लड़का भागकर जाएगा कहां? लेकिन इसी बहाने समाज में लड़के के अति-महत्व पर भी सवाल उठाने की कोशिश की गई है.
खैर, कुमकुम के नसीब में ऐसी शादी का सुख नहीं लिखा था. शादी के वक्त अपने पति का जो चेहरा देखी, जिसे देखकर निष्पाप नई दुनियां का ख्वाब बुनने लगी, वह कभी पूरा हो ना सका. अलबत्ता उसका बेरोजगार भाई महेंद्र सामाजिक और व्यक्तिगत रूप से तिरस्कार और दुत्कार को चुपचाप सिर्फ बहन की खुशी की खातिर पीता रहा और घर में लड़केवालों की झूठी बड़ाई और आश्वासन के गोले फेंकते रहा. लेकिन जब महेंद्र भी टूटने लगा और उसका धैर्य जबाब देने लगा तो सच जुबान से फिसलने लगा और फिसलने लगा पति के लम्बे इंतज़ार में बैठी कुमकुम का मानसिक संतुलन. जहां न वह घर की रही ना घाट की रही. उसकी पहचान, उसका अस्तित्व सब खतरे में पड़ गया. न वह अविवाहित रही न ही विवाहित. अब वह अपने घर में होकर भी पराये के घर में थी. सामाजिक रूप से मानसिक दबाब महसूस कर रही थी. पड़ोसियों के ताने जितने उसके कान में खौलते हुए शीशे की तरह महसूस होता था उतने ही तीव्र आवेग से मानसिक रूप से संघर्ष और सामंजस्य से जूझ रही थी. आखिर वो किसे दोष दे? –खुद को, जो एक लड़की है, या अपनी गरीबी और तंगहाली को? इस बर्बादी के लिए दोष वह अपनी भाभी को दे, जिसने इस शादी का प्रस्ताव भाई के सामने रखी थी? या दोष दे अपने भाई को जिसने अपनी सक्रियता से शादी करवाई थी? लेकिन किसी को वह दोष क्यों दे? कौन उसका पराया है जिसने जानबूझ कर उसे नरक की जिंदगी में धकेलने की साजिश की? शायद किसी ने नहीं. यदि लड़के वाले कुमकुम को ले जाते तो सब वाह–वाह कर रहे होते. सभी परिवार को दाद दे रहे होते क्योंकि उस जैसे लड़के को ब्याह लाना उस परिवार के लिए नामुमकिन था. तो क्या दोष लड़के का है? उसे कुमकुम को साथ में ले जाना चाहिए था? लेकिन क्यों ले जाना चाहिए था? क्या लड़के की अपनी जिंदगी और पसंद नहीं थी? लड़के के परिवार की कोई इज्जत नहीं थी? यदि कुमकुम के घर वाले अपने से बेहतर घर–परिवार का ख्वाब देख सकते हैं तो लड़केवाले को क्यों नहीं देखना चाहिए? क्यों उसे जबर्दस्ती के वैवाहिक जीवन को आजीवन ढोना चाहिए था? और वही हुआ. लड़के ने कुमकुम को अपने घर लाने या अपनी पत्नी मानने से इंकार कर दिया.
और इसके बाद तो कुमकुम के पिता भी बेटी को विदा किए बगैर ही इस दुनिया से विदा हो गए. अपनी ही महत्वाकांक्षाओं का शिकार बना परिवार धीरे–धीरे लोग और समाज से कटते तो चला गया लेकिन कोई ठोस निर्णय न ले सका. निराशा के गर्त में समाते हुए जहां वह खुद को खेतीबाड़ी में झोंकने लगा वहीं अकेले में शांति चाहते –ना चाहते हुए भी सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार से कुमकुम के विखंडित जीवन के दुःख को दूर करने की कोशिश करती रही.
जहां मानसिक आवेश में कुमकुम दोषारोपण और मानसिक बिमारियों की शिकार होती गई वहीं शांति और महेंद्र भी मानसिक रूप से थके हुए और निराश ही थे जो अपनी जिंदगी को नियति के आगे नतमस्तक हो सबकुछ सहने को तैयार हो गए थे. न कोई आशा थी न कोई उम्मीद. इस बीच तानों से छल्ली शांति यदि एक बच्चे की इच्छा व्यक्त करती है तो सिर्फ इसलिए नहीं कि वह पति के साथ सोना चाहती है बल्कि घर का माहौल बदलना चाहती है. खुशी की एक चिंगारी के सहारे श्मशान बनते घर में फिर से रौशनी जलाना चाहती है. वंश को आगे बढ़ाना चाहती है. एक मनुष्य के रूप में अपने जैसे संतति को जन्म दे अपने कर्तव्य का निर्वाह करना चाहती है वर्ना प्रेमाभाव और अपनत्व के अभाव में खुद को जला कर समाप्त कर लेने की तैयारी तो कर ही लेती है. भले ही आवेश में कुमकुम उसे कुछ भी कह ले, लेकिन खुद शांति अपराधबोध से ग्रस्त नहीं है ऐसा तो महेंद्र के बारे में भी नहीं कहा जा सकता है. क्या कुमकुम खुद के किस्मत को कम दोष देती होगी? सच तो यही है कि नियति को ही सबकुछ मान आगे के बारे में किसी ने कुछ सोचा ही नहीं. न तो कुमकुम अपने नैतिक और मानसिक द्वंद्व से बाहर आ नई जिंदगी जीने की कोशिश की, न ही किन्हीं कारणों से महेंद्र और शांति ने दिलचस्पी ली? सभी एक ही गलती के इर्द-गिर्द खुद की जिंदगी बर्बाद करनी शुरू कर दी. और जब शांति अपने स्वार्थ में आ अपना घर बसाने चली तो कुमकुम के आवेश ने उसे तबाही की ओर मोड़ दिया. जबकि शांति के गर्भवती होने मात्र से घर की फिजा बदलने लगी थी. शांति के साथ-साथ महेंद्र और कुमकुम के चेहरे पर भी एक नई जिंदगी की खुमारी दिखने लगी थी. कहानी पूरी होकर भी अधूरी है. लेखक बांकी कल्पना पाठकों के हवाले छोड़ देती है.
इस विषय पर पहले भी न सिर्फ कहानियां लिखी जा चुकी हैं बल्कि कई क्षेत्रीय फ़िल्में भी बन चुकी हैं. फिर भी इस कहानी की सबसे बड़ी खासियत है कि पुराने विषय को नये तरीके से और अलग रेंज में प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है. सिनीवाली कहानी को प्रथम पुरुष और अन्य पुरुष में संप्रेषित करते हुए पठनीयता को बरकरार रखने में सफल रही हैं.

बुधवार, 3 मई 2017

कथाकार योगेंद्र आहूजा की पाँच मिनट और अन्य कहानियाँ पर रोहिणी अग्रवाल की संक्षिप्त टिप्पणी

कथाकार योगेंद्र आहूजा की पाँच मिनट और अन्य कहानियाँ पर रोहिणी अग्रवाल की  टिप्पणी


