बुधवार, 4 जनवरी 2023

राहुल और मोदी के बहस में उलझी भारतीय राजनीति

 सर्द मौसम में जब सब घर में दुबके रहने की जुगत में हैं तो राजनीति कुछ हद तक उबाल खाकर गर्माहट पैदा कर रही है। बिहार में तो यूं भी खरमास यानि कि मकरसंक्रांति के बाद उलट-पुलट की परंपरा रही है। अब इस वर्ष परंपरा बरकरार रहेगी या कुछ नया होगा ये तो भविष्य के गर्भ में है। फिलवक्त बिहार में जातिय जनगणना की शुरूआत हो चुकी है। लेकिन इस बार दिल्ली में भी सर्दी के मौसम में राहुल गांधी अपने व्यवहार से गर्माहट पैदा किये हुए हैं। यूं तो टेलीविजन चैनलों पर कपड़ों के प्रचार में ही "सर्दी में भी गर्मी" श्लोगन को प्रचारित -प्रसारित किया जा रहा है बाबजूद इसके राहुल गांधी के टी-शर्ट पर छिड़ी बहस अंत होने का नाम ही नहीं ले रही है।

क्या यह भारतीय राजनीति के लिए भी विचारणीय नहीं है कि हमलोग राष्ट्रीय अथवा क्षेत्रीय मुद्दों/ समस्याओं पर चर्चा करने की बजाय किसी के पहनावे और रहन-सहन में ही उलझकर रह गये हैं? ऐसा नहीं है कि इस तरीके की बहसें पहले नहीं हुई है, लेकिन सच यह है कि वह प्रतीकात्मक कार्य होता था यथा- टोपी या पगड़ी, हरा रंग या केसरिया रंग। कपड़े के ऊपर या नीचे जनेऊ धारण करना, आदि।

अब किसी ने टी-शर्ट पहन ली तो उसकी शक्ति का बखान करना। उसे तपस्वी बताना, उसकी शक्ति का जागरण आदि बेतुकी बातें करना, समय की बर्बादी ही है। यदि बहस ही करनी है तो गौर करनी चाहिए कि लगभग एक दशक की एंटीइन्कम्बेंसी फैक्टर के नाव पर सवार होकर कौन राजनीतिक बैतरणी पार उतरने की कूबत रखता है? राष्ट्रीय पार्टी सत्ता के केंद्र में बनी रहेगी या क्षेत्रीय पार्टियां नेतृत्व करने को तैयार बैठी है? साठ वर्षीय युवा नेता ही देश का नेतृत्व करने के लिए अंतिम विकल्प हैं कि कुछ तीस-पैंतीस वर्षीय युवा नेता भी अचानक परिदृश्य में नजर आ सकते हैं? जब जिंदगी में तकनीक का इतना दखल बढ़ गया है कि जिंदगी ही डिजिटल हो गई है तो शेष चीजें के प्रति संकुचित नजरिया कितना उचित है? माना कि भारत में लोगों की क्रयशक्ति इतनी बढ़ गई है कि हर महंगाई को मात देने पर आमादा है, लेकिन विचारणीय है कि इतनी कुर्बानी के बाद भी क्या देश सही रास्ते पर चल रही है? एक सामान्य आमजन अपने आप को इस माहौल में सहज सुरक्षित जीवनयापन की स्थिति में पाता है? ढ़ेरों ऐसी समस्याएं हैं जिन पर बहस किया जाना शेष है फिर राहुल या मोदी के बहस में क्या उलझना? इन्हें तो विचार करना चाहिए कि यदि राहुल गांधी में ही विकल्प दिखता है तो उनके राजनीतिक हथियार को तेज करें, उन्हें हर मोर्चे पर मोदी से बीस दिखाने की कोशिश करें न कि कपड़ा और दाढ़ी के ही महिमा मंडन में उलझे रहें। यदि मोदी इस बार भी सत्ता में काबिज होने में सफल रहे तो यकीनन एक इतिहास लिखा जाएगा कि एक से एक दिग्गज नेता भारतीय राजनीति में सक्रिय हैं लेकिन किन्हीं में उन्हें रोक पाने की कूबत नहीं।

- सुशील कुमार भारद्वाज 




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