निराशा के अंधकारमय वातावरण में जो चमकती हुई चीज नजर आती है उसमें लोगों का विश्वास जमता है। उसमें वे एक रहनुमा का अक्स देखते हैं। इसी सहारे उसे एक तय वक्त देते हैं लेकिन जब वह उस उम्मीद पर खड़ा नहीं उतरता है तो वे उसे क्षमा करने की स्थिति में भी खुद को नहीं पाते हैं। आश्चर्य जैसी कोई बात यहाँ नजर नहीं आती। क्रांति की चाह सबकी होती है क्योंकि बदलाव हर कोई चाहता है पर कोई रहनुमा नहीं बनना चाहता है क्योंकि हर इंसान बीबी -बच्चा वाला है। घर-परिवार की समस्याओं से उसे फुर्सत कहाँ है जो वह देश -समाज की बात सोच सके। उसके पास फुर्सत है तो सिर्फ किसी को गरिया लेने का। देश- दुनिया में सबको भ्रष्ट और सबसे अनैतिक करार देने की क्षमता है। वह घूसखोरी के खिलाफ सौ पेज का भाषण उड़ेल सकता है लेकिन जरूरत पड़ने पर सबसे पहले लेन-देन कर मामले को शांतिपूर्वक निपटाने का भरसक प्रयास करेगा। विफलता की स्थिति में ही शायद वह क्रांतिकारी के रूप में नजर आए वर्ना उनके पास सफाई के सौ अफसाने जरूर होंगें। मूढ़ जनता तब भी थी आज भी है। फुर्सत है किसके पास कि कोई किसी के फटे में टाँग अड़ाए। कहा गया है न कि जिनके घर खुद शीशे के हों वो दूसरों ......। दरअसल में बात वही है। यहां बेदाग है कौन? जिस तरह भगवान बुद्ध ने अपने बेटे के मृत्यु के दुख से दुखी बुढिया को कहा था कि यदि तुम एक मुट्ठी सरसों ला दो तो मैं तुम्हारे संतान को जिंदा कर दूँगा बशर्तें उस घर में आज तक किसी की मृत्यु नहीं हुई ह़ो। बुढ़ी अम्मा अपने संतान की खातिर किस किस दरवाजे नहीं गई? लेकिन अंत में निराशा के सिवाय मिला क्या? और बुद्ध को भी वह कोई दोष नहीं दे पाई । कहीं न कहीं वही स्थिति हमारी भी है। कोई भी इंसान न तो परिपूर्ण है न पूर्ण परिपक्व और न ही दोष रहित। इंसानी खामियां उसे भी कहीं न कहीं किसी मोड़ पर समझौता करने को मजबूर कर देती हैं। लेकिन जिन्हें हम भगवान मान लेते हैं उनसे हम गलती होने की अपेक्षा ही कहाँ रखते हैं? और शेष काम के लिए तो आलोचक दिन -रात मौके की ताक में तो आँखें बिछाये बैठे ही रहते हैं। फिर विवश होकर सोचना ही पड़ता है कि आखिर गलती किसकी है? इतनी अपेक्षाओं को पालने को किसने कहा था? किससे पूछकर हमने दूसरे पर इतना विश्वास कर लिया? किस भरोसे हमने दूसरे के कंधे पर अपनी उम्मीदें लाद दी? क्या यह न्यायसंगत था? फिर बाबेला किस बात का? यदि जो गलती खुद की है तो भुगतो। दूसरे को गरियाने से क्या मिलने वाला है सिवाय अपने अंदर की गंदगी से बाहरी समाज और वातावरण को गंदा करने के?
शनिवार, 13 मई 2017
गलती किसकी (आलेख): सुशील कुमार भारद्वाज
निराशा के अंधकारमय वातावरण में जो चमकती हुई चीज नजर आती है उसमें लोगों का विश्वास जमता है। उसमें वे एक रहनुमा का अक्स देखते हैं। इसी सहारे उसे एक तय वक्त देते हैं लेकिन जब वह उस उम्मीद पर खड़ा नहीं उतरता है तो वे उसे क्षमा करने की स्थिति में भी खुद को नहीं पाते हैं। आश्चर्य जैसी कोई बात यहाँ नजर नहीं आती। क्रांति की चाह सबकी होती है क्योंकि बदलाव हर कोई चाहता है पर कोई रहनुमा नहीं बनना चाहता है क्योंकि हर इंसान बीबी -बच्चा वाला है। घर-परिवार की समस्याओं से उसे फुर्सत कहाँ है जो वह देश -समाज की बात सोच सके। उसके पास फुर्सत है तो सिर्फ किसी को गरिया लेने का। देश- दुनिया में सबको भ्रष्ट और सबसे अनैतिक करार देने की क्षमता है। वह घूसखोरी के खिलाफ सौ पेज का भाषण उड़ेल सकता है लेकिन जरूरत पड़ने पर सबसे पहले लेन-देन कर मामले को शांतिपूर्वक निपटाने का भरसक प्रयास करेगा। विफलता की स्थिति में ही शायद वह क्रांतिकारी के रूप में नजर आए वर्ना उनके पास सफाई के सौ अफसाने जरूर होंगें। मूढ़ जनता तब भी थी आज भी है। फुर्सत है किसके पास कि कोई किसी के फटे में टाँग अड़ाए। कहा गया है न कि जिनके घर खुद शीशे के हों वो दूसरों ......। दरअसल में बात वही है। यहां बेदाग है कौन? जिस तरह भगवान बुद्ध ने अपने बेटे के मृत्यु के दुख से दुखी बुढिया को कहा था कि यदि तुम एक मुट्ठी सरसों ला दो तो मैं तुम्हारे संतान को जिंदा कर दूँगा बशर्तें उस घर में आज तक किसी की मृत्यु नहीं हुई ह़ो। बुढ़ी अम्मा अपने संतान की खातिर किस किस दरवाजे नहीं गई? लेकिन अंत में निराशा के सिवाय मिला क्या? और बुद्ध को भी वह कोई दोष नहीं दे पाई । कहीं न कहीं वही स्थिति हमारी भी है। कोई भी इंसान न तो परिपूर्ण है न पूर्ण परिपक्व और न ही दोष रहित। इंसानी खामियां उसे भी कहीं न कहीं किसी मोड़ पर समझौता करने को मजबूर कर देती हैं। लेकिन जिन्हें हम भगवान मान लेते हैं उनसे हम गलती होने की अपेक्षा ही कहाँ रखते हैं? और शेष काम के लिए तो आलोचक दिन -रात मौके की ताक में तो आँखें बिछाये बैठे ही रहते हैं। फिर विवश होकर सोचना ही पड़ता है कि आखिर गलती किसकी है? इतनी अपेक्षाओं को पालने को किसने कहा था? किससे पूछकर हमने दूसरे पर इतना विश्वास कर लिया? किस भरोसे हमने दूसरे के कंधे पर अपनी उम्मीदें लाद दी? क्या यह न्यायसंगत था? फिर बाबेला किस बात का? यदि जो गलती खुद की है तो भुगतो। दूसरे को गरियाने से क्या मिलने वाला है सिवाय अपने अंदर की गंदगी से बाहरी समाज और वातावरण को गंदा करने के?
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें