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शनिवार, 17 दिसंबर 2022

बिहार में हाहाकार : प्रेमकुमार मणि

 बिहार में एक बार फिर शराबबंदी चर्चा का विषय बना हुआ है। कारण सिर्फ जहरीले शराब से लगभग 70 लोगों की मौत ही नहीं है बल्कि माननीय मुख्यमंत्री का बयान भी लोगों का ध्यान आकृष्ट कर रहा है। ऐसी स्थिति में साहित्यकार और नीतीश कुमार के करीबी रहे प्रेम कुमार मणि का आलेख गौरतलब है।

बिहार में हाहाकार 

प्रेमकुमार मणि 


 बिहार की राजनीति में पिछले सात वर्षों से शिक्षा ,स्वास्थ्य और रोज़गार जैसे मुद्दों की जगह शराब केंद्रीय विषय बना हुआ है. शराबबंदी ऐसी योजना है ,जिसपर पूरा सरकारी महकमा लगा हुआ है. कौन इस बात से इंकार करेगा कि शराब ख़राब चीज है. पुराने ज़माने से सभी धर्मों ने इससे बाज़ आने की सलाह दी है. हर धार्मिक नेता ने अपने अनुयायियों को इससे परहेज करने की सौगंध खिलाई है. राष्ट्रीय आंदोलन में गांधी जी ने इसे राष्ट्रनिर्माण से जोड़ कर देखा. राष्ट्रीय आंदोलन में शराबबंदी केलिए आंदोलन चलाए गए. इसीलिए जब बिहार में शराबबंदी हुई तब इसे सर्वदलीय समर्थन मिला. लेकिन सरकार ने जो शराबबंदी नीति बनाई वह सनक से भरी हुई है.  और तमाम मुश्किलें यहीं से शुरू होती हैं. पिछले सात वर्षों में जहरीली शराब से मरने वालों की संख्या कितनी होगी किसी ने इस पर गौर किया है ? यह संख्या नरसंहारों में मारे जाने वालों की संख्या से कहीं अधिक हो गई है. और इस विषय पर हम यदि गंभीर नहीं हैं ,तब इसका मतलब है कि हम जनता के प्रति संवेदनशील नहीं हैं. अभी उत्तर बिहार  से मौत की जो भयावह खबरें आ रही हैं.उससे कोई भी परेशान हो सकता है. लगभग साठ लोगों के मरने की खबर है. इसे लेकर विधानसभा में मुख्यमंत्री की जो प्रतिक्रिया आई वह बेहद अफ़सोस जनक है. वह इस पर दुःख व्यक्त करने की जगह संतोष व्यक्त कर रहे हैं कि जो पीएगा ,सो मरेगा. आश्रित परिजनों को मुआबजा देने से भी इंकार करते हुए उन्होंने कहा कि शराब पीने वालों को कोई मुआबजा नहीं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ मेरे व्यक्तिगत सम्बन्ध भी रहे हैं . मुझे हैरानी हो रही है कि जिस नीतीश कुमार को मैं जानता रहा वह अब पूरी तरह बदल गए हैं. ऐसे इंसान वह नहीं थे. इतना गुस्सा और और ऐसा अविवेकपूर्ण वक्तव्य उनकी फितरत में शामिल नहीं था. वह अपनी सौम्यता केलिए जाने जाते थे, आज अपनी  रौद्रता केलिए चर्चित हैं. उन्होंने विधानसभा और अपनी मर्यादा का तार -तार किया है. यह सब अत्यंत दुखद है. 

 

लेकिन चाहे जो हों, जैसे हों,मुख्यमंत्री तो वही हैं. इसलिए उन्ही से कुछ कहने केलिए अभिशप्त हूँ. मैं आदरपूर्वक अनुरोध करना चाहूंगा कि इस पूरे मामले पर वह  गंभीरता से विचार करें. 


1 .  मुख्यमंत्री का यह कहना कि शराब पीने वालों को मुआबजा नहीं दूंगा उनके अविवेक को प्रदर्शित करता है. शराब पीने वाले मर गए. मुआबजा उन्हें देना है, जो उनके आश्रित हैं. वे लोग तो आपके शराबबंदी के भरोसे थे. उनके मृत परिजन को आपका सिस्टम जहरीली शराब मुहैय्या करा रहा है इसमें उन मासूम आश्रितों का क्या दोष है? मुख्यमंत्रीजी , आपकी यह उदासीनता क्या केवल इसलिए हैं कि मरने वाले दलित -पिछड़े और गरीब -कमजोर परिवारों से हैं ? 

2 . मुख्यमंत्री को इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि पुलिस महकमा और दूसरे आला अफसरों और सत्ताधारी और दूसरे रसूखदार राजनेताओं की मिलीभगत से अवैध शराब का धंधा अबाध गति से चल रहा है. हकीकत हैरान करने वाली है. 

3 . पूर्ण शराबबंदी सुनने में चाहे जितना सुन्दर लगे, इसे जमीन पर उतारना मुश्किल ही नहीं असंभव होगा. इसलिए इसे व्यावहारिक बनाया जाए ताकि यह आतंक का रूप न ले ले. समय -समय पर इसकी समीक्षा होनी चाहिए . पूर्ण शराबबंदी लक्ष्य अवश्य रहे. लेकिन उसे एकबारगी लागू करना पागलपन ही होगा. 

4 . शराबबंदी  केलिए जनजागरूकता इस तरह विकसित की जाय जिससे इसके प्रति अनाकर्षण पैदा हो.  भय एक सीमा तक ही कारगर होता है. 

5 . सरकार स्वयं  को शराब- केंद्रित नहीं कर दे. शराबबंदी कोई ऐसी उपलब्धि नहीं है कि इसका उल्लेख आप अपने भाषणों में करें. एक सभ्य समाज में शराब केलिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए. लेकिन इसकी ऐसी भी मनाही नहीं हो कि कोई एक घूंट पी ले तो उसे हथकड़ी पहननी पड़े . यह भी सभ्य समाज का लक्षण नहीं है. हमें बुद्ध की इस शिक्षा का ध्यान रखना होगा कि दोनों अतियों से बचो. मुख्यमंत्री हमेशा अतियों पर ही जोर देते हैं. याद कीजिए, शराब दरवाजे तक पहुँचाने वाले भी आप ही थे. 


और आखिर में चीन देश के ख्यात दार्शनिक लाउत्से की एक कथा ,जिसे आप को जानना चाहिए. 

लाउत्से के ज़माने में कुंग -फू -जो चीन के सम्राट का प्रधानमंत्री था, जो विद्वानों -जानकारों से सलाह -मशविरा किया करता था. कुंग एक दफा लाउत्से से मिला और पूछा बेहतर शासन केलिए क्या करना चाहिए. 

लाउत्से का जवाब था -कुछ मत करो. 

कुंग अवाक् थे. 

लाउत्से ने चुप्पी तोड़ी . कहा- शासक को निष्क्रिय दिखना चाहिए. जनता के काम में वह घुल -मिल जाए . राजा के काम जनता न करे और न जनता के काम राजा करे. अच्छे शासक वे होते हैं जिनके बारे में जनता कमसे कम चर्चा करती है. 

और ख़राब शासक ? ' कुंग -फू -जो ने लाउत्से से पूछा .

-- ' बुरे राजा वे होते हैं ,जिनके बारे में जनता रातदिन चर्चा किया करती है. जनता का काम जब राजा की चर्चा करना हो जाए ,तब समझो संकट की घड़ी है. ' 


शासन के बारे में पुरानी कहावत है, जितने अधिक कानून बनते हैं ,अपराधों की संख्या उसी अनुपात में बढ़ती है. 

मुख्यमंत्रीजी , शराब केंद्रित बिहार की राजनीति को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार के वास्तविक मुद्दों से जोड़िए. चमचा युग से बिहार को बाहर कीजिए.



आलेख वह चित्र प्रेम कुमार मणि के फेसबुक वॉल से साभार।

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2022

शराबबंदी पर लेख लिखें- दीपक दक्ष

यूं तो दीपक दक्ष पेशे से पत्रकार हैं लेकिन उनके साहित्यानुराग की गवाही उनकी कलम ही देती है। इनकी रपट भी इतनी सहज और आम बोलचाल के भाषा में होती है कि आपको अंदर तक गुदगुदा जाती है। एक बार फिर से जब शराबबंदी पर बिहार में बबाल मचा हुआ है तो दीपक दक्ष ने अपने अंदाज में शब्दों से खेलते हुए देखिए कि शराबबंदी पर कैसा लेख वो लिख गए हैं।




 शराबबंदी पर लेख लिखें...

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               शराबबंदी

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शराबबंदी एक आफत है। एक अप्रैल 2016 से बिहार में आयी है। इस आफत से पियक्कड़ सब हांफत है। हंफनी की बीमारी बढ़ती जा रही है। पियक्कड़ों का कहना कि  ई अजबे निर्णय है...गजबे निर्णय है... निर्णय हंगामा मचवाने वाला है..पटका पटकी करवाने वाला है...


  वास्तव में , शराबबंदी ने समाज के एक वर्ग को बुरी तरह प्रभावित किया है । यह समाज बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन प्रभावी है। नशे में हल्ला मचाने के लिए कुख्यात है। इसे पियक्कड़ समाज कहते हैं। जब से शराबबंदी हुई है, तब से यह गम में डूब गया है। इस समाज के लोग पिटाइल प्रेमी की तरह सुथनी जइसा मुंह बना कर घूम रहे हैं। अकेले में बैठ कर अपनी प्रेमिका शराब को याद कर रहे हैं । गीत गा रहे हैं- तू जो नहीं है तो कुछ भी नहीं है , ये माना कि महफिल जवां है, हंसी है.... जब से प्रेमिका से दूर हुए हैं , तब से अर्थशास्त्र का ज्ञान जागृत हो गया है। घर, समाज उजाड़ने वाला पुराना डाटा किनारे लगाकर,  नया डाटा पेश कर रहे हैं- 3 लाख से अधिक आदमी सुखले जेल में चल गया... 6000 दुकानें बंद हो गयी... शराब क्षेत्र का रोजगार घट गया... बेरोजगारी बढ़ गयी... सालाना 4000 करोड़ का नुकसान हो रहा है... शराब माफिया मालामाल है... पुलिस दारोगा धन्नालाल हैं....


दरअसल शराबबंदी शुरू होते ही पियक्कड़ समाज को अपनी  इमेज की  चिंता सताने लगी । इस समाज के विद्वतजन कह हैं कि

 हर दिन पियक्कड़ प्रतिभा की बेइज्जती हो रही है... कमर में रस्सा बांध के अउर फोटू खिंचवा के पेपर में छपवाया जा रहा है, ई बढ़िया बात नहीं है...पियक्कड़ प्रतिभा के साथ घोर अन्याय है...शादी विआह में दिक्कत हो रही है भाई...रस्सा बंधल फ़ोटो वायरल हो जा रहा है..  फ़ोटो देख अगुआ बिदक जा रहा है .... गुंजनवा के तिलक  में गजबे हो गया...रस्सा बंधल फ़ोटो तिलकहरु सब में बंट गया...बिआह कट गया.... लड़की के प्रेमी का चाल सफल हो गया यार....वास्तव में,  पियक्कड़ प्रतिभा को पटकने की यह बड़ी साजिश है... एक सोची-समझी चाल है... प्रतिभा कुचलने की चाल... पियक्कड़ जमात को हाशिए पर डालने की चाल...


