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शनिवार, 5 अक्टूबर 2019

पटना बाढ़ डायरी : सरकार मस्त जनता पस्त

आज फिर शनिवार आ गया। वह दिन भी शनिवार ही था जब पहली बार बीच शहर में पानी जमा था। नहीं पटना शहर का कुछ हिस्सा एक दिन की बारिश में  ही डूब गया था।




साजिश थी या नहीं ये तो कोई नहीं बता सकता क्योंकि बहत्तर घंटा पहले भारी बारिश की संभावना व्यक्त की गई थी और उस पर किसी का नियंत्रण नहीं है। नाले की सफाई आदि की बात बहुत घिसीपिटी है। सरकार की नाकामी की बात करना, किसी निर्लज्ज को महत्त्वपूर्ण बनाना है।

महत्त्वपूर्ण महज इतना है कि नुकसान हुआ जनता का और मालामाल हुई सरकार। जो कष्ट जलकैदी बन लोगों ने भोगे उसके बदले में कोई राहत तो संभव ही नहीं। जिन सामानों का नुकसान हुआ उसका मुआवजा सरकार तो देगी नहीं। लेकिन भिखमंगे की तरह राहत कोष में दान के नाम पर पोस्टर-बैनर पहले जारी कर दिये सरकार ने। साथ-ही-साथ केंद्र सरकार से भी माँगने पहुंच गये। स्वाभाविक ही था कि झोली में कुछ न कुछ आनी ही है।

और सबसे बड़ी बात की राहत कार्य आदि का लेखा-जोखा रखने का रिवाज ही नहीं है। जो है सो घर भरने से ही मतलब है। एक बार लेखा-जोखा भी हुआ तो पटना के डीएम बेचारे गौतम गोस्वामी जी असमय ही जेल में रहते हुए ही दूसरी दुनिया को कूच कर गये।

खैर, अंतिम बात यही कि अमूमन सरकार बाढ़-सुखाड़ का इंतजार ही करती है ताकि घर में हरियाली और चमक-धमक बनी रहे।

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सुशील कुमार भारद्वाज

रविवार, 29 सितंबर 2019

पटना है पानी पानी दुर्गापूजा से पहले ही

दुर्गापूजा का आज हो गया है आगाज। लेकिन एक दिन पहले से ही है #पटना पानी में बेहाल। लक्षण देखकर तो मान लिया था कि इस बार दुर्गा पूजा में घूमना होगा थोड़ा मुश्किल, लेकिन ये ना सोचा था कि लोग शाम में आरती दिखाने के लिए भी जाएंगे तरस? कहाँ ढ़ूढ़ेंगें वे उन आस्था की मूर्तियों को आसपास में? गर जो याद भी आई पत्थर की मूर्तियों से सजे मंदिर की, तो कौन जाएगा इतनी दूर डूब कर छाती भर पानी में? भक्ति दिखाने के लिए मन चंगा तो कठौती में गंगा भी काफी है।








लेकिन बात यहीं रूकती तो नहीं! दो दिन बाद लोग क्या खाएंगे-पीएंगे? सब्जी और फल यूँ ही दुर्गापूजा के नाम पर महँगा होता, अब तो सोचना ही नहीं है। सोचता हूँ तो बस इतना कि जिस शहर को स्मार्ट बनाने के लिए अरबों रूपये उड़ाये गये वो एक दिन की बारिश को भी थाम न सका। और चुप्पी लादे बैठे हैं सारे आला-अधिकारी। जो कोई चूँ चाँ कर रहे हैं तो सिर्फ अगली लूटपाट की तरकीबों की तलाश में।
शर्म मगर आती नहीं उन बेहूदा मंत्रियों और अय्याश अधिकारियों को। वे फिर सक्रिय नजर आएंगे उपचुनाव वाले क्षेत्र में। फिलवक्त तो विधायक और नेता खुद लगे हैं अपनी जान बचाने को। नंगे को कोई कितना नंगा करेगा? इसीलिए चुप्पी में कोई पूछ भी नहीं रहा कि गंगा खतरे के निशान से कितना ऊपर है? कोई नहीं जानना चाह रहा कि बीच गंगा के पेट में खड़े आलीशान भवनों के नाले से शहर  को कोई खतरा तो नहीं। पूछ कर ही क्या करना है जब वे बारिश की ही पानी में डूब रहे हैं। जनता की तो यही नियति है लेकिन राजा भी डूबा है सत्ता के नशे में। बोलता है यूँ जैसे कि वही ईश्वर हो। लेकिन बेशर्म राजा को गाली देना भी तो खुद की ही तौहीन है।
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सुशील कुमार भारद्वाज

गुरुवार, 30 मार्च 2017

पटना में मदन कश्यप का कविता-पाठ

29 मार्च 2017 को बिहार की धरती पटना में महाराजा कामेश्वर सिंह कॉम्प्लेक्स स्थित टेक्नो हेराल्ड के परिसर में प्रगतिशील लेखक संघ के पटना जिला ईकाई के तत्वावधान में वरिष्ठ कवि मदन कश्यप के सम्मान में एक काव्यात्मक कार्यक्रम का आयोजन किया गया।'गूलर के फूल नहीं खिलते', 'लेकिन उदास है पृथ्वी', नीम रोशनी में', 'कुरुज' और 'दूर तक चुप्पी' जैसे महत्वपूर्ण कविता-संग्रहों के कवि मदन कश्यप ने प्रतिरोध की आग में तपी -तपायी 'भारत माता की जै', 'डपोरशंख', 'छोटे-छोटे ईश्वर', 'पुरखों का दुःख', 'अभी भी बचे हैं', 'उम्मीद', 'बहुरूपिया', 'काल-यात्री' और 'बिजूका' शीर्षक जैसी कविताओं का पाठ किया। राजभाषा विभाग, बिहार सरकार के 'नागार्जुन-सम्मान' से सम्मानित  कवि मदन कश्यप के कविता-पाठ आयोजन के मुख्य अतिथि दिल्ली से पधारे प्रसिद्ध कवि गंगेश गुँजन थे, अतिथि दिल्ली से पधारे कवि-आलोचक देवशंकर नवीन थे। अध्यक्षता समकालीन कविता के महत्वपूर्ण कवि प्रभात सरसिज ने की। कार्यक्रम का संचालन कवि राजकिशोर राजन किया और धन्यवादज्ञापन कवि शहंशाह आलम ने किया।

पहले सत्र में  मदन कश्यप का कविता- पाठ हुआ तो दूसरे सत्र में आयोजन में शरीक हुए कवि एवं गजलकारों ने अपनी रचना से सबों को बाँधे रखा। जहाँ कुछ वक्ताओं ने मदन कश्यप एवं अन्य रचनाकारों की काव्य-पाठ पर सार्थक टिप्पणी की वहीं कथाकार शेखर ने आयोजन को ऐतिहासिक बताते हुए प्रगतिशील लेखक संघ के ऐतिहासिक पहलुओं पर अपनी बेबाक टिप्पणी रखी। आयोजन की खासियत रही कि मदन कश्यप अपनी कविता -पाठ के साथ -साथ उसकी रचना प्रक्रिया पर भी बात करते रहे। इस मौके पर अनिल विभाकर, संजय कुमार कुंदन, रामनाथ शोधार्थी, कथाकार अशोक, भगवत झा अनिमेष, बी एन विश्वकर्मा, समीर परिमल, सुशील कुमार भारद्वाज आदि समेत कई साहित्यकार उपस्थित रहे।

रविवार, 19 फ़रवरी 2017

पटना इतिहास की नजर में : अरूण सिंह


ईस्ट इंडिया कंपनी जब हिंदुस्तान में व्यापार करने आयी थी उस वक्त विश्व अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी 23 फीसदी थी। और जब वे भारत छोड़कर गए तो यह घटकर चार फीसदी से भी कम रह गयी थी। उन्होंने यहां के उद्योगों को भरपूर क्षति पहुंचाई और यहां की अर्थव्यवस्था को तहस नहस कर दिया।
पटना का समृद्ध बाजार भी इससे अछूता नहीं रहा। एक वक्त में ब्रिटिश, डच, डेन और फ्रांसीसियों का पसंदीदा यह शहर धीरे धीरे अपनी महत्ता खोने लगा। पटना और इसके आसपास के गांवों में जहां कभी घर घर में हथकरघे चल रहे थे, धीरे धीरे बंद होने लगे। ओ’ मैली जब 1907 में सर्वेक्षण कर रहा था उस वक्त तक यह सिमट कर रायपुरा (फतुहा) तक ही रह गया था। यहां के बुनकर अभी भी सिल्क से तसर का निर्माण कर रहे थे। इसके साथ ही बुनकर सिल्क और सूती को मिलाकर जिसे बाफ्टा कहते थे, का उत्पादन कर रहे थे। इसकी खपत स्थानीय बाजार में थी और साथ ही इसका निर्यात कलकत्ता तक हो रहा था। इसके सौ वर्ष पहले जब बुकानन यहां सर्वेक्षण कर रहा था उस वक्त यहां के सिल्क का निर्यात पर्शिया के बाजारों तक हो रहा था।
पटना सिटी में बने शीशे के उत्पादों का भी एक वक्त में बड़ा बाजार था। इसका निर्यात यूरोप तक हो रहा था। ओ’ मैली ने गज़ेटियर में पटना सिटी के लोदीकटरा मोहल्ले में शीशे से बने उत्पादों का उल्लेख किया है। उसने लिखा है कि इत्र रखने की शीशियां,बोतलें,लैम्पों और चुड़ियों का निर्माण सोन नदी के बालू और सोड़ा से किया जाता है। इससे शीशे का जो निर्माण होता है वह हरे रंग का और अशुद्ध होता है। लेकिन जो शीशा शुद्ध और सफ़ेद होता है उसका निर्माण रेलवे के टूटे लैम्पों के शीशे से होता है। उसने यूरोपियन शैली के फूलदानों के निर्माण का भी उल्लेख किया है। उसने लिखा है कि कारीगर फूलदानों के शीशों को रंगने के लिए नीले थोथे, नील के रंग और अन्य सामग्रियों का प्रयोग करते हैं। जबकि शीशे को नीला रंग देने के लिए टिन के ऑक्साइड का प्रयोग किया जाता है। उसने इनके निर्माण के प्रक्रिया का भी जिक्र किया है।
पटना सिटी के मारूफगंज मोहल्ले के संगतराशों (पत्थर गढ़ने वाला) का भी उल्लेख ओ’ मैली ने किया है। उसने लिखा है कि जिस बलुआ पत्थर का उपयोग यहां के कारीगर करते हैं वह मिर्जापुरी पत्थर कहलाता है। इन पत्थरों के बड़ी बड़ी सिल्लियों को मिर्ज़ापुर जिले के चुनार और बिंध्याचल से नाव से गंगा नदी के मार्फ़त लाया जाता है। सासाराम और मुंगेर से ग्रेनाइट का भी आयात किया जाता है। इन पत्थरों से देवी देवताओं की मूर्तियां, आटा पीसने वाला जांता, मसाला पीसने वाला सिल-लोढा, कुम्हारों की चक्कियां, पत्थर के प्लेट और कपों का निर्माण होता है। इनकी खपत पटना और देश के दूसरे शहरों में होती है। इनकी मांग लगातार बनी रहती है।
ओ’ मैली ने पटना और दानापुर के बढ़इयों (लकड़ी का काम करने वाले) की दक्षता का भी उल्लेख किया है। उसने लिखा है कि इन कारीगरों द्वारा बनाये गए लकड़ी के खूबसूरत छज्जे, जो दानापुर और पटना की इमारतों की खास पहचान है उनकी कारीगरी के नमूने हैं। इन कारीगरों द्वारा बनाये गए खूबसूरत मजबूत फर्नीचर और आलमारियों का निर्यात देश के दूसरे शहरों में होता है। कुत्ता गाड़ी और पालकियों का निर्माण भी पटना और दानापुर की विशेषता है।
पटना सिटी की सड़कों और गलियों से गुजरते हुए ठहर कर आप पुरानी इमारतों को देखें तो उनमे लगी लकड़ी के खूबसूरत छज्जे आपको अभी भी दिख जायेंगे।
साभार: प्रभात खबर