#जनेऊ_कहानी_संग्रह
कहानी शीर्षक और संबंधित टिप्पणी के क्रम में पढ़े:-
जनेऊ - थोड़ी लम्बी कहानी है। कहानी के बीच - बीच में विचारधारा इस तरह घुस गई है कि कहानी की ज़मीन दबाव से उभर गई है। इस पर चलने में (पढ़ते में) थोड़ी परेशानी का अनुभव होता है। परिणामस्वरूप कहानी की गति मंद है।
इंतज़ार, मंझधार - यहाँ पर लेखक की दुविधा साफ़ नज़र आती है। वे कहना क्या चाहते हैं पूरी तरह से स्पष्ट नहीं होने के कारण कहानी खुल नहीं पाती है।
उस रात - शुरू में वन नाइट स्टैंड जैसी लगती है लेकिन अंत आते-जाते कहानी बदल जाती है। हालांकि ऐसा नॉर्मली होता नहीं सिवाय फिल्मों के। लेखक की कल्पना या फैंटेसी कहा जा सकता है। ठीक है।
धर्म, जाति बदल लीजिए - विषय तो अच्छा है लेकिन कहानी में और अच्छे से उतारा जा सकता तो प्रभावी लगता। आजकल जाति और धर्म के आधार पर खाने में भेदभाव कहाँ दिखता है ख़ासकर कामकाजी दफ़्तर में। हाँ आंतरिक उधेड़बुन ज़रूर हो सकता है। पर दोनों कहानी मिलकर एक हो सकती थी।
शायद कोई नहीं - एक अजनबी डायरी के माध्यम से कहानी बुनी गई है। पढ़ने में ठीक है। थोड़ी लम्बी और विवरणात्मक है।
पगली का तौलिया - छोटी होती हुई भी कहानी अपने उद्देश्य को पूरा करती है। पठनीय भी है।
जाति भाई, बिहार वाली बस, निकाह की दावत- ये तीनों छोटी कहानियाँ अच्छी बनी हैं और पठनीय हैं। हालाँकि निकाह की दावत में यह पता नहीं चलता कि मास्टर जी के साथ असल में क्या परेशानी आयी। अपनी बोलचाल और स्थानीयता से स्वभाविक लगती हैं।
निर्लज्ज - ठीक है। लेकिन अधिक मुखर है। शायद ऐसा होता भी हो लेकिन यह सर्वव्यापी तो नहीं है। स्थानीय भाषा कहानी में आने से रूचिकर और विश्वसनीय बनी है।
नंदिनी - जनेऊ से विस्तार लेकर बनायी गयी कहानी है। हालाँकि 'जनेऊ' के प्रोफेसर 'नंदिनी' में आकर इतने क्रूर और पाखंडी बन गए, ये तथ्य विरोधाभास पैदा करता है।
ऐसा लगता है जैसे लेखक पहले से ही पात्रों के बारे में अपनी राय बना लेते हैं और कहानी में उससे ज़रा भी नहीं डिगते। मेरे विचार में यह हठधर्मिता कहानी को बहुत बार पूर्वाग्रह की एकतरफ़ा लीक पर मोड़ देती है जो एकरसता और दोहराव पैदा करती है।
यह भी हो सकता है यह लेखक का अपना स्टाइल हो और बहुत लोगों की राय अन्यथा भी हो। ये मेरा निजी अनुभव है।
बहरहाल, नये और पहले कहानी - संग्रह के लिए लेखक सुशील कुमार भारद्वाज जी को बधाई और शुभकामनाएँ। और हाँ पटना के बारे में बहुत - सी जानकारियों से रूबरू करवाने के लिए लेखक को धन्यवाद।
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| अभिशांत |
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जनेऊ - थोड़ी लम्बी कहानी है। कहानी के बीच - बीच में विचारधारा इस तरह घुस गई है कि कहानी की ज़मीन दबाव से उभर गई है। इस पर चलने में (पढ़ते में) थोड़ी परेशानी का अनुभव होता है। परिणामस्वरूप कहानी की गति मंद है।
इंतज़ार, मंझधार - यहाँ पर लेखक की दुविधा साफ़ नज़र आती है। वे कहना क्या चाहते हैं पूरी तरह से स्पष्ट नहीं होने के कारण कहानी खुल नहीं पाती है।
उस रात - शुरू में वन नाइट स्टैंड जैसी लगती है लेकिन अंत आते-जाते कहानी बदल जाती है। हालांकि ऐसा नॉर्मली होता नहीं सिवाय फिल्मों के। लेखक की कल्पना या फैंटेसी कहा जा सकता है। ठीक है।
धर्म, जाति बदल लीजिए - विषय तो अच्छा है लेकिन कहानी में और अच्छे से उतारा जा सकता तो प्रभावी लगता। आजकल जाति और धर्म के आधार पर खाने में भेदभाव कहाँ दिखता है ख़ासकर कामकाजी दफ़्तर में। हाँ आंतरिक उधेड़बुन ज़रूर हो सकता है। पर दोनों कहानी मिलकर एक हो सकती थी।
शायद कोई नहीं - एक अजनबी डायरी के माध्यम से कहानी बुनी गई है। पढ़ने में ठीक है। थोड़ी लम्बी और विवरणात्मक है।
पगली का तौलिया - छोटी होती हुई भी कहानी अपने उद्देश्य को पूरा करती है। पठनीय भी है।
जाति भाई, बिहार वाली बस, निकाह की दावत- ये तीनों छोटी कहानियाँ अच्छी बनी हैं और पठनीय हैं। हालाँकि निकाह की दावत में यह पता नहीं चलता कि मास्टर जी के साथ असल में क्या परेशानी आयी। अपनी बोलचाल और स्थानीयता से स्वभाविक लगती हैं।
निर्लज्ज - ठीक है। लेकिन अधिक मुखर है। शायद ऐसा होता भी हो लेकिन यह सर्वव्यापी तो नहीं है। स्थानीय भाषा कहानी में आने से रूचिकर और विश्वसनीय बनी है।
नंदिनी - जनेऊ से विस्तार लेकर बनायी गयी कहानी है। हालाँकि 'जनेऊ' के प्रोफेसर 'नंदिनी' में आकर इतने क्रूर और पाखंडी बन गए, ये तथ्य विरोधाभास पैदा करता है।
ऐसा लगता है जैसे लेखक पहले से ही पात्रों के बारे में अपनी राय बना लेते हैं और कहानी में उससे ज़रा भी नहीं डिगते। मेरे विचार में यह हठधर्मिता कहानी को बहुत बार पूर्वाग्रह की एकतरफ़ा लीक पर मोड़ देती है जो एकरसता और दोहराव पैदा करती है।
यह भी हो सकता है यह लेखक का अपना स्टाइल हो और बहुत लोगों की राय अन्यथा भी हो। ये मेरा निजी अनुभव है।
बहरहाल, नये और पहले कहानी - संग्रह के लिए लेखक सुशील कुमार भारद्वाज जी को बधाई और शुभकामनाएँ। और हाँ पटना के बारे में बहुत - सी जानकारियों से रूबरू करवाने के लिए लेखक को धन्यवाद।


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