शनिवार, 19 नवंबर 2022

मानवता की कहानी है कमलेश की पत्थलगड़ी और अन्य कहानियां - सुशील कुमार भारद्वाज

 मानवता की कहानी है पत्थलगड़ी और अन्य कहानियां

- सुशील कुमार भारद्वाज 



“दक्खिन टोला” जैसी कहानी संग्रह के बाद कमलेश ने "पत्थलगड़ी और अन्य कहानियां" के साथ अपनी महत्वपूर्ण  उपस्थिति साहित्यिक परिदृश्य में सक्रियता से दर्ज की है। कमलेश की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि वे कहानियों को गुनने और उसे रोमांचक तरीके से कहने में माहिर हैं। इनकी कहानी आपको आकर्षित नहीं करती है बल्कि कहानी अपने परिवेश में आपको अवशोषित कर लेती है। कहानी की एक ऐसी दुनिया जिसमें कोरी कल्पना या ढकोसला या बनावटीपन नहीं दिखता। दिखता है तो आपका, हमारा या हमारे परिवेश के किसी व्यक्ति का दर्द और संघर्ष। सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक व्यवस्था का ऐसा ताना-बाना जिसमें इंसान अपने अस्तित्व के लिए जूझता नजर आता है। 

कथाकार के पहले संग्रह का नाम “दक्खिन टोला” है तो इस दूसरे संग्रह को सांकेतिक रूप से उत्तर टोला भी कहा जा सकता है. दरअसल कमलेश के इस दूसरे संग्रह को देखा जाय तो, स्पष्ट रूप में यह दो भाग में विभक्त नज़र आता है। एक तरफ तिवारी जी हैं, जो जिन्दगी के झंझावातों का सामना विभिन्न रूप में विविध जगह पर कर रहे हैं। और दूसरी तरफ आदिवासी लोग हैं जो अपनी जमीन, पेड़, पहाड़ और संस्कृति को बचाने के लिए पत्थलगड़ी जैसी परम्परा का सहारा ले रहे हैं। चूँकि कथाकार गत वर्षों से रांची में ही पदस्थापित हैं और हाल के वर्षों में इस पत्थलगड़ी प्रकरण की वजह से झारखण्ड काफी चर्चा में भी रहा, जिसे उन्होंने करीब से जाना–समझा और कहानी के माध्यम से लोगों को इसके बारे में जागरूक करने की कोशिश की। दूसरी महत्वपूर्ण बात कि संग्रह की अधिकांश कहानियों का उद्गम स्थल कहें या लोकेल कहें वह बिहार का बक्सर जिला है जिसका चारित्रिक उभार भी कुछ कहानियों में नज़र आता है। 

संग्रह की कहानियों को संक्षिप्त रूप में देखा जाय तो पहली कहानी अघोरी में तिवारीजी का अजीब दर्द उभरता है। एक इंसान जो अपनी नामर्दगी की वजह से कुंठाग्रस्त है। जो जीवन से पलायन करते करते अपना घर-परिवार सबकुछ खो कर लगभग विक्षिप्त-सा व्यवहार करता है। उसे हमारा समाज सिद्ध पुरूष-अघोरी के रूप में विख्यात किये हुये रहता है। तिवारीजी के दुःख-दर्द को समझने-बूझने और इलाज कराने की बजाय अंधविश्वास में डूबे इंसान उसी से अपना इलाज कराने चले आते हैं जो कुंठा में आकंठ डूबा हुआ है। दूसरी कहानी पत्थलगड़ी विगत वर्ष में झारखंड की चर्चित पत्थलगड़ी प्रकरण को विशेष रूप से खोलती नज़र आती है। यह कहानी आदिवासी समाज के जीवन संघर्ष को बयां करती है। आलसाराम, बिसराम बेदिया और सोगराम जैसे धुनी लोगों के बहाने उस निरीह आदिवासी समाज की पड़ताल करती है यह कहानी, जिनकी जमीन, जंगल और जीवन सरकार एवं पूंजीपतियों के षड्यंत्रकारी हवस की शिकार हो जाती है।

संग्रह की तीसरी कहानी "बाबा साहब की बांह" जातिवाद के जंजाल में फंसे समाज की खबर लेती है। जहां रवि, सुनील, इम्तियाज और राघव जैसे किताबी इम्तिहान में फेल आवारा टाईप के लड़के अपने मानवीय और सामाजिक समरसता के गुण के बदौलत समाज में फैलते दंगा-फसाद को रोकने की एक सफल कोशिश करते हैं। भले ही राजनेता अपनी वोट की राजनीति के लिए आरक्षण और जातिवाद को अपनी सुविधानुसार विभिन्न रंगों में रंगने की कोशिश करते हों।

आदिवासी समाज पर केन्द्रित दूसरी और इस संग्रह की चौथी कहानी है  "खिड़की"। पूंजीवाद का शिकार व्यवस्था किस कदर भोलेभाले आदिवासी को मानसिक, शारीरिक, आर्थिक और भावनात्मक रूप से तोड़ने की कोशिश करता है?  सच को जानते हुए भी झूठ को सच बना देने की जद्दोजहद से परिचय कराती है यह कहानी। 

"लालकोट" एक पारिवारिक ज़िम्मेदारी की पृष्ठभूमि पर लिखी गई संग्रह की पांचवीं कहानी है। जहां तिवारीजी को लव एट फर्स्ट साइट का भ्रम होता है लेकिन ज्योंही उन्हें एक बेटी का दिल पिता के लिए धड़कता हुआ महसूस होता है उन्हें अपनी बेटी की याद आने लगती है। कह सकते हैं कि पिता-पुत्री के प्रेम पर केंद्रित यह संग्रह की दूसरी कहानी है।

छोटन तिवारी का कला के प्रति अगाध लगाव और स्वयं घर-परिवार, समाज और जाति-धर्म से परे व्यवसाय को शौक के लिए अपनाकर लवण्डा बन जाने की कहानी है "प्रेम अगिन में"।

"बोक्का" कहानी के बहाने कथाकार कमलेश ने कामरेडों के कथनी और करनी के अंतर को निशाने पर लेने की कोशिश की है। कहें कि कम्युनिस्टों की छल-क्षदम को बेनकाब करने की कोशिश की है। सुदर्शन तिवारी जाति-धर्म का नारा लगाते हुए कहते हैं कि गरीबों का जाति-धर्म सिर्फ गरीबी है। सभी मजदूर एक हो जाएं। लेकिन वे अपनी बेटी गीता की शादी उसके प्रेमी कालिका ठाकुर से करवाने की बजाय उसके प्रेमी को ही दुनिया से ही रूखसत करने की कोशिश करते हैं।

"कर्ज़" कहानी भी तिवारीजी से ही शुरू होती है लेकिन कथाकार ने इसमें वैसे लोगों की बदहाली को बयां किया है जो महाजनी प्रथा के शिकार हो तन-मन-धन से सबकुछ खो चुके हैं और सरकारी व्यवस्था भी उन सूदखोर या दलाल का ही साथ देती नज़र आती है। जबकि "परिणाम" कहानी में कथाकार ने परिवार के भावनात्मक पहलू को छूने की कोशिश की है जहां पिता और पुत्र के भावनात्मक रूप से समन्वय नहीं हो पाने की वजह से परिवार बिखर जाता है। शायद बदलते समय की ही यह परिणति है।

संग्रह की अंतिम कहानी "भाई" एक ऐसे मुसहर पोस्टमास्टर की कहानी बयां करती है जो खुद इज्ज़त और स्वाभिमान की खातिर अपने घर की नौकरी से झारखंड के खूंटी जिले के अनिगड़ा में स्थानांतरण करा लेता है। लेकिन उसकी पहचान और उसका बीता हुआ समय उसका पीछा नहीं छोड़ता है। सुभरन मुंडा में उसे अपने भाई की ही छवि नज़र नहीं आती है बल्कि उसका गुण, संघर्ष और विचार भी एकाकार होता नज़र आता है। विषम परिस्थितियों की वजह से राघव सदा चाहकर भी उसकी मदद नहीं कर पाता है। लेकिन सुभरन के इनकॉनटर की खबर से वह इस कदर भावावेश हो जाता है कि वह हिम्मत करके पत्थलगड़ी गांव घाघरा की ओर अपनी बाईक बढ़ा ही देता है। 

संग्रह में प्रस्तुत भाषा सामान्य परिवेशगत है तो बोली पात्रानुकूल और कहानी को विश्वनीयता प्रदान करने में सहायक है। कहीं भी क्लिष्ट शब्द या वाक्य का प्रयोग नहीं किया गया है जो कि कहानी की पठनीयता को सहज और सुगम बनाता है। कथाकार कहीं भी हड़बड़ी में नहीं दिखता है बल्कि बहुत ही धैर्य के साथ कहानी को धीमी आंच पर पकाते हुए धीरे धीरे परिणति की ओर बढ़ता है। यूँ कहें की कमलेश एक सामान्य इन्सान की असामान्य जिन्दगी बहुत ही सहजता और पठनीयता के साथ पाठकों के सामने प्रस्तुत करने की सफल कोशिश करते हैं। पात्रों को धीरे धीरे कहानी के अनुसार प्याज के छिलके की तरह अलग अलग परत में दिखाने की कोशिश करते हैं। व्यक्ति ही नहीं बल्कि स्थान को भी एक चरित्र के रूप में उभारने की कोशिश करते हैं। समग्रता में संग्रह की कहानियां मानवता की कहानी है। 

 

पुस्तक:- पत्थलगड़ी और अन्य कहानियां

कथाकार:- कमलेश 

प्रकाशक:- सेतु प्रकाशन प्रा. लि.

पृष्ठ:- 190

मूल्य:- 250/- 


सुशील कुमार भारद्वाज 



संपर्क:- 

मो- 8210229414

Email- sushilkumarbhardwaj8@gmail.com

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें