सोमवार, 3 अप्रैल 2017

अविनाश दास ने दिया अनारकली ऑफ आरा के सहयोगियों को धन्यवाद

पत्रकार से फिल्मकार बने अविनाश दास अपनी फिल्म "अनारकली ऑफ आरा" के आने और उसके प्रदर्शन के बाद आज अपने फेसबुक वॉल से फिल्म से जुड़े हर कलाकार को धन्यवाद दे रहे हैं। जितनी अच्छी फिल्म थी उतने ही अच्छे इंसान हैं अविनाश भाई। एक औपचारिक धन्यवाद देकर अविनाश भाई ने बता दिया कि हम मिट्टी के लोग मिट्टी से जुड़े रहना जानते हैं। हम न सफलता पाकर अहम् में डूब जाते हैं न ही असफलता पर रूक जाते हैं बल्कि अपने कर्मों का ईमानदारी पूर्वक वहन करते हुए आगे बढ़ते रहते हैं। अविनाश भाई जीवन में हमेशा सफल होते रहें, एक से बढ़कर एक अच्छी फिल्मों को करते हुए अपना और बिहार का नाम रौशन करते रहें । इन्हीं शुभकामनाओं के साथ पढ़ते हैं उनके शब्दों को।


फिल्म आयी, गयी। बातें हैं, बातें रहेंगी। हमारी तरफ किसी भी आयोजन की शुरुआत मंगलाचरण (Invocation) से होती है और समापन समदाउन (Thanksgiving Song) से होता है।


मैं सबसे पहले स्वरा [Swara Bhasker] का शुक्रिया करता हूं, जो अनारकली को कंसीव करने से लेकर स्क्रिप्ट और बाद की पूरी प्रक्रिया में पूरी तरह इनवाॅल्व रही। काफी ख़ून जलाया और कई बार ज़ख़्मी हुई, बीमार पड़ी।

डायरेक्टर आॅफ फोटोग्राफ़ी अरविंद कन्नाबिरन [Arvind Kannabiran] नहीं होते, तो शायद मैं बहुत असहाय होता। उन्होंने हमेशा मेरा उत्साह बनाये रखा, ढाढ़स देते रहे। सेट पर तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बाद भी मेरे प्रति अपने सम्मान और विश्वास में उन्होंने कोई कमी नहीं आने दी।

एडिटर जबीन मर्चेंट [Jabeen Merchant], जिन्होंने अनारकली को टेबल पर लगभग री-राइट किया। मेरी हर बात को धैर्यपूर्वक सुना और फिल्म की मूल भावना को लेकर स्क्रिप्टिंग के समय से बहुत उत्साहित रहीं।

संगीतकार रोहित शर्मा [Rohit Sharma] इस फिल्म की रीढ़ रहे। बिहार की आत्मा उन्होंने अनारकली के संगीत में उकेरने की कोशिश की और सफल रहे। रोहित जी के बिना अनारकली की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

असोसिएट डायरेक्टर रवींद्र रंधावा [Ravinder Randhawa] पूरी ख़ामोशी से मेरे हिस्से का विष पीते रहे और पूरी समझदारी से इस फिल्म को बेहतर और बेहतर बनाने में लगे रहे। ख़ास बात ये कि जिस क्लाइमेक्स की चर्चा हो रही है, वह गीत उन्होंने लिखा। वरना मेरे पास तो क्रांतिकारी कवि गोरख पांडे के गीत "गुलमिया अब हम नाही बजइबो, अजदिया हमरा के भावेले" का रेफरेंस था!

प्रोडक्शन डिज़ायनर अश्विनी श्रीवास्तव [Ashwini Shrivastav] ने कम संसाधनों के बावजूद अनारकली की दुनिया को रीयल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

एक नाम, जिसका ज़िक्र करना लाज़िमी है, वह नाम है तुषार सेठ [Tushar Seth] का। वह हमारे फर्स्ट एडी थे। तुषार ने टाइट टाइम-लाइन का हमेशा सबसे ज़्यादा ख़याल रखा। प्रोड्यूसर के दिये गये समय के भीतर हम तुषार की वजह से ही फिल्म बना पाये।

काॅस्ट्यूम डिज़ायनर रूपा चौरसिया [Rupa Chourasia] का डंका तो बज ही रहा है। तो हम भी उनकी जय जय कर लेते हैं।

बाक़ी हमारे कास्टिंग डायरेक्टर जीतेंद्र नाथ जीतू [Jitendra Nath Jeetu], असिस्टेंट डायरेक्टर्स निधि [Pandey Nidhi Singh], अमित [Amit Mishra] और मुहित [Muhitt Agarwaal] ने जो दिन-रात एक किया था, उसे शुक्रिया जैसे औपचारिक शब्दों से नहीं निपटाया जा सकता। पार्टी होगी दोस्तों और ज़रूर होगी।

आख़िर में निर्माता संदीप कपूर [Sandiip Kapur] का धन्यवाद, जिनके बिना अनारकली सिनेमा के पर्दे पर कभी नहीं आ पाती। आज भी परदे के पीछे के सामाजिक अंधेरे में टाॅर्च की रोशनी पर नाचती रहती और सारा दुख अकेली झेलती रहती।

#AnaarkaliOfAarah

अनिरूद्ध सिंहा की गजलें

                     
       
ग़ज़ल
                     अनिरुद्ध सिन्हा

पाले हुए  जो ज़ख्म  जुबां  पर उतर गए
रिश्ते तमाम  कट  गए  जज़्बात मर गए

घर की  तलाश और  मुहब्बत की चाह में
निकले  हुए वे लोग  न जाने  किधर गए

ये और  बात है  कि हमें  कुछ नहीं मिला
जब ज़िन्दगी की खोज में हम चाँद पर गए

साये की  तरह रहते थे जो साथ –साथ वो
रस्ते में अब मिले भी तो बचकर गुज़र गए

खुशबू तुम्हारे जिस्म की ये काम कर  गई
काँटों पे  चल रहे  थे अचानक  ठहर गए

                   💐💐💐💐💐


फूल बनकर जो ख़्वाब आता है
बारहा    लाजवाब   आता  है

जब मुहब्बत से लोग मिलते हैं
तब  वहाँ  इन्क़लाब  आता है

फिर भी रौशन जहां नहीं होता
रोज़  ही  आफताब  आता  है

अब कहाँ प्यार के लिफाफे में
कोई  लेकर  गुलाब  आता है

शायरी  में मज़ा  तभी आता
शेर जब  कामयाब  आता है


💐💐💐💐💐


कोई किसी की तरफ है कोई किसी की तरफ
वो एक हम हैं जो रहते हैं ज़िन्दगी की तरफ

जरूर  उससे  कोई दिल  का  मामला होगा
हमारी सोच भटकती है क्यों उसी  की तरफ

ग़मों ने  इतनी  मुहब्बत से हमको पाला है
कदम उठे न हमारे  कभी  खुशी की तरफ

वफ़ा  का  साज  उठाए  हुए न जाने क्यों
मैं चल रहा हूँ  अँधेरी तेरी  गली की तरफ

भटक न जाए वो  सहरा में दर बदर होकर
बढ़ाए हाथ  समुंदर  रहा  नदी  की  तरफ


💐💐💐💐💐



वो मेरे दिल तलक आता  मगर दाखिल नहीं होता
महज मिलने मिलाने से ही कुछ हासिल नहीं होता