पियक्कड़  संघ का कहना है कि शराबबंदी के कारण देश कमजोर हो रहा है।  कार्य क्षमता घट रही है। उदाहरण के लिए----- पत्रकार,   खुशवंत सिंह बनने से वंचित हो रहे हैं... इनके पास लिखने के लिए नया आईडिया नहीं आ रहा है... इनके बॉस भी नया आईडिया दे नहीं पा रहे हैं...  दिमाग की बत्ती जलाने के लिए बॉस को रात 11 बजे  का इंतजार करना पड़ रहा है।  फिर  भी पत्रकार वाला भूतवा नहीं जाग रहा है...


शराबबंदी के कारण  पार्टियों की इमेज पलटनिया मार रही है ।  पइसावाली पार्टी को लोग भिखमंगा झूठा पार्टी कह रहे हैं और नेताजी भी जान रहे हैं कि वोट की खरीदारी ठीक से नहीं हो पा रही है। वोटिंग प्रतिशत गिर रहा है।  रंगबाजी फीकी पड़ रही है। अगर यही स्थिति रही तो अगला चुनाव जीतना मुश्किल हो जाएगा।   काला धन वाला सूटकेसवा धरले रह जायेगा...


दूसरी तरफ साहब संघ का कहना है कि अफसरों की महफिल नहीं जम रही है...इट्स नॉट गुड... साहबी शान नहीं दिखा पा रहे हैं भाई...रात के अंधेरे में दुबक कर पीना पड़ रहा है भाई... नहीं तो हवाई जहाज पकड़कर दिल्ली जाना पड़ रहा है ...।


 कर्मचारी संघ कह रहा है कि जबरदस्ती झारखंड में जाकर काम चलाना पड़ रहा है....संडे वाली छुट्टी  जसीडीह जंक्शन पर बीत जा रही है ... 


डॉक्टर्स क्लब का कहना है कि आमदनी घट गई है। अस्पतालों में उल्टी, अनपच,घटना- दुर्घटना के मरीज कम पहुंच रहे हैं... मेडिकल क्षेत्र अब पहले जैसा नहीं रहा... 


 इंजीनियर- ठेकेदार की जोड़ी कह रही है कि अब पहले जैसी पटरी नहीं बैठ रही है...एक-दूसरे को पटाने में परेशानी हो रही है... हां  बहुते परेशानी हो रही है...एक बोतल शराब की कीमत आप क्या जानोगे रमेश बाबू...


जब से शराबबंदी हुई है कलाकार संघ भी सदमे में है। दिन-रात बस एक ही गीत गा रहा है- हम तुम्हें चाहते हैं ऐसे,  मरने वाला कोई जिंदगी चाहता है जैसे.... आ भी जा आ भी जा....


अंत में कहा जा सकता है कि बिहार ज्ञान की भूमि है। बुद्ध,  महावीर की भूमि है। जेपी की भूमि है। विद्रोह की भूमि है। कुरीतियों के खिलाफ तन कर खड़े होने वालों की भूमि है। शायद इसीलिए शराबबंदी की गई है। 

 लेकिन शराब बंदी के बहाने संस्कारी पियक्कड़ समाज को हतोत्साहित किया जा रहा है। शराबबंदी ने  पियक्कड़ वर्ग को झकझोर कर रख दिया है । पियक्कड़ों पर केंद्रित पार्टियों की पहचान संकट में है। वोटिंग का गणित गड़बड़ा गया है। 


 नवही लइकन को  एंग्री यंग मैन बनने से रोक दिया है।  बरात की शान घट रही है।  नागिन डांस, अजगर डांस में बदल रहा है...गोली-बंदूक की बिक्री घट रही है। सामियाना में छेद नहीं हो रहा है। चखना का व्यापार मंदी की मार झेल रहा है ....


दूसरी तरफ कोई राजा राममोहन राय की तरह आगे बढ़ रहा है .... विरोध की परवाह नहीं कर रहा है ...अर्ध नंगे फकीर के विचारों के साथ चल रहा है... क्योंकि अर्धनंगे फकीर ने भी एक बार कहा था--- अगर मुझे एक दिन के लिए तानाशाह बना दिया जाए तो एक झटके में देश के सभी शराब दुकानों को बंद करा दूंगा.... वहीं पियक्कड़ समाज प्रेमिका शराब की याद में आंसू बहाते हुए गा रहा है---

मुझको ये तेरी याद क्यों आती है/ इतना बता मुझको ये क्यों सताती है....


