रविवार, 26 मार्च 2017

पंकज चतुर्वेदी की कविताएं

पंकज चतुर्वेदी समकालीन साहित्यकारों में एक उत्कृष्ट स्थान रखते हैं जिनकी रचना जितनी कम शब्दों में होती है उतनी ही मारक होती है। ये देश -काल को अपने रचना का विषय बनाकर अपनी स्पष्ट अभिव्यक्ति को यथोचित आकार देते हैं जिनमें गूँज होती है झन्नाटे की। आज उनके फेसबुक वॉल से गुजर रहा था तो उनकी ताजा रचनाओं को पढ़े बिना रह न सका और आपलोगों के लिए भी यहाँ कुछ गौरतलब कविताओं को प्रस्तुत कर रहा हूँ।



बात करते-करते
---------------------

बात करते-करते
जब तुम्हें लगे
कि यह आदमी
अब तुम्हारा दोस्त नहीं
सत्ता का मुख़बिर है
तो अपने अनिष्ट की
आशंका तो होती है

पर उससे अधिक
अफ़सोस होता है
कि वह उतना
समुन्नत नहीं है
जितना तुम उसे
मानते थे

रश्क
------

गति पर क़ाबू करने का
यह भी उपाय है
कि आप सबसे पीछे
छूट जायें

संभव है कि तब
दौड़ के विजेता को
आपकी आत्म-शांति से
रश्क हो !

बिछोह
---------

गहरे नीले आसमान में
पेड़ों के झुरमुट की ओट में
जिस दिन
नहीं दिखता चाँद

लगता है
तुम्हारे दर्शन
नहीं हुए

फ़ासीवाद जब बढ़ता है
----------------------------

फ़ासीवाद जब बढ़ता है
मित्र घटते जाते हैं

वे दैत्य के जबड़े के
सामने नहीं
पड़ोस में
रहना चाहते हैं

मृत्यु से बचने के लिए
ऐसी जगह की तलाश में
जो जीते-जी
मृत बनाये रखती है

धर्म की राजनीति
----------------------

धर्म की राजनीति में
एजेंडा तभी तक
गुप्त रखा जाता है
जब तक उसकी
ज़रूरत हो

सीता जब अपनी कुटिया से
बाहर निकल आती हैं
तब उन्हें पता लगता है
कि भिक्षा माँग रहा व्यक्ति
साधु नहीं
रावण है
और उनका
अपहरण करने
आया है

सौम्य कोशिश
----------------

जिस गिलास में
पानी पी रहा हूँ
उस पर खुदा है
दिवंगत का नाम

अमरता की
यह सौम्य कोशिश
मेरे जीते-जी
सफल है

पानी नहीं
उसकी अमरता का
घूँट पीता हूँ

सत्ता का सरोकार
-----------------------

सत्ता का सरोकार है
कि तुम हिंसक व्यवहार के
आदी बनो

गर्व से कहो
कि तुम विजेता हो

आँसू
कमज़ोरी की निशानी हो
ग़रीब की रोटी छीन लेना
ताक़त की

हँसते समय यह सीखो
कि निर्बल का अपमान करके
कैसे हँसा जाता है

प्यार एक वर्जित ख़याल हो
और जो उस राह पर चले
उसमें शर्मिंदगी और
अपराध-भाव पैदा हो

अपराधी यह कहें
कि निरपराध करना है
समाज को

माना कि यह
--------------

माना कि यह
सपनों का
समय नहीं है
उन्माद से
पराजित है
आदर्श

लेकिन यह कवियों
विचारकों को
भाषा में भागने
और गुनाह करने की
छूट नहीं देता

अपराधी
अपराधी ही है
भाषा में हो
या उसके बाहर

अगर तुम्हारे पास
--------------------

अगर तुम्हारे पास
साम्प्रदायिकता के
ज़हर से बुझी
कटार नहीं है

जाति की तीखी
तलवार नहीं है

अतर्कित भ्रष्टाचार
नहीं है

पूँजीपति यार नहीं है

मूल्यों की ढहती
मीनार नहीं है

तो चुनाव में
तुम्हारी जीत पर
विस्मय है

हार तय है

हे राम !
----------

वैसे यह प्रमाणित नहीं है
पर उसके काफ़ी क़रीब है
कि अपनी हत्या के वक़्त
गाँधी दो ही शब्द कह सके :
''हे राम !''

आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है
कि तुम किस भाषा में
अपनी प्रार्थना और शोक
व्यक्त करोगे
जबकि तुम्हें मालूम हो
कि उसी भाषा में तुम पर
होंगे अत्याचार

प्रयोगशाला
---------------

मध्य-युग के बर्बर शासक
विश्वविद्यालयों को जलाते थे

अब जो शासक हैं
उनका ज़ोर इस पर है
कि उन्हें जलाया भले न जाय
पर जो वे करना चाहते हैं
उसकी प्रयोगशाला
बना दिया जाय

करना वे यह चाहते हैं
कि मनुष्य में आत्मा
न रहने दी जाय।

सिर्फ़ माँ है
--------------

एक छात्र जिसे पहले पीटा गया
और फिर ग़ायब कर दिया गया
नहीं मालूम वह कहाँ है कैसा है

जैसे-जैसे दिन बीतते जाते हैं
उसके मिलने की आशा
धूमिल होती जाती है

सवालों से कतराती है सत्ता---
जैसे अपराधियों का स्वतंत्र विचरण
कोई समस्या नहीं है
बल्कि जिन्हें सताया जा सकता है
उनका जीवन एक समस्या है---
और वह अपनी क्रूरता से
निश्चिन्त होना चाहती है

शरीफ़ लोग किसी अनहोनी की
आशंका में चुप रहते हैं
और जो उसे पाने के लिए लड़ रहे
हारते जाते हैं

एक नयी नागरिकता निर्मित हो रही
जो यह मानती है
कि अन्याय पर ख़ामोश रहना बेहतर है
और उसे भूलना सबसे कारगर उपाय

सिर्फ़ माँ है
जो शताब्दियों तक
अपने बेटे की प्रतीक्षा करेगी !

नये बनते निज़ाम को देखो
----------------------------

जो लोग लेखकों की
हत्या कर रहे
वे अज्ञात हैं

जो स्त्रियों को बलात्कार की
धमकियाँ दे रहे
वे अज्ञात हैं

जो फ़िल्मों के सेट जला रहे
वे अज्ञात हैं

जो बुद्धिजीवियों के साथ
मार-पीट कर रहे
और उन्हें गालियाँ दे रहे
वे अज्ञात हैं

भले तुम इसे
लोकतंत्र मानते रहो
पर इस नये बनते
निज़ाम को देखो :
मारनेवाले अज्ञात हैं
मरनेवाले ज्ञात हैं !

पंकज चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से साभार।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें