सुख जो चाहिए मुझे, वही सुख चाहिए आपको और सबको। सच पूछिए तो सुख किसे नहीं भाता है? भले चाहें आप इस पार हों चाहें उस पार? परंतु समय की यह अजीब कहानी है कि हम सच को सच और झूठ को झूठ नहीं कह पाते हैं। ऐसा नहीं है कि सच और झूठ का फर्क नहीं मालूम है। मालूम सबकुछ है लेकिन हम अजीब अदृश्य राजनीतिक डोर से बंधे हैं। हम एक सामान्य इंसान (आम जनता) होने की बजाय स्वयंसेवी राजनीतिक कार्यकर्ता बन गए हैं। हम सत्ता पक्ष अथवा विपक्ष की ओर सुविधानुसार चले जाते हैं और उसके हर निर्णय पर कुछ यूं टिप्पणी करने लगते हैं, सक्रियता से उसके पक्ष में बल्लेबाजी करने लगते हैं गोया मेरे पक्ष-विपक्ष में तर्क रखने से उनकी सरकार सुरक्षित रह जाएगी या चली जाएगी। देखने लायक मुंह तो तब बनता है जब वह पार्टी ही देर -सबेर अपने बयान से मुकर जाती है अथवा माफ़ी मांग लेती है।
क्या हमलोग शुरू से ऐसे ही थे? या राजनीतिक जागरूकता का यह साईड इफेक्ट है? या तकनीकी जीवन शैली ने हमें उग्र बना दिया है? आखिर हम क्यों एक दूसरे के दुश्मन बनते जा रहे हैं? विचारधारा की पोटली तो मुझे सबसे वाहियात चीज मालूम पड़ती है। जीवन जीने से भी बड़ी कोई विचारधारा है क्या? भाईचारा और मेलमिलाप से भी बड़ा कोई विचारधारा है क्या? लेकिन हमलोग इस्तेमाल हो रहे हैं दूसरों के हित के लिए, जिसका हमसे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कोई नाता -रिश्ता नहीं है। जितना पाप नहीं हो रहा है दुनिया में, उससे अधिक पापी होते जा रहे हैं हम सब।
-सुशील कुमार भारद्वाज