दीपक दक्ष के फेसबुक वॉल से साभार।

जबरन की शराबबंदी सफलता का मानक नहीं

 कुछ वर्ष पहले भी खाने -पीने के मसले पर विवाद हुआ था। उस समय कहा गया था कि खाना-पीना व्यक्तिगत मसला है इस पर किसी तरह का पाबंदी उचित नहीं। फिर शराबबंदी पर ये हंगामा क्यों? जब सम्पूर्ण बिहार में हर चौक-चौराहे पर शराब बिक रहा था तब भी वे ही लोग उन दूकानों पर लाइन लगते थे जो पीते थे। आज जब शराबबंदी लागू है तब भी वे ही लोग पी रहे हैं जो इसके आदि हैं। समझ से परे है कि श्रीमान इसे किस जिद्द में लिये बैठे हैं। खबर पढ़ने को मिली कि मुख्यमंत्री महोदय पिछले दिनों भी अपने विधायकों से बात की कि शराबबंदी लागू रखा जाय या हटा दिया जाय? अब सोचने वाली बात है कि किस पियाक विधायक में इतनी हिम्मत होगी कि अपने मुख्यमंत्री के संकल्प के विरोध में जाय? लेकिन गाहे -बगाहे अनेक मौकों पर अनेक विधायक / नेता शराबबंदी को समाप्त करने की सलाह मौखिक रूप से विभिन्न माध्यम से दें चुके हैं। 




आज उड़ती खबर मिल रही है कि सदन में मुख्यमंत्री ने कहा है कि शराब पीकर मरने वालों को एक रूपया भी नहीं दिया जाएगा। जबकि पिछले दिनों का बयान था कि जो पीयेगा वो मरेगा ही।

ऐसी परिस्थिति में उचित यही जान पड़ता है कि मुख्यमंत्री महोदय को किसी मध्यमार्ग पर जरूर विचार करना चाहिए। क्योंकि बालू और दारू ही बिहार के लिए एक नासूर बनता जा रहा है। और कोई तो वजह होगी कि वर्षों से शराबबंदी कानून लागू होने के बाबजूद लोग पी रहे हैं और मर रहे हैं। सरकार को यह भी अध्ययन करवाना चाहिए कि अन्य राज्यों की क्या स्थिति है? वहां शराबबंदी का कौन -सा माडल कार्य कर रहा है जो वहां से शराबबंदी की वजह से मौत की खबरें सुनाई नहीं पड़ती है?

नशा या सामाजिक बुराईयों से दूर रहने की सलाह/ जीवनशैली अच्छी बात है लेकिन महज एक नशा की वजह से अकाल मृत्यु को प्राप्त होना भी सभ्य समाज के लिए उचित नहीं माना जा सकता। फिर खाने-पीने का मसला लोगों की निजी जिंदगी का हिस्सा है उसमें किसी तरह का दखल उचित नहीं। और सच पूछा जाय तो जबरन की शराब बंदी सफलता का कोई मानक नहीं हो सकता। सफलता तब मानी जाएगी जब शराब चुनिंदा जगहों पर उपलब्ध हो, बाबजूद इसके युवा/जनता उस पेय से नफ़रत करे। उपलब्धता के बाबजूद पीने वालों की संख्या/ प्रतिशत दिन-प्रतिदिन कम होता जाय।

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गौरतलब है कि व्यक्तिगत रूप से न तो मैं किसी भी प्रकार के नशा का आदि हूं न ही समर्थक हूं। हां, चाय पीने का आदि हूं लेकिन आशा करता हूं कि चाय पीने पर सरकार कोई पाबंदी नहीं लगाएगी।

-सुशील कुमार भारद्वाज