योगेंद्र आहूजा मूलत:  कहानीकार हैं, लेकिन उनकी हर कहानी अपने गर्भ में औपन्यासिक जीवन की समग्रता और संश्लिष्टता छिपाए हुए है। चूंकि वे मौन के सर्जक कलाकार हैं, और शब्दों के किफायती प्रयोक्ता, उनकी कहानियां संदर्भों-संकेतों से अटी पड़ी हैं। कहानियों में घटनाएं हैं, लेकिन विवरण न के बराबर। उन घटनाओं के भीतर छुपे राजनीतिक षड़यंत्रों, सांस्कृतिक संदर्भों, आर्थिक नीतियों और अंतरराष्ट्रीय प्रभावों को एक-दूसरे की संगति में गुने बिना लेखक के मूल आशय को समझना कठिन हो जाता है। चूंकि उनकी कहानियां उद्बोधन का स्थूल और दंभपूर्ण 'सृजनात्मक पाखंड' नहीं रचतीं, संवाद के सहारे अपने और परिवेश के भीतर की थाह लेकर साझा रणनीति बनाने की दुर्धर्ष लड़ाई लड़ती हैं, इसलिए पाठक को उनकी कहानियों में यहां-वहां बिखरे संकेतों को ब्यौरों में, ब्यौरों को युगीन विडंबनाओं के आर्तनाद में, और आर्तनाद को सृजन की सूक्ष्म अर्थव्यंजनाओं में तब्दील करते हुए खुद ही अपने आस्वाद तंत्र को विस्तृत और गहन करना पड़ता है।
उदाहरण के लिए कहानी 'एक्यूरेट पैथोलॉजी' में निरुपित पहली ही घटना को लिया जा सकता है जो पात्र, वातावरण और ब्यौरों के साथ घुलमिल कर समय की सीमा के आर पार व्यवस्थागत विघटन और मानवीय शोषण की एक-सी कहानी रचने लगती है।


कौतूहल को जगाना और उत्तरोतर उसी के सहारे त्रासदी की चरम अवस्था में संघर्ष के बीज बो आना योगेंद्र आहूजा की कथा-शिल्प की खासियत है। कहानी की शुरुआत वे गनपत नाई के बारे में एक स्टेटमेंट से करते हैं - ''आख़िरी दाढ़ी उसने पच्चीस साल पहले उसी दिन बनाई थी, उस साल के आखरी दिन जब . .  .।'' लेकिन नहीं, पाठक के प्राण कंठ तक अटका कर वे जानबूझकर वहां से रफूचक्कर हो जाते हैं। न, दरअसल वही बने रहते हैं - शब्दकार नहीं, कैमरामैन की तरह। बस, कैमरे का फोकस बदल देते हैं। गनपत के निर्णय से नहीं, उम्रदराज गनपत के अनुभवों से अब वे बावस्ता हैं जो दूर से ही दमन और उत्पीड़न की आहट तो लेना जानता है, उससे जूझना नहीं, और इस प्रक्रिया में अपनी ही जड़ता में वह एक के बाद एक घटनाओं के जरिए वक्त को विकरालतर होते देखने को बाध्य है। पाठक थोड़ी सी राहत भरी सांस लेकर गनपत के अनुभवों में डूबने की तैयारी करता ही है कि योगेंद्र आहूजा कैमरे का एंगिल पहली स्टेटमेंट के छूटे अंतिम शब्द पर केंद्रित कर देते हैं - ''जब . . . झंडापुर चौराहे पर . . . दो आदमी मार दिए उन्होंने, एक कोई हाशमी साहब, एक रामबहादुर . .  ।''
पाठक सन्न! तो यह गनपत की नहीं, प्रख्यात रंगकर्मी सफदर हाशमी की हत्या की कहानी है? वह अपने से ही सवाल पूछता है खूब आशंकित होकर। संशय की ठोस वजह भी है उसके पास। अभी.अभी लेखक के कैमरे की आंख से उसने एक बेहद भयावह लेकिन कलात्मक चित्र देखा था। 31 दिसंबर की ठिठुरती रात के घने अंधेरे में अपने सैलून में असहाय सा अकेला खड़ा है गनपत। लाइट नहीं है, इसलिए अंधेरे की काली परतों को चीरने के लिए धुंआती ढिबरी जल रही है।  प्रकाश की लौ कितनी मद्धम और कंपकपाती क्यों न हो, वह अंधेरे के शाप में बिंधे अक्स को धुंधला धुंधला उजागर कर ही देती है। फिर यह ढिबरी तो सैलून में जल रही है जहां ग्राहक और हज्जाम दोनों की सुविधा के लिए हर दीवार पर कई कई कोणों में आईने टंगे हैं। आईने ढिबरी के कांपते उजाले को प्रतिबिंबित कर-कर के उजाले की एक श्रृंखला बना देते हैं। साथ ही गनपत की असहायता को भी कई गुना बढ़ा देते हैं। इसी के साथ अनायास फोकस में आता है झंडापुर के नुक्कड़ नाटक से लौटे गनपत के तरुण पुत्र रोशनलाल का दहशत भरा चेहरा। दहशत मौत का स्मरण कराती है, मौत का पर्याय नहीं होती। दहशतजदा आदमी भी शायद यह सत्य नहीं जानता। जानता है कैमरा जो सैंकड़ों ढिबरियों के आवर्धित प्रकाश में हृदय के अंतस्तल में दबी-ढकी परतों के चेहरे को भी उघाड़ लाता है। कैमरा देखता है, खौफ के बावजूद ''बेइंसाफी और क्रूरता के विरुद्ध उसके हृदय में जो प्रतिवाद जन्मा था, जीवन का प्रथम प्रतिवाद, पहला इंकार, पहला विशाल गुस्सा और अपार घृणा, उसे उसने हृदय में ही रखने का फैसला किया, उस दिन तक के लिए, जब . .   .।''
एक बार फिर 'जब'। यानी फिर रस में व्यवधान! लेकिन अब पाठक ने झल्लाना छोड़ दिया है। वह उमग कर योगेंद्र आहूजा के खेल में शामिल हो गया है। शायद बचपन की स्मृतियों को ताजा करके घुटन भरे माहौल में 'टीलो' खेलने का शौक चर्रा आया हो। वह समझ गया है, लेखक उसे भरमाने के लिए इशारे करके गोटी को कहीं छुपा आता है और खुद इत्मीनान से टहलता हुआ कहीं दूर निकल जाता है, मानो पिछली बात से कोई वास्ता नहीं।
पाठक जानता है, लेखक की इत्मीनान भरी अगली यात्रा में ही उसे टीलो की अगली गोटी मिलेगी। इसलिए अपनी अंतश्चेतना को दो भागों में विभाजित कर वह नेपथ्य और रंगमंच दोनों जगह पर बनी रहने वाली सक्रियता को देखने नहीं, गुनने लगता है। टीलो खेल को जीतने का एक ही मूलमंत्र है - अंतर्सूत्रों पर गहरी पकड़।
योगेंद्र आहूजा चूंकि औपन्यासिक संवेदना के कथाकार हैं, इसलिए कहानी में अनेक अंतर्कथाओं और चरित्रों को बुनते हुए युग की विडंबनाओं को नहीं, विडंबनाओं को बनाने वाली परिघटनाओं, मानसिकताओं और प्रक्रियाओं को थहा लेना चाहते हैं। यही वजह है कि उनकी कहानियों में समय एकरैखिक गति से आगे नहीं बढ़ता, तमाम नियमों और अनुशासन की धज्जियां उड़ाते हुए अपनी वर्तुलाकार गति में कभी बदलाव के अंधेरों को लिए आता है, कभी बदलाव से पहले की दमघोंटू सर्जक चुप्पी' की अनिवार्यता को। 'पांच मिनट' कहानी में उनकी यह तकनीक अपने चरम उत्कर्ष पर है।

रोहिणी अग्रवाल के फेसबुक वॉल से साभार।

रविवार, 23 अप्रैल 2017

फिल्म निर्माण में बाधा बनती बिहार के सिनेमाघर पर विनोद अनुपम की एक टिप्पणी

फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम का कॉलम हर हफ्ता दैनिक प्रभात खबर में पढ़ने को मिलता है। इस बार अनुपम जी ने अपने आलेख में बिहार में सिनेमाघर की दयनीय होती स्थिति में बिहारी फिल्म निर्माण की बाधाओं को उकेरने की कोशिश की है जिससे आप भी पढ़ें।

