शुक्रवार, 27 दिसंबर 2019

मैंने आह्वान किया था पागल बनने को (कविता): सुशील कुमार भारद्वाज

मैंने आह्वान किया था पागल बनने को
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-सुशील कुमार भारद्वाज


नहीं मानता तूझे अपना प्रधान,
नहीं मानता मैं तेरा फरमान।
तू कहेगा पूरब जिसे,
पश्चिम कहूँगा मैं उसे।
तू करेगा स्वच्छता की बात,
मैं करूँगा गंदगी की बात।
तू पूजेगा राम को,
मैं पूजूँगा रावण को।
तू कहेगा प्रगति की बात,
मैं करूँगा जड़त्व की बात।
तू कहेगा अनुशासन की बात,
मैं करूँगा अभिव्यक्ति की बात।
तू कहेगा कुऐं में मत कूद,
मैं कहूँगा जल्दी से कूद।
तू पूजता है गोडसे को,
मैं पूजता हूँ गाँधी को।
तू कहेगा अहिंसा ही धर्म है,
मैं कहूँगा देश को जलाना ही कर्म है।
बस इतना समझ ले तू,
आजीवन का मेरा वैर है तू।
जिस दिन तू कहेगा जिंदा रहने को,
उस दिन कहूँगा खुद को जिंदा जलाने को।
तू कहेगा इंसान बनने को,
मैं आह्वान करूँगा हैवान बनने को।
क्योंकि तूने कहा पागल नहीं बनने को,
इसलिए मैंने आह्वान किया था पागल बनने को।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★
#सुकुभा

सोमवार, 9 दिसंबर 2019

मुस्लिमों के लिए बुद्धिजीवियों का नकली प्रेम

यह भी किसी क्रूर सच्चाई से कम नहीं है कि भारत के अधिकांश राजनीतिक दल और तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग #मुस्लिम शब्द सुनते ही इतने दरियादिल हो जाते हैं कि लगता है कि सहानुभूति में वे अपना सर्वस्व न्योछावर कर देंगें। लेकिन उनके दिल में कश्मीरी पंडितों के साथ हुए व्यवहार या फिर 1984 के सिख दंगे के पीड़ितों के लिए कोई दर्द नहीं झलकता है। जबकि उन्हें या तो सबकी बात करनी चाहिए या किसी की भी बात नहीं करनी चाहिए।
कितने आश्चर्य की बात है कि तत्कालीन जम्मू कश्मीर में पाक के साथ दोहरी नागरिकता का खेल वर्षों से चलता रहा लेकिन कभी उनके लिए आवाज उठाने की फुर्सत किसी को नहीं मिली। चीन बार-बार जम्मू कश्मीर के लिए नत्थी करके वीजा जारी करता रहा लेकिन प्रकांड विद्वान सब कान में तेल डालकर सोते रहे।
जिस देश में स्वजातीय और स्वधर्मियों के लिए कभी मदद के लिए आगे नहीं आए वे आज धर्मनिरपेक्षता का राग अलाप रहे हैं। भाई, अपना घर (घर व्यापक संदर्भ में) सँभाल लीजिए बाद बाँकी तो संविधान संशोधन कभी भी कर सकते हैं। ये तो आपके हाथ का खिलौना है। इतना शोर मचाने से आप किसी का भला नहीं कर रहे हैं बल्कि अपनी राजनीतिक बुद्धि या कुंठा को उजागर कर रहे हैं। आपलोगों की विचारधारा ने भारत को नियतिवादी बनाकर छोड़ दिया है। कम से कम अब तो इसे प्रगति के पथ पर बढ़ने दीजिए। फिर आपलोगों ने #असहिष्णुता का कितना गंदा खेल खेला उसे सम्पूर्ण विश्व ने देखा। आखिर आपने आजादी के बाद कैसे भारत (धर्मनिरपेक्ष माहौल) को तैयार किया कि मुस्लिम आज तक भयभीत हैं? क्या किसी को साल-दो-साल में डर लग सकता है? कदापि नहीं। जिस देश में मुस्लिम राष्ट्रपति की कुर्सी तक बड़ी सहजता के साथ पहुँचे उस देश में यदि कोई उप-राष्ट्रपति तक असहजता और असहिष्णुता की बात करें। तो ऐसे देश में आखिर कोई मुस्लिम शरण लेने क्यों आएगा? यकीनन वो आतंकवाद और आईएसआई का एजेंट बनकर अशांति फैलाने के ख्याल से ही आएगा। तो क्या आप इन आतंकवादियों और मानवता के दुश्मनों को प्रश्रय देकर देश को ही नहीं बल्कि अपनी पीढ़ी को ही बर्बाद करना चाहते हैं?
यदि आप सच में मुस्लिम के हिमायती हैं तो देश में रह रहे मुस्लिमों के पक्ष में काम करें। उनके शिक्षा और जीवनशैली में सुधार करें। सच्चर कमेटी की बताई कमियों को दूर करने की कोशिश करें जो आपकी धर्मनिरपेक्ष सरकार द्वारा छोड़ी गई सौगात है।
★★★★★★★★★★★★★
सुशील कुमार भारद्वाज