जो हम  फिरकापरस्ती  को मुहब्बत से मिटा देते
कोई बिस्मिल नहीं  होता कोई क़ातिल नहीं  होता

ये कैसी  बेबसी  के दौर  में  अब जी रहे हैं हम
हमारी फिक्र में  शामिल हमारा  दिल नहीं  होता

अगर सीने में जज़्बों की जो लौ मद्ध्म नहीं होती
किसी  को जीत लेना फिर यहाँ मुश्किल नहीं होता

कभी जो  ठान लेता  है बगावत के लिए कुछ भी
तो लेकर हाथ में खंजर  कभी गाफ़िल नहीं  होता

                       💐💐💐💐💐


जब भी उठा  है  दर्द  तेरा  मुस्कुरा लिए
कुछ इस तरह से आँख के मोती बचा लिए

जितने चमन के फूल थे घर में सजा लिए
यारों  ने  खूब  अपने  मुक़द्दर बना  लिए

ज़ख़्मी  हुए हैं  पाँव इन्हें देखना भी क्या
हमने ही  अपनी  राह में काँटे बिछा लिए

इतने  मिले  हैं ज़ख्म  ज़माने  से दोस्तो
रोने  को जी  किया तो ज़रा गुनगुना लिए

पहचान   अपनी  खूब  छुपाई  है आपने
चेहरे  पे अपने  और भी चेहरे लगा लिए

💐💐💐💐💐

                                                                                                               गुलज़ार  पोखर,मुंगेर(बिहार)811201
 Email-anirudhsinhamunger@gmail.
 Mobile-09430450098        

राधेश्याम तिवारी एवं अन्य का पटना में कविता-पाठ (रपट): शहंशाह आलम

राधेश्याम तिवारी एवं अन्य का पटना में कविता-पाठ
शहंशाह आलम
       

     कवयित्री डॉ. भावना शेखर के आवास सी-43, अमरावती अपार्टमेंट, बेली रोड, पटना में 'सृजन संगति' के तत्वावधान में दिल्ली से पधारे कवि राधेश्याम तिवारी का एकल-पाठ तथा पटना के अन्य प्रतिनिधि कवियों के कविता-पाठ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य-अतिथि डॉ. शिवनारायण थे, अध्यक्ष डॉ. श्रीराम तिवारी थे। संचालन ऋषीकेश पाठक ने किया। आतिथ्य डॉ. भावना शेखर जी ने संभाला।


     इस अवसर पर दिल्ली से पधारे चर्चित कवि राधेश्याम तिवारी ने अपनी - भाषा में संभव, बिल्ला नम्बर-56, हुसैन जी को नहीं जाना था 'कतर', राजेन्द्र यादव की कुर्सी, छाता, कनस्तर में गंगा, राजघाट में गोडसे, हम लड़ेंगे, दिल्ली में सियार, दिल्ली : उजड़े हुए लोगों का घर, कुत्ते की प्रार्थना, पूँजी का नंगा नाच, तुम कहाँ खड़े हो, तुम्हारे बोलने का मतलब, लोकतंत्र की ऐसी माया, समय के साथ, मुर्दा लोग, नयी सुबह के स्वागत में, फिर किसी ने छेड़ दिया - आदि कविताओं का पाठ किया। राधेश्याम तिवारी जी की कविताओं ने अपने पाठ किए जाने के समय पूरी सहजता से अपनी ताज़गी को बरक़रार रखा और आदमी के कठिन समय को बेहद बारीकी से प्रकट किया। उनकी कविताओं की ख़ासियत यही कि उनकी कविताएँ जितनी सहज दिखाई देती हैं, कविताओं का असर उतना ही गहरा होता है। राधेश्याम जी की कविताएँ समकालीन कविता की दुनिया में लम्बे अरसे तक टिके रहने वाली कविताएँ हैं।


     कार्यक्रम के दूसरे सत्र में श्रीराम तिवारी, शिवनारायण, भावना शेखर, रानी श्रीवास्तव, शहंशाह आलम, भागवत शरण झा 'अनिमेष', हरींद्र विद्यार्थी, निविड़ शिवपुत्र, ऋषीकेश पाठक, विजय गुँजन, सुजीत वर्मा, रमेश पाठक, राजकुमार प्रेमी, रवीन्द्र कुमार सिन्हा, हृदय नारायण झा, सरोज तिवारी, बाँके बिहारी आदि कवियों / कवयित्रियों ने अपनी-अपनी प्रतिनिघि कविताओं का पाठ किया।

     आए हुए कवियों, कवयित्रियों, श्रोताओं का आभार निविड़ शिवपुत्र ने व्यक्त किया।

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रविवार, 2 अप्रैल 2017

नरेंद्र कुमार की कुछ कविताएं


युवा कवि नरेंद्र अपनी रचनाओं में मानवता और संवेदना को समेटने की कोशिश करते हैं। दर्द चाहे अपने अतीत का हो या विस्थापन का, वह कहीं- न-कहीं परिलक्षित हो ही जाता है। पढ़ते हैं नरेंद्र कुमार की कुछ कविताओं को।


1. भूख और शोक
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जी बाबू !
यह जय भारत बैंड है

अगर हमारा संगीत
आपको उत्साहित कर देता है
उमंग से भर दे रहा है
तो सुनिए...

यह हम सबका भूख और
शोक है
जो आपको ठुमके लगाने को
बाध्य कर दे रहा है
समझे कि नहीं...

जान लीजिए बाबू
जैसे ही हम
अपने भूख और शोक से
उबर लेंगे
हम विस्मृत हो जायेंगे

पर एक जीवन होगा
हमारे भी पास
थोड़ा-बहुत हम भी थिरक लेंगे
जो आप नहीं देख पाएंगे ... ...

2. लुका–छिपी
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बिटिया ...
घर से निकलती है
घूम-घाम
वापस आ
पिता की आँखों में
ढूंढती है कुछ...

पिता भी लौटे हैं अभी
बिटिया को अपनी ओर
गौर से ताकते देख
चौंकते नहीं
बस, हौले–से मुस्कुरा देते हैं
हाँ..!
शुरू में चौंके थे जरूर

उन्होंने भी
महसूस किया है इधर ...
कि बिटिया की आँखों ने
देखना अधिक,
बोलना कुछ कम कर दिया है

3. सफ़र में
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सफ़र में
गुमसुम बैठी वह
क्या सोच रही है ?
बीतते समय का सच !
या कुछ निज़ी ...

बीच-बीच में
सेलफोन पर
बतियाती...
अपने होने को
बयां कर रही है
विस्तार से... ...

4. अबकी मेले में देखा
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अबकी मेले में देखा
कई औरतें
नंगी हुई जाती थीं
दुनिया के सामने
चेहरे पर बेहयाई पोते..!

परदा गिरते ही पर
भागती थीं आप–से–आप
हांए-हांए बिलखते
नवजातों को चिमटाए
एक झटके में ही छाती खोलतीं
उनकी धुकधुकी को
खुद में समेट
फिर-फिर
बिसूरकर रोती !

अबकी मेले में देखा..!

5. अपना शहर
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मेन रोड पर
दिखती नहीं अब
चाय की दुकानें
दोस्तों के ठहाके
अखबार पढतीं
अलसाई आँखें

मूक और शिष्ट-से
खङे हैं कतारों में
जगमगाते रेस्तरां
मॉल और मल्टीप्लेक्स

कहाँ बचा है जीवन ?
कहाँ गए वे लोग ?
पूछने पर वह भौंचक
आँख फाड़े..!
शायद नया है शहर में
या है कोई अपना-सा
जिसे मैं ढूंढ रहा इस घड़ी
बेचैन..!

बेज़वाब..!
वह तेजी से आती
सिटी बस में लटक लेता है
और मैं भी...
गुम होता जा रहा हूँ
भीड़ में कहीं



 नाम - नरेन्द्र कुमार,
जन्म - 06.06.1980
शिक्षा - एम0ए0 (हिन्दी)
प्रकाशन - विभिन्न पत्रिकाओं एवं दैनिकों में कुछ रचनाएं प्रकाशित।
सम्प्रति - सरकारी सेवा
सम्पर्क :
मो0 - 9334834308
ई-मेल – narendrapatna@gmail.com
   

बिहार में साहित्यकारों का सम्मान या अपमान (रपट): सुशील कुमार भारद्वाज

बिहार में साहित्यकारों का सम्मान या अपमान
सुशील कुमार भारद्वाज

एक अरसे बाद, मंत्रिमंडल सचिवालय (राजभाषा) विभाग के तत्वावधान में आयोजित "राजभाषा हिन्दी-साहित्य समागम" का आयोजन 30 एवं 31 मार्च 2017 को आयोजित किया गया। कार्यक्रम का उदघाटन सूबे के शिक्षा मंत्री श्री अशोक चौधरी ने किया तो विशिष्ठ अतिथि के रूप में राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री श्री मदन मोहन झा, मनोनित विधान षार्षद  डॉ रामवचन राय, हिन्दी प्रगति समिति, बिहार के अध्यक्ष श्री सत्यनारायण एवं पटना उच्च न्यायालय के भूतपूर्व न्यायधीश श्री राजेंद्र प्रसाद मौजूद थे।

पहले दिन उद्घाटन के बाद हिन्दी सेवी सम्मान एवं पुरस्कार का वितरण वर्ष 2014-15 के लिए 13 एवं 2016-17 के लिए 17 साहित्यकारों के बीच किया गया। चेक वितरण के बाद "हिन्दी भाषा और नागरी लिपि का मानकीकरण" पर अखिल भारतीय गोष्ठी शुरू हुआ जो दूसरे दिन के पहले सत्र तक जारी रहा। इसके साथ ही हिन्दी पांडुलिपि प्रकाशन अनुदान राशि का वितरण किया गया। जबकि आयोजन का समापन केदारनाथ सिंह, विष्णु नागर, विश्वनाथ तिवारी, आलोक धन्वा, सत्यनारायण, बद्री नारायण, कुमार अम्बुज, दिनेश कुशवाहा, लीलाधर जगुड़ी, नचिकेता, विश्वरंजन, रबींद्र राजहंस और अरूण कमल जैसे प्रख्यात कवियों के बेहतरीन एवं ऐतिहासिक कविता-पाठ के साथ हुआ। इस यादगार पल के साक्षी बने साहित्यकार जाबिर हुसैन के निधि कोष से बने फणीश्वरनाथ रेणु हिन्दी भवन में मौजूद सूबे के वरिष्ठ एवं नये साहित्यकार।
इस सफल आयोजन में कितना साहित्य था और कितनी राजनीति ये तो बहस का एक अलग मुद्दा हो सकता है लेकिन आयोजन में शरीक लोगों ने ही कुछ प्रश्न लगा दिए। सबसे पहले तो राजेंद्र प्रसाद शिखर सम्मान से सम्मानित सूबे के वरिष्ठ साहित्यकार खगेंद्र ठाकुर ने ही मंच से बिगूल फूँक दिया- "जो विभाग सम्मान और पुरस्कार का फर्क नहीं समझता उसका सम्मान क्या लेना?" उनकी आपत्ति आमंत्रण पत्र की छपाई को लेकर भी थी। जबकि हिन्दी पर चर्चा करते -करते कुछ साहित्यकार मंच पर ही मैथिली और भोजपुरी के योगदान पर बुरी तरह उलझ गये जिसे बीचबचाव से समाप्त किया गया। हद तो तब हो गई जब कविता-पाठ के सत्र में  मंच-संचालक हिन्दी के प्रोफेसर बलराम तिवारी के हिन्दी कविता और मंचासीन कवि के संदर्भ में टिप्पणी पर कथाकार शेखर ने आपत्ति दर्ज की तो उन्होंने कहा कि यह एक सरकारी कार्यक्रम है और विभाग की ओर से मिले नाम के अतिरिक्त कुछ भी कहना संभव नहीं है।"
जहाँ एक ओर लोगों की नाराजगी राहत वितरण शिविर की तर्ज पर पुरस्कार वितरण पर थी तो कुछ लोग बहस तलब थे कि वर्ष 2015-16 के लिए माँगे गये आवेदन को ही वर्ष 2016-17 घोषित कर हकमारी की गई है। यदि मामला रूपये का नहीं है तो आखिर ये गोलमाल क्यों? घोषित पुरस्कार राशि को दो अथवा अधिक लोगों के बीच बाँट देने की परंपरा कोई नई नहीं है।
वहीं दूसरी ओर, दबी जुबान से यह टिप्पणी करने से भी लोग नहीं कतरा रहे थे कि जाबिर हुसैन साहब के विशेष प्रयास से तैयार भवन को गलत तरीके से सरकार ने न सिर्फ हथिया लिया  है बल्कि उन्हें सम्मानित करने की बजाय अपमानित करने के लिए उनके नाम पर हर बार एक मामूली राशि के पुरस्कार की घोषणा भी करती है जिसके स्वीकार करने या न करने संबंधी बातों को कभी मीडिया ने भी उठाना मुनासिब नहीं समझा।
पूरे कार्यक्रम के दरम्यान यह बहस भी मौजूं रही कि सूबे के मुख्यमंत्री उर्दू के कार्यक्रम में न सिर्फ शरीक होते हैं, बल्कि उर्दू के प्रोत्साहन के लिए कई घोषणाएं  भी करते हैं लेकिन हिन्दी साहित्यकारों की सरकार की नजर में हैसियत ही इतनी है कि दूर -दराज से आये साहित्यकारों को भी शिक्षा मंत्री एवं रेणु के नाम पर सत्ता भोगने वाले साहित्यकारों के हवाले छोड़ दिया जाता है। शायद यहाँ भी वोट -बैंक हो।
कोई भी साहित्यिक कार्यक्रम बगैर शोर-शराबे के संपंन्न हो जाय और सबके चेहरे की रौनक बरकरार रहे, ये तो शायद ही संभव है लेकिन इस तरीके के कार्यक्रम आगे भी सफलता पूर्वक होते रहें इसी में सबों की भलाई है।

गुरुवार, 30 मार्च 2017

पटना में मदन कश्यप का कविता-पाठ

29 मार्च 2017 को बिहार की धरती पटना में महाराजा कामेश्वर सिंह कॉम्प्लेक्स स्थित टेक्नो हेराल्ड के परिसर में प्रगतिशील लेखक संघ के पटना जिला ईकाई के तत्वावधान में वरिष्ठ कवि मदन कश्यप के सम्मान में एक काव्यात्मक कार्यक्रम का आयोजन किया गया।'गूलर के फूल नहीं खिलते', 'लेकिन उदास है पृथ्वी', नीम रोशनी में', 'कुरुज' और 'दूर तक चुप्पी' जैसे महत्वपूर्ण कविता-संग्रहों के कवि मदन कश्यप ने प्रतिरोध की आग में तपी -तपायी 'भारत माता की जै', 'डपोरशंख', 'छोटे-छोटे ईश्वर', 'पुरखों का दुःख', 'अभी भी बचे हैं', 'उम्मीद', 'बहुरूपिया', 'काल-यात्री' और 'बिजूका' शीर्षक जैसी कविताओं का पाठ किया। राजभाषा विभाग, बिहार सरकार के 'नागार्जुन-सम्मान' से सम्मानित  कवि मदन कश्यप के कविता-पाठ आयोजन के मुख्य अतिथि दिल्ली से पधारे प्रसिद्ध कवि गंगेश गुँजन थे, अतिथि दिल्ली से पधारे कवि-आलोचक देवशंकर नवीन थे। अध्यक्षता समकालीन कविता के महत्वपूर्ण कवि प्रभात सरसिज ने की। कार्यक्रम का संचालन कवि राजकिशोर राजन किया और धन्यवादज्ञापन कवि शहंशाह आलम ने किया।

पहले सत्र में  मदन कश्यप का कविता- पाठ हुआ तो दूसरे सत्र में आयोजन में शरीक हुए कवि एवं गजलकारों ने अपनी रचना से सबों को बाँधे रखा। जहाँ कुछ वक्ताओं ने मदन कश्यप एवं अन्य रचनाकारों की काव्य-पाठ पर सार्थक टिप्पणी की वहीं कथाकार शेखर ने आयोजन को ऐतिहासिक बताते हुए प्रगतिशील लेखक संघ के ऐतिहासिक पहलुओं पर अपनी बेबाक टिप्पणी रखी। आयोजन की खासियत रही कि मदन कश्यप अपनी कविता -पाठ के साथ -साथ उसकी रचना प्रक्रिया पर भी बात करते रहे। इस मौके पर अनिल विभाकर, संजय कुमार कुंदन, रामनाथ शोधार्थी, कथाकार अशोक, भगवत झा अनिमेष, बी एन विश्वकर्मा, समीर परिमल, सुशील कुमार भारद्वाज आदि समेत कई साहित्यकार उपस्थित रहे।

रविवार, 26 मार्च 2017

पंकज चतुर्वेदी की कविताएं

पंकज चतुर्वेदी समकालीन साहित्यकारों में एक उत्कृष्ट स्थान रखते हैं जिनकी रचना जितनी कम शब्दों में होती है उतनी ही मारक होती है। ये देश -काल को अपने रचना का विषय बनाकर अपनी स्पष्ट अभिव्यक्ति को यथोचित आकार देते हैं जिनमें गूँज होती है झन्नाटे की। आज उनके फेसबुक वॉल से गुजर रहा था तो उनकी ताजा रचनाओं को पढ़े बिना रह न सका और आपलोगों के लिए भी यहाँ कुछ गौरतलब कविताओं को प्रस्तुत कर रहा हूँ।



बात करते-करते
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बात करते-करते
जब तुम्हें लगे
कि यह आदमी
अब तुम्हारा दोस्त नहीं
सत्ता का मुख़बिर है
तो अपने अनिष्ट की
आशंका तो होती है

पर उससे अधिक
अफ़सोस होता है
कि वह उतना
समुन्नत नहीं है
जितना तुम उसे
मानते थे

रश्क
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गति पर क़ाबू करने का
यह भी उपाय है
कि आप सबसे पीछे
छूट जायें

संभव है कि तब
दौड़ के विजेता को
आपकी आत्म-शांति से
रश्क हो !

बिछोह
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गहरे नीले आसमान में
पेड़ों के झुरमुट की ओट में
जिस दिन
नहीं दिखता चाँद

लगता है
तुम्हारे दर्शन
नहीं हुए

फ़ासीवाद जब बढ़ता है
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फ़ासीवाद जब बढ़ता है
मित्र घटते जाते हैं

वे दैत्य के जबड़े के
सामने नहीं
पड़ोस में
रहना चाहते हैं

मृत्यु से बचने के लिए
ऐसी जगह की तलाश में
जो जीते-जी
मृत बनाये रखती है

धर्म की राजनीति
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धर्म की राजनीति में
एजेंडा तभी तक
गुप्त रखा जाता है
जब तक उसकी
ज़रूरत हो

सीता जब अपनी कुटिया से
बाहर निकल आती हैं
तब उन्हें पता लगता है
कि भिक्षा माँग रहा व्यक्ति
साधु नहीं
रावण है
और उनका
अपहरण करने
आया है

सौम्य कोशिश
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जिस गिलास में
पानी पी रहा हूँ
उस पर खुदा है
दिवंगत का नाम

अमरता की
यह सौम्य कोशिश
मेरे जीते-जी
सफल है

पानी नहीं
उसकी अमरता का
घूँट पीता हूँ

सत्ता का सरोकार
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सत्ता का सरोकार है
कि तुम हिंसक व्यवहार के
आदी बनो

गर्व से कहो
कि तुम विजेता हो

आँसू
कमज़ोरी की निशानी हो
ग़रीब की रोटी छीन लेना
ताक़त की

हँसते समय यह सीखो
कि निर्बल का अपमान करके
कैसे हँसा जाता है

प्यार एक वर्जित ख़याल हो
और जो उस राह पर चले
उसमें शर्मिंदगी और
अपराध-भाव पैदा हो

अपराधी यह कहें
कि निरपराध करना है
समाज को

माना कि यह
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माना कि यह
सपनों का
समय नहीं है
उन्माद से
पराजित है
आदर्श

लेकिन यह कवियों
विचारकों को
भाषा में भागने
और गुनाह करने की
छूट नहीं देता

अपराधी
अपराधी ही है
भाषा में हो
या उसके बाहर

अगर तुम्हारे पास
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अगर तुम्हारे पास
साम्प्रदायिकता के
ज़हर से बुझी
कटार नहीं है

जाति की तीखी
तलवार नहीं है

अतर्कित भ्रष्टाचार
नहीं है

पूँजीपति यार नहीं है

मूल्यों की ढहती
मीनार नहीं है

तो चुनाव में
तुम्हारी जीत पर
विस्मय है

हार तय है

हे राम !
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वैसे यह प्रमाणित नहीं है
पर उसके काफ़ी क़रीब है
कि अपनी हत्या के वक़्त
गाँधी दो ही शब्द कह सके :
''हे राम !''

आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है
कि तुम किस भाषा में
अपनी प्रार्थना और शोक
व्यक्त करोगे
जबकि तुम्हें मालूम हो
कि उसी भाषा में तुम पर
होंगे अत्याचार

प्रयोगशाला
---------------

मध्य-युग के बर्बर शासक
विश्वविद्यालयों को जलाते थे

अब जो शासक हैं
उनका ज़ोर इस पर है
कि उन्हें जलाया भले न जाय
पर जो वे करना चाहते हैं
उसकी प्रयोगशाला
बना दिया जाय

करना वे यह चाहते हैं
कि मनुष्य में आत्मा
न रहने दी जाय।

सिर्फ़ माँ है
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एक छात्र जिसे पहले पीटा गया
और फिर ग़ायब कर दिया गया
नहीं मालूम वह कहाँ है कैसा है

जैसे-जैसे दिन बीतते जाते हैं
उसके मिलने की आशा
धूमिल होती जाती है

सवालों से कतराती है सत्ता---
जैसे अपराधियों का स्वतंत्र विचरण
कोई समस्या नहीं है
बल्कि जिन्हें सताया जा सकता है
उनका जीवन एक समस्या है---
और वह अपनी क्रूरता से
निश्चिन्त होना चाहती है

शरीफ़ लोग किसी अनहोनी की
आशंका में चुप रहते हैं
और जो उसे पाने के लिए लड़ रहे
हारते जाते हैं

एक नयी नागरिकता निर्मित हो रही
जो यह मानती है
कि अन्याय पर ख़ामोश रहना बेहतर है
और उसे भूलना सबसे कारगर उपाय

सिर्फ़ माँ है
जो शताब्दियों तक
अपने बेटे की प्रतीक्षा करेगी !

नये बनते निज़ाम को देखो
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जो लोग लेखकों की
हत्या कर रहे
वे अज्ञात हैं

जो स्त्रियों को बलात्कार की
धमकियाँ दे रहे
वे अज्ञात हैं

जो फ़िल्मों के सेट जला रहे
वे अज्ञात हैं

जो बुद्धिजीवियों के साथ
मार-पीट कर रहे
और उन्हें गालियाँ दे रहे
वे अज्ञात हैं

भले तुम इसे
लोकतंत्र मानते रहो
पर इस नये बनते
निज़ाम को देखो :
मारनेवाले अज्ञात हैं
मरनेवाले ज्ञात हैं !

पंकज चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से साभार।

सभ्यता का मानदंडः सुशील कुमार भारद्वाज

आज हिन्दुस्तान दैनिक के संपादकीय पन्ना पर कॉर्टून कोना देख कर सोचता रह गया। एक सांसद महोदय चप्पल हाथ में लिए चल रहे हैं और सभ्यता का मानदंड पर्दे के पीछे छुपने में मशगूल। तुर्रा ये कि महोदय के पैर नंगे हैं। तो मतलब कि जनाब ने पैर की बजाय चप्पलों को हाथों की शोभा बना ली। सभ्यता का मानदंड बदल रहा है तो संभव है कल को कुछ और दिख जाय! लेकिन जेहन में एक सवाल कुलाँचे मार रहा कि भाई गिनती किसने की? चप्पल चलाने वाले या खाने वाले गिन रहे थे कि 25 चप्पल खा चुके? मुझे तो एक सिनेमा का एक दृश्य याद आ गया  जिसमें एक शराबी खुले चैम्बर के पास 25- 25 बोल रहा था और जब एक सज्जन पूछने आया तो उसे भी उसमें धकेल कर नम्बर 26 कर दिया। खैर, एक दिन पहले खबर आई कि सांसद महोदय की पत्नी अपने पति के बचाव में आई कि पिटने वाला की बदतमीजी थी कि उसने "मोदी जी को मोदी" कह दिया। जबकि सांसद महोदय ने बयान दिया कि शिवसेना प्रमुख ने उन्हें मीडिया से दूर रहने की सलाह दी है। आश्चर्य है न कि खुद मीडिया को आगे बढ़ाने वाले ठाकरे साहब खुद "सामना" के पत्रकारों को बेरोजगार कर रहे हैं जबकि खबरें अच्छी अच्छी आ सकती थीं। खैर, ये सब राजनेताओं की बातें हैं राजनेता ही जानें। राजनेता की बातें सबकी समझ में आ ही जाय तो राजनेता काहे का? अब तो यही उम्मीद कर सकते हैं कि शायद अब संसद ही तय करेगी कि सभ्यता का मानदंड क्या हो? ठीक वैसे ही जैसे पिछले दिनों वित्त मंत्री अरूण जेटली जी ने कहा कि संसद को यह हक है कि वह विचार करे कि सरकारी धन का सदुपयोग कैसे हो? किसे पेंशन दे और किसे न दे? वैसे ही जैसे संसद तय करेगी ओबीसी के श्रेणी में किसे रखा जाय और किसे क्या सुविधा दी जाय? अब अपनी सभ्यता का मानदंड बचा रहे इसके लिए भी यदि संसद पर ही निर्भर रहना पड़े तो शायद जिंदगी की बहुत सारी सहुलियतों की परिभाषाएं ही बदल जाय। खैर लोकतंत्र में भले ही अधिकार जनता के हाथ में हो लेकिन इस्तेमाल तो जनप्रतिनिधि ही न करेंगें। सत्य को स्वीकार करने से गुरेज कैसा?
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शनिवार, 25 मार्च 2017

असग़र वजाहत की कहानी नये ईसा मसीह

प्रख्यात कथाकार असग़र वजाहत साहब जिस तरह किसी परिचय के मुँहताज नहीं हैं वैसे ही उनकी रचना। गंभीर से गंभीर मुद्दे को भी सहजता से रूपरेखा में ढ़ाल लेते हैं। वजाहत साहब न सिर्फ अपने चारों ओर की हवा से वाकिफ रहते हैं बल्कि समय समय पर वे इस पर अपनी राय भी रखते हैं। प्रस्तुत कहानी भले ही व्यंग्य के रूप में है लेकिन पढ़ते ही आपको मालूम पड़ जाएगा कि निशाना कहाँ साधा गया है। तो आइये पढ़ते हैं असग़र वजाहत साहब की कहानी "नये ईसा मसीह"

नये ईसा मसीह
(कहानी)
असग़र वजाहत
(हिंदी के वरिष्ठ और प्रतिष्ठित कवि, व्यंगकार और पत्रकार  विष्णु नागर जी को समर्पित)
एक नए ईसा मसीह हैं। उन से सभी खुश हैं । उनकी लोकप्रियता आसमान को छू रही है। हर आदमी उनके ऊपर बलिदान होने को तैयार है। वे जहां जाते हैं लोग अपनी आंखें बिछा देते हैं।
इसी समय कोइ और आया। उसने कहा कि वह ईसा मसीह है । अब ईसा मसीह दो हो गए। एक को हम कह सकते हैं नये ईसा मसीह और दूसरे को कह सकते हैं पुराने ईसा मसीह।
नये ईसा मसीह  को जब यह पता चला कि कोई और भी अपने आपको ईसा मसीह कह रहा है तो वे गुस्से से पागल हो गये। उन्होने कहा , किसकी हिम्मत है कि कोई और अपने को ईसा मसीह कह सके। मैं देख लूंगा ।मैं समझ लूंगा। मैं दिखा दूंगा । मैं कर दूंगा ।मैं फोड़  दूंगा ।मैं  तोड़ दूंगा । मैं चीर  दूंगा। मैं फाड़ दूंगा। मैं बजा दूंगा।मैं घटा दूंगा। मैं  मिटा दूंगा।मैं घुसेड़ दूंगा। .... मैं ईसा मसीह था, हूँ और रहूँगा।
पुराने ईसा मसीह को जब ये पता चला कि कोई उनसे खुश नहीं है तो पुराने ईसा मसीह नए मसीह के सामने आए और अपना एक गाल उनके आगे कर दिया। नये मसीह ने उनके गाल पर एक जोर का थप्पड़ मारा। पुराने  मसीह ने दूसरा गाल आगे कर दिया ।नए मसीह ने उस पर भी जोर का तमाचा मारा।  पुराने मसीह ने  फिर पहला गाल आगे कर दिया । पुराने मसीह को नये मसीह लगातार तमाचे मारते रहे। यहां तक कि पुराने मसीह अधमरे हो गए।
और फिर नये मसीह ने  पुराने ईसा मसीह को सूली पर टांग दिया गया।
जनता ने करतल ध्वनि से नए ईसा मसीह का समर्थन किया।
लाखों लोगों की भीड़  को नए ईसा मसीह ने संबोधित किया है।
- असली ईसा मसीह कौन है? आप लोग बताओ? मैं हूं या यह आदमी है जो सूली पर चढ़ा है?
- आप हैं आप हैं।' जनता एक स्वर में  बोली।
-  सच्चा कौन है, मैं हूँ या यह आदमी  है जो सूली पर चढ़ा है ?
- आप हैं आप हैं ।
-  तुम किसके आदेश  मानोगे, मेरे यह इस आदमी के जो सूली पर चढ़ा है ?
- आपके आपके।' पूरी जनता ने कहा ।
-  तुम मुझे वोट दोगे या इस आदमी को जो सूली पर चढ़ा है?
- आपको आपको।'
-  किस पर विश्वास करते हो जो सूली पर चढ़ा है या मुझ पर ?
- आप पर और आप पर और आप पर ।' जनता ने एक स्वर से कहा।
सूली पर लटके यीशु मसीह की आंखें धीरे धीरे बंद हो रही थीं । लोग यह समझे कि उनकी आँखें वास्तव में 'बंद' हो जायेगीं।
पर पुराने  ईसा मसीह की आँखें कभी 'बंद' नहीं होतीं।
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असग़र वजाहत के वॉल से साभार।

शुक्रवार, 10 मार्च 2017

दलित-चिंतन को मिटाने की मुहिम : प्रेम सिंह (आलेख)


हिन्दी के प्रखर साहित्यकार डॉ धर्मवीर का लम्बी बीमारी के बाद 09 मार्च 2017 को निधन हो गया। आइये उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए दिल्ली  विश्वविद्यालय के प्रेम सिंह का लिखा आलेख पढते हैं।
डॉ धर्मवीर


मध्यकाल के रचनाकारों में कबीर का अध्ययन और मूल्यांकन सबसे जटिल और चुनौती भरा रहा है। साहित्य के इतिहासकारों और आलोचकों के अलावा दूसरे विषयों के विद्वानों ने भी कबीर के अध्ययन में रुचि ली है। कबीर का एक विमर्श लोक में भी बराबर चलता रहा है। वहां भी अन्य रचनाकारों के मुकाबले कबीर सबसे आगे और विशिष्ट हैं। हिंदी में कबीर के अध्ययन की लंबी परंपरा है। उस परंपरा में 1997 में डाॅ. धर्मवीर की आलोचना-पुस्तक ‘कबीर के आलोचक’ प्रकाशित हुई। उस पुस्तक में कबीर के व्यक्तित्व और चिंतन के मूल्यांकन संबंधी पूर्व मान्यताओं को ध्वस्त कर डाॅ. धर्मवीर ने अपनी नई स्थापनाएं प्रस्तुत की हैं। इस पुस्तक से कबीर के अध्ययन की परंपरा में पहली बार एक बड़ा तूफान उठ खड़ा हुआ।
 हिंदी आलोचना के परिदृश्य में सक्रिय सभी रंगतों के आलोचक डाॅ. धर्मवीर की ‘हिमाकत’ से क्षुब्ध हो उठते हैं। और साथ ही उन्हें ठिकाने लगाने के लिए सन्नद्ध। जमे हुए आलोचकों को तजुर्बा है, खासकर प्रगतिवादी आलोचकों को, कि कैसे उनकी काट करने वाले को काटा जाता है। हिंदी के ज्यादातर आलोचक और लेखक डाॅ. धर्मवीर पर चैतरफा हमला बोल देते हैं। इस विश्वास के साथ कि मैदान में नया और अकेला उतरा यह शख्स उनके हमलों के आगे थोड़ी देर भी नहीं टिक पाएगा। लेकिन धर्मवीर उनके हमलों से किंचित भी परेशान नहीं होते। स्वागत और खुशी के साथ पूरी तसल्ली और तफसील से सबकी आपत्तियों और सवालों के नुक्ता दर नुक्ता जवाब देते हैं। बहस के साथ कबीर पर उनका शोध-कार्य जारी रहता है।
 इस दौरान उनकी एक के बाद एक पांच पुस्तकें सामने आती हैं। तीन पुस्तकें - ‘कबीर: डाॅ. हजारीप्रसाद द्विवेदी का प्रक्षिप्त चिंतन’ (2000), ‘कबीर और रामानंद: किंवदंतियां’ (2000), ‘कबीर: बाज भी, कपोत भी, पपीहा भी’ (2000) - नई सदी में कबीर श्रृंखला के अंतर्गत और दो पुस्तकें - ‘कबीर के कुछ और आलोचक’ (2002) और ‘सूत न कपास’ (2003) कबीर के आलोचक श्रृंखला के अंतर्गत। इन पुस्तकों से पता चलता है कि शुरुआती छोटी पुस्तक के पीछे लेखक की बड़ी तैयारी थी। चर्चा कबीर और उनकी आलोचना के दायरे से निकल कर ज्ञान की कई दिशाओं - दर्शन, धर्म, समाजशास्त्र, इतिहास, न्याय, कानून आदि - में व्याप्त हो जाती है। जो समझ रहे थे कि डाॅ. धर्मवीर को हवा में उड़ा देंगे, जान गए कि मुठभेड़ किसी सामान्य आलोचक से नहीं, एक गंभीर चिंतक से है। कबीर के आत्मविश्वास से लैस एक ऐसा चिंतक जिसने प्रगतिशीलता एवं आधुनिकता के झंडाबरदार ब्राह्मणों-ठाकुरों-वैश्यों को एक झटके में दलित-चिंतन की धार पर धर दिया है। ब्राह्मणवादी दर्शन और संस्कृति में पगे दिमाग को मानववाद, माक्र्सवाद, अस्तित्ववाद, मनोविश्लेषणवाद, उत्तर-आधुनिकतावाद आदि की पैकेजिंग से संवार कर आधुनिक बुद्धिजीवी बने विद्वानों के सामने यह कड़ी चुनौती थी। जो बड़े उत्साह और आत्मविश्वास के साथ डाॅ. धर्मवीर से उलझे थे, वे सब पीछे हट गए।    
 दरपेश चुनौती के सामने प्रभुत्वशाली प्रतिष्ठान अथवा महानुभाव कई बार चुप्पी की राजनीति (पाॅलिटिक्स आॅफ साइलेंस) का सहारा लेते हैं। वह किसी गंभीर चुनौती को निष्क्रिय करने की बोलने-लिखने से ज्यादा असरदार रणनीति होती है। डाॅ. धर्मवीर की चुनौती के सामने हिंदी के कुछ विद्वानों ने चुप्पी का हथियार इस्तेमाल किया। डाॅ. नामवर सिंह ने कहा कि वे डाॅ. धर्मवीर के विरोध में नहीं बालेंगे; हालांकि वे उनकी स्थापनाओं से सहमत नहीं हैं। उन्होंने पहेली बुझाई कि डाॅ. धर्मवीर का विरोध करने से ब्राह्मणवाद मजबूत होगा। शायद शुरू में डाॅ. नामवर सिंह को लगा होगा कि उनके दो शिष्य डाॅ. वीरभारत तलवार व डाॅ. पुरुषोत्तम अग्रवाल उनके साथी डाॅ. मैनेजर पांडे के साथ मिल कर ‘डेमेज कंट्रोल’ कर लेंगे। अथार्त् तूफान से माक्र्सवाद और डाॅ. हजारीप्रसाद द्विवेदी को सुरक्षित बचा कर ले आएंगे। ‘डेमेज कंट्रोल’ न हो पाने की स्थिति में वे खुद कुछ देर के लिए मैदान में उतर कर डाॅ. धर्मवीर को मर्यादा तोड़ने यानी ‘शास्त्र’ एवं ‘गुरु’ की निंदा का दंड देंगे। लेकिन लगता है वे जल्दी ही समझ गए कि इस बार चुनौती विकट है और अभी तक आजमाई ‘साहित्यिक’ युक्तियों से मामला रफा-दफा होने वाला नहीं है। यह कबीर पर कब्जे की लड़ाई नहीं, डाॅ. धर्मवीर ने ज्ञान पर ब्राह्मणी कब्जे को हटाने का ‘कांड’ उपस्थित कर दिया है। यह पहचानने में वे सबसे ज्यादा सयाने निकले कि पूरी तैयार से मैदान में उतरे डाॅ. धर्मवीर के सामने सीधी मुठभेड़ में जीतने का माद्दा इस समय हिंदी के किसी विद्वान में नहीं है। इसलिए चुप हो जाओ, झुक जाओ, नई रणनीति बनाओ!
 ‘कबीर के आलोेचक’ समेत उपर्युक्त छह पुस्तकों और लंबी बहस के बाद कबीर पर कोई नया और गंभीर अध्ययन डाॅ. धर्मवीर को नजरअंदाज करके नहीं किया जा सकता है। भले ही उसमें डाॅ. धर्मवीर की काट ही काट हो। अगर उस बहस में शामिल रहने वाला कोई विद्वान अपनेे कबीर संबंधी अध्ययन में डाॅ. धर्मवीर को नजरअंदाज करता है तो अकादमिक जगत के लिए यह चिंता का बायस होना चाहिए। अकादमिक ईमानदारी का विकल्प नहीं है और उसका समुचित निर्वाह सभी विद्वानों की सम्मिलित जिम्मेदारी है। जब डाॅ. पुरुषोत्तम अग्रवाल की पुस्तक ‘अकथ कहानी प्रेम की: कबीर की कविता और उनका समय’ का प्रकाशन-पूर्व प्रचार शुरू हुआ तो हमने स्वाभाविक तौर पर माना कि आलोचक ने डाॅ. धर्मवीर की पुस्तकों और बहस को खाते में लेकर अपना अध्ययन प्रस्तुत किया होगा और इस रूप में वह कबीर पर एक महत्वपूर्ण आलोचना-कृति होगी। पुस्तक प्रकाशित होने पर हमें अपने एक शोधार्थी से यह जान कर आश्चर्य हुआ कि डाॅ. अग्रवाल की पुस्तक में डाॅ. धर्मवीर की पुस्तकों का कहीं जिक्र ही नहीं है। पांच साल पहले जो महाभारत कबीर को लेकर मच चुका है उसके बाद यह संभव नहीं है कि कबीर पर तीस-बत्तीस साल लगा कर काम करने वाले विद्वान के सामने डाॅ. धर्मवीर के कबीर की तस्वीर न झूलती रहे।
 यह स्वीकृत मान्यता है कि भक्तिकालीन भक्त एवं संत कवियों ने अपनी-अपनी मनोभूमि से समवेत रूप में प्रेम को पांचवा पुरुषार्थ सिद्ध कर दिया था। यह भी माना जा सकता है कि कबीर और रैदास की प्रेमोपासना संभवतः सबसे निराली और सबसे उदात्त है। ऐसे में कबीर समेत समस्त भक्तिकालीन रचनाकारों के प्रेमोपासक होने से भला किसे ऐतराज हो सकता है? डाॅ. धर्मवीर ने कबीर की खोज मुक्त-ज्ञान के करुणानिधान के रूप में की है। वहां उनसे मुठभेड़ की जा सकती है जो कुछ हद तक हुई भी और धर्मवीर ने जवाब भी दिए। उनके जवाबों को अपर्याप्त, यहां तक कि गलत ठहराया जा सकता है। डाॅ. अग्रवाल की पुस्तक के शाीर्षक से ही यह समझा जा सकता है कि लेखक ने प्रेम की अकथ कहानी की आड़ में ज्ञान पर वर्चस्व की राजनीति की है। कबीर को डाॅ. धर्मवीर से छुड़ा कर प्रेम के पुराने अखाड़े में खींच कर ले जाना दरअसल प्रतिक्रियावाद कहा जाएगा। दलित-चिंतन की भूमि से इसे ब्राह्मणवादी साजिश भी कहा जा सकता है।
 हमने इस पुस्तक की राजनीति के बारे में बाहर से बताया है। बेहतर होगा कि डाॅ. धर्मवीर तीन दषक लगा कर लिखी गई डाॅ. अग्रवाल की बहुप्रशंसित पुस्तक को पढ़ें और उसकी अंदरूनी राजनीति की विस्तृत समीक्षा करें।
प्रेम सिंह

