शनिवार, 13 मई 2017

धंधा है चलता ही रहेगा ः सुशील कुमार भारद्वाज


लगातार जारी है और जारी ही रहेगा। ऐसा भी नहीं है कि यह पहली बार हुआ है। भूतकाल में भी लोगों ने इनके जलवे देखे हैं लेकिन वो क्या कहते हैं न कि थेथरई इतनी जल्दी छुटती नहीं। चोरी करके भी सीनाज़ोरी करके गर्व से आगे बढ़ते जाते हैं। आखिर उनका दोष भी कहाँ है? दोषी तो शायद वे हैं जो सबकुछ जानकर भी उनके अंधभक्त हैं। उनके छिछाले में भी उनके अद्भूत कारनामें और हिम्मत देखते हैं। उनके जयकारे में ही सारी शक्ति उड़ेल देते हैं। दुःख में भी चूँ करने की हिम्मत नहीं कर पाते। इसलिए नहीं कि उन्हें बोलना नहीं आता बल्कि इसलिए कि उन्हें अपने थूके को ही चाटना पड़ेगा। चाहे ऐंठन कितनी ही क्यों न पड़ जाए वे हिलेंगें नहीं और जो कहीं हिल गये तो समझ लो कि उनको कोई नया आका मिल गया। वह संरक्षित और सुरक्षित महसूस कर रहा है। फिर तो वह विभीषण की तरह अपने पुराने घर में भी आग लगाने से नहीं चुकेगा। आखिर राजनीतिक दांवपेच सीख कर ही तो वे यहाँ तक पहुँचे हैं। आखिरकार क्योंकर उनसे कोई ईमानदारी की आस लगाये बैठा है। अब तो ईमानदारी की आस लगाना ही बेईमानी है। अभी भी शक है तो मारते रहो अंधेरे में तीर। निशाने पे गया तो भी वाह वाह चूक गया तो भी वाह वाह। अपना क्या है? हम तो कह देंगें - राम राम भाई राम राम।

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