रविवार, 1 दिसंबर 2019

हत्यारा (कविता) : सुशील कुमार भारद्वाज

                                                   
हत्यारा
★★★★★★★

आँखों के भ्रम को यूँ न दिल से लगाइए कि
दिल और दिमाग काम करना ही कर दे बंद सही में।
आखिर किस बेजा पर एक हत्यारे को सही
और दूसरे को गलत करार देते हो?
हत्यारा तो केवल हत्यारा होता है।
वह जिस्म का हत्यारा है तो
मानवता और इंसानियत कहाँ शेष बची है?
ढ़ूंढ़ रहे हो तुम हत्यारे की जाति-धर्म?
कहाँ ढ़ूढ़ पाओगे तुम संस्कार और रिश्ते?
सभी यहीं पले-बढ़े हैं, हमसब के बीच!
हत्यारे को तो तुम पैदा कर रहे हो हर रोज
अपनी स्वार्थपरता की अँधी दौड़ में।
किसी हत्यारे को पूजते हो घर- मंदिर में,
और किसी हत्यारे को देते हो गाली!
तुम ही तो हत्यारों के लिए आते हो अदालतों में,
और देते हो मानवाधिकार की दलील।
कौन कहता है कि नहीं बैठा है हत्यारा
घर से बाहर तक अपने घात में?
जरा-सी गुस्ताखी तो करो
हत्यारे की विरोध की।

★★★★★★★★★★★★★
सुकुभा

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019

आज के दौर में रावण वध

दशहरा के अंतिम बेला में अब रावण-वध होगा। अजी, रावण का वध क्या होगा? उसे तो जलाया जाएगा और लोग खुश होंगें कि रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले में लगे पटाखों की गूँज दूर तक जाएगी और एक अलग माहौल बनेगा।




ये सिर्फ पटना में होता है ऐसी बात नहीं है। अब तो ये छोटे -छोटे गाँवों में भी आयोजित होने लगा है, शहरों और महानगरों की कौन पूछता है?

सबसे अजीब लगता है कि पर्यावरण को काफी नुकसान पहुँचा करके भी लोग आह्लादित होते हैं। लोग भीड़ में नुकसान सहकर भी मजा लेंतें हैं। और तो और, रावण के रूप में रूपये को जलाकर खुश हो लेते हैं और असली रावण को समाज में जब-तब देखकर घिघी बँध जाती है। जबकि लोगों को उससे प्रेरणा लेनी चाहिए। आत्मबल और आत्मविश्वास को बढ़ाना चाहिए। अपने अंदर और आसपड़ोस में घर जमाये बुराई को फौरन बाहर निकाल देना चाहिए। समाज में मिलने वाले रावण का प्रतिकार और वहिष्कार करना चाहिए।

लेकिन अफसोस कि इस पूँजीवादी युग में हर चीज का सीधा संबंध पूँजी और किसी के पेट से जुड़े रोजी-रोटी से होता है। अच्छा है बुरा है- सोचने की जरूरत ही नहीं है। जबकि पूजा-पाठ पूर्णतः आस्था की बात है। इसे फालतू के बाह्याडंबर से दूर रखना चाहिए नहीं तो आनेवाली पीढ़ी जरूर खुद को इससे दूर करने लगेगी। वैसे भी नये जमाने के लोग पर्व-त्योहार को इवेंट के रूप में सेलिब्रेट करने लगे हैं आस्था की बजाय।

★★★★★★★★★★★★★★★★★★★
सुशील कुमार भारद्वाज

शनिवार, 5 अक्टूबर 2019

पटना बाढ़ डायरी : सरकार मस्त जनता पस्त

आज फिर शनिवार आ गया। वह दिन भी शनिवार ही था जब पहली बार बीच शहर में पानी जमा था। नहीं पटना शहर का कुछ हिस्सा एक दिन की बारिश में  ही डूब गया था।




साजिश थी या नहीं ये तो कोई नहीं बता सकता क्योंकि बहत्तर घंटा पहले भारी बारिश की संभावना व्यक्त की गई थी और उस पर किसी का नियंत्रण नहीं है। नाले की सफाई आदि की बात बहुत घिसीपिटी है। सरकार की नाकामी की बात करना, किसी निर्लज्ज को महत्त्वपूर्ण बनाना है।

महत्त्वपूर्ण महज इतना है कि नुकसान हुआ जनता का और मालामाल हुई सरकार। जो कष्ट जलकैदी बन लोगों ने भोगे उसके बदले में कोई राहत तो संभव ही नहीं। जिन सामानों का नुकसान हुआ उसका मुआवजा सरकार तो देगी नहीं। लेकिन भिखमंगे की तरह राहत कोष में दान के नाम पर पोस्टर-बैनर पहले जारी कर दिये सरकार ने। साथ-ही-साथ केंद्र सरकार से भी माँगने पहुंच गये। स्वाभाविक ही था कि झोली में कुछ न कुछ आनी ही है।

और सबसे बड़ी बात की राहत कार्य आदि का लेखा-जोखा रखने का रिवाज ही नहीं है। जो है सो घर भरने से ही मतलब है। एक बार लेखा-जोखा भी हुआ तो पटना के डीएम बेचारे गौतम गोस्वामी जी असमय ही जेल में रहते हुए ही दूसरी दुनिया को कूच कर गये।

खैर, अंतिम बात यही कि अमूमन सरकार बाढ़-सुखाड़ का इंतजार ही करती है ताकि घर में हरियाली और चमक-धमक बनी रहे।

★★★★★★★★★★★★★★★★
सुशील कुमार भारद्वाज

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2019

बाढ़ रूपी जल समस्या से पीड़ित पटना

क्या यह मान लिया जाय कि #नीतीश_कुमार का अंत आ गया है? प्रकृति ही उनके अहम को तोड़ेगी उनकी नाकामियों की बदौलत? यह आश्चर्य नहीं कि शुक्रवार की रात शुरू हुई समस्या अभी भी बदस्तूर जारी है। दो दिन से बारिश भी बंद है लेकिन सोमवार की रात बीतने को है और पानी जस की तस है। जलकैदी बने लोग कालापानी को याद कर रहे हैं। वे परिकल्पना कर रहे हैं कि कालापानी की सजा भी कुछ ऐसी ही होती होगी। कोई मदद नहीं। खुद के बूते जिओ जब तक कर सकते हो संघर्ष। बिजली, पानी और भोजन के अभाव में आप जिंदगी की परिकल्पना मात्र कर सकते हैं। सरकारी व्यवस्था में जो भ्रष्टाचार है वह सरेआम इस मुसीबत में भी है। जो रक्षक हैं वे भी चंद रूपयों की खातिर अपनी मानवता बेच चुके हैं। शायद गलती उनकी नहीं, उनकी मानसिकता की है जो धीरे धीरे कई वर्ष में उन्हें पत्थरदिल स्वार्थी बना गया है। जिंदगी मशीन की तरह हो गई है तो फिर मानवता और इंसानियत की बात भी तो बेईमानी ही लगती है। जैसे डॉक्टर आपकी मजबूरियों को समझने की बजाय आपके शरीर से धीरे धीरे खून निकालते रहता है, वैसा ही तो आज पूरा समाज हो गया है।



ज्यों ज्यों दिन बीतते जा रहा है लोगों के मन में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। सहायता तो दूर सहानुभूति के भी शब्द कहीं से सुनाई नहीं पड़ रहा है। न मुख्यमंत्री न कोई और मंत्री कुछ भी स्पष्ट रूप में बोलने की स्थिति में है। सबको काठ मार गया है। शुक्र है कि अभी चंद सीटों के लिए ही उपचुनाव होना है फिलवक्त। लेकिन इसी समय अगली वर्ष नेता जनता के सामने वोटों की भीख माँग रहे होंगें।
हालांकि सच्चाई तो आनेवाला समय बताएगा कि लोग जाति-धर्म से उठकर कुछ विचार कर पाते हैं या अपनी दकियानूसी विचारों में खोकर ही अपने दर्द को दबा लेंगें? विकल्प है कि नहीं? यह विचार का विषय नहीं है क्योंकि इसी कमजोरी का फायदा सामनेवाला उठाता है। आज जिसे आप विकल्प मानते हैं, वर्षों पहले भी तो वह नहीं था। बदलाव या परिवर्तन ही समाज और देश को जागरूक करता है। लेकिन देखना यह भी होगा कि जनता अपने लिए क्या तय करती है और किससे वह संतुष्ट है? हमारे और आपके विचारों से उन्हें कोई लेना देना नहीं है।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★
सुशील कुमार भारद्वाज

रविवार, 29 सितंबर 2019

पटना है पानी पानी दुर्गापूजा से पहले ही

दुर्गापूजा का आज हो गया है आगाज। लेकिन एक दिन पहले से ही है #पटना पानी में बेहाल। लक्षण देखकर तो मान लिया था कि इस बार दुर्गा पूजा में घूमना होगा थोड़ा मुश्किल, लेकिन ये ना सोचा था कि लोग शाम में आरती दिखाने के लिए भी जाएंगे तरस? कहाँ ढ़ूढ़ेंगें वे उन आस्था की मूर्तियों को आसपास में? गर जो याद भी आई पत्थर की मूर्तियों से सजे मंदिर की, तो कौन जाएगा इतनी दूर डूब कर छाती भर पानी में? भक्ति दिखाने के लिए मन चंगा तो कठौती में गंगा भी काफी है।