 सिनेमाघर बनाएं,तभी बनेंगे सिनेमा

आज जबकि सलमान और शाहरुख की फिल्मों के लिए दूसरे हफ्ते में प्रवेश करना बडी बात मानी जाती है,’अनारकली ऑफ आरा’ जैसी फिल्म का कुछ शहरों के कुछ सिनेमाघरों में पांचवे हफ्ते में प्रवेश करना चकित करता है।उल्लेखनीय है कि बिहार की पृष्ठभूमि पर बिहारी सितारों और तकनीशियनों के साथ बनी यह फिल्म बिहार से पहले हफ्ते में ही बाहर हो गई थी। पहले हफ्ते के आंकडों के अनुसार भी मुम्बई में बॉक्स ऑफिस पर इस फिल्म ने लगभग 44 लाख की कमाई की,जबकि बिहार में कुल जमा 4 लाख। वास्तव में ऐसी बात नहीं कि जो फिल्म जुहू(मुम्बई),गुडगांव और जामनगर में पांचवे हफ्ते में भी देखी जा रही है,वह बिहार ने देखनी नहीं चाही,सच यह है कि सिनेमा देखने के लिए चाहिए सिनेमाघर,और बिहार के कई जिलों में सिनेमाघर हैं ही नहीं।
बिहार में 80 के दशक तक 450 से अधिक सिनेमाघर थे,आज इसकी संख्या घटकर 200 के करीब रह गई है। पटना में कभी समय था जब मोना,एलफिंस्टन, रिजेन्ट, रुपक, चाणक्य, वीणा, अप्सरा, वैशाली, पर्ल जैसे लगभग शहर के सभी कोनों में सिनेमाघर थे। इसके अलावे दानापुर, खगौल और पटना सिटी में कई सिनेमाघर थे। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इनकी क्षमता अमूमन 300 से ऊपर की होती थी। आज सिनेमाघर ही नहीं घटे,मोना और रिजेन्ट की तरह जो बचे हैं,उनकी क्षमता आधे से भी कम रह गई है। इन्हीं सिनेमाघरों को ‘दंगल’ का दवाब झेलना पडता है, ‘अनारकली’ के लिए भी गुंजाइश निकालनी पडती है, और भोजपुरी फिल्मों के लिए भी। ऐसे में किसी फिल्म को वे चाहकर भी लगाए नहीं रह सकते, क्योंकि अगली फिल्म को जगह चाहिए होती है।
सिंगल थिएटर सभी जगह बंद हुए हैं,लेकिन वहां उसकी भरपाई मल्टीप्लेक्स ने कर दी है,जबकि बिहार में सिनेमाघर बंद तो हुए,नए नहीं खुले। जाहिर है व्यवसाय के नाम पर सिनेमा में बिहार की भागीदारी एक प्रतिशत से भी कम होती चली गई। ऐसे में बिहार में सिनेमा के विकास के चाहे जितने सपने पाल लें,उन्हें तब तक साकार नहीं किया जा सकता, जब तक हम दर्शक बनाने की व्यवस्था नहीं करें,दर्शक तब बनेंगे जब सिनेमाघर बनेंगे। जाहिर है कोई क्यों ‘अनारकली’,’मिथिला मखान’ या ‘गुटरू गुटरगूं’ परिकल्पित करे,जबकि व्यवसाय के लिए उसे मुम्बई,जामनगर और गुडगांव का ही मुंह जोहना पडे।

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

जासूसी उपन्यास पर प्रियदर्शन की टिप्पणी


हम जासूसी उपन्यास क्यों पढ़ते हैं?
प्रियदर्शन

मारियो पूजो के मशहूर उपन्यास 'गॉडफादर' में एक इंस्पेक्टर मैक्लुस्की गॉडफादर के बेटे माइकल कारलियोन को थप्पड़ मार कर उसका जबड़ा तोड़ देता है। इस इंस्पेक्टर को और उसके पीछे खड़े लोगों को सजा दी जानी है।
माइकल तय करता है कि वह इंस्पेक्टर को गोली मार देगा। उसका बड़ा भाई सोनी कारलियोन उसे यह समझाना चाहता है कि इंस्पेक्टर की उससे कोई निजी दुश्मनी नहीं थी- इसे वह एक पेशेवर प्रतिद्वंद्विता की तरह ले, निजी हमले की तरह नहीं। कुछ देर बाद यही बात उसका सलाहकार टॉम हेगान उससे कहता है। 'प्रोफेशनल' और 'पर्सनल' के इस फ़र्क को माइकल बड़ी शिद्दत से ख़ारिज करता हुआ कहता है- ‘टॉम, मूर्ख मत बनो। सबकुछ पर्सनल है, कारोबार का एक-एक रेशा। हर आदमी हर रोज़ जो टुकड़ा भकोसता है, वह बस पर्सनल है। वे इसी को कारोबार कहते हैं। लेकिन यह पूरी तरह निजी है। तुम्हें मालूम है, ये मैंने किससे सीखा? डॉन से, गॉडफादर से। अगर उसके किसी दोस्त को बिजली का झटका लग जाए तो वह उसे निजी तौर पर लेता था। मेरा मेरीन में जाना उसके लिए निजी था। यही चीज़ उसको बड़ा बनाती है। वह सबकुछ निजी तौर पर लेता है।‘
यहां पहुंचते-पहुंचते मैं अटक जाता हूं। मैं कोई अपराध कथा पढ़ रहा हूं या जीवन को समझने वाली कोई किताब? मारियो पूजो के इस उपन्यास की ताकत क्या यह है कि उसमें इटली के माफिया गिरोहों की आपसी लड़ाई का बड़ा जीवंत वर्णन है? या उसकी ताकत इस बात में निहित है कि इस अपराध कथा के भीतर भी जीवन के स्पंदन को, रिश्तों के द्वंद्व को अलग-अलग स्तरों पर समझा जा सकता है?
दूसरों की नहीं जानता, लेकिन मेरी साहित्यिक मनोरचना और अभिरुचि के विकास में जासूसी और अपराध कथाओं का भी अच्छा ख़ासा हाथ रहा है। बचपन से ही जासूसी उपन्यास मेरे साथ रहे। राजन इकबाल सीरीज़ वाले एससी बेदी के बाल पॉकेट बुक्स सबसे प्रिय रहे। मिलने पर रायजादा की राम रहीम सीरीज़ भी पढ़ लेता था। लेकिन जल्द ही इन बाल जासूसी उपन्यासों का साथ छूट गया। कर्नल रंजीत और इब्ने सफी के उपन्यास चले आए। इनके साथ कुशवाहा कांत, कुमार कश्यप, ओम प्रकाश शर्मा, वेद प्रकाश शर्मा और वेद प्रकाश कांबोज के उपन्यास पढ़ता रहा। सच तो यह है कि ओम प्रकाश शर्मा के उपन्यासों ने शीत युद्ध की वैश्विक राजनीति की मेरी पहली समझ बनाई। इस राजनीति में भारत और रूस के जासूस एक तरफ़ हुआ करते थे और पाकिस्तान-चीन-अमेरिका और इंग्लैंड के दूसरी तरफ। सीआईए और केजीबी जैसी ख़ौफ़नाक संस्थाओं के नाम पहली बार इन्हीं उपन्यासों में मिले। उगांडा, ईदी अमीन, लीबिया,  कर्नल गद्दाफ़ी- इन सबसे पहला परिचय उन्हीं दिनों हुआ। कर्नल विनोद, कैप्टन, हमीद, राजेश, विक्रांत, विशाल, जगन जैसे जासूस तरह-तरह से कातिलों को पकड़ते रहे, देश के दुश्मनों से हमें बचाते रहे, अपनों के बीच छुपे परायों की पहचान करते रहे और उन अपराधी चेहरों को सामने लाते रहे और हमारा मन बहलाते रहे।
तब भी जानता था- अब कुछ और ज़्यादा जानता हूं- ये उपन्यास ज़िंदगी के, जासूसी के, जांच-पड़ताल और खोजबीन के बहुत सतही और उथले संस्करण थे। सेक्स, हिंसा और रहस्य-रोमांच की उस चाशनी को अपने-अपने ब्रांड के हिसाब से मिलाने वाले जो दरअसल पश्चिम के जासूसी उपन्यासों से बनी थी। लेकिन अगर जीवन और अध्ययन की वे प्राथमिक सीढ़ियां नहीं आई होतीं तो कुछ और ऊपर उठकर न गंभीर साहित्य को सहजता से पढ़ पाता और न ही जासूसी उपन्यासों और अपराध कथाओं की उस दुनिया में डूब पाता जो अब भी खींचती है। मैंने बहुत सारे तो नहीं, फिर भी सतही और गंभीर कई तरह की वे कहानियां पढ़ी हैं जिन्हें जासूसी उपन्यासों की श्रेणी में रखा जा सकता है। इनमें जेम्स हेडली चेज़ और शिडनी शेल्डन से लेकर अगाथा क्रिस्टी, रॉबिन कुक, जेफ़री आर्चर और कई दूसरे भूले-भटके नामों तक की रचनाएं शामिल हैं।
लेकिन इन अपराध कथाओं में ऐसा क्या है जो हमें खींचता है? अपराध कोई अच्छी चीज़ नहीं, कत्ल, अपहरण या लूटपाट की खबरें हमें अख़बारों में रोज़ मिलती हैं जिनसे हम त्रस्त रहते हैं। या हमारे अवचेतन में अपराध को लेकर एक कौतूहल रहता है जो अचानक किसी कहानी के बीच सक्रिय हो जाता है और हमें एक तरह की तृप्ति देता है? यह बहुत आजमाया हुआ और अब तो सर्वेक्षणों से भी प्रमाणित निष्कर्ष है कि दुनिया में सबसे ज़्यादा अपराध कथाएं बिकती हैं- चाहे वे साहित्य के रूप में हो या फिल्मों में या फिर टीवी सीरियल में। हो सकता है कि इसका कुछ वास्ता हमारे भीतर की उस आदिम अतृप्ति से हो जिनके बीच कोई अपराध घटित होता है- या फिर यह समझने से कि आखिर वह कौन सा मनोविज्ञान है जिसमें इंसान अपराध करता है।
लेकिन अपराध कथाओं या जासूसी उपन्यासों के हिट होने की सबसे बड़ी वजह उस कौतूहल में है जो इंसानी सभ्यता को आगे ले जाने वाले मूल तत्वों में है। यह कौतूहल न होता तो शायद हम अपने भीतर और बाहर की बहुत सारी छुपी हुई दुनियाओं की तलाश न कर पाते। वैसे तो पूरा साहित्य ही एक तरह से बाहर-भीतर के दृश्य-अदृश्य संसार की तलाश है, और कई बार बहुत शास्त्रीय मानी जाने वाली किताबें अपनी दुरूहता के बावजूद बेहद दिलचस्प अपराध और जासूसी कथाएं साबित हुई हैं। उंबेर्तो इको का उपन्यास 'नेम आॅफ द रोज़' कहीं से जासूसी उपन्यास नहीं है लेकिन लंबे दार्शनिक आख्यानों और संदर्भों से भरी यह पूरी किताब अंततः एक मठ में लगातार हो रही मौतों और उसकी जांच करने आए एक संन्यासी और उसके शिष्य की कहानी के बीच ही आगे बढ़ती है। ओरहान पामुक के उपन्यास माई नेम इज़ रेड की शुरुआत भी एक क़त्ल से ही होती है।
बहरहाल, यहां विषयांतर का ख़तरा है। हम एक विधा के रूप में जिन अपराध कथाओं की बात कर रहे हैं, वहां की दुनिया भी उत्सुकता के मूल रेशों से ही बनी है- बस इस फर्क के साथ कि उनमें बड़ी सघन तीव्रता को साधने की कोशिश होती है- उसके अपने फॉर्मूले भी होते हैं। हर अपराध या जासूसी कथा में कुछ कोशिशों को बहुत आसानी से पहचाना जा सकता है। मसलन एक शिल्प इस तरह का होता है जिसमें हत्यारा या अपराधी बिल्कुल सामने न आए। बिल्कुल अंत में यह राज खुलता है कि अपराधी कौन है? इसी शैली में यह कोशिश शामिल रहती है कि अपराधी वह निकले जिस पर पूरे उपन्यास में सबसे कम संदेह हो। हत्या करने में उसका हाथ सामने आए जो मृतक के सबसे करीब हो। अगाथा क्रिस्टी के कई उपन्यासों में यह प्रविधि दिखाई पड़ती है। ‘मर्डर इन मेसोपोटामिया’ में एक चौकोर घर के अलग-अलग कमरों में 12 लोग हैं और एक हत्या हुई है। हत्या का संदेह हर किसी पर है- लेकिन अंत में कातिल वह निकलता है जो सबसे पाक-साफ़ मालूम होता है, जिसने मक़तूल की सेवा के लिए एक नर्स और क़त्ल की जांच के लिए एक जासूस को बुलाया है।
दूसरी प्रविधि यह है कि हत्यारा या अपराधी एक के बाद एक जुर्म करता जाता है और जासूस उसके पीछे लगा रहता है। यहां सारी उत्सुकता इस बात को लेकर होती है कि अगला जुर्म कैसे होना है और चूहे-बिल्ली का यह खेल ख़त्म कब होना है।
चूहे बिल्ली के इस खेल की लोकप्रियता इस बात से समझी जा सकती है कि इसके अपने नायक हैं- कुछ तो इतने बड़े कि अपने लेखक से आगे निकल कर किंवदंतियों और मुहावरों में बदल गए हैं। आर्थर कानन डायल को कम लोग जानते हैं, उस शर्लक होम्स को सब जानते हैं जो पलक झपकते एक साथ कई चीज़ें विश्लेषित कर लेता है। ज़रूरत पड़ने पर वह बहादुरी भी दिखा सकता है लेकिन उसका नायकत्व दरअसल उस अंतर्दृष्टि में छुपा है जिसके सहारे वह अपराध की जगह देख अपराधी का मन पढ़ लेता है। हिंदी में मेजर बलवंत और कर्नल विनोद जैसे कई जासूस रहे हैं जिनके आने से अचानक पाठक कोई नया राज़ खुलने की उम्मीद पाल लेता है।
बहरहाल, यह सिर्फ ‘कौन’ और ‘कैसे’ का मामला होता तो जासूसी उपन्यास कब की अपनी उम्र खो चुके होते। इसके साथ बहुत सारी और भी चाशनियां हैं जो फेंटी जाती हैं। राष्ट्रवाद या देशभक्ति की चाशनी इसमें सबसे अहम है। जासूसी कथाओं का संसार वैश्विक राजनीतिक घटनाओं से भी खूब बनता रहा है। बीसवीं सदी के विश्वयुद्धों को पृष्ठभूमि में रखकर कुछ बेहतरीन जासूसी उपन्यास लिखे गए हैं। अगाथा क्रिस्टी के ‘सीक्रेट ऐडवर्सरीज’ की शुरुआत ही पहले विश्वयुद्ध में डुबो दिए गए एक जहाज़ से होती है जिसमें एक शख्स एक अनजान लड़की को कुछ बेहद गोपनीय दस्तावेज दे देता है ताकि वह उसे सुरक्षित पहुंचा सके। इसके बाद वह लड़की गायब हो जाती है। इसके बाद का उपन्यास उसकी तलाश के बीच दो बेखबर युवाओं के रोमांच से बनता है। इत्तिफाकन इस उपन्यास में अगाथा क्रिस्टी दो और प्रविधियों का इस्तेमाल करती हैं जो आगे चल कर जासूसी उपन्यासों में कई बार इस्तेमाल किए गए। उसकी गुम किरदार स्मृतिलोप की शिकार होती है जिसके चलते बहुत सारी समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। इसके अलावा इस उपन्यास में दो बेरोज़गार युवा- टॉमी और ट्यूपेंस- जो कहीं से जासूस होने के लिए प्रशिक्षित या तैयार नहीं हैं, और जिन्हें बस अपनी ज़रूरत के लिए एक खतरनाक मिशन में लगना पड़ता है- सबसे बड़े नायक सिद्ध होते हैं। इसके बाद कई ऐसे उपन्यास आए जिनमें ऐसे शौकिया या मामूली लोग बड़ी-बड़ी साज़िशों का पर्दाफाश करते देखे गए।
जेफरी आर्चर के ‘ऑनर अमंग थीव्स’ में सद्दाम हुसैन के लोग अमेरिका का डिक्लियरेशन ऑफ इंडिपेंडेंस चुरा लेने की योजना बनाते हैं। एक बार लगता है कि उन्होंने उसे चुरा भी लिया। 90 के दशक के बाद खाड़ी के देशों और अमेरिका के बीच के तनाव की पृष्ठभूमि में यह एक दिलचस्प उपन्यास है। इसी तरह जेफरी आर्चर का ही एक और उपन्यास ‘फॉल्स इंप्रेशंस’ हालांकि एक पेंटिंग को लेकर है, लेकिन उसकी पृष्ठभूमि में 9/11 का हमला भी है। इस कहानी में पुराने रईसों को उधार देने वाले एक बैंक की सलाहकार ऐसी ही एक रईस महिला के घर उसकी संपत्ति का मूल्यांकन करने पहुंचती है। महिला उधार चुकाने में अक्षम है और उसकी जायदाद बेचकर रकम वसूली की बात है। ये सलाहकार देखती है कि उसके विशाल मकान में वॉन गॉ का एक सेल्फ पोर्ट्रेट लगा हुआ है। वह उस महिला को बताती है कि बस यह पोर्ट्रेट बेच कर वह अपना पूरा कर्ज़ ही नहीं अदा कर सकती है, आने वाली ज़िंदगी की ज़रूरतों के लिए भी पैसा जुटा सकती है। यह बात वह न्यूयॉर्क में बैठे अपने बॉस को भी बता देती है जो उस लड़की पर बहुत बुरी तरह नाराज होता है। वह उसे फौरन वापस लौटने का आदेश देता है। उसी रात एजिलाबेथ नाम की उस महिला की हत्या हो जाती है और संदेह वहां से चली इस लड़की पर जाता है जो इन सबसे बेख़बर है। वह सुबह वर्ल्ड ट्रेड टावर की ऊपरी मंज़िलों में कहीं स्थित अपने दफ्तर पहुंचती है और एक-एक दो विमानों को इमारत से टकराता हुआ देखती है। अगले कई पन्नों में इस बात का वर्णन है कि वह कैसे वहां से उतरती है। यह पूरा उपन्यास आने वाले पन्नों में पेंटिंग की दुनिया में मूल और नकली की बहस को रखता है, चित्रकला की परंपरा को रखता है और एक बहुत रोचक पाठ बनाता है। 
दरअसल जासूसी उपन्यासों का यह संसार अब तो- खासकर अंग्रेज़ी में- कई हिस्सों में बंटा हुआ है। एक तरफ शुद्ध अपराध कथाएं हैं जिनमें बहुत वीभत्स तरीके से की जा रही हत्याओं की जांच पड़ताल है, दूसरी तरफ राजनीतिक टकराव के ताने-बाने से बने जासूसी उपन्यास हैं जिनमें एक-दूसरे के ख़िलाफ़ साजिशें करने और उन्हें नाकाम करने का खेल चलता रहता है। तीसरी तरफ़ कुछ ‘लाइट डिटेक्टिव’ उपन्यास हैं जिनमें न वीभत्स हत्याएं हैं और न ब़ड़ी साजिशें, बल्कि छोटे-छोटे तनावों के बीच छोटे-छोटे अपराधों और चूकों से बनने वाला रहस्य रोमांच है। इन सबके बीच ‘मेडिकल थ्रिलर’ भी हैं जिनके लिए रोबिन कुक मशहूर है। चिकित्सकीय गुत्थियों पर केंद्रित उसके उपन्यास अपनी तरह से बेहद रोमांचक हुआ करते हैं। ‘हार्मफुल इंटेंट’ नाम के उपन्यास में एक डॉक्टर एक महिला को एनीस्थीसिया देता है और उसकी जान चली जाती है। डॉक्टर पर लापरवाही का आरोप लगता है, उसे जेल की सज़ा होती है। इसके बाद डॉक्टर कैसे अपने-आप को बेगुनाह साबित करता है और कैसे इस कोशिश में नकली इंजेक्शनों दवाओं का एक कार्टल पकड़ा जाता है, इसकी बड़ी दिलचस्प कहानी मिलती है।
तो मेरे लिए जासूसी उपन्यासों का यह संसार जितना दिलचस्प रहा है उतना ही आंख खोलने वाला भी। मामूली लोगों के विकट साहस, गैरमामूली लगने वाले लोगों की साधारणता, अपराधियों के भीतर दबी इंसानियत, सफ़ेदपोश लोगों के भीतर बसे जुर्म, जीवन के सहज ब्योरों के बीच छुपी रहने वाली कहानियां, एक-दूसरे की वास्तविक शिनाख्त का सवाल- यह सब यह संसार हमारे सामने लाता रहा है।
फिर दुहराना होगा- इन जासूसी उपन्यासों को पढ़ना जीवन या पठन-पाठन की प्राथमिक सीढ़ियों पर ही चढ़ना है। ये लेखक हमारे टॉल्स्टॉय, शेक्सपियर, पामुक या मारख़ेज़ नहीं हैं जो हमारे लिए जीवन की बहुत सारी सूक्ष्मताओं का संधान करते हैं। लेकिन ये वे लोग हैं जो याद दिलाते हैं कि जीवन बहुत सारी अनिश्चितताओं और संभावनाओं से भरा है। इनसे गुज़र कर हम जब वास्तविक लेखकों तक पहुंचते हैं तो उस लेखन का भी कहीं ज़्यादा आनंद ले पाते हैं। जासूसी उपन्यासों ने मेरे लिए यह काम किया है, कुछ सीढ़ियां आसान बनाई हैं, कुछ चीज़ों को समझने की एक पृष्ठभूमि तैयार की है।
हंस से साभार।

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

मालिनी गौतम की किताब "एक नदी जामुनी सी" पर राजकिशोर राजन की एक टिप्पणी:-

परंपरा ऋतुराज सम्मान 2015 से सम्मानित मालिनी गौतम की किताब "एक नदी जामुनी सी" पर राजकिशोर राजन की एक टिप्पणी:-
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घनीभूत संवेदनाओं की प्रवहमान धारा
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एक नदी जामुनी सी-मालिनी गौतम
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मालिनी गौतम हिंदी कविता के क्षेत्र में एक परिचित  नाम हैं।इनकी कविताएँ अपनी सहजता और सादगी के कारण सहज ही आकर्षित करती हैं।आलोच्य संग्रह 'एक नदी जामुनी सी'व्यापक सामाजिक सरोकार और प्रेम के विस्तृत संसार की कविताएँ हैं।इस संग्रह के पूर्व'बूँद बूँद एहसास' कवितासंग्रह और'दर्द का कारवां' (ग़ज़ल संग्रह)प्रकाशित हैं।

इस संग्रह की कविताओं में स्त्री अस्मिता के यक्ष प्रश्नों से मुठभेड़ है ।इस संसार में प्रेम है,ख़ुशी है,दुःख है,अफ़सोस है,पीड़ा है और इन सबके बीच एक स्त्री का अपनी स्वतंत्र पहचान रचने की पटकथा है।पहली ही कविता 'छतरियां' स्त्री के त्याग, बलिदान और जीवन में हासिल का मर्मस्पर्शी कथा कहती है कि किस प्रकार घर परिवार और बच्चों पर छतरी की तरह तनी रहती है पर उसकी किस्मत में छतरियां नहीं है-----

औरतें------------
लाल,पीली,, नीली,सफ़ेद छतरियों सी
हर दम तनी हुई
अपने घर परिवार और बच्चों पर
---------------
पर अफ़सोस
उनके नसीब में नहीं होती
कोई लाल,पीली,नीली,या सफ़ेद छतरी

एक नदी जामुनी सी एक प्रेम कविता है।सीधी-सहज यह कविता ह्रदय के तार को झंकृत कर देती है।'उफनती आदिवासी नदी' एक बेहतर प्रेम कविता है ,इसमें प्रेम के ख़ूबसूरत पलों को सहेज लेने का प्रस्ताव है।'अनंतकाल के लिए'प्रेम को व्यापकता और सम्पूर्णता में देखती है,जहां दैहिक स्तर से  ऊपर उठ कर अस्तित्व के स्वीकार की बात है साथ ही जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गुंजाइश भी बनी रहे।'चाँद के साथ'कविता देर तक साथ रहती है,इसमें कवयित्री ने संसार में सर्वाधिक प्रिय चीजों को गिनाते हुए बताया है कि सबका अपना अपना चाँद होता है।अपनी कहन के कारण यह कविता बहुत प्रभावित करती है।इस संग्रह की प्रेम कविताओं का संसार भी व्यापक है वह मात्र रूमानी कार्य व्यापार  नहीं है।इन कविताओं में प्रेम का उच्चतर स्वरुप  है।इस संग्रह में प्रेमविषयक और स्त्रीविमर्श की जो कविताएँ हैं वे किसी विचारधारा या वाद से आक्रांत नहीं हैं।प्राकृतिक रूप से वे जड़ों तक पहुंच स्त्री के दुःखों और विडंबनाओं की पहचान करती हैं।स्त्री विमर्श के अभ्यस्त चलन को लाँघ कर कवयित्री ने अपनी बात कही है और हर बात पर और बात बात पर पुरुषों को कटघरे में खड़ा नहीं किया है और सारे दुखों के लिए पुरुषों को जिम्मेदार मान अपने कर्तव्यों की इतिश्री नहीं कर लेतीं।इस संग्रह की एक महत्वपूर्ण कविता'प्रेम में होना'में उनके विचारों को देखा जा सकता है।यह कविता बताती है कि एज औरत, पुरुष के प्रेम से पल भर उबरना नहीं चाहती,वह पुरुष के प्रेम में इस कदर डूब जाती है  और उस गहराई तक डूब जाती है जहाँ पहुंचकर उसका स्वयं का अस्तित्व समाप्त हो जाता है।जबकि पुरुष स्वयं के अस्तित्व को बचा लेता है और अपनी दुनिया में लौट आता है।कवयित्री की इस स्थापना को गंभीरता से समझने की जरुरत है।इससे भले कुछ लोग असहमत हो सकते हैं,पर इसमें सच्चाई है।इस कविता मैं'नमकीन सा फ़्लर्ट' जैसे प्रयोग भी है जो एक उदाहरण है कि उनके पास पर्याप्त शब्द भंडार हैं और शब्दों का बेहतर प्रयोग उन्हें भली भाँती ज्ञात है साथ ही काव्यतत्व की समझ भी------

पर पुरुष----
जिस तीव्रता से चढ़ता है
प्रेम की सीढियाँ
उतनी ही तेजी से वापस
उतरना भी चाहता है
इस भंवर में गोता लगाकर
अपनी दुनिया में

सर्द रिश्ते,जर्द पत्ते,कमबख्त दूरियां,लकीरें,बरसात,मिलान एक पल का,टूटता तारा,एक और एक ग्यारह,होने से न होने तक,जैसी प्रेम कविताएँ विभिन्न कोणों से प्रेम की अंतर्यात्रा करती हैं।ये कविताएँ जमीन से जुडी हुई कविताएँ हैं।'जर्द पत्ते'  आकार में छोटी पर एक खूबसूरत कविता है, जो पाठक से बार बार पाठ की मांग करती है-----

जरा ध्यान से
झांककर देखो
इन पीली निस्तेज आँखों में
मोहब्बत के सुर्ख पत्ते
अब यहाँ नहीं रहते
यह तो घर है
पीले जर्द पत्तों का
जिन्हें मैंने बरसों से रखा है
सहेजकर!

समाज में स्त्रियों के प्रति अत्याचार,भेदभाव,शोषण का विरोध मालिनी गौतम की कविताओं के मुख्य स्वर हैं।'सजा एक अपराध की' कविता की पहली ही दो पंक्तियाँ ही समाज में स्त्रियों की दुर्दशा को प्रभावपूर्ण तरीके से कहने में समर्थ है-------

लड़कियां कटती हैं
खेत में खड़ी फसलों की तरह
खटती हैं
मशीनों के कलपुर्जों की तरह
कच्चे सूत सी
काती जाती हैं चरखों पर
कच्ची हांड़ी सी
चढ़ाई जाती हैं आंच पर

राजकिशोर राजन


यह कविता लड़कियों के प्रति सामाजिक भेदभाव को गहराई तक जा बारीक़ चित्रण करती है और प्रकारांतर से प्रश्न पूछती है कि यह कैसा सभ्य समाज है! जहां लड़कियां मालगाड़ी सी दौड़ती हैं और हाथ पोंछे नैपकिन की भांति डस्टबिन में फेंक दी जाती हैं! कवयित्री अपनी कविताओं में कागज की लेखी नहीं, आँखन देखी कहती हैं इसीलिए इनकी कविताएँ जीवंत लगती हैं।इनकी कविताओं का सपना है कि यह संसार उस लायक बने जहां लड़कियों के लिए,स्त्रियों के लिए एक सुरक्षित कोना हो।इनकी कविताएँ उम्मीद की कविताएँ हैं।तमाम जड़ताओं के बाद भी दुनिया बदल रही है।स्त्रियों की लड़ाई रंग ला रही है,अपनी दुनिया के नवनिर्माण का उनका सपना रंग ला रहा है।कुछ इसी प्रकार की ध्वनि'लड़कियां बदली बदली सी' में सुनाई पड़ती है जहां वे अपनी स्कूलों और कालेजों में स्वतंत्रता का अनुभव तो कर रही हैं पर घर पहुँचते पहुँचते उनके पैरों में बेड़ियां पद जाती हैं ।यह कविता शिल्प की दृष्टि से भी संग्रह की बेहतरीन कविताओं में से एक है।उसी प्रकार 'औरत' कविता है जहां आज भी एक औरत सुबह के इंतजार में है।कविताएँ लयात्मक हैं जिसका मुख्य कारण कवयित्री का गीतकार होना है और कविता भी तो अंततः यही चाहती है कि वह किसी के होठों  पर थिरके ,गीत बन जाये----

आज मैंने फिर ढूंढ उसे
माथे पर लगे सिंदूर में
ऊँन के गोलों में
बिस्तर पर बिछी चादरों में
कर रही थी वह इंतजार
एक और सुबह का

संग्रह की कविताओं की भाषा सहज और तरल है,कहीं भी अमूर्तन या अबूझ पन नहीं है।कहन का सलीका और सादगी इन कविताओं को एक अलग आस्वाद प्रदान करता है और सबसे बड़ी बात की मालिनी गौतम का कवि सब कुछ खोकर भी कविता को बचाना चाहता है----

अपना अब कुछ खोकर भी
मैं बचाना चाहती हूँ
मेरी कविता --मेरी कविताई
                         (मैं और कविता)



शनिवार, 22 अक्टूबर 2016

31अक्टूबर :सनसनी के बहाने दर्शकों को जुटाने की नाकाम कोशिश

31अक्टूबर :सनसनी के बहाने दर्शकों को जुटाने की नाकाम कोशिश
-सुशील कुमार भारद्वाज
गूगल से साभार