 हमें विश्वास था कि डाॅ. धर्मवीर के कबीर को ‘गायब’ करने का डाॅ. अग्रवाल का ‘जादू’ सभी विद्वानों पर नहीं चलेगा। कहीं न कहीं से आवाज आएगी। हमारे कान पुस्तक की भूरी-भूरी प्रशंसा करने में लगे विद्वानों की तरफ लग गए कि वे डाॅ. धर्मवीर का कोई जिक्र करते हैं या नहीं? भले ही यह कह कर कि डाॅ. अग्रवाल ने कबीर के नाम पर डाॅ. धर्मवीर द्वारा फैलाया गया ‘कूड़ा-कर्कट’ साफ कर दिया है। डाॅ. अग्रवाल की पुस्तक का प्रकाशन और विमोचन समारोहपूर्वक हुआ। उस पर गोष्ठियों और समीक्षाओं का सिलसिला अभी जारी है। जिस सुनियोजित ढंग से पुस्तक को ‘लाॅन्च’ किया गया है उससे लगता है गोष्ठियों और समीक्षाओं का सिलसिला लंबा चलेगा। अब तक प्रायः हर रंगत का विद्वान पुस्तक पर न्यौछावर लुटा चुका है। इसमें कोई समस्या नहीं है - जब अफसर-लेखकों के लिए विद्वानों के दिल के दरवाजे खुल जाते हैं तो लेखक-अफसर के लिए छाती चैड़ी क्यों नहीं होगी! समस्या यह है कि किसी विद्वान ने अपनी लिखित या मौखिक राय रखते वक्त डाॅ. धर्मवीर और उनके कबीर का हवाला नहीं दिया है। डाॅ. नामवर सिंह ने भी नहीं, जो कहते थे कबीर पर आगे बात बिना डाॅ. धर्मवीर के नहीं हो सकती। ऐसा माहौल बना दिया गया है मानो कबीर पर धर्मवीर की पुस्तकें आई ही नहीं थीं, न कोई बहस थी, न धर्मवीर नाम का कोई विद्वान हिंदी में है। इसके बावजूद कि कबीर के बाद धर्मवीर की कई विषयों पर कई पुस्तकें आ चुकी हैं।
 अब हम कह सकते हैं कि डाॅ. धर्मवीर को ‘गायब’ करने का काम चूक से या अकेले डाॅ. अग्रवाल के करने से नहीं हुआ है। यह जाना-बूझा और सम्मिलित उद्यम है। जिस तरह से आधुनिक और प्रगतिशील युग में डाॅ. धर्मवीर को ‘गायब’ करने का ‘तिलस्म’ रचा गया है, उससे यह आशंका मजबूत होती है कि पिछड़े सामंतकालों में दलित-चिंतन को दबाने और नष्ट करने की युक्तियां और रणनीतियां बड़े पैमाने पर ईजाद की गई होंगी और अमल में लाई गई होंगी। कम से कम शुरुआती दौर में तो जरूर ऐसा हुआ होगा - जब तक दलित और शूद्र जीवन को श्रम और सेवा का पर्याय बना कर ज्ञान-विहीन क्षेत्र में तब्दील नहीं कर दिया गया। यह तो खैर पीछे की बात है और उसे मध्यकाल के मत्थे मढ़ कर तसल्ली पाई जा सकती है। लेकिन प्रस्तुत और इस तरह के अन्य वाकये बताते हैं कि हाशिए के समूहों एवं अस्मिताओं के सशक्तिकरण की आधुनिक बुद्धिजीवियों की चिंता वास्तविक नहीं है। आधुनिक बौद्धिक प्रतिष्ठान हजारों साल तक दबा कर रखी गई हाशिए की अस्मिताओं को स्वतंत्र चिंतन की छूट देने को तैयार नहीं है। ऐसे चिंतन को तो कतई नहीं जिसमें प्रभुत्वशाली चिंतन के बरक्स समुचित ढांचा और दृष्टि मिलती हो।
 डाॅ. धर्मवीर के चिंतन की पद्धति में एक हद के बाद तेर-मेर का रवैया हमें ठीक नहीं लगता रहा है। दुनिया में चिंतन का अभी तक का अनुभव बताता है कि चिंतन की एक मनोभूमि ऐसी होती है जहां अपने रास्ते और दृष्टि से पहुंच कर चिंतक विभक्त नहीं रह जाता है। अब बात हमारी समझ में आती है कि एक दलित-चिंतक अनेक खतरों के लिए खुला होता है। वह मिला कि रला! ब्राह्मणी चिंतन वाले लेखकों-विचारकों से दलितों को सावधन रहने की डाॅ. धर्मवीर की हिदायत का निहितार्थ भी अब हमारी समझ में आता है। रास्ते के बटमार दलित चिंतक को कभी पूर्णकाम नहीं होने दे सकते। दलित चिंतक प्रचलित अर्थ में समन्वयवादी नहीं हो सकता। अगर वह होता है तो ब्राह्मणी चिंतन कई तरह के हथकंडों से उसके चिंतन को रला सकता है। डाॅ. धर्मवीर ने दलित-चिंतन को सबसे बड़ा खतरा ‘मार्क्सकवादी बटमारों’ से बताया है। शायद यही उनका सबसे बड़ा अपराध हो गया है?  
 डाॅ. धर्मवीर के स्वतंत्र दलित-चिंतन के विरोधियों ने पीछे हटते वक्त मुंह बनाते हुए जताया था कि ‘मूर्ख के मुंह कौन लगे’! बात वहीं समाप्त हो जा सकती थी। लेकिन हुई नहीं। डाॅ. धर्मवीर ने बारूद का जो ढेर इकठ्ठा कर दिया था, उसे निष्क्रिय करना जरूरी था। पुश्त दर पुश्त चले आए सत्ता पर कब्जे को बरकरार रखने के लिए ज्ञान पर कब्जा बनाए रखना अनिवार्य है। उन्हें यह अहसास अच्छी तरह हो गया कि डाॅ. धर्मवीर कब्जे में आने वाले नहीं हैं। लिहाजा, अंदर ही अंदर तय पाया गया कि उन्हें ध्वस्त करने की पुख्ता और दूरगामी रणनीति बनानी होगी। डाॅ. अग्रवाल की पुस्तक और उसके जन्म पर जो सोहर गाए जा रहे हैं, उसी रणनीति का प्रतिफल है।
 इस प्रतिफल तक आने के पहले काफी कुछ घटित हुआ है जिसके विस्तृत ब्यौरे में नहीं जाया जा सकता। लेकिन एक-दो मोटी बातें बताई जा सकती हैं। डाॅ. अग्रवाल के शिष्य बजरंगबिहारी तिवारी और रमणिका गुप्ता के निर्देशन में दलित महिलाओं से ‘नैतिकता के ठेकेदार’ धर्मवीर पर चप्पलें फिंकवाई गईं। डाॅ. धर्मवीर द्वारा ‘कफन’ की बुधिया के पेट में ठाकुर का बच्चा बताने पर, सामंतवाद को पानी पी-पी कर कोसने वाले राजेंद्र यादव सरीखे प्रगतिशीलता के पर्याय लेखक हाहाकार कर उठे। बड़े-बड़े लेखकों ने गली के छोकरों के अंदाज में डाॅ. धर्मवीर की बौद्धिकता पर फब्तियां कसीं और लानत भेजी। गोया किसी ‘ठाकुर’ ने किसी दलित महिला का कभी शीलहरण किया ही न हो?
 काॅलिजों और विष्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में कबीर सभी जगह पढ़ाए जाते हैं। लेकिन लगभग सभी जगह कबीर के अध्ययन के लिए प्रस्तावित संदर्भग्रंथों में डाॅ. धर्मवीर की किताबें नहीं हैं। डाॅ. धर्मवीर पर शोध करने के इच्छुक शोधर्थियों को हतोत्साहित किया गया। चार साल पहले एमफिल के हमारे एक शोधार्थी को डाॅ. धर्मवीर की आलोचना-दृष्टि पर शोध का विषय मिला तो डाॅ. अग्रवाल ने उस पर विषय बदलने के लिए दबाव डाला। हमें यह सुन कर अपने पेषे पर गहरी ग्लानि हुई कि उन्होंने शोधार्थी के सामने डाॅ. धर्मवीर के प्रति असंसदीय भाषा का प्रयोग किया। एक चर्चित दलित लेखक ने भी शोधार्थी को लताड़ा कि वह डाॅ. धर्मवीर पर शोध करके क्यों उनका महत्व बढ़ाता है? हमारे नामचीन और जिम्मेदार पदों पर बैठे विद्वानों का यह क्या हाल हो गया है! डाॅ. सुधीश पचैरी ने जताया है कि वे चैतरफा विरोध के बीच डाॅ. धर्मवीर के समर्थक हैं। लेकिन वे पहली ही नजर में पकड़े जाते हैं जब भारतीय समाज और वांडमय की गहरी खुदाई करने वाली और अपने को आदि स्रोतों से जोड़ने वाली प्रतिभा को उत्तर-आधुनिकता की ‘संजीवनी’ से जाग्रत हुआ बताते हैं। यानी एक ‘आजीवक’ को आज के बाजार का जीव मानते हैं। समर्थन की आड़ में भ्रम फैलाने के और भी उदाहरण मिल सकते हैं।
 कुल मिला कर कहा जा सकता है कि डाॅ. धर्मवीर के चिंतन को निष्क्रिय करने के लिए जार-सत्ता, बाजार-सत्ता और सरकार-सत्ता के नुमांइदे बुद्धिजीवी एकजुट हो गए हैं। यह अलग विषय है कि उनकी संलिप्तता में भारत में पिछले डेढ़ हजार सालों से चली आ रही रूढि़ की बड़ी भूमिका है। क्योंकि वे इतने नादान नहीं हैं कि यह सच्चाई नहीं जानते हों कि मौलिक सृजन और चिंतन कुछ देर के लिए नजरअंदाज किए जा सकते हैं, उन्हें हमेशा के लिए निष्क्रिय नहीं किया जा सकता।