मंगलवार, 1 अक्टूबर 2019

बाढ़ रूपी जल समस्या से पीड़ित पटना

क्या यह मान लिया जाय कि #नीतीश_कुमार का अंत आ गया है? प्रकृति ही उनके अहम को तोड़ेगी उनकी नाकामियों की बदौलत? यह आश्चर्य नहीं कि शुक्रवार की रात शुरू हुई समस्या अभी भी बदस्तूर जारी है। दो दिन से बारिश भी बंद है लेकिन सोमवार की रात बीतने को है और पानी जस की तस है। जलकैदी बने लोग कालापानी को याद कर रहे हैं। वे परिकल्पना कर रहे हैं कि कालापानी की सजा भी कुछ ऐसी ही होती होगी। कोई मदद नहीं। खुद के बूते जिओ जब तक कर सकते हो संघर्ष। बिजली, पानी और भोजन के अभाव में आप जिंदगी की परिकल्पना मात्र कर सकते हैं। सरकारी व्यवस्था में जो भ्रष्टाचार है वह सरेआम इस मुसीबत में भी है। जो रक्षक हैं वे भी चंद रूपयों की खातिर अपनी मानवता बेच चुके हैं। शायद गलती उनकी नहीं, उनकी मानसिकता की है जो धीरे धीरे कई वर्ष में उन्हें पत्थरदिल स्वार्थी बना गया है। जिंदगी मशीन की तरह हो गई है तो फिर मानवता और इंसानियत की बात भी तो बेईमानी ही लगती है। जैसे डॉक्टर आपकी मजबूरियों को समझने की बजाय आपके शरीर से धीरे धीरे खून निकालते रहता है, वैसा ही तो आज पूरा समाज हो गया है।



ज्यों ज्यों दिन बीतते जा रहा है लोगों के मन में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। सहायता तो दूर सहानुभूति के भी शब्द कहीं से सुनाई नहीं पड़ रहा है। न मुख्यमंत्री न कोई और मंत्री कुछ भी स्पष्ट रूप में बोलने की स्थिति में है। सबको काठ मार गया है। शुक्र है कि अभी चंद सीटों के लिए ही उपचुनाव होना है फिलवक्त। लेकिन इसी समय अगली वर्ष नेता जनता के सामने वोटों की भीख माँग रहे होंगें।
हालांकि सच्चाई तो आनेवाला समय बताएगा कि लोग जाति-धर्म से उठकर कुछ विचार कर पाते हैं या अपनी दकियानूसी विचारों में खोकर ही अपने दर्द को दबा लेंगें? विकल्प है कि नहीं? यह विचार का विषय नहीं है क्योंकि इसी कमजोरी का फायदा सामनेवाला उठाता है। आज जिसे आप विकल्प मानते हैं, वर्षों पहले भी तो वह नहीं था। बदलाव या परिवर्तन ही समाज और देश को जागरूक करता है। लेकिन देखना यह भी होगा कि जनता अपने लिए क्या तय करती है और किससे वह संतुष्ट है? हमारे और आपके विचारों से उन्हें कोई लेना देना नहीं है।
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सुशील कुमार भारद्वाज

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