फिल्मकार फिल्म बनाते समय फिल्म की कहानी, विषय, कलाकार तथा कमाई जैसे अन्य चीजों पर भी विचार करते हैं। लेकिन इन दिनों फिल्म की सफलता की गारंटी के लिए कुछ खास नुस्खों का भी उपयोग किया जाने लगा है बिल्कुल समाचार चैनलों की तरह समाचार सनसनी फैलाने और लोगों को आकर्षित करने की नीयत से। शायद निर्देशक शिवाजी लोटन पाटिल और निर्माता हैरी सचदेवा ने कुछ सनसनी फैलाने और कम बजट में अधिक मुनाफा कमाने के इरादे से ही फिल्म का नाम "31 अक्टूबर" रखा। इतना ही नहीं वर्ष 1984 और भारत शब्द को भी पोस्टर में टिकट की तरह प्रस्तुत किया गया है। और यदि 31 अक्टूबर 1984 का भारतीय इतिहास में कोई खास महत्व है तो इसलिए कि उस दिन भारत के तत्कालीन महिला प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गाँधी की हत्या उनके ही दो सिख अंगरक्षकों ने कर दी थी जिसका तात्कालिक कारण ब्लू अॉपरेशन यानि सेना का अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में घुसकर आतंकवादियों का मार गिराने की अनुमति देना था। और इंदिरा गाँधी की हत्या की खबर फैलते ही दिल्ली और आसपास के इलाके में साथ ही देश के लगभग सभी राज्यों में कमोवेश हिंसा का एक लहर चल पडा। दंगे की आग में काफी जानमाल की क्षति हुई थी। बाद के वर्षों में जाँच और अदालत की भी बातें हुईं लेकिन परिणाम सिफर ही रहा। तब से अब तक में एक लंबा दौर गुजर चुका है। इस बीच अनेक अन्य दंगें भी हुए और दंगों के बहानें कुछ फिल्में भी आईं।
लेकिन सोहा अली खान, वीर दास, दयाशंकर पांडे, लखा लखविंदर सिंह, प्रीतम कांगे, और सेजल शर्मा अभिनित फिल्म "31 अक्टूबर" न तो इंदिरा गाँधी की कहानी है न उनके हत्या की कहानी बल्कि यह एक दंगा पीडित परिवार की कहानी है जो अपने धर्म के कारण पहले तो अपनों के बीच शक की निगाह से देखा जाता है और बाद की उसकी जिंदगी बने माहौल की वजह से दुश्वारियों से भर जाती है। वे न्याय की आस में आगे बढते हैं जहाँ उन्हें कुछ लोगों का साथ तो मिल जाता है लेकिन न्याय नहीं।
फिल्म में कलाकारों के अभिनय और गीत संगीत पर कुछ कहना अलग बात है लेकिन सवाल उठता है कि क्या फिल्मकार के लिए फिल्म का नाम न्यायोचित है? क्या 1984 के भारत को पूर्णत: दिखाने में सफलता मिली? क्या दंगा पीडित की प्रस्तुत स्थिति सिर्फ इसी दंगें में हुई थी या कमोबेश यही स्थिति हर दंगें की होती है? क्या फिल्मकार ऐतिहासिक फिल्म बनाने की कोशिश कर रहे थे? यदि नहीं तो फिर फिल्म का नाम सनसनी फैलाने के लिए क्यों? जब फिल्म 2015 में ही तैयार हो गई थी तो 2016 में वह भी अक्टूबर के महीने में प्रदर्शित करने की क्या वजह बनी? शायद फिल्म निर्देशक कहीं न कहीं भ्रम की स्थिति में रहे जिसका खामियाजा यकीनन फिल्म को भुगतना पड रहा है या पडेगा। फिल्म की सफलता के लिए फिल्म की सारी कसौटियों पर खडा उतरना भी निहायत ही जरूरी है। और दर्शकों के नब्ज को पकडने की जरूरत भी

सुशील कुमार भारद्वाज

रविवार, 4 अक्टूबर 2015

गीताश्री की कहानी सोनमछरी दैहिक प्रेम पर निःस्वार्थ प्रेम की जीत है (सुशील कुमार भारद्वाज )



सोनमछरी: दैहिक प्रेम पर निःस्वार्थ प्रेम की जीत

                                     
  -सुशील कुमार भारद्वाज
स्त्री अस्मिता के अनछुए पहलुओं पर बेबाकी से लिखने वालों में गीताश्री का नाम अहम है. लंबे समय से पत्रकारिता एवं साहित्य से जुडी लेखिका का अनुभव फलक इतना विस्तृत है कि उन्हें सिर्फ स्त्री विमर्श या किसी और विमर्श तक में सीमित करना उचित नहीं है. वे अपने पात्रों को स्त्री–पुरुष मानने की बजाय उसे सिर्फ पात्र मानती हैं और परिस्थिति के अनुसार न्याय करती हैं. खालिस आदर्शवाद की बजाय वो मनोवैज्ञानिकनी यथार्थ को तवज्जो देती हैं.
गीताश्री की कहानी “सोनमछरी” चयन के अधिकार और बेमेल विवाह के बीच संकरे आर्थिक गली से गुजरती है. जहाँ एक तरफ धोखा है तो दूसरे तरफ बेबसी. किसी को बदल देने की जिद्द है तो स्वयं ही बदल जाने की नियति. कुछ श्राप का भ्रम है तो कुछ अपनी अपरिपक्वता में लिए गए निर्णय का पश्चाताप. अंत में है दैहिक प्रेम पर निःस्वार्थ प्रेम की जीत, और उद्देश्यपूर्ण जीवन.
गौर करने वाली बात है कि लेखिका पत्रकारिता में बीडी व्यवसाय एवं बीडी मजदूर पर गहन रिपोर्टिंग कर चुकी हैं. अतः संभव है कि सोनमछरी कहानी का बीजारोपण उसी अनुभव की परिणति हो. खैर कहानी फ्लाश्बैक में तीव्र गति से बगैर विशेष रायता फैलाये आगे बढती है. जहाँ शंकर लड़की की बीडी बनाने की कला के बारे में जानकारी लेने के बाद ही शादी के लिए हामी भरता है. शंकर के नजरिये से शादी का मतलब है - स्त्री-पुरुष का दैहिक मिलन और बीडी बनाने के सामाजिक पेशे में ही रम कर सारे सुखों और दुखों के बीच जीवन का पूर्ण निर्वाह. जहाँ न चुहल करने के लिए अवकाश है, न ही अपने आर्थिक स्थिति को विस्तार देने की चाह है और न ही सेफ जोन से बाहर जाकर कुछ नया कर गुजरने की प्रेरणा.
भारतीय समाज में एक कहावत है “किसी लड़की की शादी में झूठ बोलना ठीक वैसे ही गलत नहीं है जैसे महाभारत में युद्धिस्थिर का झूठ बोलना”, और वे सोचते हैं कि स्त्री में वह शक्ति है जो किसी भी व्यक्ति और परिस्थिति पर शासन कर सकती है. जिसके परिणाम को हम रुम्पा के उस रूप में देख सकते हैं जिसमें वो अपने मायके से लायी कहानियों में शंकर को उलझा कर शारीरिक संसर्ग से महीनों दूर ही नहीं रखती है, बल्कि बीडी बनाने के काम को छोड़ कर मछली मारने को विवश भी करती है.
घर की शांति और सफल गृहस्थ जीवन की चाह में हार मानकर खुद को बदलने की गरज से शंकर जब मछली मारने के लिए तैयार होता है तब रुम्पा के ह्रदय में समायी अंतहीन भावनाएं मुखर हो विजय घोष को पूरे जांगीपुर में फैलाने लगती हैं. उसके अंदर का नासमझ लालच इस कदर फुंफकार मारता है कि शंकर अपने पहले दैहिक सुख को पाने के आश्वासन मात्र से काल्पनिक दुनिया में खोकर बेबस मन से ही सही लेकिन गंगा के लहरों से जूझने चला जाता है.
इंसान तब सबसे ज्यादे दुखी होता है जब उससे कोई चीज छीन लिया जाय, चाहे वह वस्तु उसके नज़र में कितना ही तुच्छ क्यों न हो? रुम्पा का दुख-दारुण होना, और उसी बीडी व्यवसाय में अव्वल होना जिससे नफ़रत हो, उबकाई आती हो, नियति का रहस्योद्घाटन करता है. यदि रुम्पा अपनी जिद्द में न बहकती तो क्या यह परिस्थिति संभव था? कहा जाता है जब इंसान दुखी होता है तभी उसे प्रेम होता है, वह जीवन की सच्चाइयों से वाकिफ होता है, वह उन्नति के मार्ग की ओर बढ़ता है. लेकिन यह भी सच है कि रुम्पा को नयी खुशी भी इसी बीडी व्यवसाय में लगे अमित दास से मिलती है. जिससे मछली का उसका चयन गलत साबित होता है. लेकिन यह हमारे बदले एवं उन्मुक्त वातावरण का असर है, जहाँ छटपटाहट है मुक्ति का, उन्मुक्त जीवन जीने का, आसमान को किसी भी कीमत पर छूने का.
लेकिन बंग्लादेश की जेल से साल भर की यातना झेलने के बाद जब शंकर वापस आया तो उसकी दुनिया उजड चुकी थी, उसका दोष क्या था? नियति को उसी से सारा दगा करना था जो निर्दोष था? उसने शांति से जीवन जीना चाहा, क्या यह था उसका दोष? पत्नी की खुशी की खातिर खुद को बदल लेना गुनाह था? रुम्पा के माता-पिता ने झूठ बोला और उनकी शादी करवा दी, उसकी सजा सिर्फ शंकर को मिलनी चाहिए? रुम्पा न तो शंकर का चयन की थी न ही उसके व्यवसाय और आर्थिक स्थिति को, तो इसमें उसका क्या दोष था? रुम्पा का कष्ट तो उसके माता-पिता या उसका खुद का चयन था, लेकिन शंकर का कष्ट किसका चयन था?
माना कि बाद में बीडी का चयन उसकी नियति थी, लेकिन अमित का चयन किसका था? क्या उसका काल्पनिक दुनियां चकनाचूर हो चुका था? क्या वो व्यावहारिक हो चुकी थी? नियति को चुनौती देने का सामर्थ उसमें आ चुका था या उससे समझौता कर चुकी थी? कहीं रुम्पा का ये यथार्थ से पलायन तो नहीं? उसमें शंकर के सवालों का सामना करने का साहस नहीं?
मानवीय दृष्टिकोण से जो गलत हुआ लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से देखें तो रुम्पा ने अमित का चयन सही ही किया, इससे सिर्फ एक इंसान, शंकर, की जीते जी मौत हुई वर्ना तीनों जिंदगी की तबाही ही नियति थी. जब त्रेता युग में लंका से वापसी के बाद सीता का शांतिपूर्वक निर्वाह राम के साथ न हो सका तो जहरीले वातावरण वाले कलयुग में रुम्पा का निर्वाह शंकर के साथ कैसे हो पाएगा? यातनाओं एवं भावनात्मक जख्मों से छलनी हो चुका शंकर फ्रायड के सिद्धांत से शायद ही कहीं चुकेगा. आदर्शवाद और कानून कुछ भी कहे लेकिन टूट चुका विश्वास का गांठ शायद ही कभी उन्हें चैन की साँस लेने देगा. एक इंसान के तौर पर शंकर रुम्पा को एक शरीर के अलावे शायद ही कुछ और समझ पाएगा, जहाँ सहानुभूति भी कभी रिस-रिस कर ही पहुंचे. लेकिन अमित के साथ नये जीवन में व्यावहारिक रूप से उसे सबकुछ मिलने की संभावना शेष है.
गीताश्री ने गंगा किनारे बसे एक बस्ती की कहानी में जहाँ बिम्बों का यथोचित प्रयोग किया है, वहीं हिंदी और बांग्ला के शब्दों का इस्तेमाल कर एक बेहतरीन शिल्प में कहानी को प्रस्तुत करने का सफल प्रयास भी किया है. यहाँ तक की शीर्षक “सोनमछरी” भी विरोधाभास को समेटे आकर्षण का केंद्र है जो आपको सोचने-विचारने पर मजबूर कर देता है. संभव है कुछ लोग इसके भावनात्मक पक्ष को लेकर टीका –टिप्पणी करें, लेकिन भावना हमारे जीवन से इतर है क्या? विद्वान आलोचकों ने भावना में बहने से मना किया है भावना से तो नहीं.
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रविवार, 6 सितंबर 2015

कलबुर्गी की हत्या के बाद का तमाशा(सुशील कुमार भारद्वाज )



                   कलबुर्गी की हत्या के बाद का तमाशा
                              ( सुशील कुमार भारद्वाज)





              एम एम कलबुर्गी
कन्नड़ लेखक कलबुर्गी की हत्या के बाद जो तमाशा दिख रहा है उससे यक़ीनन स्वयं प्रो एम एम कल्बुर्गी की आत्मा दुखी होगी. निर्ममता और नृशंसता की हद है कि लोग तरह तरह की बयानबाजियां कर रहें हैं. कोई कहते हैं कि कल्बुर्गी मुस्लिम होते तो कितना हायतोबा मचता? कोई कहते हैं कांग्रेस की सरकार है फिर सोनिया गाँधी या राहुल गाँधी ने चुप्पी क्यों लाद रखी है? लगभग किसी न किसी शहर में किसी न किसी संगठन के द्वारा प्रतिरोध मार्च प्रतिदिन निकाले जा रहे हैं उनमें बहुत सारे ऐसे भी हैं जिनका विचार उनसे अलग रहा है. बात अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भी है. लेकिन हस्याद्पद स्थिति ये है कि कुछ लोग खेमेबाजी का भी खेल खेल रहें हैं. बात यहीं कहाँ रूकी? एक प्रसिद्ध लेखक ने अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार राशि सहित लौटाने का घोषणा किया तो इस पर एक अलग खेल शुरू हो गया. कोई उन्हें पलटदास कहता है तो कोई उनके ऐतिहासिक कृत्यों पर ऊँगली उठा रहा है.

कोई यह नही कह सकता कि आगे किसी तरीके की हत्या अब न होगी. न ही कोई यह कह रहा है कि आगे की कार्य योजना क्या हो? कुछ लोगों की गंभीरता की बातों को अलग कर दें तो सारा नजारा किसी तमाशा से कम नही दिखता है जहाँ अपना फोटो खिंचवाने और नाम उछालने का मौका लोगों को ठीक उसी प्रकार मिल गया है जिस प्रकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वच्छता अभियान के समय सेल्फि का मिल गया था. क्या यह किसी क्रूर मजाक से कम है?

लोगों ने कन्नड़ भाषा या कलबुर्गी के साहित्यों की ना तो गंभीरता से चर्चा की न ही उनके साहित्य को बड़े फलक या विश्व के बड़े पाठक समुदाय के बीच लाने की कोई कोशिश या संकल्प किया. उनके पीछे जो परिजन हैं उनकी सहायता के लिए कितने हाथ आगे सही मायने में बढे कहना मुश्किल है. ऐसी परिस्थिति में प्रो एम एम कुलबुर्गी अब क्या सोचते होंगे ठीक ठीक कुछ कह पाना मुश्किल ही लगता है. लेकिन इतना तो तय ही है कि जितना वे जिन्दा रहते दुखी नही हुए होंगें उससे कहीं अधिक आज वे अपनी मौत के बाद हो रहे तमाशे से दुखी होंगें. लोगों को कम से कम किसी के मौत के बाद खेले जा रहे इस असंवेदनशीलता से थोडा उपर उठने की कोशिश जरूर करनी चाहिए.