लेकिन बात यहीं रूकती तो नहीं! दो दिन बाद लोग क्या खाएंगे-पीएंगे? सब्जी और फल यूँ ही दुर्गापूजा के नाम पर महँगा होता, अब तो सोचना ही नहीं है। सोचता हूँ तो बस इतना कि जिस शहर को स्मार्ट बनाने के लिए अरबों रूपये उड़ाये गये वो एक दिन की बारिश को भी थाम न सका। और चुप्पी लादे बैठे हैं सारे आला-अधिकारी। जो कोई चूँ चाँ कर रहे हैं तो सिर्फ अगली लूटपाट की तरकीबों की तलाश में।
शर्म मगर आती नहीं उन बेहूदा मंत्रियों और अय्याश अधिकारियों को। वे फिर सक्रिय नजर आएंगे उपचुनाव वाले क्षेत्र में। फिलवक्त तो विधायक और नेता खुद लगे हैं अपनी जान बचाने को। नंगे को कोई कितना नंगा करेगा? इसीलिए चुप्पी में कोई पूछ भी नहीं रहा कि गंगा खतरे के निशान से कितना ऊपर है? कोई नहीं जानना चाह रहा कि बीच गंगा के पेट में खड़े आलीशान भवनों के नाले से शहर  को कोई खतरा तो नहीं। पूछ कर ही क्या करना है जब वे बारिश की ही पानी में डूब रहे हैं। जनता की तो यही नियति है लेकिन राजा भी डूबा है सत्ता के नशे में। बोलता है यूँ जैसे कि वही ईश्वर हो। लेकिन बेशर्म राजा को गाली देना भी तो खुद की ही तौहीन है।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
सुशील कुमार भारद्वाज

मंगलवार, 24 सितंबर 2019

जनेऊ कहानी संग्रह पर अभिशांत की टिप्पणी

#जनेऊ_कहानी_संग्रह
अभिशांत

कहानी शीर्षक और संबंधित टिप्पणी के क्रम में पढ़े:-

जनेऊ - थोड़ी लम्बी कहानी है। कहानी के बीच - बीच में विचारधारा इस तरह घुस गई है कि कहानी की ज़मीन दबाव से उभर गई है। इस पर चलने में (पढ़ते में) थोड़ी परेशानी का अनुभव होता है। परिणामस्वरूप कहानी की गति मंद है।

इंतज़ार, मंझधार - यहाँ पर लेखक की दुविधा साफ़ नज़र आती है। वे कहना क्या चाहते हैं पूरी तरह से स्पष्ट नहीं होने के कारण कहानी खुल नहीं पाती है।

उस रात - शुरू में वन नाइट स्टैंड जैसी लगती है लेकिन अंत आते-जाते कहानी बदल जाती है। हालांकि ऐसा नॉर्मली होता नहीं सिवाय फिल्मों के। लेखक की कल्पना या फैंटेसी कहा जा सकता है। ठीक है।

धर्म, जाति बदल लीजिए - विषय तो अच्छा है लेकिन कहानी में और अच्छे से उतारा जा सकता तो प्रभावी लगता। आजकल जाति और धर्म के आधार पर खाने में भेदभाव कहाँ दिखता है ख़ासकर कामकाजी दफ़्तर में। हाँ आंतरिक उधेड़बुन ज़रूर हो सकता है। पर दोनों कहानी मिलकर एक हो सकती थी।

शायद कोई नहीं - एक अजनबी डायरी के माध्यम से कहानी बुनी गई है। पढ़ने में ठीक है। थोड़ी लम्बी और विवरणात्मक है।

पगली का तौलिया - छोटी होती हुई भी कहानी अपने उद्देश्य को पूरा करती है। पठनीय भी है।

जाति भाई, बिहार वाली बस, निकाह की दावत- ये तीनों छोटी कहानियाँ अच्छी बनी हैं और पठनीय हैं। हालाँकि निकाह की दावत में यह पता नहीं चलता कि मास्टर जी के साथ असल में क्या परेशानी आयी। अपनी बोलचाल और स्थानीयता से स्वभाविक लगती हैं।

निर्लज्ज - ठीक है। लेकिन अधिक मुखर है। शायद ऐसा होता भी हो लेकिन यह सर्वव्यापी तो नहीं है। स्थानीय भाषा कहानी में आने से रूचिकर और विश्वसनीय बनी है।

नंदिनी - जनेऊ से विस्तार लेकर बनायी गयी कहानी है। हालाँकि 'जनेऊ' के प्रोफेसर 'नंदिनी' में आकर इतने क्रूर और पाखंडी बन गए, ये तथ्य विरोधाभास पैदा करता है।

ऐसा लगता है जैसे लेखक पहले से ही पात्रों के बारे में अपनी राय बना लेते हैं और कहानी में उससे ज़रा भी नहीं डिगते। मेरे विचार में यह हठधर्मिता कहानी को बहुत बार पूर्वाग्रह की एकतरफ़ा लीक पर मोड़ देती है जो एकरसता और दोहराव पैदा करती है।

यह भी हो सकता है यह लेखक का अपना स्टाइल हो और बहुत लोगों की राय अन्यथा भी हो। ये मेरा निजी अनुभव है।

बहरहाल, नये और पहले कहानी - संग्रह के लिए लेखक सुशील कुमार भारद्वाज जी को बधाई और शुभकामनाएँ। और हाँ पटना के बारे में बहुत - सी जानकारियों से रूबरू करवाने के लिए लेखक को धन्यवाद।

शंभु पी सिंह की दलित बाभन का लोकार्पण




कॉलेज ऑफ कॉमर्स आर्ट्स एंड साइंस के सभागार में प्रलेस एवं कॉलेज ऑफ कॉमर्स ऑर्ट्स एंड साइंस के संयुक्त तत्वावधान में शंभु पी सिंह के कथा-संग्रह दलित बाभन का लोकार्पण एवं विचार गोष्ठी आयोजित किया गया।

वरिष्ठ कथाकार श्रीमती मृदुला बिहारी जयपुर से शिरकत करने पधारी थीं।मुख्य अतिथि के रूप में प्रो.डॉ रामवचन राय, विधान पार्षद के साथ शैलेश्वर सती प्रसाद की अध्यक्षता में कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।मुख्य वक्ता के रूप में डॉ शिव नारायण, डॉ कासिम खुरशीद, कोलकाता विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ अमरनाथ,वरिष्ठ कवि प्रभात सरसिज,वरिष्ठ साहित्यकार श्री राम तिवारी के अतिरिक्त युवा कथाकार सुशील भारद्वाज और युवा कवि राजकिशोर राजन ने भी अपने विचार व्यक्त किया।फतुहा से पधारे लघु कथाकार श्री रामयतन यादव जी ने कहानी के कई पक्षों पर बात की। प्रगतिशील लेखक संघ की अध्यक्ष डॉ रानी श्रीवास्तव ने मंच संचालन की जिम्मेदारी संभाली और कॉलेज के प्राचार्य डॉ तपन कुमार शांडिल्य ने अतिथियों का स्वागत के साथ कहानी संग्रह की शीर्षक कहानी पर अपने विचार व्यक्त किया।इस अवसर पर शहर के कई गणमान्य साहित्यकार और साहित्य प्रेमी उपस्थित थे।जिसमें कवियत्री किरण सिंह, साहित्यकार डॉ मंगला रानी,कवि सिध्देश्वर,लोकगायिका नीतू नवगीत के अतिरिक्त समाजसेवी डॉ पी एस दयाल यति भी शामिल थे।

दलित बाभन अपने देशकाल की भावना पर लिखी गई कहानी है लेकिन लेखक कभी भावना में बहता नहीं। कहानी में न आदर्श है न समाधान। इन कहानियों में जीवन संघर्ष की कड़वी सच्चाई है। मृदुला बिहारी अपना यह वक्तव्य दे रही थीं शंभु पी सिंह के कथा संग्रह दलित बाभन के लोकार्पण एवं विचार गोष्ठी में।

मौके पर स्वागत करते हुए कॉलेज के प्राचार्य तपन कुमार शांडिल्य ने कहा कि दलित बाभन लिखकर लेखक ने दलितों को जागरूक करने की कोशिश की है। वहीं कासिम खुर्शीद ने कहा कि दलित बाभन में कंटाहा ब्राह्मण की दयनीय स्थिति को रेखांकित की गई है। नायिका कहती है कि दलित को तो कानूनी संरक्षण प्राप्त है लेकिन कंटाहा को वो भी नसीब नहीं।
राजकिशोर राजन ने कहा कि दलित बाभन कथा संग्रह भारतीय समाज में हो रहे आमूल-चूल परिवर्तन को रेखांकित किया गया है। शंभु जी की प्रत्येक कहानी में एक सवाल पाठकों के लिए छोड़ती है।
शिवनारायण ने कहा कि इस संग्रह में कहानियों का संग्रह में जिस शिल्प का प्रयोग किया गया है वह हमें विमलमित्र की याद दिलाती है। संग्रह में समाज के विभिन्न यथार्थ को उकेरने की सफल कोशिश की गई है।
रामवचन राय ने अपनी बात रखते हुए कहा कि शंभु जी की कहानियां बेलौस और संतुलित है। यही सबसे बड़ी उपलब्धि है।
कार्यक्रम का संचालन कर रही रानी श्रीवास्तव ने कहा कि इस संग्रह में दहेज और आरक्षण के मुद्दे को भी उठाया गया है।
अपनी लेखकीय बात रखते हुए शंभु पी सिंह ने कहा कि मेरी कहानी किसी को हँसाती है, रूलाती है। यही हमारी सफलता है।
अध्यक्षीय भाषण देते हुए शैलेश्वर सती प्रसाद ने अपनी बात रखी और राजकिशोर राजन ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

बुधवार, 11 सितंबर 2019

अस्मुरारी नंदन मिश्र का पत्र जनेऊ के लेखक सुशील कुमार भारद्वाज के नाम





प्रिय मित्र Sushil Kumar Bhardwaj,
सप्रेम नमस्कार!
आपका कहानी-संग्रह- 'जनेऊ' प्रकाशन से मँगवाकर पढ़ गया|
मैं पत्र के रूप में किताब पर लिखने से कुछ संकोच कर रहा था, लेकिन इस शैली में मैंने यहाँ लिखा है, तो लगा इसी रूप को अपनाया जाए|
सबसे पहले तो पहली किताब के लिए बधाई देता हूँ| पहली रचना हर किसी के लिए महत्त्वपूर्ण होती है| यदि मेरी जानकारी दुरुस्त हो तो यह रचना पहले किंडल पर आ चुकी थी, यह शायद उसी की किताब रूप में प्रस्तुति है|
“जनेऊ” संग्रह में शामिल कहानियों की सबसे अच्छी बात यह लगी कि इसका लोकल स्पष्ट है| आपने तथ्यात्मक जानकारी दी है, जिससे विशेष क्षेत्र के प्रति एक उत्सुकता और आकर्षण जगता है, लेकिन कहीं-कहीं ऐसा भी प्रतीत होता है, जैसे कहानी उसे छूकर निकल जाती है|
मुझे छोटे आकार की कहानी जैसे “पगली का तौलिया” अथवा “धर्म” विशेष पसंद आयी| लम्बी कहानियों में यथा ‘जनेऊ’ और ‘नंदिनी’ में कुछ बनावटीपन सा लगा|
आपकी कुछ कहानियों को पढ़कर लगता है, जैसे एक ही घटना से कई-कई कहानियाँ निकाल लेने का प्रयास हो| इस सन्दर्भ में ‘धर्म’, ‘मँझधार’ और ‘जाति बदल लीजिए’ कहानियों को देखा जा सकता है| ‘जाति बदल लीजिए’ कहानी में ‘धर्म’ और ‘मँझधार’ दोनों कहानियाँ समाहित हैं| तीनों कहानियों की नायिका का नाम सोफिया होने से ही यह बात नहीं कह रहा हूँ बल्कि चिंतन, विचार, संवाद और शैली भी एक हैं| अंतर बस इतना है कि ‘धर्म’ और ‘मँझधार’ दो कहानियाँ, जबकि ‘जाति बदल लीजिए’ दोनों को मिलाकर तीसरी| ऐसी स्थिति में बाकी दो की आवश्यकता नहीं बचती|
यही बात कमोबेश जनेऊ और नंदिनी के लिए भी सच है| ‘जनेऊ’ की ‘शिवानी’ ही ‘नंदिनी’ की ‘नंदिनी’ है| दोनों कहानियों को पढ़कर ऐसा लगता है, जैसे एक विशेष सोच को साबित करने के लिए ये कहानियाँ लिखी गयी हैं| आपकी किताब के परिचय में लिखा है- “सामंती जीवन की मार्मिक कहानियाँ”| जबकि सच्चाई यह है कि यह सामंती मूल्यों के टूटने की बेचैनी की कहानियाँ है| मानो लेखक उस टूटन से दुखी है और इन कहानियों द्वारा अपनी खुन्नस निकालना चाहता हो| यदि इस विषय पर एक कहानी होती तो परिस्थिति-विशेष की कहानी मानकर उसका मूल्यांकन किया जा सकता था, लेकिन दोनों मिलाकर लेखक की सोच पर सवाल खड़े करते हैं| जनेऊ में प्रोफ़ेसर चौधरी और उनके प्रेम प्रसंग में स्पष्ट ही मटुकनाथ और जूली की छवि है| नंदिनी में भी यही प्रोफ़ेसर हैं, यद्यपि नाम वही नहीं है|
ऐसी कहानियाँ एक दूसरे रूप में “लव-जिहाद” के प्रचारित राजनीति से आतंकित नज़र आती हैं| दलित-वर्ग का आदमी सवर्ण युवती को उसी तरह फँसा लेता है| यह अनायास नहीं है कि अंतरधार्मिक प्रेम-प्रसंग में जाति और धर्म बदलने की बात मुसलमान चरित्र से कहवायी जाती है, भले ही वह स्त्री-चरित्र हो|
इस तरह से देखें तो यह कहानियाँ सामंती जीवन की ही कहानी नहीं रह जाती, बल्कि सामंती मूल्यों के सरंक्षण की कहानियाँ हो जाती हैं| इस मामले में मेरी उत्सुकता आपकी आगे की कहानियों के लिए है |
एक ज़रूरी बात यह कि भाषा में लापरवाही दिखती है| बिहारी हिंदी में जो दोष है, वह इन कहानियों की भाषा में अविरल रूप में मौजूद है| वह इस तरह भी नहीं आया है कि उसे बिहारीपन के प्रयोग के  रूप में देखें, क्योंकि फिर अन्य विशेषताएँ भी आनी चाहिए| हम जो ‘ने’ के प्रयोग को छोड़ देते हैं और ‘सीता खायी’, ‘तुम कही’ जैसे प्रयोग करते हैं, इस किताब में ये प्रयोग वैसे ही शामिल है| ज्यादातर स्त्री पात्र के साथ यह समस्या रही है- ‘आज धोखा नहीं दी होती’(जनेऊ), ‘झट से जवाब दी’(इन्तजार), जैसे ख़ूब प्रयोग हैं|
मैं कहानियों का बढ़िया पाठक अपने को नहीं मानता और न ही आलोचना की क्षमता है| ऐसा भी देखता रहा हूँ कि जिन कहानियों ने मुझे ज़रा भी प्रभावित नहीं किया, वह पूरी किताब बहु-पुरस्कृत रही| तो मेरा कहा कोई अंतिम नहीं है| आप इसपर विचार कर सकते हैं, अथवा छोड़ भी सकते हैं|
मैं आपके रचनात्मक रहने की दुआ करता हूँ और उम्मीद करता हूँ कि आपकी आगामी कहानियाँ आपके कहानी-लेखन में ही विकास लेकर नहीं आए, बल्कि हिंदी कहानी के विकास में भी योगदान दे| धन्यवाद |
आपका-
अस्मुरारी
अस्मुरारी नंदन मिश्र